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दूरद्रष्टा अंबेडकर

दूरद्रष्टा अंबेडकर

By शैलेन्द्र चौहान

अंबेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अंबेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढि़वादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं में भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया। यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होंने देश भर में काम किया था।

भारतीय राजनीतिक-सामाजिक परिप्रेक्ष्य में छह दिसंबर बहुत महत्वपूर्ण है। यह भारतीय इतिहास के एक नायक डॉ. अंबेडकर की  पुण्यतिथि है। डॉ. अंबेडकर एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ-साथ, भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे। अंबेडकर का जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। अंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की भेदमूलक वर्ण व्यवस्था और भारतीय समाज में सर्वव्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने में बिताया। यह एक सुखद संयोग ही कहा जायेगा कि अनेकों सामाजिक और वित्तीय बाधाएं एवं विसंगतियों को पार कर अंबेडकर ने कॉलेज की उच्च शिक्षा प्राप्त की। अंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही अर्थशास्त्र व राजनीतिक विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ  इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। अंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने अध्यापन कार्य किया तथा दलित स्थितियों के संदर्भ में पत्रिका प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष: भारत सरकार अधिनियम 1919, तैयार कर रही साउथ बोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अंबेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अंबेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत की। 1920 में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया। तब, अंबेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढि़वादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लडऩे के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। अंबेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की, जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन 1926 में वो बंबई विधान परिषद के मनोनीत सदस्य बन गये। सन 1927 में डॉ. अंबेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होंने अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिये संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।

अंबेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की, जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर-कानूनी करार दिया गया। अंबेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों में आरक्षण प्रणाली शुरू करने के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया। भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हें हर क्षेत्र में अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की, जबकि मूल कल्पना में पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी। 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपनाया। अपने काम को पूरा करने के बाद बोलते हुए अंबेडकर ने कहा – ”मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है। यह लचीला है, पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूं कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।’’

1951 में संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अंबेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया, पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ थी। डॉ. अंबेडकर अब तक की सबसे बड़ी अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अंबेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास गांधी की आलोचना की, उन्होंने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया।

अंबेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की, जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल न हो। 8 अगस्त, 1930 को शोषित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान अंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है। उन्होंने कहा – ”हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं… राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती। उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपने रहन-सहन का बुरा तरीका बदलना होगा…. उनको शिक्षित होना चाहिए… एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उंचाइयों का स्रोत है।’’

इस भाषण में अंबेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की।

अंबेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढि़वादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं में भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया। यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होंने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये ‘उदार’ राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अंबेडकर की अस्पृश्य समुदाय में बढ़ती लोकप्रियता और जन-समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहां उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका हिंदू समाज की भावी पीढ़ी को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी। 1932 में जब ब्रिटिशों ने अंबेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गांधी ने रूढि़वादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढि़वादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अंबेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति में होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गांधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की मांग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छुआछूत खत्म करने की बात स्वीकार कर ली गयी। गांधी ने इस उम्मीद पर इसे स्वीकार किया कि बाकि सभी सवर्ण भी पूना संधि का आदर कर सभी शर्तें मान लेंगे। इसके बाद गांधी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योति राव फुले थे। अंबेडकर ने 1952 में लोकसभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 में उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और मृत्युपर्यंत वे इस सदन के सदस्य रहे।

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