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आग और राग का कवि: धूमिल

आग और राग का कवि: धूमिल

By सुरेन्द्र अग्निहोत्री

जिदंगी के संघर्षों से जूझते, रोटी के लिए संघर्ष करते धूमिल ने अपने निजी अनुभवों से पाया था कि अपनी भूख के समाधान के लिए रोटी बनाने वाले हाथ इस बात का उत्तर आज तक नहीं पा सके कि भूख की आग बुझाने वाली रोटी क्यों कुछ लोगों के लिए खेल का सामान बन गई है। वे इस प्रश्न से जूझते हुए ही अपनी कविता में पूछा था कि ‘एक तीसरा आदमी भी है/जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है/वह सिर्फ रोटी से खेलता है/ मैं पूछता हूं-/ यह तीसरा आदमी कौन है/ मेरे देश की संसद मौन है।’

हे भाई हे! अगर चाहते हो
कि हवा का रूख बदले
तो एक काम करो-
हे भाई हे!!
संसद जाम करने से बेहतर है
सड़क जाम करो

कवि धूमिल की ये पंक्तियां हमें सोचने को विवश कर देती हैं। 9 नवम्बर 1936 को वाराणसी जनपद के खेवली नामक गांव में जन्मे सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की जीवन यात्रा संघर्ष के पथ पर शुरू हुई थी, जिसके कारण हाईस्कूल से आगे शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाने का कारण रोटी के संघर्ष था। लेकिन, समय और समाज की तलाश उन्हें कलकत्ता ले आई। वहां जंगल विभाग में काम करते हुए मालिक की बात – ‘आई एम पेइंग फॉर माई वर्क, नाट फॉर योर हेल्थ’ के जवाब में धूमिल ने ‘आई एम वार्किंग फॉर माई हेल्थ नॉट फॉर योर वर्क’, कहकर इस्तीफा सौंप दिया। यह बात  कहीं न कहीं उनके चरित्र को रेखांकित करती है। इसे अनुभव से धूमिल ने समझा था और तब कहा था – ”भूख सबसे पहले भाषा को खाती है’’। पर इतना सच जानने के लिए धूमिल ने समीकरण को बारीकी से समझा था। वे जानते थे कि भूख और भाषा का रिश्ता अटूट है, पर वे इनके बीच संतुलन को नितंात आवश्यक मानते थे। चेतावनी के लहजे में उन्होंने लिखा कि, ”अगर तुम्हारी भूख और भाषा में यदि सही दूरी नहीं है तो अपने आप को आदमी मत कहो’’ (संसद से सड़क पृ0 114)। भूख किस प्रकार व्यवस्था का हथियार बनती है, इसे अपने अनुभवों से धूमिल ने शिद्दत से महसूस किया था। व्यवस्था के साथ भाषा और भूख से जुड़े द्वन्द्व की बड़ी बारीक पहचान धूमिल को थी। तभी ‘भाषा की रात’ रचना में चेहरों की ठीक-ठाक पहचान करते हुए लिखते हैं –

चंद चालाक लोगों ने-
जिनकी नरभक्षी जीभ ने
पसीने का स्वाद चख लिया है।
बहस के लिए
भूख की जगह
भाषा को रख दिया है। (संसद से सड़क)

भूख की जगह भाषा को बहस के लिए रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि ”भूख से भागा हुआ आदमी/भाषा की ओर जाएगा’’। (संसद से सड़क पृ0 88) और इसीलिए उन लोगों ने भाषा का छद्म निर्मित किया, क्योंकि भूख में तो मिलावट संभव नहीं थी। व्यवस्था भाषा का एक ऐसा छद्म निर्मित करती है, जिसमें शब्द अपने मूल अर्थ से हट जाते हैं। जो शब्द या भाषा मंतव्यों को ठीक-ठीक व्यक्त न कर सके उसकी प्रासंगिकता ही प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। भूख की ताकत को पहचानने वाली व्यवस्था इसे एक हथियार के रूप में प्रयोग करती है और भाषा का ऐसा रूप निर्मित करती है, जो हमें भटकाने को पर्याप्त है। धूमिल ने इस छद्म को पहचान कर ही कहा था, ”उन्हें तुम्हारी भूख/जो तुम्हें न्यायालय से लेकर नींद से पहले नींद से पहले की/प्रार्थना तक गलत रास्तों पर डालती थी।’’ (संसद से सड़क पृ0 47)

यह छद्म भाषा किस तरह व्यवस्था के मंतव्यों में सहायक होती है इसे एक उदाहरण से समझ सकते हंै। प्रचारतंत्र के समाचार के ठीक पहले या बाद में एक वाक्य बोला जाता था, ”जिसे जो काम मिला है वह निष्ठापूर्वक करे यही सच्ची देश सेवा और राष्ट्र प्रेम है।’’ यदि विस्तार में जाएं तो इसका अर्थ हम पाते हैं कि यहां शोषण करना भी देश सेवा है और श्रम करना भी देश सेवा है और लूटाना भी। अंधेरे में जिस प्रकार वस्तुओं के रूप और शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं, उसी प्रकार भाषा की रात में भी शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। वहां भाषा विशिष्ट प्रयोजन से प्रयुक्त होने लगती है। जब भाषा दमन और शोषण की राजनीति का हिस्सा बनती है तो भाषिक संवेदनशीलता से मानवीय संवेदनशीलता गायब हो जाती है। शासक वर्ग भाषा का छद्म बढ़ाता है। वह अपने उद्देश्यों को छिपाने के लिए भाषा के छल का सहारा लेता है। धूमिल इस छद्म को पहचान रहे थे। भूख किस तरह भाषा को खाती है, इसे उन्होंने अपनी कविता में बड़े साफ ढंग से बताया है कि भाषा किसका ग्रास है। उन्होंने कहा है-

भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे का कौर है
सड़क पर और है संसद में और है।
(संसद से सड़क पृ0 96)

संसद में और चरित्र वाले लोग ही हैं, जो हमारी भूख को हथियार बनाकर हमें भाषा के नाम पर लड़ाते हैं। भूख के हाथों मजबूर होकर लोग व्यवस्था की भाषा बोलने पर मजबूर हो जाते है। तमाम असंतोषी और अभियोगी मुद्राओं को उन्होंने चन्द टुच्ची सुविधाओं के आगे तलवे चाटते देखा था और इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ‘चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने/अभियोग की भाषा चुक जाती है।’’ (संसद से सड़क पृ0 116)।

वे भूख और भाषा के बीच संतुलन की बार-बार मांग इसलिए करते हैं, क्योंकि छद्म विद्रोह की मुद्रा वालों की सही पहचान उन्हें थी, जो मानते थे कि हाथ भी उठे रहें और कांख भी ढंकी रहे। वे बार-बार व्यवस्था द्वारा किये जाते रहे भाषा के दुरूपयोग की ओर इशारा करते हैं और भाषा कि मुक्ति की बात करते हैं, क्योंकि उनके मत में ‘जनता की मुक्ति माने भाषा की मुक्ति’ था।

जिदंगी के संघर्षों से जूझते, रोटी के लिए संघर्ष करते धूमिल ने अपने निजी अनुभवों से पाया था कि अपनी भूख के समाधान के लिए रोटी बनाने वाले हाथ इस बात का उत्तर आज तक नहीं पा सके कि भूख की आग बुझाने वाली रोटी क्यों कुछ लोगों के लिए खेल का सामान बन गई है। वे इस प्रश्न से जूझते हुए ही अपनी कविता में पूछा कि ‘एक तीसरा आदमी भी है/जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है/वह सिर्फ रोटी से खेलता है/ मैं पूछता हूं- यह तीसरा आदमी कौन है/ मेरे देश की संसद मौन है।’’ (कल सुनना मुझे पृ0 33)।

यह बेचैनी और प्रश्नाकुलता वस्तुत: भूख और भाषा के प्रश्न से जुड़ी हुई है, क्योंकि रोटी जब भूख शंात करने की जगह खिलौना बन जाय तो निश्चय ही भाषा को हस्तक्षेप करना ही पड़ता है। इस रोटी का गणित न केवल कविता में वे हल कर रहे थे, बल्कि संयुक्त परिवार की त्रासद स्थितियों में परिवार के मुखिया की उस विडंबना को भी समझ रहे थे कि, ”खाने से पहले मुंहदुब्बर/पेट पर/पानी पीता है और लजाता है/कुल रोटी तीन/पहले उसे थाली खाती है/फिर वह रोटी खाता है।’’ (कल सुनना मुझे पृ0 17)

इन परिस्थितियों से टकरा कर ही भूख और भाषा के बीच की गणित हल करने की ओर वे प्रवृत्त हुए थे। भूख किस तरह परेशान कर देती है इस बात का एहसास धूमिल को देश और परदेश में, घर और बाहर, सब जगह हुआ था। इसी से उपजे असंतोष रूपी सबसे बड़ा हथियार को कविता के रूप में इस्तेमाल किया –

बच्चे भूखे हैं:
मां के चेहरे पत्थर,
पिता जैसे काठ: अपनी ही आग में
जले है ज्यों सारा घर, (सुनना मुझे पृ0 68)

इस अनुभूति ने ही शायद धूमिल को इस निष्कर्ष पर पहुंचाया था कि ”कहीं कोई भाषा नहीं है/भूख के केन्द्र में/एक थरथराता हुआ आंसू है/जिस पर आग पहरा देती है।’’ (सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र: पृ0 59)
यह थरथराते हुए आंसू पर आग का पहरा भूख और भाषा के रिश्ते को प्रतीकात्मक ढंग से बड़ी तल्खी के साथ व्यक्त करता है। धूमिल जानते थे कि भूख जिंदगी की एक सच्चाई है। तभी उन्होंने लिखा है कि, ”भूख कभी गाली नहीं होती/और पेट का नंगापन नंगई नहीं है।’’ (सुदामा पांडे का प्रजातंत्र पृ0 48)

सांस्कृतिक कदाचार बनाम मानवीयता का सौन्दर्यबोध के बीच भारतीय समाज के भयावह दौर को शब्दों को स्वर देकर दायित्वबोध का निर्वाह करती धूमिल की कविताओं ने नया संसार रचा है। समतावादी समाजिक मूल्यों पर आधारित लोकतंत्र की स्थापना की वैधता को प्रेरणा देती धूमिल की कविताएं भय-भूख के बीच बनती-गिरती, जलती-बुझती झोपड़पट्टियों से लेकर आकाश छूती गगनचुम्बी इमारतों के बीच अंधी खोह को चुनौती देती है और दर्द और संघर्षों का दस्तावेज बन जाती है।

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