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धर्म-निरपेक्षतावादियों का नया डेरा

धर्म-निरपेक्षतावादियों का नया डेरा

By विजय दत्त

उन्होंने उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं। युद्ध की लकीर खींच चुकी है। बुद्धिजीवी, वामपंथी,  धर्मनिरपेक्षतावादी, मीडिया के कुछ संभ्रांत और ऐसे लोग, जिन्होंने दिल्ली में विधानसभा चुनाव का मौका देखकर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का अवसर देखकर मोदी विरोध को लघु उद्योग में तब्दील कर दिया है, वे नरेन्द्र मोदी के उभार के साथ ही मौका चूक गए हैं।  वास्तव में, ऐसे लोग जिन्हें वर्तमान सरकार के लोकाचार से थोड़ा-बहुत कुछ लेना-देना है वे पहले ही आरामदेह पदों पर सुरक्षित हैं। डॉ. अमत्र्य सेन कथित धांधली के बावजूद अभी भी नालंदा विश्वविद्यालय परियोजना के अध्यक्ष पद बने हुए हैं। विदेश मंत्रालय अपनी महत्वकांक्षी परियोजनाओं के लिए अभी भी पैसे बहा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ उसे भटकता हुआ छोड़ देता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता सेन वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने कहा था कि वे नहीं चाहते हैं कि मोदी देश का प्रधानमंत्री बनें, क्योंकि उनकी धर्मनिरपेक्ष साख नहीं है। उन्होंने शासन के मोदी-मॉडल को यह कहकर आलोचना की कि हमें उसमें बिल्कुल भी विश्वास नहीं है। यह भारत सरकार की अपनी रिपोर्ट के विपरीत है। एक टीवी चैनल द्वारा पूछे गए सवाल पर कि मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए या नहीं, उन्होंने जवाब दिया – ”नहीं, मैं नहीं चाहता। एक भारतीय नागरिक होने के नाते मैं नहीं चाहता कि मोदी देश का प्रधानमंत्री बनें। … उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस करें।’’ उन्होंने आगे कहा – ”मैं नहीं सोचता कि उनका अतीत अच्छा रहा है। मेरा मानना है कि असुरक्षित महसूस करने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य होना जरूरी नहीं है। हम भारतीय ऐसी परिस्थिति नहीं चाहते, जिसमें अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करें। वैध रूप से देखा जाए तो 2002 में उनके खिलाफ संगठित रूप से हिंसा की गई थी। मेरा मानना है कि यह एक डरावना रिकॉर्ड है और मैं नहीं चाहता कि कोई भी ऐसा भारतीय व्यक्ति प्रधानमंत्री बने, जिसका ऐसा रिकॉर्ड रहा हो।’’

सेन ने कहा था कि गुजरात में आधारभूत ढांचा बढिय़ा हो सकता है, लेकिन मोदी ने बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक के लिए कुछ नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि गुजरात मॉडल को स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करना है और समाज में समानता लानी है। मोदी ने बहुसंख्यक समाज को यह भी महसूस कराया था कि वे अल्पसंख्यकों के साथ बुरा व्यवहार नहीं कर रहे हैं और भारत की पुरानी सहिष्णु होने की परंपरा के खिलाफ नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा था – ”इन दोनों तथ्यों को भी लिया जा सकता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य में मोदी के गुजरात का बुरा रिकॉर्ड है। उन्हें इस पर ध्यान देने की जरूरत है….. इसके बजाय वे आधारभूत संरचना पर ध्यान दे रहे हैं।’’

मोदी पर डॉ. सेन का दिया गया विषाक्त बयान मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें भारत आने से रोक रहा है या वे डरे हुए हैं? नालंदा विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी से डॉ. सेन को हटाने की कोई भी कोशिश निश्चित रूप से प्रतिशोध के रूप में देखी जाएगी, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त इस परियोजना का प्रबंधन और कार्यशैली बेहतरीन होनी चाहिए थी, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि ऐसा नहीं है। फिर ऐसे व्यक्ति के प्रति उदारता दिखाने की क्या वजह है, जो वर्तमान सरकार से घृणा करता है? लगता है कि विदेश मंत्रालय को इन बातों की जानकारी नहीं है।

तब, तिब्बती पहचान के एक विद्वान, पूर्व कांग्रेसी और इंदिरा गांधी के वफादार 87 वर्षीय लोकेश चंद्रा भारत की सांस्कृतिक कूटनीति विभाग – इंडियन कॉन्सिल फॉर कल्चरल रिलेशन्स (आईसीसीआर) का प्रमुख बनाया गया है। एक और कांग्रेसी को चुनने की क्या वजह हो सकती है? प्राचीन भारतीय वेद और संस्कृति का डॉ. कर्ण सिंह का अध्ययन अद्वितीय है। इन्हें उस व्यक्ति द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसका झुकाव संघ की तरफ है। जिंदगी भर कांग्रेसी रहे व्यक्ति का संघ की तरफ झुकाव? जो भी हो, अब चंद्रा का पूरा ध्यान मोदी की तरफ है और पूरी तरह कृतज्ञ नजर आ रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा – ”वो भगवान के अवतार हैं। वे विचारधारा के नहीं, विचारों वाले व्यक्ति हैं।’’ ऐसा लगता है कि 87 साल की उम्र में वे पूरी तरह कायापलट के दौर से गुजर रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने निश्चित रूप से उनके इस हृदय-परिवत्र्तन को देखा होगा।

अब एक अन्य नियुक्ति की बात करते हैं। जब मधु किश्वर को मोदी पर लिखी अपनी किताब को रिलीज करने से रोका गया था, तब कविता शर्मा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की निर्देशक थीं। संयोग से बुद्धिजीवियों ने किश्वर की ब्रांडिंग गद्दार के रूप में कर दी। अब, विदेश मंत्रालय ने कविता शर्मा को साउथ एशिया यूनिवर्सिटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह एक तरह का इनाम है, लेकिन किस बात का इनाम….!

यह सब सुनने में कितना अजीब लगता है। बुद्धिजीवियों को अपने पुराने अपमान के लिए अब कम से कम विदेश मंत्रालय का शुक्रगुजार होना चाहिए। बुद्धिजीवियों के लिए अभी सब कुछ नहीं खोया है। अब उम्मीद यह है कि अरविंद केजरीवाल, जो झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले और समाज के निचले तबके में अब भी लोकप्रिय हैं, वे भारतीय जनता पार्टी को भारी जीत से रोकेंगे और संभवत: इस बार भी जीतेंगे। मोदी विरोधी समूह केजरीवाल की जितना संभव हो सकता है, उतनी मदद कर रहा है।

यह सब अरविंद केजरीवाल द्वारा लगातार टीवी चैनलों पर दिए जा रहे साक्षात्कारों से जाहिर होता है। इस बार यह रणनीतिक रूप से गतिशील है। केजरीवाल ने लोगों से मुलाकात का अपना अभियान भी तेज कर दिया है और लगभग रोज ही सरकार की नीतियों और ऐक्शन पर अपने बयान देने लगे हैं।

हमने देखा है कि पहले चरण में घर-घर मुलाकात, दूसरे चरण में पोस्टर और अंत में बैठकों का दौर। केजरीवाल ने 49 दिनों में त्याग-पत्र देने के लिए जनता से माफी मांगी है। उन्होंने पहले ही भाजपा को अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीवार का नाम जाहिर करने की बात कहकर परेशानी में डाल दिया है। एक टिप्पणीकार का कहना है – ”तथ्य यह है कि यदि आम आदमी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आती है तो केजरीवाल ही मुख्यमंत्री होंगे, क्योंकि पार्टी का सबसे अधिक पॉपुलर चेहरा वही हैं। नेताविहीन भाजपा अपंग है।’’

लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह मोदी दिल्ली में भी लोगों का समर्थन हासिल करने में सफल होंगे। आम आदमी पार्टी के अंदरूनी लोगों का मानना है कि मोदी-लहर स्लम एरिया के लोगों को लुभाने में सफल नहीं हो पाएगी या उसका निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच कोई असर नहीं होगा। जो भी हो, लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों का आंकलन है कि इस बार ‘आआपा’ का खात्मा है। लेकिन, आखिरी सांस तक उम्मीद कायम रहती है। अपने मीडिया मित्रों के साथ बुद्धिजीवियों ने छद्मयुद्ध की तैयारी कर ली है और जैसा कि खबरें आ रही हैं, भगवा पार्टी के जयचंद मोदी-विरोधियों और उनकी नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखने वाले लोगों को भी उकसा रहे हैं। इस तरह डूम्सडे क्लब में भी संख्या बढ़ रही है। उन्हें मोदी सरकार द्वारा पहल किए गए या प्रस्तावित नीतियों में कुछ भी सही या फायदेमंद नहीं दिख रहा है। इस क्लब के नामी सदस्य सांसद मणिशंकर अय्यर हैं।

लूटियंस और डूम्सडे क्लब के सदस्य यथास्थिति को बनाए रखना चाहते हैं। वे पुराने तंत्र को बेहतर मानते हैं उनके प्रभाव बनाने में मदद करता है और सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक मुद्दों का ऑथिरिटी बनाकर सरकार द्वारा विशेषाधिकार और कई तरह के भत्तों से नवाजा जाता रहा है। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि यह सिस्टम विभाजनकारी तत्वों को प्रश्रय और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।

नरेन्द्र मोदी के आगमन से ऐसे वर्ग पर एक परछाईं पड़ गई है। बहुत बड़े बुद्धजीवी माने जाने वाले लेखक और टिप्पणीकारों के आज्ञा और निर्णय अंतिम आदेश माने जाते हैं। पिछले छह महीनों से वे गहरी निद्रा में सो रहे हैं और शायद ही कभी कुछ बोलने या लिखने का मौका पाते हैं। ऐसे लोग जो टीवी चैनलों पर साक्षात्कार देने के अभ्यस्त रहे हैं या लगातार अपना आलेख छपवाते रहे हैं, वे खुद को परित्यक्त महसूस कर रहे हैं। इस तरह यह पूरे कबीले के लिए किसी भयानक आपदा से कम नहीं है, जिन्हें विशेषाधिकार हासिल करने में कई दशक लग गए।

राजीव गांधी सरकार ने अपने कुछ नजदीकी लोगों को उनके जीवनसाथी के नाम पर एशियाड गांव में फ्लैट आवंटित किए थे। बड़े-बड़े लोगों को दक्षिणी दिल्ली के वीआईपी एरिया में फ्लैट दिया गया। उनके लिए कुछ घूमने-फिरने का इंतजाम किया गया। उन्हें प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर किसी भी मंत्रालय या सचिव तक पहुंचने का रास्ता बनाया गया। संपादकीय पृष्ठों पर उनके साक्षात्कार या लेख लगातार आते रहे।

इसी प्रकार, तीस्ता सीतलवाड़, संजीव भट्ट, जाकिया जाफरी और मानवाधिकार आयोग जैसे संगठनों के प्रवक्ता, जो मोदी आलोचना के कारण हमेशा सुर्खियों में रहते हैं, मुख्य पृष्ठ पर अक्सर जगह पाते रहे हैं। टीवी चैनलों पर उनकी उपस्थिति भी प्राय: दिखती रही है। उनसे अक्सर बहुत ही सरल सवाल समान विचारधारा के एंकरों द्वारा पूछे जाते रहे हैं।

लेकिन, पिछले छह महीनों में महत्व पाने और स्वयं लिए गए अधिकार की गलत भावना खत्म हो चुकी है। उनके संरक्षक कांग्रेस की अपनी ही हालत फटेहाल है। वीआईपी ट्रिटमेंट पाने वाले लूटियंस क्लब के सदस्यों, बुद्धिजीवी और मीडिया के कुछ एलिटों की स्थिति बातें अब कोई नहीं सुन रहा है।

यहां तक कि ब्रिटेन में भी मोदी के प्रभाव ने इस समूह में डर पैदा कर दिया है। सलमान रूश्दी, अनीश कपूर, किंग्स कॉलेज के प्रोफेसरों सहित कई बुद्धिजीवियों ने ‘इंडिया अगेंस्ट मोदी’ जैसे स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर किए। द गार्जियन में प्रकाशित पत्र के अनुसार – ”यदि वे (मोदी) प्रधानमंत्री चुने जाते हैं तो यह एक देश के रूप में भारत के हर नागरिक और समुदाय की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा होगा।’’ इसी तरह के शब्दों वाले आलेख इंडिपेंडेंट में भी छपी थी। इससे वे मोदी पर और भी तीव्रता से मौखिक हमले के लिए अपने भारतीय सहयोगियों को प्रोत्साहित करते हैं।

लेकिन, पूरी तरह नियोजित ‘स्टॉप मोदी फ्रॉम बीइंग पीएम’ अभियान के बावजूद भारत के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में पहली बार स्पष्ट बहुमत दिया। इससे लूटियंस क्लब के सदस्य और मोदी-आलोचकों को गहरी निराशा हुई। उनके सलाह को भारतीय जनता ने पूरी तरह नकार दिया और इस कारण दशकों में पहली बार इस समूह ने डर महसूस किया है। वे अचानक अपने आप को अकेला महसूस करने लगे और पाया कि अधिकांश टीवी चैनल ओपिनियन या जजमेंट के लिए उन्हें आमंत्रित नहीं कर रहे हैं। ऐसे दक्षिणपंथी या वामपंथी या मध्यमार्गी व्यक्ति जो लंबे समय से नजरअंदाज किए गए वे फैसले ले रहे हैं।

हताश और असंतुष्ट बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्षतावादी दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद कुछ पहचान और प्रासंगिकता हासिल करने की उम्मीद कर रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि अन्य जगहों की तरह दिल्ली में भाजपा बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी। इस तरह की उम्मीद का विशेषज्ञों द्वारा उपहास उड़ाया जा रहा है। यहां तक कि प्रसिद्धि, विश्वासनीयता और प्रभाव की ऊंचाई पर होने के दौरान भी केजरीवाल पिछले विधानसभा चुनावों में नंबर एक की हैसियत नहीं हासिल कर पाए थे। मोदी-आलोचकों को ऐसी उम्मीद क्यों है कि इस बार उनके लिए कुर्सी सुरक्षित है? उनके सबसे बड़े संरक्षक कांग्रेस का लगातार सफाया होता जा रहा है। भाजपा झारखंड और संभवत: जम्मू-कश्मीर में जीत हासिल करने के बाद दिल्ली में फ्रेश माइंड से चुनाव लडऩे की योजना बना चुकी है।

केजरीवाल संभवत: बड़े सपने देख रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे सदमे में हैं। दुर्भाग्य से, बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्षतावादी, लूटियंस एवं डूम्सडे क्लब के सदस्य केजरीवाल के साथ और गहराई में डूबते जा रहे हैं।

हमले के शिकार लूटियंस जोन के बशिंदों और कांग्रेस के लाड़-प्यार वाले अभिजात वर्ग को बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्षतावाद की दीवार बचा रही है। बदलाव, विकास, अवसर और जीवन-यापन में विश्वस्तरीय गुणवत्ता हासिल करने की उत्सुक युवा पीढ़ी के पास समय नहीं है और न ही उनके लिए उसमें आदर का भाव है जो आत्ममुग्धता के शिकार हैं। देखिए, तहलका पत्रिका की एक साधारण महिला के जीवन को उसके बॉस ने किस तरह बर्बाद कर दिया।

जहां तक रूश्दी के पश्चिमी कबीले की बात है, उन्हें अपने भविष्य को लेकर और भी अधिक चिंतित होने की जरूरत है, क्योंकि वहां सूर्यास्त हो चुका है। उन्हें अपने भारतीय भाई-बहनों को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। अब देश बड़े लीग में शामिल होने की दहलीज पर है।

भारतीय बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों को हकीकत को स्वीकार करना चाहिए और मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए। उनका स्वर्णिम दौर खत्म होना अच्छी बात है। उन्हें हताश होने की जरूरत नहीं है। कहावत है कि नैतिकता और बुद्धिमत्ता की गिरावट, चापलूसी के सीधे अनुपात में होती है। याद रहे, लाड़-प्यार का वक्त खत्म हो चुका है।

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