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चुनावी जंग जीतने की होड़

चुनावी जंग जीतने की होड़

By रांची से संजय सिन्हा

झारखण्ड में 13 विधानसभा क्षेत्रों के लिए 25 नम्बर को प्रथम चरण का चुनाव सम्पन्न हो गया है। अभी चार चरणों का मतदान बाकी है। इस चुनाव के लिए एक तरफ क्षेत्रीय पार्टियों के हौसले पस्त हैं तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के नेताओं में चुनावी जंग जीत लेने की होड़ मची हुई है। यहां विधानसभा की 81 सीटें हैं, जिनमें 13 सीटों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच चुनाव हुआ। राजनीतिक दलों के रणनीतिकार चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में जुटे हुये हैं।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवीन्द्र राय कहते हैं – ”चौदह सालों में भी झारखण्ड का विकास नहीं हो पाया है। किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलने के कारण कमजोर सरकारें बनीं, लिहाजा राज्य का विकास नहीं हो पाया।’’ मौजूदा सरकार पर निशाना साधते हुए रवीन्द्र राय कहते हैं – ”हेमंत सोरेन की सरकार न तो प्रदेश के आदिवासियों का कल्याण कर पाई और न ही उनकी सरकार में गैर-आदिवासियों का ही भला हो पाया। आज भी झारखण्ड हर लिहाज से पिछड़ेपन का शिकार है।’’

उधर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन वर्तमान विधानसभा चुनाव को लेकर खासे उत्साहित हैं। वे झामुमो को प्रदेश का रहनुमा मानते हैं और कहते हैं कि उनकी सरकार ने लगातार विकासमूलक कार्य किए हैं। यही वजह है कि जनता का भरोसा झामुमो पर पहले से अधिक बढ़ा है।

झारखण्ड विकास मोर्चा (झाविमो) और ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) भी चुनावी मैदान में पूरी तैयारी के साथ उतर चुकी है। आजसू के केन्द्रीय महासचिव रोशन लाल चौधरी ने कहा – ”पार्टी सभी विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है। इस बार भी हमारा चुनावी मुद्दा शिक्षा, हरियाली और विकास है। इन्हीं मु़द्दों पर हम चुनाव लड़ेंगे।’’ रोशन लाल चौधरी खुद भी इस वार चुनाव लड़ रहे हैं। उनके भाई चंद्र प्रकाश चौधरी पिछली सरकार में मंत्री रह चुके हैं। दूसरी तरफ झारखण्ड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी प्रदेश में लगातार सभाएं कर रहे है और जनता से एक ईमानदार एवं मजबूत सरकार लाने की अपील कर रहे हैं। झाविमो के केन्द्रीय महासचिव मन्तोष सोरेन का दावा है कि ज्यादातर सीटों पर उनकी पार्टी को सफलता मिलेगी, क्योंकि प्रदेश की जनता सभी दलों के फरेब को समझ चुकी है। उन्होंने कहा कि बाबूलाल मरांडी की सरकार सबसे मजबूत सरकार साबित हुई थी। उन्होंने ईमानदारीपूर्वक प्रदेश के विकास के लिए कार्य किए। इस बार भी हम एक स्थायी सरकार प्रदेश की जनता को देना चाहते हैं।’’

प्रदेश के राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार के चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियों का सफाया हो सकता है। 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 18 सीटें मिली थीं, लिहाजा झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के साथ मिलकर सरकार बनी। भाजपा नेता अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने एवं झामुमो की ओर से हेमंत सोरेन को उप मुख्यमंत्री बनाया गया, मगर 2013 में यह सरकार कर गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इसके बाद झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने घटक दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई। मुख्यमंत्री के रूप में हेमंत सोरेन की ताजपोशी हुई। 3 जनवरी 2015 को विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है, लिहाजा चुनाव आयोग ने मतदान की घोषणा कर दी है।

बनेगी मजबूत सरकार – समरेश सिंह

13-12-2014

झारखण्ड के कद्दावर और बाहुबली नेताओं में शुमार समरेश सिंह पिछले कई सालों से बोकारो विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे है। वे भाजपा की सरकार में मंत्री भी रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक हालातों पर उनसे संजय सिन्हा की बातचीत के प्रमुख अंश –

राज्य में विधानसभा चुनाव जारी है। इस चुनाव में आपकी क्या भूमिका है?
झारखण्ड में एक मजबूत सरकार बनेगी। जहां तक मेरी भूमिका का सवाल है, तो मैं यही कहूंगा कि जनता मेरे लिए जो भी भूमिका तय करेगी, जैसा निर्देश होगा, मैं उसी तरह काम करूंगा।

आपको लगता है कि महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह झारखण्ड में भी ‘मोदी-मैजिक’ एक बड़ा फैक्टर है?
निश्चित तौर पर। नरेन्द्र मोदी जी की कार्यशैली से पूरा देश प्रभावित है, तो झारखण्ड कैसे अछूता रह सकता है। प्रदेश की जनता अगर विकास चाहती है, तो भाजपा को लाना होगा।

बोकारो के लिए आपकी पहली प्राथमिकता क्या है?
सर्वांगीण विकास। प्रदेश में एम्स की स्थापना, युवाओं के लिए रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरे राज्यों के पूंजीपतियों से निवेश करवाना हमारी पहली प्राथमिकताओं में शामिल है।

यहां झामुमो का अपना एक वोट बैंक रहा है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लगभग 28 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के वोटर झामुमो से जुड़े हैं, लेकिन धीरे-धीरे इन वोटरों को बांटने का काम झाविमो और कांग्रेस ने किया। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनावों में झामुमो को 18 सीटें मिलीं तो झाविमो को 11 और कांग्रेस को 14 सीटें मिली। इस बार झाविमो की सीटें बढऩे की उम्मीद है, क्योंकि राज्य के कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाबूलाल मरांडी का अच्छा-खासा प्रभाव है। कद्दावर आदिवासी नेताओं में से एक बाबूलाल मरांडी ने इस बार चुनाव प्रचार में पूरी उर्जा झोंक दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह यहां भी बाजी मार सकती है। बहरहाल राज्य का सियासी पारा चढ़ा हुआ है।

इस बार पूरे झारखण्ड में 199 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 33,65,780 है। माओवाद प्रभावित 6 जिलों में शांतिपूर्ण तरीके से मतदान कराना चुनाव आयोग के लिए टेढ़ी खीर था, लेकिन आयोग ने मतदान के पहले चरण में इस चुनौती को भी सफलतापूर्वक पार किया। पहले चरण के चुनाव में 61.92 प्रतिशत मतदान हुआ। अभी चार चरणों का चुनाव बाकी है। यह भी चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती से कम नहीं।

युवा मतदाताओं की होगी अहम् भूमिका
पिछले लोकसभा चुनावों में युवा वोटरों के उत्साह को देखते हुए इस बार भी यह तय है कि नए एवं युवा वोटर प्रदेश की सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यही वजह है कि लगभग सभी पार्टियां युवा मतदाताओं को रिझाने में लग गई हैं। रांची की छात्रा संजना सिन्हा कहती हैं – ”राजनीतिक पाटियां अब युवाओं को बरगला नहीं सकतीं। सियासी दलों ने युवाओं को लंबे समय तक इस्तेमाल किया, लेकिन अब उनमें जागरूकता आ चुकी है। हमारा वोट उसी को जाएगा, जो हमें रोजगार के अवसर मुहैया कराएगा। अब सिर्फ कोरे वादों से काम नहीं चलने वाला।’’ सियासी पार्टियां युवाओं को जोडऩे के लिए सोशल मीडिया का भी सहारा ले रही हंै। एक सर्वेक्षण के मुताबिक झारखण्ड में 10 लाख से भी अधिक पढ़े-लिखे युवा एवं नए वोटर हैं, जो इस बार निर्णायक भूमिका में होंगे।

महिलाओं का हाल-बेहाल
राज्य के चुनावी अखाड़े में महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय है। 2005 और 2009 में हुए विधानसभा चुनावों में पुरूषों की तुलना में महिलाएं काफी कम संख्या में उतरी थीं। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2005 में प्रदेश की 81 सीटों पर 1,296 पुरूष उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे, जबकि महिला उम्मीदवारों की संख्या महज 94 थी। इनमें से 85 को करारी हार मिली थी। यहां तक कि इनमें से ज्यादातर की जमानत भी जब्त हो गई थी। केवल 5 सीटों पर महिलाओं का कब्जा हो पाया था, जबकि वर्ष 2005 में हुए चुनावों में 1205 पुरूषों और 107 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था, जिनमें से 94 महिला प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। सिर्फ 5 महिलाओं को ही विधायक की कुर्सी मिल पाई थी। इस बार 199 उम्मीदवारों में सिर्फ 18 महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं।

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