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ब्रेन-ड्रेन से ब्रेन-गेन तक

ब्रेन-ड्रेन से ब्रेन-गेन तक

By सुधीर गहलोत

सिंधी समुदाय के बारे में एक कहावत प्रचलित है कि गौर से देखें तो मैदानी भाग से लेकर उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव तक पर सिंधी व्यापार करते मिल जाएंगे। यह सच्चाई भी है कि अविभाजित भारत में सिंधियों का व्यापार यूरोप से लेकर अरब तक था। ये तो सामाजिक विकास के चरम की बात है जिससे व्यापार की आधुनिक प्रणाली विकसित हुई और औद्योगिक क्रांति ने अपने अस्तित्व को बनाया। आज से हजारों साल पहले भी लोग यायावर जिंदगी गुजारते हुए दुनिया के कोने-कोने में जाते रहे हैं और बसते रहे हैं। आज से लगभग दो हजार साल पहले पहली शताब्दी में कनिष्क के शासनकाल में वत्र्तमान राजस्थान से उत्तर-पश्चिम और पूर्वी यूरोप में लोग जाकर बसे, जो जिप्सी कहलाए। उसके बाद पांचवीं सदी में चोलवंश के शासन में भारत के लोग दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों – इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, सुमात्रा और बाली में बड़े पैमाने पर गए और वहीं बस गए। आधुनिक इतिहास में अंग्रेजों द्वारा गिरमिटया मजदूर के रूप में भारतीयों को फीजी, सूरीनाम, गुयाना, मॉरीशस, ट्रिनीडाड-टोबैगो आदि देशों में भेजा गया, जहां उन्होंने अपने आप को पूरी तरह स्थापित कर लिया। अपनी मातृभूमि को छोड़ कर कुछ लोग भोजन की तलाश में अन्यत्र गए तो कुछ अत्याचारों से बचने के लिए। अत्याचारों से बचने की कोशिश में पलायन के शिकार होने वाले लोगों में कश्मीरी पंडित से लेकर बांग्लादेश एवं पाकिस्तान के अहमदिया और हिंदू समुदाय हैं तो इराक और सीरिया के यजीदी, शिया और कुर्द भी शामिल हैं।  शिक्षा और बेहतर जिंदगी के लिए दूसरे देशों में पलायन जीविकोपार्जन की समस्या कही जा सकती है, लेकर हिंसा और नरसंहार से बचने के लिए किए जाने वाला पलायन अस्तित्व की रक्षा है।

प्रवासी नए स्थान पर न सिर्फ अपनी दक्षता और विशेषज्ञता साथ लेकर जाते हैं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी जीवन-शैली और अपनी सभ्यता के गुढ़ रहस्य भी साथ लेकर जाते हैं। सदियों से यही क्रम जारी है। लेकिन, औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिमी देशों में हुए औद्योगिकीकरण और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आई उसमें तेजी के बाद विकसित हुए देशों में शिक्षा के बेहतरीन साधन, रोजगार के बेहतर अवसर और स्वच्छंद जिंदगी ने विकाशील देशों के लोगों को अपनी ओर लुभाया। विश्व के कोने-कोने से लोग सपने लेकर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की तरफ जाने लगे। इनमें भारत से प्रवास करने वाले युवाओं की संख्या भी कम नहीं थी। आज युरोपीय देशों सहित अमेरिका में बसे भारतीय अपनी दक्षता और कार्यकुलशता के लिए जाने जाते हैं।

90 के दशक में आईटी सेक्टर में उछाल और अमेरिकी अर्थव्यस्था में आई गति ने भारतीय युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित किया। कम कीमत पर कुशल कामगार को लुभाने के लिए अमेरिका ने अस्थाई एच-1बी वीसा का प्रावधान किया, जिसमें न्यूनतम योग्यता स्नातक रखी गई। इस वीसा नीति के कारण भारत से डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और आईटी पेशेवरों ने अमेरिका की तरफ रूख किया। परिणाम यह हुआ कि सन 1900 में जहां अमेरिका में भारतीयों की आबादी सिर्फ 6 हजार थी, वहीं 2013 के अंत तक बढ़कर यह आबादी करीब 30 लाख हो गई। अमेरिकी सेंसस ब्यूरो के अनुसार, भारतीय मूल के 75 प्रतिशत लोगों की न्यूनतम शिक्षा स्नातक है और 69 प्रतिशत प्रबंधन और आईटी क्षेत्र में कार्यरत हैं। दूसरी तरफ खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 40 लाख है। एक तरफ यूरोपीय देशों और अमेरिका में जाने वाले भारतीय कुशल और दक्ष श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, वहीं खाड़ी देशों में जाने वाले ज्यादातर भारतीय अल्प-कुशल या अकुशल कामगार हैं। आज 6 महादेशों के 125 देशों में लगभग तीन करोड़ अप्रवासी भारतीय रहते हैं।

भविष्य को संवारने के लिए अमेरिका और यूरोपीय देशों में गए भारतीयों ने न सिर्फ वहां अपनी दक्षता का लोहा मनवाया है, बल्कि वहां की राजनीतिक और व्यवसाय में भी महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किए। अमेरिका में लुसियाना प्रांत के गर्वनर बॉबी जिंदल, साउथ कैरोलिना की गवर्नर निक्की हेली, न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल प्रीत भरारा कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने अमेरिका की राजनीति में उंचाई हासिल की है। कनाडा में इस समय 9 भारतवंशी सांसद हैं तो ब्रिटीश संसद में 8 भारतवंशी सांसद हैं। ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में 8 भारतीय मूल के सांसद हैं। इसके साथ ही अमेरिकी संस्थानों के सीईओ, व्यवसायी, वैज्ञानिक, वकील, डॉक्टर, आईटी प्रोफेशनल, मीडियाकर्मी और फिल्ममेकर के रूप में भारतवंशी अपने नेतृत्व-क्षमता से दुनिया भर को लुभा रहे हैं। अमेरिका की कुल जनसंख्या का सिर्फ एक प्रतिशत के रूप में रहने वाले भारतीय वहां के कुल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और आईटी प्रोफेशनल्स की संख्या में 5 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं। जबकि अमेरिका के कुल डॉक्टरों की संख्या का 10 प्रतिशत भारतीय हैं। वहां रहने वाले भारतीय परिवारों की आय भी आम अमेरिकियों से ज्यादा है। यह उनकी दक्षता का परिणाम है।

29-11-2014

इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद देश में हमेशा से यह मुद्दा रहा है कि देश के बेहतरीन दिमाग विदेशियों की उन्नति के लिए काम करता है। इसे राजनीतिक स्तर पर भी उठाया जाता रहा है, वहीं भारतीय कॉरपोरेट जगत भी देश में दक्ष कर्मचारियों की कमी का हवाला देता रहा है। यह कुछ हद तक सही भी है कि देश के संसाधनों और ज्यादातर भारत सरकार के अनुदान पर शिक्षा प्राप्त करने वाले भारत के युवा अपने देश के बजाय विदेश में काम करने को ज्यादा तरजीह देते हैं। इससे देश की उन्नति के लिए जरूरी दक्ष कर्मचारी की खासी कमी झेलनी पड़ती है। इसे ब्रेन-ड्रेन की संज्ञा दिया जाता है। लेकिन ब्रेन-ड्रेन के पक्ष में प्राय: यह जवाब दिया जाता है कि यहां सही अवसर की कमी के कारण लोगों को पलायन करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

आईआईटी, आईआईएम, आईआईएस-सी जैसे संस्थानों में पढ़कर विदेश में अपनी सेवाएं देने के कारण इस पर कई बार प्रतिबंध लगाने मांग की गई। कहा गया कि सरकारी अनुदान पर पढऩे वाले विद्यार्थियों को विदेश में सेवा देने से पहले देश में कम से कम पांच साल तक काम करना अनिवार्य करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। दूसरी तरफ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टक्नोलॉजी और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे संस्थानों का इसरो के कर्मचारियों में महज 2 प्रतिशत से भी कम का योगदान है। जबकि रोड और रेल जैसे अन्य अभियांत्रिकी विभागों में उनकी उपस्थिति नगण्य है या कह लें कि उन क्षेत्रों में उनकी दिलचस्पी ही नहीं है। उन्हें विदेशों की उंची तनख्वाह वाली नौकरी और रंगीन जीवन-शैली ज्यादा आकर्षित करती हैं।

इंदिरा गांधी के शासनकाल में आयकर का स्लैब 97.75 प्रतिशत था, जो आजाद भारत के इतिहास के सबसे अधिक टैक्स चुकाना पड़ता था। इसके अलावा वेल्थ टैक्स सहित अन्य कई कर के रूप में यह टैक्स स्लैब 103 प्रतिशत के करीब पहुंच जाता था। यानी 100 रूपए की कमाई पर 103 रूपए टैक्स देना होता था। यही वो दौर था, जब भारतवंशियों ने पलायन कर विदेशों में व्यवसाय स्थापित कर उन्नति के नए कीत्र्तिमान स्थापित किए और देश का सिर उंचा किया।

ब्रेन-ड्रेन की अवधारणा को सकारात्मक मोड़ देने में चंद्रबाबु नायडू, पल्लम राजू और अरूण शौरी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका मानना था कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय विदेशों से भारत में पैसे भेजते हैं, जिससे यहां कि अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। साथ ही, वे कई सालों के अनुभव के बाद जब देश में आकर कोई नया रोजगार शुरू करते हैं तो उनके साथ उस देश की तकनीक और कार्य-पद्धति होती है। इस अवधारणा को मजबूती देने के लिए अप्रवासी भारतीयों का सम्मेलन हर वर्ष शुरू करने की पहल अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने की। भावी संभावनाओं और अनुकूल माहौल के कारण अप्रवासी भारतीयों ने भारत में निवेश करने में रूचि भी दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत को निवेश के साथ-साथ अनुभव और तकनीक भी हासिल हुए।

हालांकि 2008 की भयावह वैश्विक मंदी के कारण हजारों लोगों की नौकरियां गर्इं। अमेरिका से लेकर युरोपीय देशों तक में इसके भयानक परिणाम देखने को मिले, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था को ऐसा कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा जिसके कारण बड़े पैमाने पर नौकरियों से छंटनी करने की जरूरत पड़ी हो या अर्थव्यवस्था के बुरी तरह पटरी से उतरने की आशंका जाहिर की गई हो। उस दौरान हजारों अप्रवासी दक्ष और कुशल युवाओं ने भारत की ओर रूख किया। लोगों में विश्वास जगा कि अनुभव हासिल करने की दृष्टि से विदेशों में काम करना कुछ समय के लिए भले ही जरूरी हो, लेकिन इस मामले में भारत एक स्थिर अर्थव्यवस्था है। विदेशों से लौटे लोगों ने भारत में नए उद्योग-धंधों में निवेश किए और भारत की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया। खाड़ी देशों में भी काम करने वाले भारतीयों का विदेशी मुद्रा अर्जित करने में अहम योगदान है। खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा सलाना लगभग 63.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर भारत में भेजे जाते हैं, जो किसी भी देश को बचत के रूप में भेजी जाने वाली सबसे बड़ी राशि है। भारत में विदेशों से भेजे जाने वाले कुल रकम का 60 प्रतिशत खाड़ी देशों से भेजा जाता है, जो वित्तीय वर्ष 2011-12 में भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग चार प्रतिशत था।

हालांकि अब तो ब्रेन-ड्रेन की अवधारणा को भाजपा सरकार ने सकारात्मक रूप में लेते हुए ब्रेन-गेन, यानी कुशल भारतीयों को विदेशों में अपनी सेवाएं देने की एक नई अवधारणा को प्रतिपादित किया है। लोकसभा चुनावों के दौरान अपने भाषणों से लेकर अमेरिका के मैडिसन स्क्वॉयर तक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हम (भारत) कुशल और दक्ष मानव-संसाधन का दुनिया को निर्यात कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि विश्व भर में भारतीय नर्सों और शिक्षकों की भारी मांग है। हम उच्चस्तरीय नर्स और शिक्षकों को प्रशिक्षित कर दुनिया भर में इस कमी को पूरा कर सकते हैं। भाजपा की यह सोच दूरदर्शी है। इससे ब्रिटेन सहित अन्य युरोपीय देशों के साथ-साथ खाड़ी देशों में कुशल लोगों के जरिए ज्यादा से ज्यादा विदेशी मुद्रा अर्जित कर अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से आधारभूत संरचनाओं में निवेश किए जा सकते हैं। इसके साथ ही इन देशों में भारत की संस्कृति, परंपरा, ज्ञान-संपदा, विचारों और रहन-रहन को फैलाया जा सकता है। युवाशक्ति को भारत में मजबूत और दक्ष बनाने के पीछे प्रधानमंत्री का यही सपना है।

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