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सैकड़ों दीए, हजारों ख्वाब

सैकड़ों दीए, हजारों ख्वाब

By अनिल धीर

सतपड़ा जाने वाली अंतिम नौका दूसरी छोर पर पहुंच चुकी थी। हम लगभग आधे घंटे लेट थे। हमारी इनोवा को पार कराने के लिए नाविक ने तीन नावों को एक साथ जोडऩे का निर्णय लिया था। लेकिन, समुद्र में उठती लहरों के बीच दूसरी तरफ पहुंचना खतरनाक था। हमने अपना मन बदलते हुए भुवनेश्वर पहुंचने के लिए पालुर जंक्शन के घुमावदार रास्ते से जाने का निर्णय लिया। एक बार फिर लंबी दूरी तक ड्राईव करने से पहले मैंने थोड़ा आराम करना बेहतर समझा और घाट की तरफ उतर गया। देर शाम की इस बेला में झील की दूसरी तरफ टिमटिमाती रौशनी मन को मोह रही थी।

अंधेरा छा चुका था और हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। अचानक रास्ते में एक ट्विस्ट आया जब हमारी गाड़ी की रौशनी में बहुद्देशीय चक्रवात शेल्टर चमक उठा। इस तरह की संरचनाएं ओडिशा के तटीय क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में देखी जा सकती है। बांस की शहतीरों से बांधे गए शेल्टर में लगभग पांच सौ लोग बैठ सकते हैं। इस तरह की बहुकार्यात्मक इमारतें चक्रवात के समय सुरक्षित आवास उपलब्ध कराती हैं। आपदा प्रबंधन के लिए हर एक साइक्लोन शेल्टर में 32 प्रकार के उच्चस्तरीय उपकरण रखना अनिवार्य है। इसमें दराती, साइरन, रसोई के उपकरण, पानी की अस्थायी टंकी, सोलर लाईट, स्ट्रेचर, लाईफ जैकेट, जेनरेटर आदि शामिल हैं। इन शहतीरों के नीचे बड़ी संख्या में पशु भी समा सकते हैं। इस तरह के ज्यादातर शेल्टर स्कूल के रूप में भी कार्य करते हैं। हाल ही में आए साइक्लोन में इस तरह के शेल्टर से बहुत फायदे हुए।

जिस चीज ने मेरा सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वह था शेल्टर की ऊंचाई पर टिमटिमाते सैकड़ों लैंप। गहरी निगाह से देखने पर एलईडी की रौशनी में किताबों को निहारते हुए बच्चों के चेहरे दिखे। यह एक ऐसा दृश्य था, जिसने मुझे वहां रूकने पर मजबूर कर दिया। मैं शेल्टर की तरफ लगभग 50 मीटर आगे बढ़ा। वहां पहुंचने की मेरी कोशिश का संज्ञान लिया गया और बच्चों के बीच हलचल हुई। उन्हें पढ़ाने वाले दो शिक्षक मेरी तरफ आए। मैंने बताया गया कि यहां आने से मैं अपने-आप को रोक नहीं सका और उन्होंने इस बात को समझा भी।

वहां बच्चे से लेकर 10वीं कक्षा तक के लगभग 250 विद्यार्थी थे जो मैट्रिक की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उम्र के अनुसार वे अलग-अलग समूहों में बैठे थे। हर समूह एक-दूसरे से निश्चित दूरी पर था। हर एक छात्र के पास एक झोला और रिचार्जेबल चाईनीज एलइडी लैंप था। शिक्षकों की कड़ी निगाह के कारण फर्श पर बैठे हुए सभी छात्र अपनी किताबों और स्लेटों पर नजर जमाए हुए थे। कुछ छोटे बच्चे एक ही लालटेन के सामने साथ बैठे हुए थे। एक छोटे समूह के पास एक ही लालटेन था और वे सभी उसके चारों तरफ बैठे थे। अंधेरी रात में एक लालटेन के सामने छोटे बच्चों के बैठने का माहौल वास्तविक था। सभी बच्चे 5 किलोमीटर के दायरे में पडऩे वाले गांवों से थे, जो परीक्षा में पास होने के लिए लगभग 2 घंटे के अतिरिक्त ट्यूशन के लिए यहां आए थे। उसमें से कुछ बड़े लड़के ट्यूशन के लिए स्कूल के बाद यहीं रूक गए थे और ट्यूशन के बाद ही घर जाते थे।

मेरी उपस्थिति के कारण छात्र और शिक्षक दोनों ही असहज महसूस कर रहे थे, इसलिए मैं इसके लिए खुद को दोषी समझ रहा था। उनमें कुछ बच्चे बेहद ही शर्मीले थे। वे अपने पैरों पर हाथों से मारते और हर जगह उपस्थित मच्छरों को पकडऩे की चेष्टा करते। दूसरे वर्ग का एक छोटा सा छात्र मेरे पास यह जानने के लिए आया कि मैं कोई मंत्री तो नहीं। वह स्थान बिजली और कुछ लैंपों की रौशनी से रौशन था। एक छोटा सा लड़का अपनी स्लेट पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींच रहा था।

29-11-2014

मैंने लगभग आधे घंटे बच्चों के साथ गुजारे। मैं नहीं जानता कि क्यों, लेकिन यह हृदय को छूने वाला अनुभव था। शिक्षकों ने हमें उन समस्याओं के बारे में बताया जो विद्यार्थी झेल रहे थे। वे सभी खेती वाले पृष्ठभूमि थे। उनके मां-बाप या तो जमीन के छोटे टुकड़े पर काम करते थे या चिल्का झील में मछली पकड़ते थे। शिक्षक भी स्वयंसेवक थे। उन शिक्षकों में एक तहसील कोर्ट में वकील थे तो दूसरे शिक्षक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में काम करते थे। दोनों ने एक ही विद्यालय में पढ़ाई की थी और प्रतिदिन दो घंटे यहां के छात्रों को पढ़ाने के लिए देते हैं।

मैंने सीनियर क्लास के बच्चों से बात की। शुरू में वे बहुत शर्माए, लेकिन कुछ देर बाद उन्होंने अपनी आशाओं और आकांक्षाओं के बारे में बातें की। सभी बच्चों में कुछ जानने की उत्कंठा थी। उन्होंने डॉक्टर, इंजिनियर, पुलिस अधिकार, कलेक्टर बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया। यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई कि उनमें से ज्यादातर बच्चे शिक्षक बनना चाहते थे। एक लड़की ने मुझे यहां तक बताया कि चिलिका के टीवी टॉक शो में वो मुझे पहले देख चुकी है।

भारतीय डाक टिकट के संग्रहकर्ता के रूप में मैं पहले भी कई विद्यालयों में डाक संग्रह पर वर्कशॉप आयोजित कर चुका हूं। डाक विभाग के अधिकारी डाक टिकट संग्रहकर्ता के रूप में मेरी विशेषज्ञता को विद्यालय के छात्रों के बीच हॉबी के रूप में विकासित के लिए प्रयोग करते रहे हैं। जिन विद्यालयों का मैंने दौरा किया है, वे ज्यादातर पॉश कहे जाने वाले विद्यालय रहे हैं। मैं अक्सर छात्रों से उनके महत्कांक्षा के बारे में पूछता और उनका जवाब होता – डॉक्टर, इंजिनियर, पायलट, क्रिकेटर, अभिनेता, स्टंटमैन, शेफ, डांसर आदि बनना है। लेकिन, उनमें से शायद ही कोई बच्चा शिक्षक बनने की बात कही। भुवनेश्वर के एक प्रीमियर स्कूल के 500 छात्रों में से एक भी छात्र ने शिक्षक बनने की बात नहीं कही। ग्रामीण ओडिशा के एक छोटे से स्कूल, जो चिल्का झील के कारण मुख्य भूमि से कटा हुआ था और चक्रवात से बचने वाले शेल्टर हाउस में चल रहा था, वहां के बहुत से बच्चों ने शिक्षक बनने की बात कही। मैं नहीं समझ सका कि ऐसा क्यों, लेकिन इन बच्चों की इच्छा को सुनकर मेरा मन बहुत खुश हुआ।

देश और विदेश में अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने के लिए भुवनेश्वर के एक इंटरनेशनल स्कूल का देश और विदेश के स्कूलों के साथ एक्सचेंज प्रोग्राम होता है। मैं उम्मीद करता हूं कि ये स्कूल अपने छात्रों को उन स्कूलों में भी भेजेंगे जहां के बच्चे स्लेट और किताब के साथ लैंप भी स्कूल ले जाते हैं। ये छात्र जिंदगी के कठिन पाठ पढ़ते हैं और उससे जुझने का माद्दा सीखते हैं। मुझे एक पुरानी कहावत याद आती है – ‘कामयाब होने के लिए नहीं, काबिल होने के लिए पढ़ो।’

ओडिशा के 58 हजार स्कूलों में से 10 हजार स्कूलों के पास उचित स्कूल भवन नहीं है। शौचालय, बिजली, खेल का मैदान और बाउंड्री वॉल सरकारी स्कूलों में शायद ही देखने को मिलता है। इन स्कूलों के 35 प्रतिशत कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड तक नहीं है। 4,400 स्कूलों में मात्र एक कमरा है। इनमें शिक्षक भी एक ही है। अगर शिक्षक छुट्टी पर रहता है या अचानक तबीयत खराब होती है तो स्कूल बंद रहता है। कुल एक लाख 79 हजार शिक्षकों में 18 हजार (10 प्रतिशत) शिक्षक अप्रशिक्षित हैं। इन 30 प्रतिशत स्कूलों में स्वच्छपेय की सुविधा नहीं है और 35 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। 44,076 विद्यालयों में बिजली नहीं है और 2,346 विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है। और, इन सबसे उपर 350 स्कूल बिना किसी भवन के चल रहे हैं। यह सारे आंकड़े कुछ साल पहले ओडिशा प्राईमरी एजुकेशन प्रोग्राम ऑथिरिटी द्वारा तैयार किए गए ‘ओडिशा में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति-2012’ के हैं।

मैं स्कूल और शिक्षकों का नाम नहीं लूंगा, जिन्होंने मुझसे कहा कि ऐसा न करें। लेकिन, जैसे ही मैं वहां से दूर आया मुझे अहसास हुआ कि मैंने इस छोटे से स्कूल से बहुत कुछ लिया और उन्हें बहुत थोड़ा दिया। मैं नहीं जानता कि मेरी इस यात्रा से वहां के बच्चों में क्या उम्मीदें जगीं, लेकिन ऐसा लगा कि कुछ बच्चे इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि अब वहां जल्दी ही बिजली आ जाएगी।

हमारी उपस्थिति परेशानी पैदा करने वाली थी। अब वहां से निकलने का समय था। उनमें से कुछ बच्चों ने मुझे गुडबॉय कहा। चिल्का क्षेत्र में सड़कों पर गाड़ी चलाने के दौरान लोमडिय़ों, हाइनों और मछली पकडऩे वाली बिल्लियों से सामना हुआ। यह आद्र्रक्षेत्र सांपों से भरा हुआ है। हाल ही में भटका हुआ हाथियों के एक झुंड को ट्रेन ने रौंद दिया, जिसके कारण पांच हाथियों की मौत हो गई। मुझे आश्चर्य हुआ कि अगर इन सबसे बच्चों को यदि डर लगता है तो वे घर कब और कैसे लौटते होंगे। मैं उन आंखों की उम्मीदों को नहीं भूल सकता, जो मेरी तरफ देखते हुए अंगड़ाई ले रहे थे। मैं जानता हूं कि ये सभी बच्चे अपने साथ लैंप लेकर रात्रि स्कूल में अपना पाठ पढ़ते हैं, उनसे बहुत कुछ सीखकर वापस लौट आया।

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