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हिन्दू आतंकवाद या कांग्रेसी साजिश?

हिन्दू आतंकवाद या कांग्रेसी साजिश?

बारह सालों के बाद आखिरकार सच्चाई सामने आ ही गयी। समझौता ब्लास्ट केस में पंचकूला की स्पेशल एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने असीमानंद समेत सभी 4 आरोपियों को बरी कर दिया है।  स्पेशल एनआईए कोर्ट ने असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजेंद्र चौधरी को बरी किया है।  बता दें कि 18 फरवरी 2007 को हुए समझौता एक्सप्रेस धमाके में 68 लोगों की जान गई थी। मरने वाले में ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक शामिल थे। धमाके के ढाई साल बाद केस को एनआईए को सौंप दिया गया था। 18 फरवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत में समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में आईडी ब्लास्ट किया गया था। हादसे में 43 पाकिस्तानी, 10 भारतीय नागरिक और 15 अन्य लोग मारे गए थे। मारे गए कुल 68 में से 64 आम लोग थे, जबकि 4 रेलवे के अधिकारी थे। ब्लास्ट के बाद कई अन्य कोच में आग लग गई थी। शुरुआत में हरियाणा पुलिस ने मामले की जांच की, लेकिन जुलाई 2010 को जांच एनआईए को सौंप दिया गया। समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में पहली चार्जशीट 2011 में फाइल की गई। इसके बाद 2012 और 2013 में भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की गई।

ट्रेन रात के 10.50 बजे दिल्ली से रवाना हुई थी।  इसमें 16 कोच थे। ब्लास्ट 2 अनारक्षित कोच में किया गया था। 4 आईडी प्लांट किए गए थे, जिनमें 2 ब्लास्ट हुए और 2 को बाद में बरामद किया गया। केस में आठ लोग आरोपी थे, लेकिन चार लोगों ने ही ट्रायल का सामना किया। केस में स्वामी असीमानंद को मुख्य आरोपी बनाया गया था जिन्हें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 2015 में जमानत दे दी थी। दो साल में तीन मामलों में बरी होने के बाद स्वामी असीमानंद अब आजाद हैं। धार्मिक उपदेशक के तौर पर कई उपनामों से पहचाने जाने वाले असीमानंद को पंचकूला की एक विशेष अदालत ने अभी हाल ही में समझौता ट्रेन विस्फोट मामले में बरी कर दिया। असीमानंद को एक समय भारत में सबसे अधिक वांछित व्यक्ति के रूप में जाना जाता था।  वर्ष 2007 में भारत में हुए तीन बम विस्फोटों में कथित भूमिका के लिए उनका नाम सामने आया था। इसकी शुरूआत भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन समझौता एक्सप्रेस में 17 और 18 फरवरी की दरम्यानी रात में विस्फोट की घटना से हुई जिसमें 68 लोग मारे गए थे।

झूठ का फैलाया मायाजाल

8तत्कालीन यूपीए सरकार ने अजमेर शरीफ, मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस विस्फोटों को हिन्दू आतंकवाद से जोड़कर भारतीय समाज में वैमनस्यता फैलाने की गंभीर साजिश रची थी। चारो आतंकवादी वारदातों के तार एक दूसरे से जोड़े थे। स्वामी असीमानंद तीनो वारदातों में मुख्य अभियुक्त बनाए गए थे। हिन्दू या भगवा आतंकवाद का पहला जुमला जयपुर में फेंका गया था। जयपुर में कांग्रेस के अधिवेशन में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ऐलान किया था की ‘गृहमंत्रालय की जांच में निकला है कि आरएसएस और भाजपा के ट्रेनिंग केम्पों में हिन्दू आतंकवाद की ट्रेनिंग दी जा रही है।’ बड़ा विवाद खड़ा हुआ। आखिर में शिंदे ने संसद में बयान वापस लिया और सफाई दी। पर मुस्लिम आतंकवाद का बचाव करने की कांग्रेसी साजिश तो 2009 से जारी थी। तभी तो स्वामी असीमानंद, स्वामी दयानंद पांडे, साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, सुनील जोशी, संदीप डंग, भारत भाई को फर्जीवाड़ा कर के चार्जशीट किया गया। इनमें से कोई भी आरएसएस का जिम्मेदार अधिकारी नहीं था। असीमानंद के ऊपर जरूर वनवासी कल्याण आश्रम की जिम्मेदारी  थी। इस लिए संघ के अधिकारी इन्द्रेश कुमार को बाद में फंसाया गया। मार्च 2017 में आए एनआईए अदालत के पहले फैसले में असीमानंद और इन्द्रेश दोनों बरी हो गए। यह पहला फैसला अजमेर शरीफ के बम धमाकों का था। बम धमाके 11 नवम्बर 2007 को हुए थे। राजस्थान पुलिस की एटीएस ने अक्टूबर 2010 को चार्जशीट दाखिल की। असीमानंद की गिरफ्तारी एक महीने बाद नवम्बर में हुई। उसके एक महीने बाद दिल्ली मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में असीमानंद का तथाकथित कन्फेशन हुआ। यह कन्फेशन पूरी तरह सरकारी अमले के दुरूपयोग का नमूना था। असीमानंद ने एक बार चंडीगढ़ की अदालत से निकलते हुए कहा था-‘मैंने कन्फेशन नहीं दिया है।’ कांग्रेस और यूपीए सरकार की सारी  हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी इस कन्फेशन पर आधारित थी। जो पूरी तरह बेसिरपैर का था। जैसेकि इस कन्फेशन में असीमानंद की कर्नल पुरोहित से बातचीत का हवाला था, कर्नल पुरोहित से भी यह कन्फेशन करवाया गया। पर दोनों में बातचीत का न कोइ आधार था, न सबूत। इसी कन्फेशन का एक पैराग्राफ हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी की हवा निकालता है। इस पैरा में असीमानंद की तरफ से कहा गया था -‘समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के अगले दिन मैं भारत भाई के घर गया। साध्वी प्रज्ञा और सुनील जोशी भी वहीं पर थे। मैंने सुनील जोशी से पूछा कि ब्लास्ट के समय वह कहां थे। सुनील जोशी ने कहा-यह हमारा काम है। पर मैंने कहा-यह आईएसआई का काम है। जोशी ने कहा- आईएसआई मुसलमानों को कैसे मार सकती है। इस पर मैंने कहा-पाकिस्तान में रोज मुसलमानों की आतंकवादी वारदातों में हत्या हो रही है। सुनील जोशी के पास इस का कोई जवाब नहीं था।’ अब इस बातचीत से कोई कम-पढ़ा लिखा भी क्या अंदाज लगाएगा। यही न कि हिन्दू आतंकवाद सिर्फ हवा-हवाई था। मुसलमान मरे, इसलिए आक्रोशित हिन्दू खुश थे। वे श्रेय लेने की कोशिश कर रहे थे। जबकि जोशी के बड़बोलेपन पर जब असीमानंद ने सवाल किया, तो जोशी के पास कोई जवाब नहीं था। अब कोई भी अंदाज लगा सकता है कि समझौता एक्सप्रेस केस में कैसे सबूत रहे होंगे। यूपीए सरकार ने अपनी अदालतों की साख गिराने की भी साजिश रची थी। अब न तो मालेगांव केस में हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी से कुछ निकलना है, न मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस में। पाकिस्तान को कहने का मौका मिलेगा कि भारत की अदालतें निष्पक्ष नहीं। पर कांग्रेस अभी भी आतंकवाद को समझने को तैयार नहीं।

पाठकों को याद दिला दें इसी तरह 18 मई 2007 को हैदरबाद में स्थित मक्का मस्जिद में एक बम धमाका हुआ था जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी और 58 लोग घायल हो गये थे।  इस मामले को भी हिन्दू आतंकवाद की घटना बनाने में तत्कालीन यूपीए सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पिछले साल इस मामले में 11 साल बाद आये फैसले मेें भी एनआईए की विशेष अदालत ने स्वामी असीमानंद सहित पांच अभियुक्तों को बरी कर दिया था। जब यह धमाका हुआ था तब वहां पर जुम्मे की नमाज अदा की जा रही थी तथा भीड़ को नियंत्रित करने के लिये पुलिस ने गोलियां चलाई थीं जिसमें पांच  लोगों की और मौत हो गयी थी। शुरूआत में इस मामले में हरकतुल-जमात-ए-इस्लामी पर शक जताया गया था। पर 2010 में अचानक से अभिनव भारत संगठन के स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया गया और पूरे मामले को पूरी तरह से विपरीत दिशा में मोड़ दिया गया था। स्वामी असीमानंद की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस व वामपंथियों सहित सभी विरोधी दलो व उनके प्रबुद्ध वर्ग ने संघ व भाजपा को बदनाम करने का एक विशेष अभियान चला दिया था लेकिन अब वह खारिज हो चुका है।

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स्वामी असीमानंद और प्रज्ञा ठाकुर की आड़ में कांग्रेस व अन्य सभी दलों ने एक प्रकार से हिंदू जनमानस के खिलाफ जमकर जहर बोने का अभियान शुरू कर दिया था। वहीं कांग्रेसी व अन्य दल अपनी आदत से अभी भी बाज नहीं आ रहे हैं। तत्कालीन यूपीए सरकार ने सोची समझी साजिश के तहत संघ परिवार पर शाखाओं आदि के माध्यम से  आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने के गंम्भीर आरोप लगाये थे और इसी खेल की आड़ में संघ पर नये सिरे प्रतिबंधों को लगाने की गुपचुप तैयारी भी कर ली थी। यदि उस समय के तमाम अखबार  उठाकर देखे  जाये तो  यह साफ हो जायेगा की तत्कालीन यूपीए सरकार संघ व भाजपा सहित सभी हिंदू संगठनों  को बदनाम करने के लिए कितनी घिनौनी साजिश रच रहीं थी। इन सभी के पीछे पूर्व गृहमंत्री पी चिंदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे, शिवराज पाटिल और सलमान खुर्शीद जैसे लोगो का शातिर दिमाग दिन रात काम कर रहा था। आज जब स्वामी असीमानंद 12  साल की असीम पीड़ा व देशद्रोह की बदनामी की वेदना से बेदाग बरी होकर बाहर आ गये है। तब से इन सभी सेक्यूलर दलों को एक बार फिर से गहरी वेदना होने लग गयी है।

कुछ सालों पहले विकीलीक्स का बहुत प्रचार हुआ था। उसी विकीलिक्स की एक केबिल में अमेरिका के पूर्व राजदूत टिमोथी जे रोएमूर ने अपने विदेश मंत्रालय को लिखे पत्र में राहुल गांधी के बयान का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने हिंदू आतंकवाद की बात कही थी। इसी केबल में  टिमोथी के हस्ताक्षर वाले टेलीग्राम में राहुल से बात का उल्लेख  किया गया था। 3 अगस्त 2009 को भेजे इस टेलीग्राम में रोएमर ने लिखा था हम राहुल गांधी और अन्य सांसदों से बातचीत कर रहे हैं। हम इसके निष्कर्ष को भेज रहे हैं।  विकीलिक्स के अनुसार 20 जुलाई 2009 को एक डिनर में राहुल गांधी मौजूद थे। इस दौरान यूएस राजदूत ने राहुल से लश्कर के बारे में पूछा था इस पर उन्होंने कहा कि इसका भारत में थोड़ा बहुत सपोर्ट हो सकता है लेकिन देश में हिंदू आतंकवादियों से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा है। गौर करने वाली बात यह है की  कांग्रेस को उस समय भी लादेन के पैसे और हाफिज के नेतृत्व में बना लश्कर कम खतरनाक लगता था जबकि निरीह हिंदू अधिक खतरनाक नजर आते हैं। वही कांग्रेस आज भी जिस तरह से उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगती फिर रही है उससे कांग्रेस के लश्कर जैसे आतंकी गिरोह को कवर फायर देती या यूं कहे बचाती  भी दिख रही है।

भ्रम का टूटता महल

असीमानंद के खिलाफ लगाए सभी आरोपों से उनका बरी हो जाना ये लगभग साफ करता है कि भारत में सेक्यूलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो भी कुछ कहा और किया जाता है उसके पीछे अल्पसंख्यकवाद और उससे भी बदतर हिंदू विरोधी सोच ही होती है। यह काफी परेशान करने वाला तथ्य है। इसे हम विडंबना नहीं कह सकते क्योंकि अभी भी ये पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि आखिर हिन्दू कौन और क्या हैं। 1966 में पांच सदस्यीय संविधान खंडपीठ की तरफ से लिखते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश पी.बी. गजेंद्रगढ़कर ने कहा था-‘हिंदू धर्म को परिभाषित करना या इसका पूरी तरह से वर्णन करना हमारे लिए असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।’ 10 साल बाद 1976 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और मामले को निपटाते हुए कहा, ‘हिंदू’ शब्द को शुद्धता के साथ परिभाषित करना मुश्किल है। क्योंकि ये तो सभी को पता है कि हिंदू धर्म के अंदर कई तरह के विश्वासों, धर्मों, प्रथाओं और पूजा आत्मसात हैं. हिंदू धर्म इनको खुद से अलग भी नहीं करता।’ लेकिन फिर भी जब हिंदुओं की ‘आतंकवादी’ के रूप में ब्रांडिंग करने की बात आती है, तो हर कोई तुरंत इसका जानकार हो जाता है कि हिंदू कौन है। ऐसे तो आतंकवाद को धर्म से ना जोडऩे की अपील करते यह छद्म धर्मनिर्पेक्ष्तावादी अघाते नहीं लेकिन ‘हिंद’ आतंकवाद इन्हे तुरंत नजर आने लगता है।

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इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा जो  हिन्दू हितों के लिए अक्सर लड़ती नजर आती है उसने ‘हिंदू आतंकवाद या सैफरन टेरर’ के बारे में अपने विचार लंबे समय से स्पष्ट कर रखे हैं। वह हिन्दू आतंकवाद की बात को बेबुनियाद मानती है। भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 10 साल पहले ‘हिंदू आतंकवाद’ को कांग्रेस द्वारा फैलाया गया हौआ कहा था। चंडीगढ़ में एक चुनाव रैली में बोलते हुए आडवाणी ने कहा- ‘मालेगांव ब्लास्ट के बाद वोट बैंक के लिए कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद शब्द ईजाद किया। लेकिन भाजपा ने कभी भी मुस्लिम आतंकवाद जैसे किसी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।’ कांग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा फैलाई ही इसलिए की एक तो यह अवधारणा उनके  सत्ता में बने रहने का एक हथियार था और दूसरी तरफ फूट डालो शासन करो की इनकी नीति का हिस्सा था। लेकिन अब समय बदल गया है। कांग्रेस अब सत्ता में नहीं है। इसका नियंत्रण राज्य, इसकी मशीनरी, प्रेस, बौद्धिक वर्ग हर जगह से खत्म हो गया है. अब ये इस स्थिति में नहीं हैं कि इस तरह की बातों पर अपना नियंत्रण बनाकर रख सकें। एक प्रकार से स्वामी  असीमानंद के बरी हो जाने के बाद कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण करने की नीति और हिंदू आतंकवाद के नाम पर संघ व बीजेपी के खिलाफ पूरे देशभर में जहर की खेती करने वाली साजिश अब पूरी तरह से बेनकाब होती जा रही है। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हिंदुओ को बदनाम करने के लिये एक बेहद गहरी साजिश रची थी जिसका पर्दाफाश हो चुका है। साथ ही यह भी साबित हो रहा है कि गांधी परिवार व कांग्रेस की मानसिकता पूरी तरह से हिंदू विरोधी है। इस पूरे वातावरण के लिए कांग्रेस पार्टी ही दोषी है। भगवा आतंकवाद की कहानी रचने वाले लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिये साथ ही उन पर नयायपालिका व जांच एजेंसियों को गुमराह करने का भी एक मुकदमा कांग्रेस  पार्टी पर बनता ही है।

जस्टिस गजेंद्रगढ़कर ने अपने उसी फैसले में कहा था, ‘दुनिया के दूसरे धर्मों के विपरीत, हिंदू धर्म किसी को भी अपना पैगम्बर या दूत नहीं मानता। ये किसी एक भगवान की भी पूजा नहीं करता है, यह किसी भी एक सिद्धांत का भी पालन नहीं करता है, यह किसी एक दार्शनिक अवधारणा पर विश्वास नहीं करता है, दरअसल यह किसी भी धर्म या पंथ की संकीर्ण पारंपरिक विशेषताओं को पूरा नहीं करती है।’ यहां यह ध्यान  होगा की राष्ट्रवाद या  फिर चाहे उसे हिंदुत्व कहें या राजनीतिक हिंदूवाद, को न तो अपना ध्येय ही खोना चाहिए और न ही बहुत ज्यादा बदलाव लाना चाहिए। हमारे जीवन के इस पहलू को न तो नजरअंदाज और न ही छेड़छाड़ करना चाहिए।  कट्टरता से हिंदुओं को भी उतनी ही तकलीफ होती है जितना दुसरे धर्मों को। साथ ही हिंदुओं को ‘हिंदू आतंक’ जैसे झूठ पर भी नजर रखना चाहिए जो इस धर्म को तोडऩे के मकसद से फैलाए जाते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने अपनी 1871 की जनगणना में धर्म और जाति की शुरूआत की थी।  इसके द्वारा उन्होंने ऐसी आग को हवा दे दी है जो अभी तक बुझने का नाम नहीं ले रही।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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