ब्रेकिंग न्यूज़ 

कौन बढ़ा रहा था ऐसे अपराधियों को?

कौन बढ़ा रहा था ऐसे अपराधियों को?

By शिरीष सप्रे

किसी तरह पैर आगे-पीछे करते-करते शौचालय की दीवार के सहारे टिक पाया था। दोनों तरफ दरवाजे खुले थे पर हवा नाम को भी नहीं लग रही थी। भयानक सफोकेशन था तब भी लगातार लोग बीड़ी और सिगरेट पिए जा रहे थे। जहां मैं खड़ा था ठीक उसके बाजू में किसी तरह एक मोटे काले और भद्दे से आदमी ने बैठने की जगह बना ली थी। वह खैनी खा रहा था। थोड़ा ही समय बीता होगा कि उसने पिच्च से मेरे पैर के बगल में थूक दिया। मैं जूते पहने हुए था वरना उसके छींटे मेरे पैर पर अवश्य पड़ते। मैंने उस आदमी से कहा कि तुम दरवाजे के पास बैठे हुए हो बाहर भी थूक सकते थे, डिब्बे के अंदर ठीक मेरे पैर के पास क्यों थूक दिया। वह सहज ही बोला ‘क्या करें बाबू गरीब आदमी हैं’। अब गरीब आदमी होने का डिब्बे के अंदर थूकने से क्या ताल्लुक? क्या गरीब आदमी घर के अंदर ही हगते-मूतते हैं? मैं गुस्से में था। आगे कुछ नहीं बोल पाया पर यदि यही बात मैं उससे पूछता और वह फिर वही बात दोहरा देता ‘क्या करें बाबू गरीब आदमी हैं’ तो अपने कपड़े फाड़ लेने या सर के बाल नोंच लेने का मन अवश्य करता।

खैर मूल बात यह है कि गरीबी और गंदगी में एक घनिष्ठ संबंध है। लोग झुग्गी-झोंपडिय़ों में रहते हैं, गंदे नालों के किनारे रहते हैं, कचरा फेंकने वाली जगहों पर रहते हैं, पानी जमा होने वाले निचले स्थानों पर रहते हैं, गाय-भैंसों के साथ रहते हैं, सुअरों और भेड़-बकरियों के साथ रहते हैं, जाहिर है राजी-खुशी तो वे वहां नहीं रहते, मजबूरी में ही रहते हैं, पर वातावरण के हिसाब से अपने को ढाल लेते हैं। मैला ढोने, साफ  करने से लेकर गाड़ी सुधारने तक के काम वे करते हैं जिनमें मैल लगना स्वाभाविक है। गत दिनों आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों, विशेष रूप से मेहबूबनगर जिले में दिमागी ज्वर (मेनिंजो एनसिफलाटिस) से दो सौ से अधिक बच्चों की मौत हो गई। यह बीमारी गंदगी और गरीबी के कारण ही पनपी थी। गंदगी के कारण मच्छरों का बढऩा और उनसे मलेरिया तथा मस्तिष्क ज्वर का फैलना ग्रामीण इलाकों में बहुत आम बात है। राजस्थान के रेगिस्तानी भाग में हर वर्ष हजारों लोग इन बीमारियों की बलि चढ़ जाते हैं। मिट्टी पत्थर और खेती के काम भी कोई साफ-सुथरे काम तो हैं नहीं कि नहा-धोकर आराम से संपन्न किए जा सकें और कमीज भी मैली न हो। तो गरीब किसान मजदूरों को गंदगी से जूझते रहने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प कम से कम भारत में तो नहीं ही है। यह कहावत सटीक है कि मिट्टी में पैदा हुए हैं और मिट्टी में ही मिल जाएंगे।

13-12-2014

भारत की धर्मभीरु जनता (शिक्षित-अशिक्षित दोनों ही) अज्ञान, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा के जाल में बुरी तरह फंसी हुई है। गांव-गांव में भूतबाधा, असाध्य बीमारियों के इलाज, गुप्तधन की प्राप्ति, मनचाही संतान की चाह एवं कई कुरीतियों के नाम पर अनेकानेक ढ़ोंगी साधु-बाबा-तांत्रिक अमानवीय कुकर्म, नरबलि सहित इनके साथ करते रहते हैं। इनके कारनामे पकड़ में आने पर समय-समय पर छपते ही रहते हैं। लोगों को फुसलाने के लिए अधिकांशत: ये ढोंगी चमत्कार दिखलाने के साथ ही मुफ्त रहवास, उनके संप्रदाय में रोजगार के नाम पर सेवा-चाकरी और प्रचार का काम करवाते हैं एवं मुफ्त भोजन-भंडारे का भी सहारा लेते हैं।  दकियानूसी विचारों की पीलिया से अनेक वर्षों से ग्रस्त हमारे समाज में हो चूके अनेक समाज सुधारकों के डोज हजम नहीं हुए, तभी तो आज परमाणु युग में भी जनता का झुकाव विध्वंसक, घातक अंधश्रद्धाओं की ओर ही है।

इन अंधश्रद्धाओं और ढोंगी बाबाओं के तिलिस्म में फंसे लोगों का मजाक उड़ाने, उन पर तरस खाने की अपेक्षा सामाजिक दृष्टि से घातक अंधश्रद्धाओं के संहार के लिए विज्ञानवादी, तार्किक-बुद्धिनिष्ठ, विवेकशील दृष्टिकोण की जडें समाज में जमाना आवश्यक है। इसके लिए जनशिक्षा और सामाजिक प्रबोधन पर बल देना होगा। शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शास्त्रीय विश्लेषण सीखाने वाली चिकित्सक प्रवृत्ति निर्मित करने, उसको बढ़ावा देने पर बल देना पड़ेगा। उदाहरण के लिए प्रेमचंद की कहानियां। देश के विकास एवं प्रगति के लिए अंधश्रद्धा निर्मूलन आवश्यक है। चाहें तो इसके लिए कानून बनाएं और समाज को इन ढोंगी गुरुओं, बाबाओं से बचाना समय की मांग है। इस संबंध में यह कहावत बहुत सटीक है जो नारु उन्मूलन के दौर में सरकार ने प्रचारित की थी –

पानी पीयो छान के, गुरु करो जान के।’

набор профессиональнойооо полигон одесса

Leave a Reply

Your email address will not be published.