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बनारस में जलपरियां!

बनारस में जलपरियां!

By प्रेमपाल सिंह वाल्यान

गंगा के आंचल में नावों व बजड़ों पर जिस्मफरोशी का व्यापार शुरू हो गया है। शरीर का व्यापार करने वाली जलपरियां कहीं और से नहीं मंगाई जातीं, बल्कि बनारस के पक्के मुहल्लों में बसने वाली कुछ पेशेवर मध्यम व उच्च परिवारों से जुड़ी हुई लड़कियां होती हैं, जो अपने महंगे शौक को पूरा करने के उद्देश्य से अतिरिक्त आय के लिए अपने शरीर का सौदा करती हैं। कुछ विधवाएं व देववासियां भी हैं, जो धार्मिक और सामाजिक वर्जनाओं के कारण चाहकर भी विवाह नहीं कर पातीं। वे विधवाएं मंदिरों में पूजा पाठ करने की आड़ में अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए गंगा के घाटों की शरण लेती हैं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बनारसियों ने अपना सांसद चुना था। इस प्रकार मोदी का बनारस और बनारस के मोदी हो गए। अब मोदी के बनारस में कुछ तब्दीलियां नजर आने लगी हैं। इन्हीं तब्दीलियों में एक नकारात्मक तब्दीली यह भी  है कि यहां के गंगा घाटों पर जलपरियों की आवाजाही बढ़ गई है। देह व्यापार की नयी खोज जलपरियों का यहां काफी बोलबाला है जो अपने ग्राहकों को गंगा में तैरते बजड़ों के प्राइवेट केबिन में चन्द घंटों में ही तीनों लोक की सैर करवा देती हैं। इन बजड़ों (तैरता हुआ काठ का घर) की भव्यता का अन्दाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भारत के अमीरों में टॉप-10 में शुमार तथा देश के प्रमुख उद्योगपति मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी ने अपना 51वां जन्मदिन 1 नवम्बर, 2014 को पूरे लाव-लश्कर के साथ तीन लग्जरी बजड़ों पर मनाया। यही लग्जरी बजड़े कुछ अमीर अय्याशों के लिए ऐशगाह बन गये हैं। वैसे यह खेल कोई नया नहीं है। इसका इतिहास आदिकाल से ही मिलता है। कहा जाता है कि, स्कंद पुराण में वर्णित एक संदर्भ के अनुसार, स्वर्ग की अप्सराओं और आदमी के सहवास से वेश्याओं का जन्म हुआ। पंचचूर्णा नाम की अप्सरा ने पहली वेश्या को जन्म दिया था। मेनका, रम्भा, उर्वशी आदि वेश्याओं में गजब की सुन्दरता एवं आकर्षण था, जिसमें उनकी विनोदी प्रवृत्ति सोने में सुहागे का काम करती थी। वे अपनी बुद्धिमत्ता तथा खुशमिजाजी से बड़े-बड़े योगियों तथा मुनियों को भी मुग्ध कर लिया करती थीं। ऋग्वेद में ‘उर्वशी’ तथा ‘शुक्ला’, अजुर्वेद में ‘पूनजीकस्थल’, ‘रितुस्थला’, ‘मेनका’, ‘सहजन्या’ तथा ‘विश्वाली’ आदि का वर्णन मिलता है।

इसके अतिरिक्त उत्तर वैदिक कालीन साहित्य में भी नाचने-गाने वाली अनेक नर्तकियों का वर्णन है, जो वेश्याओं के समान जीवन व्यतीत करती थीं। मत्स्य पुराण में वेश्याओं को शुभ माना गया है। बौद्धकाल में वैशाली की आम्रपाली तथा शलावती अत्यंत प्रभावशाली व ख्याति प्राप्त वेश्याएं हुई हैं। गुप्त काल में भी वेश्यावृत्ति अत्यंत व्यवस्थित एवं संगठित ढंग से होती थी। ‘पाटलीपुत्र’ में इस व्यवसाय पर कर लगता था तथा वेश्याओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने ग्राहकों की सूची तथा उनसे होने वाली सम्भावित आय का पूरा विवरण सरकार के पास जमा करें।

अर्वाचीन भारत में भी जवान लड़कियों के रूप-रंग के सम्मोहन से राजाओं को मुग्ध करके उनकी नैतिकता को क्षत-विक्षत किया जाता था। आज की तरह ही उस समय भी उच्चाधिकारी अपनी स्त्रियों के माध्यम से राजाओं एवं उनके मंत्रियों से नाना प्रकार की सुविधाएं तथा अनुदान प्राप्त किया करते थे।

राजा-महाराजा अपने राजकुमारों को तौर-तरीके व चालाकियां सिखाने के लिए वेश्याओं के पास भेजते थे, जिससे वे दूसरे राजाओं द्वारा जासूसी के रूप में प्रयोग की जाने वाली वेश्याओं के चंगुल में आसानी से न फंस सकें। इसके पश्चात् मुगलकाल में ये वेश्याएं नवाबों की तरह ठाठ-बाट से रहती थीं तथा राजाओं और नवाबों के पास ये बेरोक-टोक पहुंच सकती थीं। आज यह कार्य कॉलगर्ल व ई-गर्ल कर रही हैं। अब इसी क्रम में जलपरियां भी अस्तित्व में आ चुकी हैं।

लगभग 17 लाख की आबादी वाली विश्वविख्यात ऐतिहासिक प्राचीनतम सांस्कृतिक नगरी काशी यानि वाराणसी के गंगा घाटों पर जिस्मफरोशी का नया महारोग फैला है।

भांग-बूटी के बादशाही नशे में गहरेबाजी का जौहर, बनारसी पान के चौघड़ों को मुंह में दबाए रखने का रईसाना अंदाज, नृत्य-संगीत की महफिलें, सुबह की बेला में दण्ड-बैठकी व स्नान तथा सुबह से देर रात तक जागने की उनींदी और मादक अंगड़ाई, तीज-त्यौहारों में कुश्ती-दंगल, तैराकी, बुलबुलेबाजी, पतंगबाजी की जीवन्त परम्पराएं अब इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हैं। गंगा में नावों और बजड़ों पर उठने वाली घुंघरूओं की झंकार, तबले की संगत, सारंगी की गंज, ठुमरी व दादरा के बोल अब सुनाई नहीं पड़ते। अब गंगा के मरघटी सन्नाटों में देह व्यापार का घिनौना धंधा होता है।

आधुनिक बनारस पर अय्याशी और व्यावसायिकता का कलेवर चढ़ा हुआ है। सुन्दर कालोनियों, क्लबों, होटलों में पनपती अंग्रेजियत, चापलूसी, खूबसूरती और पाश्चात्य संगीत के तेवर में जकड़ी बनारसी मस्ती कराह रही है। हजारों-हजार वर्षों से धर्मभीरू जनता के मन और आत्मा को पवित्र करने वाली गंगा इन दिनों देह व्यापार, अय्याशी एवं तस्करी जैसे घिनौने कृत्यों का केन्द्र बन गयी है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता है, जब बनारस क्षेत्र में कोई हत्या न होती हो। अब काशी की गंगा से मुक्ति और घाटों से आदर्श के पाठ नहीं पढ़ाये जाते, बल्कि जिस्मफरोशी, पॉकेटमारी, बेईमानी तथा झूठ-फरेब के खेल-तमाशे देखने को मिलते हैं।

काशी के दशाश्वमेध घाट, राजेन्द्र घाट, अहिल्या घाट, अस्सी और मणिकर्णिका घाट इन दिनों तस्करों, नशेडिय़ों और अय्याशों के लिए जन्नत बन गये हैं। गंगा के आंचल में नावों व बजड़ों पर जिस्मफरोशी का व्यापार शुरू हो गया है। शरीर का व्यापार करने वाली जलपरियां कहीं और से नहीं मंगाई जातीं, बल्कि बनारस के पक्के मुहल्लों में बसने वाली कुछ पेशेवर मध्यम व उच्च परिवारों से जुड़ी हुई लड़कियां होती हैं, जो अपने महंगे शौक को पूरा करने के उद्देश्य से अतिरिक्त आय के लिए अपने शरीर का सौदा करती हैं। कुछ विधवाएं व देवदासियां भी हैं, जो धार्मिक और सामाजिक वर्जनाओं के कारण चाहकर भी विवाह नहीं कर पातीं। वे विधवाएं मंदिरों में पूजा-पाठ करने की आड़ में अपनी काम-वासना की पूर्ति के लिए गंगा के घाटों की शरण लेती हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ज्यों-ज्यों शाम ढलती है, त्यों-त्यों काशी के कुछ प्रसिद्ध घाटों पर रंगीन मिजाज व्यक्तियों और उनकी तबियत को ताजगी देने वाली युवतियों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। देह व्यापार करने वाली युवतियां अक्सर गर्मी के मौसम में शाम सात बजे से देर रात्रि तक गंगा के घाटों पर रहती हैं। उनके कुछ खास एजेंट होते हैं, जो ग्राहकों से सौदा तय करने के बाद उन्हें गंगा में तैरते हुए किसी बजड़े पर बैठा देते हैं। बजड़े (तैरता हुआ काठ का घर) को किसी अंधेरे एवं सुनसान क्षेत्र में ले जाया जाता है। बाद में दूसरी नाव से युवतियां सतर्कता से वहां पहुंच जाती हैं। बहुधा इन बजड़ों को गंगा नदी के दूसरे छोर पर ले जाकर खड़ा कर दिया जाता है, जहां लोग अपने मन की मुराद पूरी करते हैं। एजेंट नावों पर बैठकर पहरेदारी करते हैं। किसी भी प्रकार के खतरे का अंदेशा होते ही वे अपने सुनिश्चित आवाजों तथा प्रकाश के संकेतों से उन्हें सतर्क कर देते हैं। हालांकि यह धंधा पूरी गोपनीयता के साथ किया जाता है। इसके बावजूद भी यदा-कदा ऐसी युवतियां जलरक्षक गश्ती दलों के हाथ पकड़ी जाती हैं, लेकिन मोटी रकम देकर हवालात जाने से पहले ही छूट जाती हैं। कुछ पेशेवर जलपरियां तो ‘बचाव’ के लिहाज से जल रक्षक गश्ती पुलिस को साप्ताहिक अथवा मासिक रकम ‘चौथ’ (चढ़ावे) के रूप में देती हैं।

पिछले वर्ष जल रक्षक गश्ती दल ने गंगा की आंचल में देह व्यापार करने वाली कई जलपरियों एवं रंगीन परिंदों के सौदागरों को जेल भेजा, लेकिन धंधे में कमी आने के बजाय बढ़ोत्तरी होती गयी। शराफत का खोल ओढ़े कुछ जिस्म के सौदागर भावी खतरों के भय से मुंह मांगी रकम देकर जलपरियों को होटलों में भी बुलाने लगे हैं।

प्रासंगिक है कि वाराणसी के चौक थाने का समीपवर्ती मुहल्ला ‘दाल मण्डी’ वेश्यावृत्ति के लिए कुख्यात है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पहले वहां कभी ‘तन’ का सौदा नहीं होता था, केवल संगीत और नृत्य के ताल गूंजा करते थे। उन दिनों गाने-बजाने और नृत्य व मुजरे की भी एक मर्यादा होती थी। किसी कोठे पर रईसों के एक दल के आते ही दूसरों के लिए वहां का दरवाजा उस रोज बंद हो जाता था। उस जमाने की हुस्नाबाई, धनेसरा बाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी बाई, गिरजा देवी, फिल्म अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दनबाई और छप्पन छुरी के नाम से मशहूर जानकी बाई का नाम संगीत के क्षेत्र में आज भी याद किया जाता है।

कुछ बाइयां किसी रईस की रसिकता पर रीझ जातीं तो प्राय: जिन्दगी भर के लिए उसी की होकर रह जातीं। रईस भी अपनी चहेती बाई की सुख-सुविधा और मान-सम्मान का पूरा ख्याल रखते थे। लेकिन राजे-रजवाड़े खत्म हो गये। न वे कद्रदां रहे न वे बाईयां रहीं। ‘दाल मण्डी’ धीरे-धीरे वेश्या बाजार बन गया। गाने बजाने की ओट में थोड़े से पैसे के लिए देह व्यापार होने लगा। तब भी यह कुत्सित व्यापार एक संकुचित क्षेत्र में ही सीमित था।

फिर सरकार ने वेश्यावृत्ति उन्मूलन अभियान चलाया। ‘दाल मण्डी’ की तमाम वेश्याओं को मडुुवाडीह इलाके के शिवदासपुर गांव में बसा कर उन्हें जीवन बसर करने के साधन मुहैया कराये गये, लेकिन ‘दाल मण्डी’ ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि एक नया देह व्यापार केन्द्र शिवदासपुर जरूर पनप गया। फलस्वरूप वेश्यावृत्ति पहले की अपेक्षा अधिक कुत्सित रूप में फैल गयी है। दाल मण्डी में अब भी शबाना, रेहना, फातिमा, रेखा, बिन्दु, मीना, मधु, परवीन, संगीता, नसीम, हलचल, लाजोबाई, रानी दिलरूबा, मीरा के कोठे विधिवत चल रहे हैं। खैरून, सविता, गौरी, तुलसी, नन्दरानी आदि न जाने कितनी वेश्याएं हैं जो मजबूरी में अपने शरीर का व्यापार करती हैं।

लेकिन शरीर का धंधा अब दाल मण्डी अथवा शिवदासपुर तक ही सीमित नहीं, बनारस के पक्के मुहल्लों की संकरी गलियों के घरों, होटलों, क्लबों, कुछ ब्यूटी पार्लरों और गंगा की आंचल में नाव और बजड़ों तक पर विधिवत् फैल चुका है। सिर्फ वेश्याओं का नाम बदल गया है। अब उन्हें कॉलगर्ल, एस्कॉर्ट, ई-गर्ल व जलपरी कहा जाता है। आज वे तस्करी, जासूसी, ठेकेदारी, नौकरी, व्यापार आदि का एक आवश्यक अंग बनती जा रही हैं। वेश्यावृत्ति के प्राय: रोज नए-नए तरीके इजाद किये जा रहे हैं। इन पेशेवर युवतियों को समाज के सफेदपोश लोगों का संरक्षण प्राप्त है। गंगा नदी में नावों और बजड़ों पर होने वाले शरीर के व्यापार में इन दिनों काफी बहार आ गया है। कुछ नेपाली युवतियां केवल शरीर का धंधा करने के उद्देश्य से वाराणसी आती हैं। पक्के मुहल्लों में पढ़ाई-लिखाई करने के बहाने मकान लेकर रहती हैं और शाम को घाटों पर अपने एजेंटों के माध्यम से लोगों को मनचाहा मनोरंजन देकर खासी रकम ऐंठने में कामयाब हो रही हैं। घाटों का ग्राहक यदि गंगा में विलास नहीं करना चाहता तो एजेंट होटलों में पूरा-पूरा प्रबंध कर देते हैं। बस घंटे भर के लिए 800 रुपये से 10,000 रुपये तक अथवा कभी-कभी पूरी रात के लिए 30,000 रुपये तक का सौदा होता है, जिसमें होटल खर्च और भोजन आदि शामिल होता है।

जलपरियों के एजेंट न केवल ऐश ही मुहैया कराते हैं बल्कि मादक पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों को हेरोइन, चरस, स्मैक, गांजा, भांग तक उपलब्ध कराते हैं। संसार की कोई भी ऐसी नशीली वस्तु नहीं जो कोशिश करने और पैसा खर्च करने पर घाटों पर उपलब्ध न हो सके।

मालदार अय्याशों को चाय में नशीली दवाइयां मिलाकर बड़ी खूबसूरती से यहां लूट लिया जाता है। प्राय: उपस्थित ग्राहकों, जिसमें अधिकतर विदेशी होते हैं, को ही अक्सर लूटा जाता है और यदा-कदा हत्याएं भी कर दी जाती हैं।

काशी के घाटों पर आनंद लेने के लिए नित्य पधारने वालों में सैंकड़ों विदेशी होते हैं, जो हिन्दुस्तानी माल (तरूणी) के लिए अंधाधुंध पैसा पानी की तरह बहाते हैं। कुछ उन्मुक्त विचारों की विदेशी युवतियां पैसे देकर अपनी सेक्स पूर्ति के लिए ‘गबरू जवान’ (स्वस्थ बलशाली युवक) तलाशती रहती हैं, जो घाटों पर उन्हें आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। लेकिन शहर के कुछ मशहूर पैसे वाले और तथाकथित रईस भी यहां आकर रात की रंगीनियों में डूबने के लिए बेतहाशा पैसे खर्च करते हैं। कुछ युवक अपने परिचित एजेंटों के माध्यम से विदेशी युवतियों की खरीद-फरोख्त कर अपना शौक पूरा करते हैं।

गंगा के आंचल में इस घिनौने धंधे के चलते एड्स फैलने की सम्भावना अधिक हो गयी है। इसके लिए प्रबुद्ध वर्ग काफी चिंतित है, लेकिन स्थानीय पुलिस व जल गश्ती पुलिस का संरक्षण होने के कारण कोई उंगली नहीं उठा पाता। गंगा के घाटों पर अनेक बार ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं, जब युवतियों ने मुसाफिरों को अपने रूप-यौवन के जाल में फांसकर उनकी घडिय़ां, सोने की जंजीरें तथा अंगूठियां उतरवा ली हैं। जलपरियों के जाल में फंसने वाले लोग अपना सब कुछ लुटा देते हैं और इज्जत चली जाने के भय से अपनी जुबान नहीं खोलते। यदा-कदा यदि किसी ने पुलिस को आपबीती सुनानी भी चाही जो उल्टे उसे ही पुलिस का कोपभाजन बनना पड़ा।

देह व्यापार के इन तेवरों को स्थानीय पुलिस भली-भांति जानती है, किंतु चढ़ावे की रकम के लालच में पुलिस अनजान बनकर गंगा के आंचल को मैला करने वाली कुल्टाओं और उनके तथाकथित दलालों (चमचों) को खुली छूट दे रखी है।

जाहिर है कि यदि काशी (वाराणसी) के घाटों और गंगा में नाव तथा बजड़ों पर जिस्मफरोशी का यह तांडव नृत्य अनवरत चलता रहा तो बहुत जल्द ही एड्स का प्रकोप बनारस पर कहर बनकर टूटेगा। अभी तक यहां लगभग 950 से अधिक एड्स रोगियों की पहचान की गयी है।

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