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हमारी उच्च सोच ही हमारा संस्कार है

हमारी उच्च सोच ही हमारा संस्कार है

By उपाली अपराजिता रथ

हम अपने जीवन में नित्य नए अनेक शब्दों का प्रयोग करते हैं। अगर इसका विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि हम शब्द के मूल का प्रयोग कर रहे हैं। जैसे एक शब्द ‘संस्कार’ को ही लिया जाए। किसी व्यक्ति की पोशाक, चाल-चलन को ही हम उसका संस्कार मानते हैं। एक अच्छा संस्कारवान व्यक्ति अच्छा भद्र परिधान धारण करता है। उसके रहन-सहन और व्यवहार में शालीनता होती है। आमतौर पर संस्कार शब्द लड़कियों के लिए ही प्रयुक्त होता है। एक लड़की को देखते ही लोग उसके संस्कारों का अंदाज लगाते हैं।

एक आदमी बचपन से जो काम अपने घर में सीखकर बड़ा हुआ है, उसके परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी से जो बातें सीखता है वही उसका संस्कार माना जाता है। कोई भी कार्य करने से पहले उसके जीवन में तथा उसके संस्कारों के दायरे में आने वाले लोगों को कितना प्रभावित करता है, यह पूछना उसके संस्कार के दायरे में नहीं आता है।

एक लड़की बचपन से एक ही वातावरण में पली-बढ़ी है। वह उसी तरह खुद को ढाल लेती है। यही उसकी संस्कार है। लेकिन यही काम और व्यवहार अगर वह दूसरों के घर जाकर करने लगती है तो उसे  अपसंस्कार कहा जाता है। असल में संस्कार की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती। यह तो समय तथा स्थान के अनुसार बदलता है।

आदिवासी समुदाय की ही बात अगर की जाए तो उनके प्रचलन के अनुसार युवक-युवती हाथ में हाथ लेकर नाचती हैं। उनमें हर युवती को अपने पसंद का वर चयन करने का अधिकार होता है। उस नृत्य के उपरांत जिस व्यक्ति को वह वरमाला पहनाती है उसके साथ उसकी शादी हो जाती है। आदिवासी समुदाय में यह संस्कार के दायरे में आता है, लेकिन वही चीज अगर हमारे समाज में हो तो हम उसको अपसंस्कार मानते हैं। ऐसी अनेक रीति-रिवाज और परंपराएं हैं जो एक समुदाय के जीवन का हिस्सा होती हैं, लेकिन अन्य संप्रदाय के लोग उसे बुरी नजर से देखते हैं।

व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को देखकर ही उसका संस्कार नहीं माना जाना चाहिए। जो काम हम करते हंै उसे करने के लिए कहीं न कहीं से प्रेरणा मिलती है। हमारा परिधान भी हमारी आदत बन जाती है। इंसान के अंदर यह संस्कार होना चाहिए कि वह दूसरों का सम्मान करें। हमारा संस्कार ऐसा होना चाहिए कि हम दूसरों के साथ मिलजुल कर रहें और सबको साथ लेकर चलें। समय तथा हालात के साथ-साथ खुद को बदलना भी हमारा संस्कार होना चाहिए। हमारा संस्कार यह होना चाहिए कि हमारे कार्य से समाज के उपर गलत असर न पड़े। ऐसा देखा जाता है कि संस्कार के नाम पर हम एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। हमारी उच्चकोटि की सोच ही हमारा संस्कार होता है।

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