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यह कैसी शिक्षा-व्यवस्था? संस्कारविहीन समाज में बुजुर्गों का अपमान!

यह कैसी शिक्षा-व्यवस्था? संस्कारविहीन समाज में बुजुर्गों का अपमान!

By ललित गर्ग

वर्तमान दौर की एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि इस समय की बुजुर्ग पीढ़ी घोर उपेक्षा और अवमानना की शिकार है। यह पीढ़ी उपेक्षा, भावनात्मक रिक्तता और उदासी को ओढ़े हुए है। इस पीढ़ी के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां, कमजोर आंखें, थका तन और उदास मन जिन त्रासद स्थितियों को बयां कर रही है, उसके लिए जिम्मेदार है हमारी आधुनिक सोच और स्वार्थपूर्ण जीवन शैली। दादा-दादी, नाना-नानी की यह पीढ़ी एक जमाने में भारतीय परंपरा और परिवेश में अतिरिक्त सम्मान की अधिकारी हुआ करती थी और उसकी छत्रछाया में संपूर्ण पारिवारिक परिवेश निश्चिंत और भरा-पूरा महसूस करता था। न केवल परिवार में बल्कि समाज में भी इस पीढ़ी का रुतबा था, शान थी। आखिर यह शान और सम्मान क्यों लुप्त होती जा रही है? क्यों वृद्ध पीढ़ी उपेक्षित होती जा रही है?  क्यों वृद्धों को निरर्थक और अनुपयोगी समझा जा रहा है?  वृद्धों की उपेक्षा से परिवार तो कमजोर हो ही रहे हैं, सबसे ज्यादा नई पीढ़ी प्रभावित हो रही है। क्या हम वृद्ध पीढ़ी को परिवार की मूलधारा में नहीं ला सकते? ऐसे कौन से कारण और हालात हैं जिनके चलते वृद्धजन  इतने उपेक्षित होते जा रहे हैं? यह समस्या बड़ी है क्योंकि किसी एक अभियान से इसे रास्ता नहीं मिल सकता। इस समस्या का समाधान पाने के लिए जन-जन की चेतना को जागना होगा।

वृद्ध एक सम्बल हुआ करते थे, ताकत हुआ करते थे और जीवन को संवारने का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करते थे। बचपन को सहलाकर उसे अकल्पित ऊंचाइयां प्रदान करने वाले, परिवारों में सुख-समृद्धि का संवद्र्धन करने वाले वृद्धजन क्यों घृणा, उपेक्षा और अवमानना के पात्र बन जाते हैं? यह एक ज्वलंत प्रश्न है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि आज पारिवारिक रिश्ते बिखर रहे हैं, उन्हें फिर से जोडऩे, उनमें स्नेह और सौहार्द बढ़ाने का काम बुजुर्ग ही कर सकते हैं। बुजुर्गों को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनने की जिम्मेदारी देने में हम लोग क्यों कोताही बरत रहे हैं? क्यों हम उनके अनुभवों, सूझ-बूझ, ज्ञान-संपदा और समृद्ध विचारों की परिपक्वता से लाभ लेने से हिचकिचा रहे हैं?

हमारे सामने एक अहम प्रश्न और है कि हम किस तरह नई पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी के बीच बढ़ती दूरी को पाटने का प्रयत्न करें। इन दोनों पीढिय़ों के बीच संवाद और संवेदनशीलता इसी तरह लुप्त होती जाती रही तो समाज और परिवार अपने नैतिक दायित्व से विमुख हो जाएगा। दो पीढिय़ों की यह भावात्मक या व्यावहारिक दूरी किसी भी दृष्टि से हितकर नहीं है। जरूरी है कि हम बुजुर्ग पीढ़ी को उसकी उम्र के अंतिम पड़ाव में मानसिक स्वस्थता का माहौल दें, आधि, व्याधि और उपाधियों को भोग चुकने के बाद वे अपना अंतिम समय समाधि के साथ गुजार सकें, ऐसी स्थितियों को निर्मित करें। नई पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी की संयुक्त जीवनशैली से अनेक तरह के फायदे हैं, जिनसे न केवल समाज और राष्ट्र मजबूत होगा बल्कि परिवार भी अपूर्व शांति और उल्लास का अनुभव करेगा। सबसे अधिक नई पीढ़ी अपने बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी की छत्रछाया में अपने आपको शक्तिशाली एवं समृद्ध महसूस करेगी। एक अवस्था के पश्चात निश्चित ही व्यक्ति में परिपक्वता और ठोसता आती है। बड़े लोगों के अनुभव से लाभ उठाकर युवा पीढ़ी भी संस्कार समृद्ध बन सकती है और वृद्धजनों के अनुभवों का वैभव और ज्ञान की अपूर्व संपदा उन्हें दुनिया की रफ्तार के साथ कदमताल करने में सहायक हो सकती है।

हावर्ड और वर्लिन के वैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों ने इस दिशा में गहन खोज की हैं। जर्मन वैज्ञानिकों ने युवाओं और बुजुर्गों के समक्ष कुछ जटिल समस्याएं तथा कुछ सुविधाजनक परिस्थितियां प्रस्तुत कीं और उन्हें हल करने को कहा। देखा गया कि जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाने में युवाओं की अपेक्षा बुजुर्ग लोग अधिक सफल या कुशल साबित हुए। अन्य अध्ययनों/विश्लेषणों से भी यह तथ्य सामने आया कि बुजुर्गों के सामने यदि कोई लक्ष्य रख दिया जाए तो वे अपने धीमे सोचने की शक्ति की क्षतिपूर्ति अपने पैने नजरिए एवं बेहतर योजनाओं के द्वारा कर लेते हैं। यह भी एक तथ्य है कि सम्यक् दृष्टिकोण, पारदर्शी सोच, परिणामों का आंकलन किसी भी चीज के अच्छे-बुरे पहलुओं को तौलने/परखने की क्षमता, ये गुण वृद्धों में अपेक्षाकृत अच्छी मात्रा में उपलब्ध होते हैं। अत: ऑफिसों, संस्थाओं या घरों में बुजुर्गों को उपेक्षित करने का जो प्रचलन बढ़ रहा है, उस पर गंभीरता से पुनर्विचार की जरूरत है। यदि उन्हें सम्मान के साथ विभिन्न दायित्वों के साथ जोड़ा जाए तो परिवार और समाज उनके अनुभवों से काफी कुछ सीख सकता है, काफी लाभ उठा सकता है।

महान विचारक कोलरिज के यह शब्द -‘पीड़ा भरा होगा यह विश्व बच्चों के बिना और कितना अमानवीय होगा यह वृद्धों के बिना?’ वर्तमान संदर्भ में आधुनिक पारिवारिक जीवन शैली पर यह एक ऐसी टिप्पणी है जिसमें वृद्ध और नई पीढ़ी की उपेक्षा को एक अभिशाप के रूप में चित्रित किया गया है। हमें जहां नई पीढ़ी को संवारना है, वहीं बुजुर्ग पीढ़ी के प्रति भी जागरूक बनना होगा। उनके प्रति उपेक्षा, घृणा को समाप्त करना होगा। हमारी मध्यम पीढ़ी के ऊपर यह कलंक न लग पाए कि हमने अपने स्वार्थों के कारण दो पीढिय़ों को जुडऩे नहीं दिया।

समय का तकाजा है कि हम उन सभी रास्तों को छोड़ दें, जहां शक्तियां बिखरती हैं। जहां भी हमारे प्रयत्न दुर्बल होते हैं, वहां उद्देश्यों को नीचा देखना पड़ता है और आत्मविश्वास जल्दी थक जाता है। वृद्ध पीढ़ी को संवारना, उपयोगी बनाना और उसे परिवार की मूलधारा में लाना एक महत्वपूर्ण उपक्रम है। इसके लिए हमारे प्रबल पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प की जरूरत है। हमें स्कूलों में पैरेंट्स-डे के स्थान पर ग्रांड-पैरेंट्स-डे मनाना चाहिए। इससे जहां बच्चे अपने दादा-दादी के अनुभवों से लाभांवित होंगे वहीं दादा-दादी को बच्चों के इस तरह के दायित्व से जुड़कर एक सक्रियता मिलेगी। इसी तरह के उपक्रम हम घरेलू, धार्मिक एवं सामाजिक स्तर पर भी कर सकते हैं। हर दिन परिवार में एक संगोष्ठी का क्रम शुरू करके उसमें परिवार के वृद्धजनों के विचारों का लाभ लें और उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करें। नई पीढ़ी को संस्कार संपन्न बनाने में वृद्धजनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। सामाजिक स्तर पर भी बुजुर्ग और नई पीढ़ी की संयुक्त संगोष्ठियां आयोजित की जाएं और उनके अनुभवों का लाभ लिया जाए। बड़े व्यावसायिक घरानों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में भी परिवार के बुजुर्गों को कुछ रचनात्मक एवं सृजनात्मक दायित्व दिए जाएं और उनकी क्षमता और ऊर्जा का उपयोग किया जाए। परिवार के आयोजनों और दिनचर्या में कुछ दायित्व वृद्धजनों को दिए जाएं जिन्हें वे आसानी से संचालित कर सकें। इन सब प्रयत्नों से बुजुर्ग पीढ़ी अपने आपको उपेक्षित महसूस नहीं कर पाएगी और उनके अनुभवों का लाभ एक नई छटा का निर्माण करेगी।

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