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राजस्थान में लोकसभा चुनाव: कांग्रेस एवं भाजपा की तुरूप चाल

राजस्थान में लोकसभा चुनाव: कांग्रेस एवं भाजपा की तुरूप चाल

सत्रहवीं लोकसभा के महासंग्राम में सफलता के लिए राजस्थान में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस और प्रतिपक्ष भारतीय जनता पार्टी ने अपने-अपने तरीके से तुरप चाल चली है। इस ताने बाने में विधानसभा में बहुमत की सीमा रेखा पर पहुंचकर तीसरी बार शासन सत्ता की बागडोर संभालने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी और कांग्रेस से बगावत कर चुनाव जीते एक दर्जन विधायकों का सार्वजनिक समर्थन हासिल कर अपने नेतृत्व को मजबूती दी है। वही जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से अपने पुत्र वैभव गहलोत को कांग्रेस प्रत्याशी बनाकर अपने राजनैतिक उत्तराधिकार की पगडंडी बनाने का दांव चला है। भाजपा ने भी नई रणनीति के चलते एक दशक पूर्व भाजपा से रूठे मीणा समुदाय के जनाधार वाले नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की घर वापसी के बाद जाट समाज के युवा नेता और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी रालोप के संस्थापक विधायक हनुमान बेनीवाल के साथ चुनावी गठबंधन में हनुमान को नागौर क्षेत्र से चुनाव लड़ाने की हरी झंडी देने में चूक नहीं की।

यह संयोग ही था कि राजस्थान में 27 मार्च 1952 को हुए प्रथम आम चुनाव की मतगणना के करीब 67 वर्ष बाद 26 मार्च 2019 को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बूंदी तथा सूरतगढ़ की चुनाव रैली के बाद गुलाबी शहर जयपुर के परकोटे से सटे रामलीला मैदान में कांग्रेस के मंच पर थे। यही पर भाजपा को घेरने के लिए कांग्रेस की किलाबंदी के दर्शन हुए। एक-एक कर उन बारह निर्दलीय विधायकों ने राहुल गांधी का अभिवादन किया जिनका प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों पर असर माना जाता है। सियासी राजनीति में भाजपा के दिग्गज घनश्याम तिवाड़ी तथा विधानसभा चुनाव में टिकट कटने से बागी होकर चुनाव लड़कर पराजित हुए पूर्व मंत्री सुरेन्द्र गोयल ने कांग्रेस का दामन थामा। कांग्रेस से भाजपा में सम्मिलित हुए पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह गहलोत की भी घर वापसी हुई तो बसपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डूंगरराम गैदर भी कांग्रेस से जुड़े। घनश्याम तिवाड़ी ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले भारत वाहिनी पार्टी का गठन किया और 67 उम्मीदवार भी मैदान में उतारे। पिछले चुनाव मे सांगानेर से सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज करने वाले तिवाड़ी इस बार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। कांग्रेस सरकार बनने के बाद तिवाड़ी ने दो तीन मर्तबा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात करके अपनी भावी राजनीति का संकेत दे दिया था।

तिवाड़ी की तरह वसुधरा राजे का मुखर विरोध करने वाले विधायक हनुमान बेनीवाल ने विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन कर तीन सीटों पर सफलता हासिल की तथा विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रो में भाजपा की पराजय का कारण बने। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने भी रालोप से चुनावी गठबंधन के प्रयास किये। बेनीवाल को अजमेर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव भी हजम नहीं हुआ। इस बीच भाजपा ने हनुमान को मना लिया। मजबूत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वापसी के प्रति आस्था जताते हुए बेनीवाल ने रालोप के भाजपा में विलय की अपेक्षा चुनावी गठबंधन में नागौर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लडऩे पर सहमति जतायी है। वैसे भी नागौर सीट भाजपा के गले का फांस बनी हुई थी। पार्टी में अंदरूनी विरोध के चलते पिछले चुनाव में नागौर से निर्वाचित केन्द्रीय मंत्री सी.आर. चौधरी को पार्टी ने दुबारा चुनाव लड़ाना उचित नहीं समझा। राजनैतिक विश्लेषक यह मानते है कि हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश की भावी जाट राजनीति में अग्रणी भूमिका निभाने की दृष्टि से भाजपा से जुडऩे को बेहतर माना है। भाजपा की प्रेस कान्फ्रेंस में रालोप से चुनावी गठबंधन तथा नागौर से चुनाव लडऩे की घोषणा के समय पूर्व मुख्यमंत्री वसुधंरा राजे की अनुपस्थिति चर्चित रही। लेकिन भाजपा के प्रदेश प्रभारी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने मीडिया को सूचित किया कि वसुंधरा राजे भी पार्टी के इस कदम से सहमत है। वसुंधरा विरोधी तिकड़ी के एक प्रमुख नेता राजप विधायक डॉ. किरोड़ी लाल मीणा पिछले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा की सीट पाने में सफल हो गए थे। लेकिन विधानसभा चुनाव अभियान में वह कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये। स्वयं उनकी पत्नी गोलमा देवी भी चुनाव में पराजित हो गई। वह भी बेनीवाल की घर वापसी के लिए प्रयासरत थे। बेनीवाल नागौर से चुनाव लडऩे के साथ प्रदेश के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों सहित हरियाणा, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार करेंगे। जावडेकर की पहल पर भाजपा से रूठे नेताओं की घर वापसी के अभियान में जाने माने आर्थिक विश्लेषक भाजपा के पूर्व प्रदेश कोषाध्यक्ष एवं प्रवक्ता सुनील भार्गव को शामिल कर उन्हें मीडिया से जुड़ा दायित्व दिया गया है।

कांग्रेस और भाजपा में आखिर तक सीटों को लेकर उहापोह की स्थिति रही। हालांकि भाजपा ने 16 प्रत्याशियों की सूची घोषित कर टिकट वितरण में पहल की। इनमें झुन्झुनू तथा बांसवाड़ा से नये चेहरों को छोड़ शेष चौदह सांसदों को पुन: मैदान में उतारा गया। भाजपा ने शेष नौ सीटों में से फिर तीन नाम तय किए। नागौर सीट पर चुनाव गठबंधन के बाद शेष पांच सीटों में से चार सीटों पर नव संवत्सर के दिन तीन सांसदों के टिकट काटते हुए नये चेहरे उतारे। धौलपुर करौली में सांसद मनोज राजोरिया को रिपीट किया गया। भरतपुर से पूर्व सांसद गंगाराम कोली की पुत्रवधू रंजीता कोली, बाड़मेर से पूर्व विधायक कैलाश चौधरी तथा राजसमंद से जयपुर राजघराने की दीया कुमारी को टिकट थमाया गया। दौसा सीट पर पेच फंसा हुआ है। पिछली बार जीते हरीश मीणा ने विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन थाम विधानसभा में प्रवेश पा लिया।

कांग्रेस में भी टिकट बंटवारे को लेकर महाभारत मचा। राहुल गांधी की चुनाव रैली के बाद एक साथ उन्नीस सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा की गई जिसमे अप्रत्याशित रूप से जयपुर से पूर्व महापौर ज्योति खण्डेलवाल को प्रत्याशी बनाया गया। लोकसभा चुनाव के लिए प्रदेश मेें पहले चरण के लिए दो अप्रैल से नामांकन शुरू होने से पहले कांग्रेस के शेष छ: प्रत्याशियों के नाम भी घोषित कर दिए। विधायक तथा ओलम्पियन खिलाड़ी कृष्णा पूनिया को जयपुर ग्रामीण से ओलम्पियन निशानेबाज मंत्री राज्यवद्र्वन सिंह राठौड़ के मुकाबले पर लाया गया है। पूर्व मंत्री बीना काक के दामाद रिजु झुन्झुनवाला अजमेर सीट से तथा राजसमंद से पार्टी के जिलाध्यक्ष देवकीनंदन गुर्जर चुनाव लड़ेंगे। उधर पार्टी हाईकमान को करीब आधा दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों में कमजोर प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने की शिकायत पर प्रदेश के नेताओं को दिल्ली में तलब किया गया।

पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा को सभी 25 सीटों पर सफलता मिली थी। अजमेर तथा अलवर में सांसदो के निधन से रिक्त सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी। दौसा से भाजपा सांसद हरीश मीणा ने विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया। भाजपा ने सोलह सांसदो को दुबारा मौका दिया है। नये चेहरो में दो वर्तमान एवं चार पूर्व विधायक शामिल है जबकि भरतपुर से रंजीता कोली तथा अलवर से बाबा बालकनाथ पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने ग्यारह पूर्व सांसदो को मौका दिया है। छ: नये चेहरों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत (जोधपुर) पूर्व आई.पी.एस. मदन गोपाल मेघवाल (बीकानेर) तथा विधायक मुरारी मीणा की पत्नी सविता मीणा (दौसा) शामिल है। प्रदेश की सबसे हॉट सीट जोधपुर पर सभी की निगाहे हंै। यहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा दांव पर है जिनके पुत्र तथा पार्टी के महासचिव वैभव गहलोत को पहली बार चुनाव लड़वाया गया है। वैभव के नाम जालोर सिरोही तथा टोंक सवाईमाधोपुर से भी चर्चा में थे। जोधपुर के अलावा अन्यत्र से चुनाव लड़ाना भी मुख्यमंत्री गहलोत की शान के खिलाफ समझा जाता,लिहाजा वैभव को केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत से मुकाबला करना है जिन्हें भाजपा में सियासत की लम्बी रेस का घोड़ा माना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह झालावाड़ बांरा से लगातार चुनावी चौका लगाने को आतुर है। पिछले विधानसभा चुनाव में जयपुर के परम्परागत भाजपा गढ़ को भेदने में कांग्रेस को मिली सफलता से उत्साहित पार्टी ने स्वतंत्र पार्टी से 1971 में तीसरी बार सांसद बनी पूर्व महारानी गायत्री देवी के निर्वाचन के 48 साल बाद ज्योति खण्डेलवाल को महिला प्रत्याशी बनाया है। ज्योति का मुकाबला भाजपा के रामचरण बोहरा से है जो पिछले चुनाव में राज्य में सर्वाधिक मतो से विजयी हुए थे। लेकिन विधानसभा चुनाव में अपने परम्परागत गढ़ जयपुर की आठ में से पांच सीटों पर पराजय तथा भाजपा के बहुमत वाले नगर निगम में महापौर के उपचुनाव से लेकर निगम के अन्य क्रियाकलापों के चलते भाजपा बैकफुट पर है।

लोकसभा के वर्ष 2014 के चुनावों पर नजर डाले तो केवल उदयपुर में इस बार भी भाजपा के अर्जुन लाल मीणा का कांग्रेस के रघुवीर सिंह से पुन: मुकाबला है। नागौर में कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई के बावजूद डॉ. ज्योति मिर्धा को तीसरा चुनाव लडऩे का मौका मिला है। कांग्रेस के दिग्गज नेता स्व. नाथूराम मिर्धा की पौत्री ज्योति 2009 में सांसद बनी लेकिन वर्ष 2014 में भाजपा के सी.आर. चौधरी से पराजित हो गई। चौधरी का टिकट काटकर भाजपा ने गठबंधन में खींवसर से रालोप विधायक हनुमान बेनीवाल के लिए सीट छोड़ी है। इसी तरह गंगानगर में भाजपा के सांसद निहालचंद मेघवाल का कांग्रेस के पुराने प्रतिद्वंदी भरत राम मेघवाल से पुन: मुकाबला है। वर्ष 2009 में निहाल उनसे पराजित हुए थे लेकिन 2014 में उन्होने कांग्रेस के मा. भंवरलाल मेघवाल को हराया था।

कांग्रेस के तेरह प्रत्याशी पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव (जोधपुर) रिजु झुनझुनवाला (अजमेर) प्रमोद शर्मा (झालावाड़) सविता मीणा (दौसा) संजय जाटव (धौलपुर, करौली) मदन गोपाल मेघवाल (बीकानेर) अभिजीत कुमार (भरतपुर) एवं ज्योति खण्डेलवाल (जयपुर) पहली बार चुनाव मैदान में है। कृष्णा पूनिया जयपुर (ग्रामीण) देवकी नन्दन गुर्जर, रामपाल शर्मा श्रवण कुमार तथा रतन देवासी विधायक का चुनाव लड़कर हार जीत चुके है।

भाजपा ने पिछली बार चुनाव जीते 25 सांसदो में से एक मात्र महिला सांसद संतोष अहलावत समेत भरतपुर बांसवाड़ा नागौर बाड़मेर के सांसद का टिकट काटा है। राजसमंद सांसद हरिओम राठौड़ स्वास्थ्य कारणों से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वर्ष 2013 में सवाई माधोपुर से पहली बार विधायक चुनी गई जयपुर राजघराने की दीया कुमारी को राजसमंद से चुनाव लड़ाया जा रहा है। पिछले तीन विधानसभा चुनावो में खाता खोल रही बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनाव में जातीय समीकरण साधते हुए उम्मीदवार उतारे है। दो सूचियो में घोषित उम्मीदवारों में जयपुर से पूर्व वरिष्ठ आईएएस उमराव सालोदिया बाड़मेर से पूर्व आईपीएस पंकज चौधरी को पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी मुकुल पकंज चौधरी को जोधपुर से वैभव गहलोत के खिलाफ टिकट देकर चुनाव राजनीति को चौंका दिया है। उधर आप पार्टी अभी चुनाव लडऩे को लेकर कशमकश में है।

प्रदेश में चुनावी हार जीत की लड़ाई में कांग्रेस भाजपा के अलावा तीसरा मोर्चा कामयाब नहीं हो पाया है। लेकिन तीसरी ताकत से जुड़े उम्मीदवारों ने पिछले तीन चुनावो में एक दर्जन से अधिक सीटों पर प्राप्त मतों के आधार पर हार जीत में निर्णायक भूमिका निभायी है। इनमे गंगानगर, चुरू, झुन्झुनू, सीकर, करौली-धौलपुर, दौसा, जयपुर ग्रामीण सीट टोंक सवाई माधोपुर, बीकानेर, जयपुर ग्रामीण सीट मुख्य है।

राजस्थान के चुनाव मैदान में महिलाओं की उपस्थिति निराशाजनक रही है। वर्ष 1952 के पहले चुनाव से वर्ष 2014 तक के चुनाव में प्रदेश से निर्वाचित कुल जमा लगभग चार सौ सांसदो में से महज पन्द्रह महिलाओं को लोकसभा की सीढ़ी चढऩे का अवसर मिला है और इनमे भी सात पूर्व राज्य परिवारों से जुड़ी हुई रही। वर्ष 1977 से राज्य की 25 लोकसभा सीटों में से तेरह निर्वाचन क्षेत्रो के मतदाताओं ने तो कभी महिलाओं को अपना प्रतिनिधि चुनने की जहमत नहीं उठायी। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के सांसद बनने से पहले जयपुर की पूर्व महारानी श्रीमती गायत्री देवी 1962 में जयपुर से स्वतंत्र पार्टी की उम्मीदवार के रूप में जीती और लगातार तीन चुनावों में सफलता हासिल की। पिछले 48 सालों में कांग्रेस भाजपा ने जयपुर से किसी महिला को जयपुर से टिकट नहीं दिया। अब कांग्रेस ने जयपुर शहर तथा ग्रामीण से महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है।

राजस्थान में पहली बार 1984 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में सहानुभूति लहर के चलते कांग्रेस को सभी 25 सीटों पर सफलता मिली। बोफोर्स तोप घोटाला प्रकरण के दौरान नवम्बर 1989 में हुए चुनाव में कांग्रेस सभी 25 सीटे हार गई। इन दोनों चुनावों के समय राजस्थान के मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर थे। वर्ष 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी लहर में भाजपा को सभी 25 सीटों पर सफलता मिली थी। तब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे थी। संयोगवश दोनों मुख्यमंत्रियों का रिश्ता मध्य प्रदेश से रहा है। आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में हुए चुनाव में जनता लहर के चलते नागौर में कांग्रेस के नाथूराम मिर्धा के अलावा कांग्रेस सभी 24 सीटे हार गई थी।

वर्ष 2019 के चुनाव से भी एक संयोग जुड़ा है। कारगिल युद्व के करीब एक माह बाद 1999 में हुए चुनाव में भाजपा को 25 में से 16 सीटो पर सफलता मिली। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सीकर में चुनाव सभा की थी। अब पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शेखावटी के चुरू जिला मुख्यालय पर चुनाव सभा की है। संयोगवश तब वाजपेयी ने जाटों को आरक्षण देने की घोषणा की थी जबकि मोदी ने पिछड़े सवर्णो को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है। चुनाव नतीजे क्या चमत्कार दिखाते है? मतगणना 23 मई तक इसकी प्रतीक्षा करनी होगी।

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

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