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श्रीलंका में चीनी पनडुद्ब्रबी

श्रीलंका में चीनी पनडुद्ब्रबी

By भास्कर रॉय

दो महिनों के अंतराल पर श्रीलंका में दो चीनी पनडुब्बियों द्वारा डेरा डाला जाना एक विचारणीय प्रश्र है। इस बात पर कोई भी नौसेना विशेषज्ञ सहमत होगा कि पनडुब्बियों का आना प्रारंभिक तौर पर कुछ अलग मसला है, क्योंकि पनडुब्बी एक गुप्त हथियार है।

अगले पांच वर्षों में न्यूक्लियर वॉरहेड वाले बैलेस्टिक मिसाईल टाईप-93 और टाईप-94 जैसी पनडुब्बियां विमानवाहक पोतों के साथ इस जलक्षेत्र में दिखने लगेंगी। चीन ने हाल ही में विमानवाहक पोत खरीदा है। यह ज्ञात है कि चीन अन्य चार विमानवाहक पोत बनाने जा रहा है।

पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह चीन के अधिकार में है, लेकिन पाकिस्तानी तालिबान द्वारा पाकिस्तानी फ्रिगेट का अपहरण करने का प्रयास किए जाने के कारण वर्तमान में चीन वहां अपना पोत तैनात करने का जोखिम उठाना नहीं चाहता। सितंबर में चीनी प्रधानमंत्री झी जिनपिंग ने भारत, श्रीलंका और म्यांमार की यात्रा के दौरान सुरक्षा कारणों से अपने यात्रा कार्यक्रम से पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया था।

कहने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान और चीन गहरे मित्र हैं और दोनों देशों की सेनाओं के बीच भी बहुत गहरे संबंध हैं। चीनी प्रधानमंत्री झी जिगपिंग ने पूर्वी सिल्क रूट को प्रोत्साहित कर मालदीव और माले पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। यह सब तब हुआ जब भारत मालदीव नीति को लेकर हिचक रहा था, जबकि माले हवाई अड्डे का प्रबंधन करने वाली जीएमआर को हटाकर यह जिम्मेदारी एक चीनी कंपनी को दे दी गई।

भारत के साथ वर्तमान सरकार की बेहतरीन रिश्ते को देखते हुए चीन बांग्लादेश को लेकर अभी शांत है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्रस्तावित गहरे समुद्री बंदरगाह के निर्माण में चीन हिस्सेदारी निभाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही चीन बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार जमीनी कॉरीडोर की हिमायत कर अपने लिए बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में प्रवेश और निकास का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश कर रहा है।

म्यांमार में प्रवेश की चीन की रणनीति एक दूसरी चुनौती है, जिसे भारत को सक्रियता से संभालने की जरूरत है। अलग-थलग पड़ा म्यांमार चीन के लिए आसान शिकार है, लेकिन परिस्थितियां बदलनी शुरू तब हुईं जब कुछ साल पहले भारत में सीमित सुधारों की पहल की गई। म्यांमार के नेता चीन के घुटन भरी चुंगल से बाहर निकलना चाहते हैं। चीन द्वारा म्यांमार के कुछ विद्रोही गुटों पर नियंत्रण और उन्हें हथियार उपलब्ध कराने के कारण यह आसान नहीं होगा, लेकिन रास्ते बंद नहीं हुए हैं। म्यांमार के सत्ता के गलियारों में भारत से बेसब्री से उम्मीद की जाती है। यह भारत पर निर्भर है कि वह म्यांमार से किस तरह पेश आता है। इसके लिए वर्तमान से बहुत ज्यादा किए जाने की जरूरत है।

पिछले कुछ सालों में यह देखने में आया है कि उत्तर में चीनी दबाव बहुत आक्रामक हो चुका है। चीनी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की अलग-अलग भारत यात्रा के दौरान सामान्यत: निश्चित वास्तविक नियंत्रण रेखा के

बावजूद सीमांकन वाले विवादास्पद क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ के कारण दोनों देशों के बीच रिश्तों में गर्माहट और रणनीतिक साझेदारी नहीं दिखी।

भारत पर जमीनी और समुद्री दोनों तरफ से एक साथ दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। अब हमें तीसरे आयाम, वायुक्षेत्र के अनावरण का इंतजार करना है। भारतीय विशेषज्ञों को चाहिए कि वे वायुक्षेत्र के गुढ़ रहस्य को समझें। क्या यह सिर्फ एयरक्राफ्ट तक सीमित रहेगा या इसमें मिसाईलें भी शामिल की जाएंगी? अंतत: क्या चीन एस-400 जैसी सतह से हवा में मार करने वाली रूसी मिसाईलों को भारत के खिलाफ तैनात करेगा?

चीन जो भी करता है उसे वह सामान्य गतिविधि बताता है। अपनी सीमा को सुरक्षित करने की भारत के किसी भी पहल को चीन द्वारा मित्रवत व्यवहार के विपरीत देखा जाता है।

चीन के पास विश्व का सबसे बड़ा प्रोपगंडा तंत्र है, जो कई दशकों में बहुत ही चतुराई से विकसित की गई है। यह बहुत प्रभावी हथियार है और इसका सफलता से प्रयोग भी हुआ है। मीडिया के कारण चीन के साथ भारत के संबंध भी प्रभावित होते हैं। सरकारी अधिकारी और सुरक्षा अधिकारियों ने मीडिया से कहा कि वे चीन के प्रति नरमी बरतें और उसे उकसाए नहीं। यूपीए शासन के दौरान एक तर्क था कि ‘चीन हमारा पहला, दूसरा और तीसरा सामरिक चिंता का विषय है, लेकिन चीन को भड़काना नहीं है’।

सरकार की तरफ से इस तरह की सलाह आना कोई नई बात नहीं थी। लेकिन, कई वर्षों के इस सलाह ने चीन मामले को देखने वाले अधिकारियों में तीव्र बेचैनी पैदा कर दी है। दोनों देशों के रिश्ते में बढ़त को गोपनीयता के नाम पर दबाकर रखी गई या फिर वार्ता असफल होने पर उस पर पर्दा डाल दिया गया। दूसरी तरफ भारत के लिए यह भी सलाह नहीं है कि वह आगे बढ़कर चीन का सामना करे। भारत की स्थिति स्पष्टवादी, आत्मविश्वासी और बचाव वाला होना चाहिए।

यदि सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण आवश्यक है, जिसे वर्षों पहले कर लिया जाना चाहिए था, तो निश्चित रूप से उसे पूरा किया जाना चाहिए। निगरानी के लिए अगर और पोस्ट की जरूरत है तो उसे भी बनाया जाना चाहिए। माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प का गठन भारत की सुरक्षा बचाव की जरूरत है। यह आक्रामक नहीं, बल्कि रक्षात्मक है।

दूसरी तरफ, विदेशी जमीन पर वरिष्ठ नेताओं का बयान देने से परहेज करना चाहिए, चाहे संबंध कितना भी दोस्ताना क्यों न हो। यह मीडिया, थिंक टैंक और सिंगापुर के वार्षिक शंैग्रि-ला वार्ता के जैसा अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों के माध्यम से होना चाहिए। प्रचार भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण कमजोरी है और बहुत से खुफिया और सुरक्षा अधिकारी इस मनोवैज्ञानिक और मीडिया युद्ध के मामले में बेवकूफ हैं। यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें चीन को महारत हासिल है।

सभी बड़े देशों को अपने पड़ोसियों से समस्या है। दक्षिण एशिया को अपने हित के अनुसार खण्डित करने वाले ब्रिटेन ने भारत के मामले को पेचीदा बनाकर छोड़ दिया। तत्काल ध्यान और कार्रवाई की मांग कर भारत अपने पड़ोसियों से संबंधों को सुधार सकता है।

भारत के दरवाजे पर श्रीलंका के रूप में एक दूसरा चीनी दबाव उभरा है। तमिलों का मुद्दा भारत-श्रीलंका के संबंधों में हमेशा आड़े आता है। अगर श्रीलंका इस मुद्दे को राजनीतिक स्तर पर समाधान करने का इच्छुक है तो इस मुद्दे को जल्दी खत्म किया जाना चाहिए। लेकिन, इसमें सिंहली राष्ट्रवादी दृष्टिकोण हमेशा समस्या खड़ी करेगी।

13-12-2014

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे का दिमाग पढऩा मुश्किल हो गया है। जाहिरा तौर पर उनकी सरकार राजपक्षे परिवार और उनके अभिन्न मित्रों द्वारा चलाई जा रही है। राजपक्षे परिवार को चीन ने कथित तौर पर लगभग खरीद लिया है। श्रीलंका में चीनी निवेश तीव्र गति से बढ़ रहा है और राजपक्षे परिवार और उनके मित्रमंडली को नेपथ्य में जाने को विवश कर रहा है। श्रीलंका के दैनिक अखबार कोलंबो टेलिग्राफ में 27 अक्टूबर 2012 को ‘चीइनाज फोर्रेज इन श्रीलंका’ शीर्षक से छपे लेख में इस तंत्र का विवरण दिया गया था। इस लेख में राष्ट्रपति राजपक्षे या उनके सहयोगी की तरफ से कोई भी ऐक्शन नहीं लिए जाने का भी विवरण है।

यह अच्छी तरह ज्ञात है कि चीन किस तरह से छोटे देशों के टॉप राजनेताओं और सेना के अधिकारियों को खरीदता है। अतीत में बांग्लादेश के साथ भी ऐसा ही हुआ है। चीनी सरकार विदेश नीति पर कोई भी निर्णय लेती है तो उसे पूरी तरह से और स्पष्ट रूप से लेती है। सेवानिवृत्त अधिकारियों सहित थिंकटैंक और विशेषज्ञों को इसकी मूलभूत जानकारी देने के लिए काम पर लगाया गया है। इसलिए इस तरह की नीतियां सामने आती हैं। चीन सरकार अधिकांशत: अपना ध्यान आयातित ऊर्जा और कच्चे माल पर लगाती है। वे दक्षिण एशिया प्रशांत क्षेत्र को तोड़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं। उन्होंने निर्णय किया है कि वे एशिया के पहले देश हैं और जापान के अलावा, जिसके लिए अलग मापदंड की जरूरत है, भारत को निष्प्रभावी किया जाना चाहिए।

यह शीतयुद्ध नहीं है। यह उभरता हुआ चीन है, जिसे झी जिनपिंग ‘चीनी सपना’ कहते हैं। उसकी भारत नीति में 1990 का वह मध्य है, जिसमें भारत के नजदीकी देशों में आधारभूत संरचना और सैनिक सहायता देकर अपनी मजबूत पकड़ बनाकर भारत पर शिकंजा कसी जाए और इसमें चीन सफल भी रहा है।

वर्तमान स्थिति में, चीनी नेतृत्व को विश्वास हो चुका है कि उसके पास इतनी शक्ति है कि वह चीनी सपने को भारत सहित कुछ निश्चित क्षेत्रों में लागू कर सकता है। समुद्री सिल्क मार्ग के जरिए चीन यह निश्चित कर चुका है कि किसी भी अन्य देश द्वारा इसमें बाधा, चुनौती या स्पर्धा न करना पड़े। यहां एक प्रश्र उठता है। क्या भारत में एनडीए सरकार का मुखर प्रदर्शन बीजिंग को क्रोधित कर रहा है? संभवत: नहीं। यह सिर्फ सामयिक है। चीन किसी भी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करेगा।

चीनी थिंकटैंक विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विभिन्न तरीके से आंकलन किया और महसूस किया कि वे उनके साथ व्यवसाय कर सकते हैं। एक बात जिसकी चीन ने गणना की थी और वह गलत साबित हुई, वह था भारत-अमेरिका संबंध तेजी से खराब होंगे। शिन्हुआ द्वारा प्रकाशित आधिकारिक आंकलन के अनुसार, मोदी ‘कट्टर राष्ट्रवादी’ हैं। भारत इस बात की शिकायत नहीं कर सकता कि चीन उसके पड़ोस में क्या कर रहा है। अब दिल्ली महसूस कर रहा है कि उसकी ‘पूर्व की ओर देखो’ नीति में सबसे बड़ी बाधा चीन है। बदले में भारत अपने दृढ़ संकल्प को मजबूती से लागू करेगा।

ध्यान देने योग्य बात है कि चीन और जापान अपने द्विपक्षीय संबंधों को स्थापित करने के लिए खामोशी से काम कर रहे हैं। चीन अमेरिका के साथ भी अपने संबंधों को नई ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए उत्सुक है, जो कि वर्तमान में प्रतिकूल है। भारत को इस नए घटनाक्रम को बहुत चतुराई से संचालित करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा संभवत: पहला कदम है।

चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में भारत को हताशा और उत्साह, दोनों को नजरअंदाज करना होगा। भारत को उम्मीद नहीं है कि चीन की तरफ से इसमें किसी भी तरह की बेहतरी की जाएगी। यह सरलीकृत सोच है। भारतीय बाजार के लिए चीन का सस्ता सामान बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। निश्चित रूप से चीन को व्यापार संतुलन पर बात करनी होगी।

भारत-चीन संबंधों को एक साथ कई स्तर पर निबटा जाना चाहिए। शक्ति, खासकर सैन्य-शक्ति शांति और स्थिरता का शुभ संकेत है। अगर इसे स्थापित कर लिया गया तो अन्य क्षेत्रों में काम करना आसान हो जाएगा।

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