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योग भूमि भारत

योग भूमि भारत

By संजय कुमार स्वामी

आज भारत पुन: दुनिया का सिरमौर बनने की ओर अग्रसर है। उत्तर में हमने एवरेस्ट पर विजय पताका फहराए हैं। पवित्र कैलाश मानसरोवर की प्रतिवर्ष हम श्रद्धाभाव से यात्रा करते हैं। दक्षिण में विशाल हिन्द महासागर जो भारत माता के चरण पखारता है उसकी कन्याकुमारी तट पर हम ‘ओणम’ उत्सव के साथ अर्चना करते हैं। अंटार्कटिका पर हमारे वैज्ञानिक अनेक वर्षों में लगातार शोध कर रहे हैं। चन्द्रमा पर भारतीय अन्तरिक्ष यात्री हो आये।

पूरी दुनियां में केवल भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां भूमि को माता का गौरव प्राप्त है। विश्व के किसी भी देश को यथा अमेरिका मां या इंग्लैंड मां या पाकिस्तान मां के नाम से नहीं पुकारा जाता। केवल अपना देश ही ऐसा है जहां भारत माता की वंदना, पूजा, अर्चना की जाती है। मां भारती की आरती उतारी जाती है। हमारे देश में अनेक स्थानों पर भारत माता के मंदिर बने हुए हैं जहां देवी, देवताओं की भांति भारत माता की नित्य पूजा-अर्चना की जाती है। हरिद्वार में स्वामी अवधेशानन्द जी ने विशाल सात मंजिला ‘भारत माता मंदिर’ निर्माण कर सम्पूर्ण भारत का लघु दर्शन कराया है। यह मंदिर भारत की एकता, अखण्डता, सामाजिक समानता, समरसता की झांकी है।

हमने मातृ-भू को एक जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं माना कि जो केवल भोग के लिए है, मल-मूत्र त्याग के लिए है, बल्कि हमने उसे जीवनदायिनी माना, इसे मां की गोद माना है। वेदों में कहा गया है – ”माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्या:’’ भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। जिस प्रकार माता सन्तान का लालन-पालन करती है, हर मौसम में उसके लिए वस्त्रादि की व्यवस्था करती है, उसी प्रकार शस्य, श्यामला, सुजला, सुफला यह धरती मां मौसमानुसार शाक, भाजी, तुफल, अन्न धान आदि उपलब्ध कराती है। भारतीय उपमहाद्वीप ही ऐसा क्षेत्र है जहां मौसमी वस्तुओं का चक्र अनवरत चलता रहता है। प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य यहां है, परन्तु आवश्यकता है प्रकृति के संसाधनों के उचित उपयोग की, न कि शोषण की। पश्चिम के विद्वानों तथा उनके पिछलग्गू तथाकथित बुद्धिजीवियों ने तो भारत को सपेरों और गोचरों का देश कहा। यहां के निवासियों को प्रकृति पूजक, पेड़ों की पूजा करने वाले कहा। उन्होंने अपनी अंग्रेजी जुबान में भारत को, यहां की संस्कृति को नीचा दिखाने की कुचेष्टा की, परन्तु सत्य यह है कि हिन्दू संस्कृति की मान्यताओं के कारण ही बहुत सारी दुर्लभ वनस्पतियां नष्ट होने से बच गयीं। हमारे यहां तुलसी, पीपल, बड़, आक, बेल, आंवला आदि की पूजा की जाती है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि ये जीवनदायी पौधे हैं। पूजा का एक अर्थ सेवा भी होता है। जहां पश्चिम का दर्शन उपभोग का दर्शन है, वहीं भारतीय दर्शन त्यागयुक्त उपयोग का दर्शन है।

हमने सम्पूर्ण जगत के कल्याण की बात की है। त्याग की भावना के साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमने केवल कहा ही नहीं, बल्कि पूरी दुनियां को एक परिवार माना है। हमने केवल अपने कल्याण की कामना नहीं की, न केवल अपने सुख की चाहत रखी, हमारे पूर्वजों ने तो हजारों सालों से सार्वभौमिक मंगल कामना के सूक्त:- ‘सर्वे भवन्तु: सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु या कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्’ को अपने जीवन में अंगीकृत एवं आत्मसात किया है। हमने न कभी कहा न कभी चाहा कि ‘अहं भवतु सुखिन: या त्वम् भव निरामया:। अहमेव सर्वम् के स्थान पर सर्वेऽपि भवन्तु सुखिन: कहा। हमने सदा सभी के मंगल की कामना परम पिता परमेश्वर से की है। भारतीय दर्शन में यह कहीं नहीं कहा गया कि ईश्वर पर केवल हमारा अधिकार है अथवा यह कि केवल हमारी पूजा पद्धति श्रेष्ठ है। हमारी नीति सबको साथ लेकर चलने की रही है। ऋग्वेद के सूक्तानुसार – ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’

भारतीय संस्कृति का दर्शन ही ‘अनेकता में एकता’ का है। ‘अलग-अलग भाषा, अलग अलग वेश फिर भी अपना एक देश।’ ‘स्वच्छ, सुहाना, सुन्दर देश अपना भारत लगे एक प्रदेश’ तथा ‘पंथ विविध, चिन्तन नाना विध बहुविध कला स्वदेश की’ जैसे गीत इस देश की तरूणाई मस्ती में झूमती गाती है। ‘चेन्नई हो या अमृतसर, अपना देश अपना घर।’ ‘दिल्ली हो या हो गुवाहाटी, अपना देश अपनी माटी।’

ऐसे नारे आज का नौजवान विद्यार्थी लगाता है। ये नारे इस देश की युवा-शक्ति ने चरित्रार्थ किये हैं। व्यवहार, खान-पान, वेशभूषा से पूरा भारत एक सूत्र में बंधा है। इडली-डोसा केवल दक्षिण भारत में ही नहीं खाया जाता। छोले-भठूरे पर अमृतसर या पंजाब का एकाधिकार नहीं है। जैसे हम स्वदेश में मिल-जुलकर भाई-भाई की तरह रहते हैं, वैसा ही हमने विदेशियों का स्वागत स्वदेश में किया है। दुनिया की सभी संस्कृतियों का मुक्त हृदय से हमने स्वागत, सम्मान किया है। अनेक मतों, पंथों को मानने वाले लोग भारत में आते रहते हैं। ‘अतिथि देवो भव:’ यह हमने केवल वाणी से कहा नहीं, व्यवहार से सार्थक किया है। पर  दूसरी संस्कृतियों की कुछ बुराईयां दूरदर्शन, केवल टीवी आदि के माध्यम से हमारे समाज पर बुरा असर छोड़ती है। भ्रष्टाचार, बेईमानी, ऊंच-नीच का भेद ये कुछ सदियों से विदेशी आक्रांताओं के हमलों से आयी बीमारियां हैं, नहीं तो महाराजा विक्रमादित्य, सम्राट चन्द्रगुप्त, अशोक महान आदि के शासनकाल तक इस प्रकार की बातें भारत में कभी सुनी भी नहीं गयीं। ज्यों-ज्यों देश का युवा-वर्ग संस्कारवान, प्रतिभाशाली, ध्येय, निष्ठ, दृढइच्छाशक्ति के साथ अपने ज्ञान चक्षुओं को खोल सूर्य सदृश खड़ा होगा, त्यों ही ये सामाजिक बुराईयों के विषाणु जलकर नष्ट हो जायेंगे।

आज भारत पुन: दुनिया का सिरमौर बनने की ओर अग्रसर है। उत्तर में हमने एवरेस्ट पर विजय पताका फहरायी है। पवित्र कैलाश मानसरोवर की प्रतिवर्ष हम श्रद्धाभाव से यात्रा करते हैं। दक्षिण में विशाल हिन्द महासागर जो भारत माता के चरण पखारता है उसकी कन्याकुमारी तट पर हम ‘ओणम’ उत्सव के साथ अर्चना करते हैं। अंटार्कटिका पर हमारे वैज्ञानिक अनेक वर्षों से लगातार शोध कर रहे हैं। चन्द्रमा पर भारतीय अन्तरिक्ष यात्री हो आये हैं। मंगल ग्रह पर भारत का मंगलयान पहुंच चुका है। भू-गर्भ से संबंधित खोजों में हमारे वैज्ञानिक जुटे हैं।

सेटेलाइट, नाभिकीय परीक्षण, कम्प्यूटर हमारी उंगलियों पर नाचते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय इंजीनियरों का लोहा पूरी दुनिया ने माना है। भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों की हरेक देश में मांग है। व्यापार के क्षेत्र में भी दुनिया के चोटी के पचास उद्योगपतियों में अनेक भारतीय हैं। अध्यात्म, योग व आयुर्वेद में तो भारत का कोई सानी ही नहीं है। हमारे अनेक संत, महात्मा विदेशों में प्रवास कर सभी को आत्मज्ञान व योग की शिक्षा देकर उनके जीवन का कल्याण कर रहे हैं।

दूसरे के दु:ख में दु:खी होना उनके गम में शरीक होना यही भारतीयता है। दुनिया में कहीं भी कोई भी समस्या हो, कोई प्राकृतिक आपदा आयी हो, भारत ने अपने सीमित साधनों के होते हुए भी भरपूर मदद दिया है।

पिछली शताब्दियों में हम पर अनेकों बार विदेशी आक्रांताओं ने हमले किये। वर्तमान में भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, आतंकवादी शक्तियां, नक्सलवादी, माओवादी इस भारत भूमि को खण्डित करने का दुष्चक्र रच रहे हैं। आधुनिकता के नाम पर हम पर लगातार सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं, परन्तु इस सबके बावजूद भारत अपना मस्तक ऊंचा कर अडिग खड़ा है। हम अपनी संप्रभुता को अक्षुण्ण रखे हुए हैं। हमारे मनीषियों की सद्ज्ञान की ताकत तथा कर्मयोगियों का धैर्य व पुरुषार्थ के बल पर हम उन प्रहारों को निष्फल कर हम भारत को पुन: विश्व का सिरमौर बनाने की ओर अग्रसर हैं। मशहूर शायर इकबाल ने कहा था-

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा।।
यूनान मिस्त्र रोमा, सब मिट गये जहां से,
अब तक मगर है बाकी, नामों निशां हमारा।।

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