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शहरी सरकार के लिए मिशन-46 की चुनौती

शहरी सरकार के लिए मिशन-46 की चुनौती

By जयपुर से गुलाब बत्रा

विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में डंका बजाने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विधानसभा के चार उपचुनावों में तीन पर मिली करारी पराजय से चितिंत हैं और उन्होंने 33 में से 26 जिलों में होने वाले निकाय चुनावों पर फोकस किया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर स्वायत्त शासन विभाग ने अधिकारियों को निकाय क्षेत्रों में भेजकर चुनावी मुद्दा बनने वाले कामों के बारे में जानकारी लेकर उन्हें प्राथमिकता से पूरा करने में तत्परता दिखाई।

राजस्थान विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर सत्तारूढ़ हुई भारतीय जनता पार्टी ने शहरी सरकार पर काबिज होकर कड़ी से कड़ी मिलाने के मकसद से मिशन-46 की रणनीति बनाई है। वहीं विधानसभा उपचुनाव में विजय से लबरेज मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस स्थानीय निकायों की अपनी अंतिम कड़ी को बचाने की जुगत में है।

राजधानी जयपुर सहित छ: नगर निगमों और 40 नगर परिषद एवं नगर पालिकाओं के चुनाव के लिए 22 नवम्बर को मतदान होगा। मतगणना 25 नवम्बर को होगी तथा 26 व 27 नवम्बर को महापौर सभापति, अध्यक्ष एवं उपमहापौर उपसभापति और उपाध्यक्ष पद के चुनाव होंगे। इस बार निकाय प्रमुखों का चुनाव पार्षद करेंगे, इसलिए सभी दलों में टिकट वितरण में अधिक माथा-पच्ची हुई। वर्ष 2009 में जयपुर, कोटा, बीकानेर तथा जोधपुर निकाय में कांग्रेस उदयपुर में भाजपा के महापौर चुने गये। नगर परिषद भरतपुर से नगर निगम में परिवर्तित निकाय के चुनाव अब होंगे। वहां की निर्दलीय सभापति महाविद्यालय की छात्रा रही सुमन कोली अभी पदेन महापौर हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस का 29 तथा भाजपा का दस, बसपा का एक तथा निर्दलियों का 6 निकायों पर कब्जा था। तब 35 लाख वोटों में से कांग्रेस को 15 लाख 95 हजार भाजपा को 13 लाख 62 हजार वोट मिले थे।

जयपुर नगर निगम में भाजपा का बोर्ड बहुमत में था, लेकिन आम मतदाताओं ने कांग्रेस की ज्योति खण्डेलवाल को महापौर चुना था। इस कारण बीते पांच साल में महापौर तथा भाजपा बोर्ड में रस्सा-कस्सी चलती रही और विकास कार्यों एवं जनसमस्याओं के समाधान में जनता टुकर-टुकर देखने को मजबूर हुई। प्रत्यक्ष चुनाव का निर्णय पिछली भाजपा की वसुंधरा सरकार ने लिया था और अब पुन: अप्रत्यक्ष चुनाव का फैसला भी इसी सरकार का है। इसका विरोध करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने निकाय प्रमुखों के चुनाव में खरीद फरोख्त की आशंका जताई है। भाजपा तथा कांग्रेस ने जीतने वाले उम्मीदवारों के चयन के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 11 नवम्बर तक प्रत्याशियों के नाम जारी करने में झिझक नहीं की, ताकि टिकट के एक से अधिक दावेदारों के असंतोष को अधिक हवा नहीं मिल पाये। इससे पहले दोनों दलों में टिकटों के लिए आवेदन की कसरत के बावजूद निर्णय उच्च स्तर पर लिए गए। सत्तारूढ़ दल में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निकाय चुनाव प्रभारी गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया तथा प्रदेश अध्यक्ष विधायक अशोक परनामी ने प्रत्याशियों के नाम पर मोहर लगाई तथा जिला इकाइयों को संबंधित उम्मीदवारों के नाम ऐन वक्त पर उजागर करने के निर्देश दिए। पार्टी में असंतोष या बगावत की आशंका से परनामी ने अनुशासन के नाम पर यह तलवार लटका दी थी कि बिना स्वीकृति के नामांकन दाखिल करने पर पार्टी टिकट नहीं देगी। वसुंधरा के मुख्य विरोधी तथा सांगानेर से वरिष्ठ विधायक पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी ने तो परनामी को पत्र लिख कर, कार्यकर्ताओं से लिए फीडबैक के बंद लिफाफे मण्डल कार्यकर्ता या उनके सामने खोलने की मांग कर डाली। उधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नई टीम खड़ी करने के लिए 40 फीसदी टिकट युवाओं को देने का मानस बनाया। दोनों पक्षों सहित अन्य दलों के दावेदारों ने पोस्टरों आदि के माध्यम से गली मौहल्लों में चुनाव प्रचार का सिलसिला आरम्भ कर दिया था। अब चूकी टिकट तो एक को मिलना है, इसलिए शेष दावेदारों पर अंकुश रखने की कवायद तो दोनों प्रमुख दलों को करनी होगी।

29-11-2014

विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों में  ऐतिहासिक जीत से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में डंका बजाने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विधानसभा के चार उपचुनावों में तीन पर मिली करारी पराजय से चितिंत हंै और उन्होंने 33 में से 26 जिलों में होने वाले निकाय चुनावों पर फोकस किया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर स्वायत्त शासन विभाग ने अधिकारियों को निकाय क्षेत्रों में भेजकर चुनावी मुद्दा बनने वाले कामों के बारे में जानकारी लेकर उन्हें प्राथमिकता से पूरा करने में तत्परता दिखाई। गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया को निकाय चुनाव प्रभारी बनाने के साथ निकाय चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई। जयपुर नगर निगम को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर शहरी विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत, उच्च शिक्षा मंत्री कालीचरण सर्राफ और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. अरूण चतुर्वेदी को लगाया गया है। इसी श्रृखंला में जयपुर में गत 7 नवम्बर को कार्यकर्ता सम्मेलन तथा सदस्यता अभियान की शुरूआत करके निगम चुनाव का आगाज किया गया। अभियान के राज्य प्रभारी महासचिव जगतप्रकाश नड्डा ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सदस्यता नवीनीकरण से इसकी शुरूआत की। राज्यसभा सदस्य नारायण पंचारिया राजस्थान में सदस्यता अभियान के प्रमुख तथा पूर्व प्रदेश मंत्री सुनील कोठारी सह प्रमुख बनाये गये हैं। वसुंधरा राजे ने इस अवसर पर दस माह के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड पेश किया और बताया कि सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के तहत भरतपुर, बीकानेर, उदयपुर संभाग के 14 जिलों की लगभग ढाई करोड़ जनता से रू-ब-रू हुई। दो साल में संभागों की हालत सुधारी जाएगी ताकि क्षेत्रीय जनता को किसी काम के लिए राजधानी आने की जरूरत नहीं होगी। जे.पी. नड्डा ने संगठन की ओर से सरकार को हर संभव मदद का भरोसा दिलाते हुए यह विश्वास जताया कि वसुंधरा राजे की अगुवाई में राजस्थान फिर से विकास की मुख्यधारा में आएगा। निकाय चुनाव प्रभारी गुलाबचंद कटारिया ओजस्वी भाषण समाप्त कर जैसे ही अपनी कुर्सी की ओर बढ़े तो मुख्यमंत्री, नड्डा तथा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी सहित अन्य मंत्रियों ने ताली बजाकर उनका अभिवादन किया। कटारिया ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर जनता ने कांग्रेस मुक्त भारत के लिए राज्य में विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया है। अब निकाय चुनाव में भाजपा की सफलता से कांग्रेस की इस जड़ में तेजाब डलेगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय निकायों से भ्रष्टाचार की शुरूआत होती है इसलिए स्वच्छ छवि वाले निष्ठावान ईमानदार कार्यकताओं को प्रत्याशी बनाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की पहल करनी होगी।

निकाय चुनाव जीतने में प्रत्याशी की छवि, वार्ड में जातीय समीकरण के साथ पार्टी के गतिशील संगठनात्मक ढांचे का अपना महत्व है। इसीलिए जयपुर में शहर अध्यक्ष संजय जैन ने मण्डल अध्यक्षों की नियुक्तियों की पहल की जिससे वार्ड अध्यक्षों के मनोनयन का मार्ग प्रशस्त हो गया है। लेकिन प्रदेश पार्टी संगठन की दृष्टि से 39 जिलों में जिला पदाधिकारी तथा मण्डल अध्यक्षों की नियुक्ति अधर में झूल रही है। प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी को कार्यसमिति के सदस्यों के मनोनयन के लिए भी समय नहीं मिला है। यह माना जाता है कि अधिकांश जिलों में सांसद विधायकों तथा जिलाध्यक्षों के बीच कथित खींचतान एवं विवाद के चलते मनोनयन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है। मोर्चों की टीम भी विवादों के घेरे में है। अब तो निकाय चुनावों के बाद ही पार्टी नेतृत्व इनकी सुध लेगा।

शहरी सरकार के रूप में स्थानीय निकाय तथा आगामी पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव के मद्देनजर केन्द्रीय मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में मुख्यमंत्री की पहल से जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए राजस्थान से प्रो. सांवरलाल जाट तथा पूर्व कर्नल राज्यवद्र्धन सिंह राठौर को शामिल कराया गया। हालांकि बाड़मेर से भाजपा के बागी दिग्गज नेता जसवंत सिंह को पटकनी देने वाले कर्नल सोनाराम तथा कोटा से ओम बिरला भी मंत्री पद की दौड़ में शामिल थे। दोनों को मौका नहीं मिला। तीन बार मंत्री रहे सांवरलाल जाट ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट तथा अन्तर्राष्ट्रीय निशानेबाज राठौर ने कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ. सी.पी जोशी को भारी अंतर से हराया था। राठौर तो सेना से त्यागपत्र देकर नरेन्द्र मोदी के समक्ष जयपुर में भाजपा में शामिल हुए थे। दोनों कांग्रेस नेता पूर्व मुंख्यमंत्री अशोक गहलोत के विरोधी खेमे से है।

बहरहाल सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस स्थानीय निकाय चुनाव अपना दमखम दिखाने को फिर मैदान में है। विधानसभा उपचुनाव में मिली सफलता से उत्साहित कांग्रेस अपने गढ़ की रक्षा करने में जुटी है तो भाजपा स्थानीय सरकार की इस अहम कडी को अपने साथ जोडऩे की तैयारी में है। चुनाव नतीजों से वसुंधरा सरकार के लगभग एक साल के कार्यकाल का यह जनमत संग्रह पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में हार-जीत का सबब भी बनेगा।

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