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कश्मीर के लिए नई उम्मीदें

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

जम्मू-कश्मीर में चुनाव का पहला चरण खत्म हो चुका है। ऐसा लगता है कि पहली बार स्वाधीनता के बाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव शांत माहौल में हो रहे हैं और यह हमारे देश के लिए एक अच्छा संकेत है। पिछले जितने राजनीतिक दलों ने केन्द्र में अथवा राज्य में शासन किया था, अटल बिहारी वाजपेयी को छोड़कर कोई भी नेता कश्मीर को लेकर इतनी सकारात्मक सोच नहीं रखता था। कश्मीर विवाद का समाधान तलाशने की गंभीर कोशिश करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ”कोई आत्मविश्वासी और संकल्पवान देश अपने बीते कल के असुविधाजनक मसलों को भविष्य पर नहीं छोड़ता। इसके बदले वह अपने अतीत की समस्याओं का निर्णायक समाधान तलाशने की कोशिश करता है, ताकि वह अपने विकास के एजेंडे पर पूरे मन से आगे बढ़ सके।’’

लेकिन वाजपेयी के राजनैतिक परिदृश्य से हटते ही सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने कश्मीर के ‘असुविधाजनक मसले’ को फिर किनारे कर दिया। उसके बाद श्रीनगर में एक के बाद एक राज्य सरकारों ने नई दिल्ली के नियंताओं की कठोर नीति पर चलकर पूरी शिद्दत से कश्मीरियों को और अलग-थलग करने में ही अपना पराक्रम दिखाया।  लिहाजा, नई दिल्ली के अडिय़ल रुख के जवाब में कश्मीरियों में विद्रोह की भावनाएं जगीं। इस तरह मामला खतरनाक स्थिति में पहुंच गया। दूसरी तरफ पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक रंजिश को सार्वजनिक बहस में लाने की भाजपा के रुख से कश्मीर के बारे में कोई भी नई पहल विस्फोटक बन जाया करती है।

मोदी को एहसास है कि कश्मीरी लोग मूल रूप से रायशुमारी ही नहीं चाहते, बल्कि उन्हें तो सड़कें, पानी, स्कूल और रोजगार चाहिए। मोदी की कश्मीर को लेकर योजनाओं में चाहे जिस राय की अहमियत हो लेकिन उनमें देश में कुशाग्र विद्वानों में एक, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष प्रताप मेहता की राय काबिलेगौर है, ”भारत की चुनौतियों के प्रति प्रधानमंत्री को ऐसा नजरिया रखना चाहिए जो तंगदिमागी और सुरक्षा विशेषज्ञों की आत्मघाती विचारों से ऊपर हो।’’

जम्मू-कश्मीर में इसके पहले 2008 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 11 सीटें मिली थीं। ये सीटें मोटे तौर पर उस साल अमरनाथ भूमि आंदोलन में संघ की भूमिका से हासिल हुई थीं। अमरनाथ तीर्थ बोर्ड को वन भूमि आवंटन के खिलाफ जब मुख्यधारा की पार्टियों, अलगाववादियों और सीविल सोसाइटी समूहों ने आंदोलन छेड़ दिया, तो संघ परिवार ने उसे हिंदू-विरोधी और जम्मू विरोधी करार दिया। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने कश्मीर घाटी की आर्थिक नाकेबंदी की धमकी दी। इससे ध्रुवीकरण शुरू हो गया।

फिर, 2014 की बाढ़ ने कश्मीर घाटी के लोगों को अपने हाल के अतीत में झांक कर देखने और 1989 की बगावत के बाद घाटी में हुई घटनाओं पर विचार करने का मौका मुहैया करा दिया।  आजादी की तेज आवाज अब धीमी पडऩे लगी है। अब यह विचार घर करने लगा है कि आजादी किससे और किसलिए? क्या भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 में हासिल विशेष दर्जा कश्मीर को वह सब करने की इजाजत नहीं देता है जो बाकी देश में अपराध माना जाता है? क्या संविधान का अनुच्छेद 35 ए जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार नहीं देता है?

राज्य में सुरक्षा बलों की मौजूदगी पर काफी हो-हल्ला मचता है। 1948,1965 ओर 1971 में पाकिस्तान के साथ तीन लड़ाइयों के बाद भी कश्मीर में सुरक्षा बल या तो सीमा पर तैनात थे या फिर अपने बैरकों में। लेकिन 1989 में अलगाववादी गतिविधयों के बढऩे और अल्पसंख्यक पंडितों को निशाना बनाए जाने के बाद ही सुरक्षा बलों को बैरकों से बाहर निकाला गया और सड़कों पर तैनात किया गया। लेकिन इससे भी घाटी से पंडितों का पलायन नहीं रुका। तो, किस आजादी की बात हम सुनते रहते हैं?

देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक आर्थिक और वित्तीय संसाधन कश्मीर को ही मिलते हैं। यह राज्य आर्थिक रूप से पूरी तरह केंद्र पर निर्भर है। वहां उत्पादन का स्तर बेहद नीचा है और राज्य अपनी भारी-भरकम और नाकारा अफसरशाही को वेतन देने लायक भी राजस्व नहीं जुटा पाता।

केंद्र में अब नई सत्ता है और देश भर में नई उम्मीद हिलोरे ले रही है कि बदलाव बेहतर हालात पैदा करेंगे। लेकिन इसके लिए कश्मीर के लोगों को आगे आना होगा और अलगाववादियों को खारिज करना होगा। उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करके जवाबदेह सरकार और विधायकों की मांग करनी होगी। इसके पहले चुनाव धांधलियों से अटे पड़े होते थे। राज्य सरकार, केंद्र और अलगाववादी सभी अपने राजनैतिक खानदानों के हक में चुनावी धांधलियों को अंजाम दिया करते थे। ये राजनैतिक खानदान न्याय और बराबरी के हालात पैदा करने में नाकाम रहे हैं और लोगों को खैरात पर निर्भर बना दिया है, मानो वे भिखारी हों।

मौजूदा चुनावों में लोगों को इन राजनैतिक गोलबंदियों को खारिज करने और सही विधायकों को चुनने का मौका मिला है। अब उन्हें ज्यादा से ज्यादा तादाद में सही समझ के साथ मतदान करने की दरकार है। पहले चरण में 71 प्रतिशत से ज्यादा मतदान दर्ज किया गया है। युवा और पहली बार वोट करने वाले मतदाताओं में खासा  उत्साह देखा गया।

भाजपा पहली दफा शासक गठबंधन का विकल्प मुहैया करा रही है जिसकी ओर हाशिए पर रहने वाले अनेक वोटरों के आकर्षित होने की संभावना है। वह चौतरफा विकास पर जोर दे रही है। फिर अपने प्रिय मुद्दे अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग करने के बदले वह लोगों से उसके नफा-नुकसान पर विचार करने की अपील कर रही है।

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