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गृहिणी का तपोबल

गृहिणी का तपोबल

By उपाली अपराजिता रथ

समाज में रहकर अपने कत्र्तव्र्यों का पालन करने वाले व्यक्ति वाकई बहुत बड़ा योगी होते हैं। इसका उल्लेख स्वामी विवेकानंद ने अपने ‘कर्मयोग’ में किया है। एक छोटी-सी कहानी के माध्यम से हम इसे आसानी से समझ सकते हैं। एक संन्यासी जंगल में एक पेड़ के नीचे तपस्या कर रहे थे। उसी पेड़ पर एक बगुला और एक कौआ आपस में लड़ाई कर रहे थे। लड़ाई के दौरान पेड़ का एक सूखा पत्ता टूटकर संन्यासी के उपर आ गिरा। तपस्या में विघ्न देखकर संन्यासी क्रोधित हो गए। आवेशित संन्यासी  ने ऊपर की तरफ देखा और उनके मस्तक से निकली अग्नि-शिखा दोनों पक्षियों को भस्म कर दिया। कुछ क्षण बाद उन्हें इसका पश्चाताप हुआ। कुछ दिन बाद संन्यासी को भिक्षा मांगने के लिए एक गांव में जाना पड़ा। एक दरवाजे पर खड़ा होकर संन्यासी भिक्षा के लिए आवाज दिया तो गृह के अंदर से एक नारी की स्वर बाहर आया कि थोड़ा इंतजार कीजिए। संन्यासी के मन में ख्याल आया कि एक साधारण नारी उनको इंतजार करने के

लिए बोल रही, जरूर उन्हें अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए। अन्दर से एक बार फिर आवाज आई – ”मैं कोई बगुला और कौआ नहीं हूं।’’ तत्पश्चात संन्यासी का गुस्सा ना केवल शान्त हो गया, बल्कि यह बात उन्हें चकित भी कर गई।

इस दुनिया में जन्म लेने वाला हर प्राणी  चाहता है कि वह संसार में आनंद से रहे। हर प्राणी का एकमात्र मकसद होता है कि उसकी आत्मा परमात्मा से एकाकार हो जाए। वह चाहता है कि वह अपनी आत्मा को इतना शुद्ध रखे कि उसमें परमात्मा खुद वास करें। इस परमानंद को पाने के लिए हर प्राणी भिन्न-भिन्न मार्ग अपनाते हैं।

कई व्यक्ति संसार के भोग-विलास तथा अपने परिवार एवं आत्मीय जनों से स्वयं को दूर रख पूरी जिंदगी बिता देते हैं। इस आनंद की प्राप्ति अनेक ऋषि-मुनियों हुई भी हैं। कई महापुरूष योग के माध्यम से  तपस्या कर अनेक अलौकिक शक्तियों के अधिकारी हो जाते हैं। जहां बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की बात होती है, वहां गृहस्थ जीवन जीने वाले साधारण मनुष्यों की बात नगण्य हो जाती है। जबकि वास्तविकता में समाज में रहकर अपना कर्म सुचारु रूप से करने वाले इंसान से बड़ा कोई योगी नहीं हो सकता। एक नारी का पूरा जीवन अपने परिवार के लिए न सिर्फ कत्र्तव्यों की निर्वाह करती है, बल्कि सबकी खुशी में अपनी खुशी का अनुभव भी करती है।

नारी अनजाने में ही इतनी शक्ति की अधिकारिणी हो जाती है कि उसकी तुलना  किसी अन्य से नहीं की जा सकती।

थोड़ी देर बाद वह नारी जब बाहर आई और विलंब के लिए क्षमा-याचना करते हुए संन्यासी से बोली – ”हे द्विज, मेरे पति बीमार हैं। मैं उनकी सेवा-सुश्रुषा कर रही थी, इसलिए आपको इंतजार करना पड़ा।’’ संन्यासी ने पूछा – ”देवी! आपको बगुला और कौए की बात कैसे ज्ञात हुआ?’’ नारी हंसते हुए उत्तर दिया – ”आप तपस्या के माध्यम से जो शक्ति हासिल करते हैं। एक साधारण नारी अपने कर्म को भगवान मानकर करती है तो वही शक्ति उसे भी प्राप्त हो जाती है। इससे उसे न सिर्फ परमानन्द, बल्कि दिव्यज्ञान भी प्राप्त हो सकती है।’’

इस तरह हर इंसान अपने कर्म को भगवान मान कर करे तो उसे भी किसी मुनि-योगी जैसा ज्ञान प्राप्त हो सकता है। एक ब्याध भी अपने कर्म को सिर्फ एक वंशानुक्रम वृत्ति मानकर परमात्मा का मनन करे तो वह भी महापुरूषों के समान हो सकता है। हम केवल कर्म को एक योग मानकर करें तो हम भी कर्मयोगी कहलाएंगे और  परमानन्द को प्राप्त करेंगे।

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