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संवेदनाओं की धार

संवेदनाओं की धार

By सुधीर गहलोत

गुजरात में पड़े भीषण अकाल के कारण इंसानों की हालत तो खराब थी ही, पशु-पक्षी भी तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे थे। जमीन दरक रही थी, उनके लिए कहीं चारा नहीं बचा था। गुजरात के पशुधन को बचाने के लिए देश भर में भूसा भेजने के प्रयासों के दौरान, लोगों का जो सहयोग मिला वह अकल्पनीय था। हालांकि यह एक छोटा प्रयास था, लेकिन लोगों की जागरूकता, दया और नि:स्वार्थ भाव ने उस काम को जनआंदोलन में बदल दिया जिसे एक दु:साध्य काम समझा जा रहा था।

राजेश माहेश्वारी ने अपनी कहानी-संग्रह ‘वे बहत्तर घंटे’ की पहली ही कहानी में गुजरात के भीषण अकाल के दौरान देश भर के लोगों की संवेदना, उनके सहयोग और इसके लिए आस-पड़ोस के लोगों को जागरूक करने के प्रयासों को बहुत बेहतर तरीके से उकेरा है। अलंकरों से इतर, कहानियों में शब्दों की मौलिकता पर विशेष ध्यान देते हुए उन्होंने उसके प्रवाह को बनाए रखा है।

26 कहानियों के संग्रह में माहेश्वरी ने मानवीय संवेदना के हर पहलु को आधार बनाकर अपनी कहानियां लिखीं हैं, जिसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। उनकी कहानियों में गांभीर्य है तो समाजिक रिश्तों की खुबसूरती की महक भी मौजूद हैं। कुछ व्यंग्य हैं तो कुछ संस्मरण। लेखक ने ’मां’ शीर्षक की कहानी में भाई-बहन के रिश्ते के मूल को बताने का प्रयास किया है। श्यामा को मंदिर के पास एक नवजात लड़की मिलती है। उसके मां-बाप को ढ़ूढने की नाकाम कोशिश के बाद श्यामा उसे अपनी बेटी के रूप में अपने बेटे सूरज के साथ बिना किसी भेदभाव के पालन करती है। सूरज भी अपनी बहन चांदनी को बहुत प्यार करता है। तमाम कष्टों के बावजूद श्यामा ने सूरज और चांदनी को अपने पैरों पर खड़ा किया। आसन्न मृत्यु को देखकर श्यामा चांदनी को बताती है कि उसने सिर्फ उसका पालन-पोषण किया है, जन्म तो किसी और ने दिया है। इस बात से चांदनी के मन में कई ख्याल उपजते हैं। चांदनी श्यामा की संपत्ति को खुद लेने के बजाय सूरज को लेने को कहती है, लेकिन सूरज इससे इंकार करते हुए कहता है कि मां के बाद इस संपत्ति की असली वारिस उसकी बहन चांदनी का ही है। भाई के इस अधिकारपूर्ण प्यार को चांदनी ठेस नहीं पहुंचाना चाहती और मां की इस संपत्ति से एक अनाथालय बनवाने के लिए सूरज को राजी कर लेती है।

‘मां’ कहानी वैसे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है जो अनाथ बच्चों के लिए कुछ करना चाहते हैं। ‘मित्रता’ कहानी हिंदू-मुस्लिम की दोस्ती और उसकी गहराई को बताती है। मृत्युशैया पर होकर भी अपने दिए गए वचन को निभाने की मिसाल पेश करती है यह कहानी। राजस्थान के परिवेश में बुनी गई कहानी ‘पनघट’ समाज को घृणित करने वाली सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में प्रस्तुत करती है।

अपनी कहानियों के जरिए समाज में एक सकारात्मक संदेश देने और बुराईयों पर कटाक्ष करने वाले राजेश माहेश्वरी एक उद्योगपति हैं। एक व्यवसायी  परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उन्होंने व्यवसायी के जीवन में आने वाले तमाम उतार-चढाव तथा एक उद्योग को संचालित करने में आने वाली बाधाओं को बहुत नजदीक से देखा है। जीवन में  कड़े संघर्षों के बाद सफलता के शिखर पर पहुंचे राजेश माहेश्वरी ने अपने जीवन के कठिन राहों में समाज और मानवीय पहलूओं को बहुत नजदीक से देखा और उसे कहानियों में पिरोया है।

‘वे बहत्तर घंटे’ की शुरू की कहानियां संवेदनाओं पर आधारित हैं, जिसे लेखक ने बहुत ही स्पष्ट और सधे शब्दों में लिखा है, लेकिन आगे की कहानियों में उस निरंतरता का थोड़ा-सा अभाव मिलता है।

29-11-2014

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