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डॉक्टर बाबू! डॉक्टरों को संभालो…

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

बिलासपुर में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाए गए नसबंदी कार्यक्रम में 17 महिलाओं की मौत ने सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल दी है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह घटना उस राज्य में हुई है, जिसके मुखिया खुद एक डॉक्टर हैं। यह पहली बार है कि राज्य के स्वास्थ्य सेवाओं का विद्रुप चेहरा सामने आया है। बलोड के सरकारी नेत्र शिविर में 2011 में इलाज के दौरान 4 लोगों की मौत हो गई थी और 30 लोगों ने हमेशा के लिए अपनी आंखें खो दीं थी। उसके अगले साल महासमुंद जिले के बगबहरा नेत्र शिविर में इलाज के दौरान 15 लोगों ने अपनी आंखों की रौशनी हमेशा के लिए खो दी। इस घटना को कवर्धा में दोहराया गया, उसके बाद दुर्ग के राजनंदगांव और फिर धमतरी में दोहराया गया। पिछले तीन सालों में राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न शिविरों में लगभग 70 लोग अपनी आंखों की रौशनी खो चुके हैं।

साल 2012 में छत्तीसगढ़ का कुख्यात गर्भाशय घोटाला सामने आया था। इसमें राज्य भर में निजी नर्सिंग होम ने स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ हासिल करने के नाम पर ग्रमीण महिलाओं का ऑपरेशन कर गर्भाशय निकाल लिया था। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हस्तक्षेप किया और राज्य सरकार से कहा कि प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा दे। इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, आयोग बनते रहते हैं, लेकिन इसके लिए किसी को आज तक उत्तरदायी नहीं ठहराया गया।

डॉ. आर.के. गुप्ता को अपने दो सहयोगियों के साथ एक खाली पड़े निजी अस्पताल में कुछ ही घंटों में 83 महिलाओं का ऑपरेशन करने का दोषी माना गया है। डॉ. गुप्ता ने इतनी संख्या में ऑपरेशन 30 दिनों में किए जाने के सरकारी गाईडलाईन को नजरअंदाज कर एक ही औजार से ऑपरेशन किया। इस तरह डॉ. गुप्ता ने एक ऑपरेशन करने में सिर्फ चार मिनट का समय लगाया। डॉ. गुप्ता को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और इस साल 26 जनवरी को उन्हें 50 हजार से अधिक नसबंदी करने के कारण मुख्यमंत्री रमन सिंह द्वारा पुरस्कृत किया गया।  हालांकि मौत के कारणों का तुरंत खुलासा नहीं हो पाया। संभवत: गंदे शल्य उपकरणों और दूषित दवाईयों की वजह से पीडि़तों में विषाक्तता के लक्षण दिखाई दिए। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई दवाईयां नकली थीं और उपकरण जंग लगे थे।

भारत का परिवार नियोजन कार्यक्रम अधिकतम संख्या के लक्ष्य, रिश्वत और दबाव पर आधारित होता है। देश के बहुत से हिस्सों में नसबंदी, खासकर महिलाओं की नसबंदी के लक्ष्य को आक्रामक तरीके से हासिल करने की कोशिश की जाती है। इसके लिए स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन में कटौती और बर्खास्तगी की धमकी दी जाती है। परिणामस्वरूप महिलाओं को पूरी सूचना दिए बिना, चाहे इसकी जटिलताओं के बारे में हो या किसी बदलाव या सुरक्षित यौन संबंधों की पूरी जानकारी, कुछ स्वास्थ्यकर्मी उन पर नसबंदी के लिए दबाव बनाते हैं।

इस घटना में भी स्वास्थ्यकर्मियों को इंसेंटिव के रूप में प्रति ऑपरेशन 200 रूपए और महिलाओं को 1400 रूपए देने का वादा किया गया। छत्तीसगढ़ दूसरा राज्य है जो मुन्नाभाई एडमिशन के देशव्यापी रैकेट से प्रभावित है। राज्य सरकार को अभी राज्य के मेडिकल कॉलेजों में नामांकन कराए फर्जी छात्रों की पहचान करनी बाकी है। वे जल्दी ही बागडोर थामने वाले हैं। राज्य का सरकारी स्वास्थ्य विभाग सिर्फ दिखावा है। राज्य द्वारा संचालित अस्पतालों में शिक्षित कुशल डॉक्टरों की भारी कमी है। ये घटना डॉक्टरों की लापरवाही को भी इंगित करती है, जिसकी तरफ राज्य सरकार को तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन, सरकारी अस्पतालों में उपयोग किए जा रहे चिकित्सकीय उपकरणों और दवाईयों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर शंका है। इसके लिए राज्य के राजनेताओं-अधिकारियों-आपूर्तिकत्र्ताओं-निजी अस्पतालों के गठबंधन की गहन जांच की आवश्यकता है।

यहां तक कि छत्तीसगढ़ के सुदूर इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी लोगों को नसीब नहीं हो रही हैं। इसमें माओवादी विद्रोही का मामला सबसे जटिल है। इन इलाकों में मलेरिया और बुखार से होने वाली मौतें आम हैं। इसमें 6 प्रतिशत मौतें बीमारी जनित होती हैं। इस सूची में दुर्घटना से होने वाली मौतें (5 प्रतिशत) है। इसके बाद टीबी, डायरिया और पीलिया से होने वाली मौतें हैं। इन बीमारियों से होने वाली मौतों का प्रतिशत क्रमश: 2 है। ग्रामीण क्षेत्रों में हुई 39 हजार मौतों (वार्षिक स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़े के अनुसार वास्तविक संख्या इससे तीन गुनी ज्यादा है) में लगभग 17 प्रतिशत मौत चिकित्सकीय सुविधा के अभाव में हुईं।

इस मसले पर राज्य सरकार के स्वास्थ्य मंत्री को तुरंत त्याग-पत्र देना चाहिए था। यहां तक कि राज्य में भ्रष्टाचार और लापरवाही से पहले हुईं घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री को इस दुर्घटना की जिम्मेवारी स्वयं लेनी चाहिए। यह घटना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए शर्मिंदगी की वजह बन गई है, जो देश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने का प्रयास कर रहे हैं।

1979 में चीन की कुल प्रजनन दर 2.8 प्रतिशत थी, जबकि केरल में 3 प्रतिशत था। चीन द्वारा 28 साल बाद, 2007 में एक बच्चे की नीति कड़ाई से लागू करने के बाद भी यह दर 1.7 पर स्थिर है। हालांकि केरल ने भी यह दर हासिल किया है, लेकिन बिना किसी दबाव के। केरल की सफलता तीन ‘ई’ - एजुकेशन (शिक्षा), एंप्लॉयमेंट (रोजगार) और इक्वालिटी (समानता) पर आधारित है। इस आधार पर केरल के तीन ई को साक्षरता दर, परिवारों की नियमित आय और आत्मविश्वासी महिलाएं में परिभाषित किया जा सकता है। लेकिन शेष भारत, खासकर उत्तरी भारत, ने केरल से कुछ नहीं सीखा।

संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में कहा है कि यदि वत्र्तमान गति के अनुसार भारत की जनसंख्या बढ़ती रही तो 2101 तक भारत की आबादी 2 बिलियन हो जाएगी। भारत की जनसंख्या नियंत्रण प्रणाली की यह असफलता की कहानी है। विशेषज्ञों ने इसके लिए नसबंदी जैसे कार्यक्रम को दोषी माना है, जो 1960 के अंत में शुरू हुआ था। उनके अनुसार, जनसंख्या जबरदस्ती नियंत्रित नहीं की जा सकती, बल्कि उसे आर्थिक विकास, सबके लिए शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से हासिल किया जा सकता है। आज हर कोई जनसंख्या नियंत्रण की गाड़ी में सवार होकर खुश है। लेकिन, इसमें से कुछ ही लोग उस शरीर को पहचान पाते हैं, जो जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कत्ल किए गए होते हैं। बिलासपुर की घटना से सरकार जरूर कुछ सीख लेगी, ऐसी उम्मीद है।

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