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बेडरूम में तब्दील होतीं भारत की सड़कें…

By श्रीप्रकाश शर्मा

अति महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्यार सरीखे जिस नितांत वैयक्तिक भाव को सरेबाजार नुमाइश करने तथा नीलाम करने की एक नियोजित आंधी चल पड़ी है, आखिर उसका अंजाम क्या होगा? मानव सभ्यता और संस्कृति का वर्तमान सोफिस्टीकेटेड संस्करण, पतन तथा विकृति के किस मुकाम पर जाकर थमेगा?

‘किस ऑफ लव’ इश्यू पर हाल ही में टेलीविजन के एक मशहूर चैनल पर एक डिस्कशन देख रहा था। इसमें सरेआम प्यार के इजहार के रूप में सड़कों पर चुम्बन एवं आलिंगन करने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य हिन्दू विचारधारा वाली पार्टियां तथा छात्र संगठनों के द्वारा सनातनी भारतीय संस्कृति की पवित्रता नष्ट होने की आशंका से जनित दशा एवं दुर्दशा पर गरमा-गरम बहस चल रही थी। इसी कार्यक्रम के दौरान बहस में भाग लेने के लिए आमंत्रित एक युवती ने इस विवादापस्पद विषय पर अपनी राय कुछ इस तरह से रखी जो हमारे लिए एक दुखद आश्चर्य से कम नहीं है – ‘हमारे देश में खजुराहो, अजंता और एलोरा के मंदिरों के भित्ति-चित्रों पर जब सरेआम अश्लीलता दिखाई जाती है तब तो कोई आवाज नहीं उठती है, किन्तु जब इसी देश में लड़के और लड़कियां अपने प्यार को चुम्बन के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं तो फिर इतना शोर-शराबा क्यों मचता है? आखिर जो अश्लीलता मंदिरों के दीवालों पर पवित्र मानी जाती है फिर वही अश्लीलता सड़कों पर चर्चा का विषय क्यों बन जाता है?’ आमंत्रित छात्रा की दलील को सुनकर पैनल के सभी गेस्ट थोड़ी देर के लिए सन्न रह गये और उनसे कुछ भी जवाब देते नहीं बना। किन्तु अंत में प्रोग्राम के एंकर ने अवसर की संवेदनशीलता को जल्दी ही भांप लिया और स्थिति को संभालते हुए और माहौल की एक सोची-समझी चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, ‘खजुराहो तथा एलोरा के मंदिरों के दीवालों पर उकेरी गयीं नग्न, अर्ध-नग्न मूर्तियां मंदिरों के अन्दर स्थित हैं जो किसी प्रकार की अश्लीलता की सरेआम नुमाइश नहीं करती हैं।’ सच पूछिये तो उस युवा छात्रा के इस क्रांतिकारी तथा गैर-परंपरागत विचारों को सुनकर थोड़ी देर के लिए मन विचलित-सा हो गया और दिल बार-बार यही सोचने के लिए विवश हो गया कि चन्द्रमा पर अपनी बस्ती तथा मंगल पर जीवन की तलाश कर रहा आधुनिक भारत नैतिक मूल्यों तथा सात्विक विचारों के किस गर्त पर आकर ठहर-सा गया है? हकीकत में आज महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वेदों तथा पुराणों के नीति संहिताओं से जिस देश ने कभी विश्व को संस्कृति और सदाचार की राह दिखाई थी वही राष्ट्र आज अपने उस सुसंस्कृत और मर्यादित मार्ग से विचलित क्यों हो गया है? अति महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्यार सरीखे जिस नितांत वैयक्तिक भाव को सरेबाजार नुमाइश करने तथा नीलाम करने की एक नियोजित आंधी चल पड़ी है आखिर उसका अंजाम क्या होगा? मानव सभ्यता और संस्कृति का वर्तमान सोफिस्टीकेटेड संस्करण पतन तथा विकृति के किस मुकाम पर जाकर थमेगा?

भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के द्वारा केरल के कोच्ची शहर में कॉफी हाउस पर अश्लीलता को हवा देने तथा डेटिंग सरीखे पाश्चात्य संस्कृति को पोषित करने के आरोप में किये गये आक्रमण के विरोध में ‘किस डे’ के अवसर पर किस ऑफ लव के रूप में सार्वजनिक रूप से चुम्बन तथा आलिंगन की घटना ने देश में वैचारिक सात्विकता तथा सांस्कृतिक विरासत की बुनियाद पर एक  बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है। पश्चिमी संस्कृति के तेजी से फैलते रिवाज के खिलाफ आरएसएस द्वारा तथाकथित मोरल पोलिसिंग तथा प्यार-मुहब्बत के गैर- सामाजिक एवं अमर्यादित संबंधों के खिलाफ खाप पंचायत के फरमान के मद्देनजर यह विषय अत्यंत ही चिंतन एवं चिंता का हो जाता है कि प्रगति की सीढ़ी पर बढ़ते हमारे कदम अब बहकने क्यों लगे हैं और उससे भी अधिक अहम प्रश्न यह उठता है कि सामाजिक तथा पारिवारिक मूल्यों एवं मर्यादित व्यवहार में इस अप्रत्याशित क्षरण पर नियंत्रण कौन करेगा?

सामाजिक वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति में कुदरती तौर पर एक पशु छुपा होता है और जो मौका पाते ही अपने वीभत्स स्वरुप में जिन्दा हो उठता है। प्रगति और समृद्धि इंसान के अन्दर रहने वाले इस जानवर का आहार होता है। जब इंसान पेट की जरूरत से ऊपर उठ जाता है तो फिर दिमाग में बैठा जानवर करवटें बदलने लगता है और यही हमारी मानसिक विकृति का कारण बन बैठता है। इसी देश में जहां आबादी के एक तिहाई भाग के लोगों को रोटी के लिए आज भी मोहताज रहना पड़ता है और फटेहाली के कारण वे बचपन से सीधे बुढ़ापा में प्रवेश करते हैं, यौवन की अवस्था जिसके लिए कभी आती ही नहीं हो तो ऐसी स्थिति में हम यह सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि किस ऑफ लव फिर किन लोगों की संस्कृति है और इसको आयात करने की मजबूरी क्यों आई? चीन, रूस और अन्य पश्चिमी देशों में प्यार के इजहार के लिए प्रचलित चुम्बन के सार्वजनिक प्रदर्शन का यह घिनौना खेल हमारे देश में उस समृद्ध परंपरा का अनादर तथा अतिक्रमण है जिसके दिव्य आभा से अभिभूत होकर हिंदुस्तान में नारी को शक्ति के अवतार के रूप में पूजा जाता है। नर को नारायण तथा नारी को जगदम्बा के रूप में पूजे जाने की मान्यता वाले भारत सरीखे धर्मपरायण देश में प्यार और चुम्बन महज सेक्स के उपादान नहीं माने जाते, बल्कि स्त्री-पुरुष के मध्य जन्म-जन्मान्तर के पवित्र संबंधों की एक अटूट कड़ी के रूप में भी देखा जाता है। कदाचित इस बात से कोई इनकार नहीं कर पाए कि प्यार को पूजा और जिन्दगी के मानिंद माने जाने वाले भारतीय सामाजिक पारिवारिक माहौल में प्यार के इस प्रकार बेशर्म नुमाइश में भाव कम वासना अधिक छुपा होता है। सच्चे प्यार को किसी इजहार की तनिक भी जरुरत नहीं होती है। एक मां जब अपने बच्चे को प्यार करती है तो वह उसका कभी भी नुमाइश नहीं करती है। ममत्व का सर्वाधिक खुबसूरत भाव दिल के अन्दर बसता है। कहते हैं कि सच्चा प्यार आंखों में होता है और वही प्यार जब आंखों से निकलकर दुनिया के सामने आ जाये और वह प्रदर्शन के परदे पर चमकने लगे तो तो वह प्यार नहीं व्यापार होता है, व्यभिचार होता है जो कि मानव संस्कृति को शर्मसार करता है। आज हमें इस मुद्दे पर सोचने की नितान्त दरकार है कि किस ऑफ लव के रास्ते हम आनेवाली पीढ़ी के लिए किस तरह के पारिवारिक तथा सामाजिक ढांचे को विरासत में देने जा रहे हैं?

आयरलैंड के प्रसिद्ध विचारक, दार्शनिक एवं वक्ता एडमंड बुर्के ने एक  बार कहा था, ‘इस दुनिया में बुराई की जीत के लिए यह आवश्यक है कि अच्छे लोग चुप रहें और कुछ भी नहीं करें।’ पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय महत्व के इस प्रकार के मुद्दों के आग पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की बजाय तथा सामाजिक भेदभाव के मध्य खाई को पाटते हुए आज वक्त का तकाजा है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग हिंदुस्तान की प्राचीन गौरवमयी संस्कृति तथा उच्च मानवीय मूल्यों के पतन को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर जन जागरूकता फैलाए। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि समाज के विकृत मानसिकता की सोच वाले आधुनिक पीढ़ी के तरक्कीपसंद दिग्भ्रमित युवा को आज सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों का इस तरह के राष्ट्रीय संकट की स्थिति में चुप रह जाने से बढ़कर और कोई न तो पाप हो सकता है और न ही कोई कायरता।зубные коронкиsap bcm

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