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क्या ‘डल झील’ में खिलेगा कमल ?

क्या ‘डल झील’ में खिलेगा कमल ?

By जम्मू से प्रकृति गुप्ता

जम्मू-कश्मीर में अगली सरकार कौन बनाएगा? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जादू से 87 सदस्यीय विधानसभा में 44+ सीटें जीतकर भाजपा राज्य की राजनैतिक स्थिति बदलने वाली है?

2014 के आम चुनावों के परिणाम को चुनावी जलजला कहा गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर के पहले चरण के मतदान साफ दर्शा रहे हैं कि कश्मीरियों ने अलगावादियों के चुनावी बहिष्कार को सिरे से नकार दिया है। उत्साही बुजुर्ग, युवा, पुरूष और महिलाओं, खासकर पहली बार मतदान करने वालों की 15 विधानसभा क्षेत्र के मतगणना केन्द्रों के बाहर लगी लंबी कतारें बता रही थीं कि बुलेट पर बैलेट भारी पड़ रहा है। इसका सारा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम की लहर और लोकतंत्र में विश्वास करने वाले कश्मीरियों को जाता है।

पिछले 18 सालों में यह पहला चुनाव है, जिसमें भारतीय चुनावी उत्सव का वास्तविक रंग जम्मू-कश्मीर में दिखा। गांदरबल से लेकर बंदीपोर तक कड़कड़ाती ठंड में बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकले और राज्य के चुनावी इतिहास में पहली बार पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए 71 प्रतिशत मतदान किए।

कभी अलगाववादी अभियान का केन्द्र्रस्थल और 1990 में घुसपैठ का आसान रास्ता रहा उत्तरी कश्मीर का बांदीपोर स्वेच्छा से हर राजनीतिक दल के रंगों – लाल, केशरिया, हरा और नीला को खुद से लपेटे रहा। इस शहर का लगभग हर हिस्सा राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के पोस्टर और बैनरों से पटा रहा। भारत विरोधी और अलगाववादी अभियान के दौरान पैदा हुए 18 वर्षीय इम्तियाज अपने पिता और दादा के साथ अंगुली पर लगे स्याही के निशान को बहुत गर्व से दिखाते हैं और वोट देने के पीछे अपने दिमाग की स्पष्ट सोच को जाहिर करते हैं। इम्तियाज का कहना है – ”हमें भ्रष्टाचार मुक्त सरकार चाहिए, जो हम जैसे लोगों के लिए काम कर सके, न कि सरकारी पैसे का प्रयोग अपने लिए बड़े बंगले, कार और अन्य सुविधाएं जुटाने में खर्च करे।’’ हालांकि उसके परिवार के लोग परंपरागत राजनीतिक दलों से जुड़े हैं, लेकिन इम्तियाज ने थोड़ा शर्माते हुए स्वीकार किया कि वह मोदी की कार्यशैली से बेहद प्रभावित हैं।

मोहम्मद मकबूल नाम के एक बुजुर्ग का कहना है – ”इस तरह की चुनावी प्रक्रिया यहां हमने 25 साल बाद देखी है। बड़े पैमाने पर लोग राजनैतिक रैलियों में शामिल हो रहे हैं।’’ चुनाव के पहले चरण में 15 विधानसभा क्षेत्रों – किश्तवार, इंदरवाल, डोडा, भदेरवाह, रामबन और बनीवाल (जम्मू क्षेत्र के), गुरेज, बंदीपुरा, सोनावरी, कंगन और गंदेरबल (कश्मीर क्षेत्र), नोबरा, लेह, कारगिल और जांस्कर (लद्दाख क्षेत्र) के कुल 123 उम्मीदवारों, जिसमें 7 मंत्री सहित 12 विधायक शामिल हैं, के भाग्य मशीनों में कैद हो गए। इन सभी क्षेत्रों में मतदान शांति से संपन्न हो गए।

हम पहले जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक और  जनसांख्यिकी साम्यता को समझने का प्रयास करते हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से जम्मू-कश्मीर भारत का पांचवा और जनसंख्या के हिसाब से 19वां सबसे बड़ा राज्य है। राज्य के तीन महत्वपूर्ण संभाग हैं – कश्मीर (97 प्रतिशत मुस्लिम आबादी), जम्मू (65 प्रतिशत हिंदू आबादी) और लद्दाख (45 प्रतिशत मुस्लिम और 47 प्रतिशत बौद्ध)। राज्य की कुल आबादी 125 मिलियन है, जिसमें कश्मीर में रहने वाले लोगों की संख्या 6.9 मिलियन है, जबकि जम्मू में 5.3 मिलियन और लद्दाख में 3 लाख लोग रहते हैं। अब्दुल्ला परिवार का ऐतिहासिक संपर्क-सूत्र होने के कारण नेशनल कॉन्फ्रेंस यहां की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है। राज्य के मु़स्लिम वोटबैंक का सबसे बड़ा रहनुमा भी यही दल है। नेशनल कॉन्फ्रेंस से यहां के लोगों का मोहभंग होने के बाद पिछले दशक में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपनी मजबूत मौजूदगी साबित की। राष्ट्रीय दर्जा के कारण कॉन्ग्रेस की भी यहां पर उपस्थिति है।

2002 और 2008 के चुनावों में दो प्रमुख क्षेत्रीय दल – पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने राज्य में कॉन्ग्रेस के सहयोग से सत्ता हासिल की। मुस्लिम बहुल कश्मीर में भाजपा हमेशा अनुपस्थित रही, जबकि हिंदू बहुल जम्मू में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 11 सीटें जीती थीं। हालांकि भाजपा ने मुस्लिम बहुल कश्मीर में अपनी राजनैतिक पकड़ बनाने का कभी गंभीर प्रयास नहीं किया, लेकिन इस बार के चुनाव में मोदी की अगुवाई में भाजपा ने कश्मीर घाटी में भी अपना विस्तार करने पर ध्यान दिया है।

भाजपा ने उन छोटे-छोटे दलों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है, जो पिछले कुछ महिनों में घाटी में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। छोटे दलों को अपने साथ जोडऩे की प्रक्रिया में भाजपा ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ हाथ मिलाया है। सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष दाराशान अंद्राबी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। उमर अपने पारिवारिक सीट गंदरबल को छोड़कर सोनवार और बिरवाह से चुनाव लड़ रहे हैं। सोनवार उनके पिता फारूख अब्दुल्ला की सीट रही है और फारूख वहां से 2008 में विधायक चुने गए थे।

38 वर्षीय अंद्राबी पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। कवि और लेखक अंद्राबी शांति के समर्थक हैं। इसी तरह का अभियान समीरा कदल में भी दिखने वाला है, जहां भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रही दंत-चिकित्सक डॉ. हिना भट्ट वर्तमान विधायक नासिर असलम वानी को कड़ी टक्कटर दे रही हैं। डॉ. भट्ट के पिता मोहम्मद सफी भट्ट नेशनल कॉन्फ्रेंस की टिकट पर सांसद रह चुके हैं। भाजपा की दो महिला चेहरा कश्मीर के गंभीर राजनैतिक माहौल में अपनी छाप छोड़ रही हैं।

भाजपा द्वारा छोटे राजनैतिक दलों को अपने साथ जोडऩे के मामले में सबसे हाईप्रोफाईल मामला पूर्व अलगाववादी नेता और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन का है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के बाद लोन ने कहा था कि चुनाव बाद उनकी पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन करने की संभावना से इंकार नहीं कर सकती है। लोन ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मोदी जम्मू-कश्मीर का भाग्य बदल सकते हैं। उनका यह बयान राज्य में भाजपा की चुनावी तस्वीर बदल सकती है। लोन ने भाजपा के महासचिव और राज्य के प्रभारी राम माधव से भी मुलाकात की। राम माधव ने भी चुनाव बाद लोन की पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना से इंकार नहीं किया। राम माधव ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में गरीबी और बेरोजगारी को मिटाकर स्वच्छ और पारदर्शी शासन देने के लिए भाजपा कटिबद्ध है। उन्होंने कहा- ”भाजपा परिवार द्वारा संचालित सत्ता के खिलाफ किसी भी लोकतांत्रिक दल के साथ गठबंधन करने को तैयार है। चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने वाले किसी भी दल के साथ बैठक करने में कोई बुराई नहीं है। इस उद्देश्य के साथ पार्टी उन सभी लोगों को साथ लाने के लिए तैयार है, जो नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के खिलाफ हैं।’’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर के किश्तवाड़ में सार्वजनिक सभा कर चुनावी रैली का आगाज किया, जिसमें लगभग 30 हजार लोग उन्हें सुनने के लिए शामिल हुए। मोदी ने राज्य में 50 साल पुरानी वंशवादी सत्ता को समाप्त करने की लोगों से अपील की। हालांकि उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस का नाम नहीं लिया, लेकिन पिछले 50 सालों से यही दोनों दल राज्य में बारी-बारी या गठबंधन के जरिए सत्ता में रही हैं।

भाजपा राज्य में सरकार बनाने की महत्वकांक्षा इसलिए पाली, क्योंकि भाजपा ने जम्मू के साथ-साथ लद्दाख क्षेत्र के दोनों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की, जबकि विधानसभा की 41 में से 27 सीटों पर लीड कर रही है। इसके कारण पार्टी के पर्यवेक्षकों को जम्मू-कश्मीर में आशा की एक नई किरण दिख रही है। इसलिए भाजपा ने 44+ के आंकड़ें को हासिल करने के लिए सभी प्रयास शुरू कर दिए। इतिहास में पहली बार भारत के अकेला मुस्लिम बहुल राज्य में भाजपा का सरकार बनाने या किंगमेकर की भूमिका निभाने का प्रयास है।

इसके अतिरिक्त, अब्दुल्ला वंश की तीसरी पीढ़ी द्वारा संचालित सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हमेशा राज्य को स्वायत्तता देने या संविधान की धारा 370 को बकरार रखने के भावनात्मक मुद्दे पर लोगों को बरगलाकर सत्ता पाई है। सत्ता-विरोधी हवा का लाभ लेकर पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी भी लोगों को राहत देने में नाकाम रही। दोनों दलों के स्वार्थ के कारण अधिकांश लोग अब मोदी के नेतृत्व में भाजपा के विकास के एजेंडे की तरफ देख रहे हैं।

यद्यपि मोदी लहर में भाजपा हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में जीत की स्थिति में है, जहां उम्मीद की जा रही है कि इस क्षेत्र से 20-25 सीटें मिलेंगी। जम्मू के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भाजपा ने चार मुस्लिम उम्मीदवार भी उतारे हैं। इन क्षेत्रों में भाजपा जनजातीय पत्ते फेंक रही है। पार्टी गुर्जरों के लिए अलग आरक्षण देने की बात कहकर उन्हें अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है। पिछले चार दशकों से गुर्जर अपने लिए अलग आरक्षण की मांग करते आ रहे हैं। इसे चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा ने राज्य में मास्टरस्ट्रोक खेला है।

तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल – नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी और कॉन्ग्रेस, नई बोतल में पुरानी शराब बेच रहे है, वहीं भाजपा अपना आयडिया बेच रही है।

2014 विधानसभा चुनाव के पर्यवेक्षक कुछ अलग महसूस कर रहे हैं। चुनाव का बहिष्कार इस बार उतना मुखर नहीं है, जितना कि अतीत में रहा है। इसके अलावा इस बार कोई आतंकी धमकी भी नहीं मिली। जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि लोगों का राजनैतिक रैलियों में बड़े स्तर पर भागीदारी रही है।

मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि घाटी में भाजपा का आतंक ज्यादा है, जिसके कारण सोपोर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक ने अलगाववादी हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी से चुनावी बहिष्कार का मजबूती से आह्वान करने की अपील की थी। सोपोर गिलानी का गृह क्षेत्र है। माना जा रहा है कि बहिष्कार के आह्वान से घाटी में भाजपा के प्रवेश पर रोक लगेगी।

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