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धारा 370 और जम्मू-कश्मीर

धारा 370 और जम्मू-कश्मीर

By नीलाभ कृष्ण

धारा 370 की बात की जाए तो यह धारा निश्चित रूप से भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को कहीं न कहीं वैचारिक रूप से परेशान करती है। उसके जेहन में यह सवाल उठते हैं कि जिस राज्य को इतना विशेष दर्जा प्राप्त है वह सब कुछ पाने के बावजूद राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग क्यों है? इसीलिए धारा 370 आम भारतीय को लगातार परेशान करती आ रही है। खासकर जो लोग सोच विचार करते हैं उनके लिए धारा 370 कहीं न कहीं एक प्रश्न चिन्ह तो है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि कश्मीर में सेना के बल पर ही भारत का रुतबा कायम है अन्यथा दिल से कश्मीरियों का एक बड़ा वर्ग भारत के साथ नहीं हैं। यदि ऐसा है तो फिर धारा 370 का क्या औचित्य है। जो धारा या विशेष प्रावधान पिछले 60-65 वर्षों में कश्मीर के लोगों के दिल में भारत के प्रति प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकी उसे समाप्त करने में क्या बुराई है? कम से कम इसका असर तो देखा ही जा सकता है।

धारा 370 में यह प्रावधान है कि कोई भी कश्मीरी महिला यदि गैर कश्मीरी से विवाह करती है तो उसे संपत्ति से बेदखल करते हुए कश्मीर में संपत्ति खरीदने का अधिकार नहीं रहेगा। कश्मीर के लोग भारत में कहीं भी निवास कर सकते हैं, संपत्ति खरीद सकते हैं, लेकिन भारत के लोग वहां संपत्ति नहीं खरीद सकते, बस नहीं सकते। यह भेदभाव निश्चित रूप से कश्मीर और भारत के बीच विभाजन की रेखा खींचता है और भी कई मुद्दे हैं जो कश्मीर और कश्मीर के लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में आने से रोक रहे हैं। धारा 370 की आड़ में पाकिस्तान कश्मीर में अलगाववाद को शह देता आया है। आजादी के 65 वर्ष बाद भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आए दो लाख से ज्यादा शरणार्थी जम्मू-कश्मीर में नागरिकता नहीं पा सके हैं।

13-12-2014

यह सच है कि बीते हुये 28 वर्षों में धारा 370 का क्षरण नहीं हुआ, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमेशा के लिये स्थित हो गई है। पंडित जवाहरलाल नेहरू जम्मू-कश्मीर के एक नेता पंडित प्रेमनाथ बजाज को 21 अगस्त 1962 में लिखे हुये पत्र से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कल्पना में भी कभी ना कभी धारा 370 समाप्त होगी। पंडित नेहरू ने अपने पत्र में लिखा है- ”वास्तविकता तो यह है कि संविधान का यह अनुच्छेद, जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिलाने के लिये कारणीभूत बताया जाता है, उसके होते हुये भी कई अन्य बातें की गयी हैं और जो कुछ और किया जाना है, वह भी किया जायेगा। मुख्य सवाल तो भावना का है, उसमें दूसरी और कोई बात नहीं है। कभी-कभी भावना ही बड़ी महत्वपूर्ण सिद्ध होती है।’’

भाजपा  ने धारा 370 पर सार्वजनिक बहस का आह्वान करके प्रशंसनीय कार्य किया है। यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर तथाकथित सेकूलर लोग बहस करने से बचते हैं। यह धारा जवाहरलाल नेहरू ने तात्कालिक आवश्यकता बताकर संविधान में जुड़वायी थी और यह आशा व्यक्त की थी कि ‘समय के साथ घिसते-घिसते यह धारा समाप्त हो जाएगी।’ आज भी इसे हमारे संविधान में ‘अस्थायी’ प्रावधान कहा गया है, जिससे स्पष्ट है कि वास्तव में इसको सदा के लिए बनाये रखने का कोई औचित्य नहीं है।

ये राह नहीं आसान…

13-12-2014

नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आते ही जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 पर चर्चा गर्म हो गई है। इसकी वजह भाजपा के घोषणापत्र में इसका जिक्र और कार्यभार संभालते ही मोदी के एक नए मंत्री की जुबान इस मुद्दे पर फिसलना है। विधि विशेषज्ञों के बीच भी इस मसले पर असमंजस है। कानूनविदों की मानें तो असंभव कुछ भी नहीं, लेकिन राह बहुत मुश्किल है।

संविधान में करीब दस राज्यों को विशेष दर्जा प्राप्त है, लेकिन जम्मू-कश्मीर को यह दर्जा देने वाला अनुच्छेद-370 कुछ अलग ही है। इसके हिसाब से विदेश, वित्त, रक्षा और दूरसंचार को छोड़कर बाकी विषयों में केंद्र का कोई भी कानून लागू करने के लिए राज्य की सहमति जरूरी होती है।

राज्य के बाहर का नागरिक यहां संपत्ति नहीं खरीद सकता। ऐसी शर्ते जम्मू-कश्मीर को छोड़कर किसी अन्य राज्य के लिए नहीं हैं। भारत के संविधान में परिवर्तन की छूट है। कहीं नहीं लिखा है कि किसी अनुच्छेद को बदला नहीं जा सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले जरूर कहते हैं कि मूल ढांचे को परिवर्तित करने वाला संशोधन नहीं किया जा सकता। अब बात अनुच्छेद-370 को संशोधित करने पर आती है। अनुच्छेद-370 को सामान्य वैधानिक प्रक्रिया के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए संविधान संशोधन करना होगा, जिसका तरीका अनुच्छेद-368 में दिया गया है। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो विधेयक दोनों सदनों में सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से और मौजूद व मतदान करने वाले सदस्यों में दो तिहाई से पारित होना चाहिए। अगर संशोधन अनुच्छेद-368 में दिए गए कुछ विशेष विषयों के बारे में है, तो उसका कुल राज्यों के कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों से भी पारित होना जरूरी है। इस अनुच्छेद को संशोधित करते समय जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के समय हुई संधि के प्रावधान भी देखने होंगे।

उमर अब्दुल्ला हो या पीडीपी नेता महबूबा या फिर कांग्रेसी नेता सब 370 के कारण खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने पर तुले हैं। आखिर धारा 370 पर चर्चा कराने से इन्हें डर क्यों लगता है? क्यों ये लोग बार बार कह रहे हैं कि इससे जम्मू-कश्मीर देश से अलग हो जाएगा? क्या देश की जनता यह नहीं समझती कि 370 की वजह से ही आज जम्मू-कश्मीर देश से अलग है? जनता सबकुछ समझती है, समझने लगी है। इतने बड़े उदाहरण के बाद कि जनता ने एक बहुमत वाली पार्टी दिल्ली पर काबिज कर दी, बावजूद अगर कोई जनता को बेवकूफ बनाने की चेष्टा करता है तो उसका नतीजा क्या होगा, यह समझा और सोचा जा सकता है। आखिर 370 के लिए ये लोग क्यों इतने लालची बने दिखते हैं कि न हटाई जाए?

मोदी और कश्मीर

13-12-2014

अब तक हम सुनते आ रहे थे कि अमुक नेता या मंत्री छुट्टी मनाने विदेश गए हुए हैं या फिर अपने परिवार के साथ किसी हिल स्टेशन गए हुए हैं। पर मोदी पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने देश में पहली बार एक नई शुरूआत करते हुए सियाचिन में तैनात सैनिकों और कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों के साथ कोई त्योहार मनाया।

हमारे देश में कहा जाता है कि उत्सव तो सारे पुराने विवाद भुलाकर गले मिलने के साथ एक नई शुरूआत करने के लिए ही होते हैं। ऐसे में अगर मोदी ने कश्मीर में एक नई शुरूआत की तो इसे राजनीती से जोड़ कर देखना बहुत ही गलत है। कश्मीर में बाढ़ में 285 लोग मारे गए। त्रासदी का मंजर खतरनाक था। 95000 से ज्यादा मकान गिर गए। फसलें चौपट हो गई। इनकी भरपाई कोई कितनी भी मदद करें नहीं हो सकती। अचानक आई आपदा के बाद मोदी ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को कश्मीर भेजा। कश्मीर के गंभीर हालात की जानकारी मिलते ही खुद वहां की हालात जानने पहुंच गए। 1000 करोड़ रुपए की मदद की। दिवाली के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सैनिकों के साथ कुछ समय बिताया। मोदी ने वहां संदेश दिया कि सभी भारतीय उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। बर्फीली चोटियों से मोदी ने दीपावली के मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और सेना के अधिकारियों-जवानों को बधाई दी।

सियाचिन के संक्षिप्त दौरे के बाद मोदी श्रीनगर गए। वहां मोदी का जम्मू व कश्मीर में पिछले महीने आई विनाशकारी बाढ़ के पीडि़तों के साथ दिवाली मनाने का कार्यक्रम था। मोदी ने इस प्राकृतिक आपदा में क्षतिग्रस्त हुए मकानों की मरम्मत के लिए 570 करोड़ रुपए और बाढ़ प्रभावित छह प्रमुख अस्पतालों के नवीकरण के लिए 175 करोड़ रुपये की सहायता देने की घोषणा की।

उन्होंने राज्य की जनता को आश्वासन दिया कि बाढ़ प्रभावितों की सहायता कार्य में केंद्र सरकार प्रदेश सरकार के साथ पूरे मनोयोग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगी। उन्होंने राज्य के बच्चों को पुस्तक सामग्री उपलब्ध कराने की बात भी कही जो बाढ़ के कारण नष्ट हो गई हैं। नरेंद्र मोदी ने जब दीपावली पर कश्मीर जाने का फैसला किया, तो विपक्षी दलों में खलबली मच गई। मोदी के दो लक्ष्य थे। पहला सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्र में तैनात सैनिकों के साथ दीपावली मनाना। दूसरा कश्मीर के बाढ़पीडि़तों को राहत पैकेज देना।

कांग्रेस को कुछ समझ में नहीं आया, पर उसकी प्रतिक्रिया हताशा भरी थी। उसकी तरफ से अधिकारिक तौर पर कहा गया कि मोदी बाढ़ राहत की राजनीति कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने दीपावली पर कश्मीर जाने का फैसला राजनीतिक गोटियां बिछाने के लिए किया गया था। उन्हें इस दूसरी कश्मीर यात्रा में कुछ नए समर्थक मिले हैं। जैसे हरियाणा के चुनाव में कुछ नए लोग भाजपा के साथ जुड़े थे, वैसा ही कुछ कश्मीर के चुनाव में भी देखने को मिलेगा। लेकिन मोदी का एक लक्ष्य और था। वह था पाकिस्तान को संदेश देना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विधानसभा चुनाव के लिए मिशन 44 प्लस के नारे ने पाकिस्तान में खलबली मचा दी है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान अब मोदी के हर कदम पर गहराई से नजर रख रहा है। मोदी का 44 प्लस का नारा जम्मू-कश्मीर की सरहदों को पार करता हुआ पाकिस्तान तक जा पहुंचा है। पाकिस्तान के तमाम अखबार रियासत में होने वाले चुनाव पर पैनी नजर रखे हुए हैं। दरअसल अक्टूबर का महीना कश्मीर के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। 26-27 अक्टूबर कश्मीर के भारत में विलय के कारण महत्वपूर्ण दिन हैं। कश्मीर पर पहला कबाइली हमला 22 अक्टूबर, 1947 को हुआ था। घुसपैठ के चौथे दिन 26 अक्टूबर को महाराजा हरी सिंह को महसूस हुआ कि भारत की मदद के बिना वह कश्मीर को नहीं बचा सकते। इसलिए उन्होंने भारत से मदद मांगी। नई दिल्ली ने कश्मीर का भारत में विलय का प्रस्ताव महाराजा को दिया, जिस पर 27 अक्टूबर को दस्तखत हुए। सरदार पटेल के कड़े रुख के कारण महाराजा हरी सिंह भारत में कश्मीर के विलय के लिए तैयार हुए थे।

लेकिन नेहरू ने मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाकर विलय पर सवालिया निशान लगा दिया। इसलिए कश्मीर का सवाल जब भी आएगा, नेहरू और पटेल की भूमिका पर बहस होगी। यह बहस होनी चाहिए, क्योंकि पटेल ने 26 अक्तूबर, 1947 को जो हासिल किया, उसे नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में गंवा दिया और कश्मीर को हमेशा के लिए विवादास्पद बना दिया। सरदार पटेल को अपना प्रेरणास्रोत मानने वाले मोदी, कश्मीर की सियासी रंगत बदलने में कितने सफल होते हैं यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तो तय है की मोदी की मंशा कश्मीर को लेकर साफ है।

ऐसा लगता है कि ऐसे नेताओं की रोजी रोटी छूट जायेगी जो भारत विरोधी मानसिकता में एक राज्य को या तो अंधकार में धकेल रहे हैं या पाकिस्तान परस्त दिखाई देते हैं। अगर धारा 370 का गंभीरता से अध्ययन किया जाये तो यह जानने में देर नहीं लगेगी कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नहीं। इसे उन्नत और बेहतर बनाने के लिए इस धारा को हटाया जाना बहुत आवश्यक है ताकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक हो सके। धारा 370 इस राज्य को बदहाल कर चुकी है और यह देश की सरकार का फर्ज है कि यह धारा हटाये और राज्य को खुशहाली के रास्ते पर लाये। 370 पर चर्चा हो, इस धारा को हटाया जाए और इस राज्य को भी भारत के अन्य राज्यों की तरह दर्जा मिले ताकि इसका विकास हो सके।

यह देश की जनता की समझ में आने लगा है और जब वह कांग्रेस तथा इसके घटक दलों के मुंह से 370 के पक्ष में बातें सुनती है तो उसे सीधे सीधे उसकी नीयत का अंदाजा होने लगता है। हालांकि फिलहाल खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया है न ही कोई बात की है, इसके बावजूद मसला राजनीतिक मैदान में मचल रहा है तो यह कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों के लिए अहितकर ही साबित होना है।

370 राष्ट्रीय मुद्दा है इस पर बहस होनी ही चाहिए

”कुछ राजनीतिक दल अनुच्छेद 370 पर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह विधानसभा चुनाव है, इसमें सुशासन व विकास पर चर्चा होनी चाहिए। 370 राष्ट्रीय मुद्दा है इस पर बहस होनी ही चाहिए। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की जनता का भारत से रिश्ता 370 का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लोगों में भरोसा बना है। जम्मू-कश्मीर की तकदीर बदलने का माद्दा सिर्फ भाजपा में ही है।

”अलगाववादियों का बदलता रुख इसका सुबूत है। सज्जाद लोन का खुलकर आना इसी दिशा में एक कदम है। हमारे प्रधानमंत्री ने तो इंसानियत के नाते गुलाम कश्मीर में भी मदद की पेशकश की, लेकिन उन्होंने न सिर्फ मदद लेने से मना किया, बल्कि राहत की पेशकश के बदले सीमा पर गोलियां बरसाईं और गोले दागे।

हमने फ्लैग दिखाना बंद किया और जवाब दिया तो वे यूएन में त्राहिमाम करने लगे। पाकिस्तान, कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहता है, लेकिन पहले अपने कब्जे वाले कश्मीर की हालत तो देखे।’’

लोकसभा चुनावो के दौरान जम्मू में ललकार रैली के दौरान भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने धारा 370 का मुद्दा उठाकर एक नई बहस को जन्म दिया था। मोदी चाहते तो देशभर में अपनी अन्य रैलियों के दौरान यह मुद्दा उठाकर काफी पहले इस बहस को छेड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने एक सही समय का इंतजार किया। कांग्रेस उस समय सांप्रदायिकता विरोधी विधेयक के माध्यम से अपनी खोई हुई जमीन को पाने की कोशिश में थी और मोदी धारा 370 का मुद्दा भी विशेष तौर पर इसी दौरान उठाना चाह रहे थे ताकि जिस ध्रुवीकरण की शुरुआत कांग्रेस ने की थी उसे अंजाम तक पहुंचाया जा सके। हालांकि धारा 370 का मुस्लिम संवेदनाओं से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन कांग्रेस को सदैव यह भय सताता रहा है कि धारा 370 खत्म करने की पहल से मुसलमान नाराज हो सकते हैं और उनका वोट बैंक गड़बड़ा सकता है।

कांग्रेस को वैचारिक आधार प्रदान करने वाले वे धर्मनिरपेक्ष विचारक भी धारा 370 के प्रति कांग्रेसी नजरिए को बाकी देश के नजरिए से अलग बनाने में कामयाब रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस के शासनकाल में ही जम्मू कश्मीर के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का पद समाप्त करके वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री का पद बनाया गया था भले ही इसके लिए आंदोलन करने वाले कोई दूसरे क्यों न थे, लेकिन कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष पंडितों को लगता है कि 370 जैसे मुद्दे कांग्रेस की रही सही जमीन को भी हिला कर रख देंगे। लिहाजा जब भी इस मुद्दे पर बहस होती है कांग्रेस अपना चेहरा छिपाकर एक तरफ बैठ जाती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। धारा 370 पर वाकयुद्ध भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं बल्कि नेशनल कांफ्रेंस और भाजपा के बीच चल रहा है।
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फारुख अब्दुल्ला ने कहा है कि मोदी 10 बार प्रधानमंत्री बन जाएं तब भी कश्मीर से धारा 370 नहीं हट सकती। अब्दुल्ला के इस कथन से यह तो साफ होता है कि वे भी मान चुके हैं कि मोदी में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत है और मोदी अगले 50 वर्ष तक भाजपा को सत्तासीन कर सकते हैं। भले ही यह अतिश्योक्ति हो लेकिन जब फारुख अब्दुल्ला ने बोल ही दिया तो पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए उमर अब्दुल्ला  ने भी इसी आवाज से सुर मिलाए हैं। उमर अब्दुल्ला  का कहना है कि वे धारा 370 के औचित्य पर मोदी से अहमदाबाद जाकर भी चर्चा कर सकते हैं। सवाल तो यह उठता है कि उमर अब्दुल्ला क्या चर्चा करेंगे। क्या वह कश्मीर की आजादी की बात करेंगे। उनके तेवर तो कुछ ऐसे ही दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि धारा 370 समाप्त करने से कश्मीर के भारत में विलय का मामला फिर उठेगा। वैसे भी अब्दुल्ला  परिवार का इतिहास रहा है कि चुनाव आते ही उनके नुमाइंदे अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर विवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस की पूरवर्ती सरकारों ने भी राजनीतिक मजबूरी के चलते इन मुद्दों को शह देकर अब्दुल्ला परिवार की राजनीतिक विरासत को संभाल रखा है।

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अब जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में बहुमत की सरकार बनी है तो भाजपा के लिए बेहद अहम अनुच्छेद 370 पर गलत बयानबाजी कर उमर कश्मीर की जनता को भड़काने का काम कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 के तहत जिस स्वतंत्रता की दुहाई वे कश्मीरी मुस्लिमों को देते हैं वह मात्र एक राजनीतिक छलावा है। क्या देश के किसी भी राज्य में आम नागरिक या खासकर अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को स्वतंत्रता नहीं मिली है? फिर कश्मीरी मुसलमान को ही खास स्वतंत्रता क्यों चाहिए? और यदि उन्हें यह खास स्वतंत्रता नहीं मिली तो क्या वे भारत से अलग हो जाएंगे? क्या पाकिस्तान में उन्हें भारत से अधिक स्वतंत्रता मिल जायेगी और क्या आजाद कश्मीर का नारा बुलंद कर वे सच में आजाद हो जाएंगे? उमर का यह कहना कि या तो अनुच्छेद 370 बरकरार रहेगा या कश्मीर देश से अलग होगा, क्या देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आता? क्योंकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी कहा है कि कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो सकता है, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति से उनकी भारत यात्रा के दौरान कश्मीर मुद्दा उठाने का भी आग्रह किया है।

यह सारे घटनाक्रम अनायास नहीं हैं, लेकिन जैसा कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा भी कि धारा 370 से कश्मीर को क्या फायदा हुआ। इस पर चर्चा होनी चाहिए। यदि यह सिद्ध हो गया कि इस धारा से कश्मीर को लाभ हुआ है तो भाजपा इस धारा का समर्थन करेगी। राजनाथ सिंह का यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है और आने वाली राजनीति का संकेत भी है। भाजपा बहुत कम सहयोगियों के साथ अगले सभी चुनावो में अपने आपको प्रस्तुत करेगी। खासकर उन लोगों को साथ रखा जाएगा जिनका नजरिया धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विवादित विषयों पर स्पष्ट होगा।

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