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पाक की नापाक कोशिश

पाक की नापाक कोशिश

By नीलाभ कृष्ण

4 से 6 अक्टूबर के बीच पाकिस्तान ने भारी गोलाबारी कर युद्धविराम  उल्लंघन किया। पाकिस्तान ने 25 बॉर्डर आउट पोस्ट्स पर बेसबब भारी गोलाबारी की, जिससे अरनिया गांव को जान-माल की भारी क्षति हुई।  इस गोलाबारी में 5 लोग मारे गए और 34 घायल हो गए। विश्लेषकों की माने तो 2003 में हुए युद्धविराम के बाद यह अब तक की सबसे भारी  गोलाबारी है।

संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का राग अलापने पर मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान एक अक्टूबर से लगातार युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा है। पाकिस्तान रेंजर्स और सेना की तरफ से सीमा सुरक्षाबल की चौकियों और गांवों को निशाना बनाकर गोलीबारी की जा रही है, जिसमें अब तक आठ लोगों की मौत हो चुकी है और 80-90 लोग घायल हो गए हैं। पाकिस्तान 192 कि.मी. लंबी भारत की सीमा पर गोलीबारी कर रहा है। पाकिस्तान मोर्टार भी दाग रहा है जिससे भारतीय नागरिकों के घरों को नुकसान पहुंच रहा है। बीएसएफ के जवानों समेत बच्चों और महिलाओं की जानें जा रही हैं और मवेशी भी मारे जा रहे हैं।

हालांकि पाकिस्तान की इस हरकत का जवाब देने के लिए भारत सरकार की तरफ से सेना को खुली छूट मिल चुकी है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे हुए गांवों में दहशत का आलम है। गांवों से अभी तक लगभग 30,000 नागरिकों को विस्थापित करके सुरक्षित कैपों में पहुंचाया गया है।

अपनी आजादी के 67 साल बीत जाने के बावजूद भारत और पाकिस्तान को आपसी सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने में आधी शताब्दी से ज्यादा वक्त लग गया। इन दोनों देशो में आपसी विश्वास बहाल करने के कार्यक्रमों की शुरुआत 1997 से हुई। मई 1997 में मालदीव की राजधानी माले में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दर कुमार गुजराल और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता प्रक्रिया की अवधारणा के बीज बोये थे। तब से लेकर भारत और पाकिस्तान तीन बार आपसी संबंधों में शांति बहाल करने की कोशिश कर चुके हैं। लाहौर वार्ता के साथ पहली बार दोनों देशों ने समग्र वार्ता प्रक्रिया की शुरुआत की थी। 1999 में हुए कारगिल युद्ध की वजह से यह वार्ता विफल हो गयी थी। वैसे 1998 अक्टूबर और नवंबर में हुयी दो सत्रों की बैठक का भी कोई उल्लेखनीय नतीजा नहीं निकला। कारगिल की लड़ाई के बाद तो किसी तरह की बातचीत की गुंजाईश ही नहीं बची थी। शांति बहाल करने की कोशिशो को एक धक्का और लगा जब पाकिस्तान में नवाज शरीफ की निर्वाचित सरकार का तख्तापलट कर दिया गया। पाकिस्तान के शासन की बागडोर सेना के जनरल परवेज मुशर्रफ के हाथो में चली गयी। जनरल परवेज मुशर्रफ जो की कारगिल की लड़ाई के सूत्रधार थे, लाहौर वार्ता के सख्त खिलाफ थे। सन 2001 में परवेज मुशर्रफ और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुयी आगरा शिखर सम्मलेन का भी कोई नतीजा निकल सका था। उसी साल 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले, जिसमे पांच सुरक्षाकर्मियों सहित करीब दर्जन भर लोगों की मौत हो गयी थी, ने दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया था। दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गयी जब भारत ने सामरिक शक्ति सीमा पर जमा करना शुरू कर दिया और ऐसा लगने लगा था कि दोनों देशों के बीच अब युद्ध हो कर रहेगा। लेकिन अक्टूबर तक आते आते यह तनाव घटने लगा और दोनों देश एक बार फिर के प्रयासों की ओर ध्यान देने लगे। तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर जफरउल्लाह खान जमाली ने मौके का फायदा उठाते हुए अप्रैल 2003 में वाजपेयी को फोन कर के शांति बहाली के प्रयासों को बल दिया।

अप्रैल 2003 से भारत ने पाकिस्तान के साथ विश्वास बहाल करने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू की। जुलाई 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच यातायात और कूटनीतिक संबंध फिर से बहाल हुए और नवंबर 2003 में दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम की घोषणा कर दी। तब से लेकर 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों तक भारत और पाकिस्तान के बीच चार दफा शांति वार्ताएं  हो चुकी हैं।

युद्धविराम उल्लंघन और भारत में सत्ता परिवर्तन
मई 2014 में भारत में  देश की सत्ता की बागडोर नरेंद्र मोदी के हाथों में आई।  मोदी, जो की पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई के हामी थे, ने सबको आश्चर्यचकित करते हुए अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को सार्क देशों के प्रमुख के साथ-साथ आने का न्योता भेज डाला। मोदी का नवाज को न्योता भेजना, नवाज का उसे स्वीकार करना, और दोनों नेताओं के बीच के रिश्तों की गर्माहट ने लोगों के बीच आशाएं जगा दी थी की मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों, जिनमें पाकिस्तान के मुस्लिम आतंकवादियों का हाथ था, के बाद से दोनों देशों के बीच जमी बर्फ के पिघलने का वक्त आ गया है। लोगों की इस उम्मीद को उस समय गहरा धक्का लगा जब पाकिस्तान के हाई कमिश्नर द्वारा कश्मीर के अलगाववादियों को नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर चर्चा  के लिए बुलाये जाने पर भारत ने सचिव स्तरीय वार्ता रद्द कर दी है। इस वार्ता के रद्द होने के बाद से ही पाकिस्तान ने राजौरी-पूंछ सेक्टर नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम का उल्लंघन करना शुरू कर दिया। साथ ही जम्मू से लगती अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर भी उसने भारी गोलाबारी शुरू कर दिया। 4 से 6 अक्टूबर के बीच पाकिस्तान ने भारी गोलाबारी कर युद्धविराम उल्लंघन किया। पाकिस्तान ने 25 बॉर्डर आउट पोस्ट्स पर बेसबब भारी गोलाबारी की, जिससे अरनिया गांव को जान-माल की भारी क्षति हुई।  इस गोलाबारी में 5 लोग मारे गए और 34 घायल हो गए। विश्लेषकों की माने तो 2003 में हुए युद्धविराम के बाद यह अब तक की सबसे भारी  गोलाबारी है। इन विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यह गोलाबारी पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत के नरेंद्र मोदी प्रशासन की परीक्षा लेने और आतंकवादियों को कश्मीर में धकेलने की एक कोशिश है। साथ ही यह उल्लंघन जम्मू-कश्मीर मुद्दे को वैश्विक स्तर  पर उठाने की भी एक कोशिश प्रतीत होती है, जैसा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल असेंबली के अपने भाषण में कर चुके हैं। यह युद्धविराम उल्लंघन इसलिए भी किया जा रहा है ताकि भारत इसका प्रतिकार करे और पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र घोषित करवाने के साजिश में सफल हो सके।

पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अपनी जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटा कर इस मुद्दे पर केंद्रित करना चाहता है। विश्लेषकों का यह भी मानना है की पाकिस्तानी सेना और आईएसआई पाकिस्तान में अपनी साख बचाये रखने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अगर उन्होंने इस तरह की हरकतें करनी अगर बंद कर दी तो पाकिस्तान की जनता के बीच जो पाकिस्तानी सेना और आईएसआई  की साख और खौफ है उसके खत्म हो जाने का खतरा हो सकता है। साथ ही यह सेना द्वारा वहां की प्रजातान्त्रिक सरकार के कदम डिगाने की कोशिश भी हो सकती है। अल कायदा द्वारा भारत में अपनी आतंकवादी शाखाएं खोलने की घोषणा और पाकिस्तानी जिहादी तत्वों और पाकिस्तानी तालिबानी समूहों द्वारा आईएसआईएस को समर्थन देने की घोषणा ने पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे को उछालने का एक बड़ा मौका दे दिया है।

पिछली सरकारों के बनिस्पत मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपना रुख कड़ा कर लिया है और पाकिस्तान को चेताया है की वह अकारण गोलाबारी बंद करे। भारत के रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने पाकिस्तान को 2003 के युद्धविराम समझौते के उल्लंघन करने पर गंभीर परिणामों के लिए तैयार रहने को कहा है। अरुण जेटली कहा कि ‘अगर पाकिस्तान संघर्ष विराम का उल्लंघन जारी रखता है, तो वह इस ‘दुस्साहस’ के कारण होने वाले ‘दर्द को महसूस’ करेगा और साथ ही कहा कि पहले देश हाथ में सिर्फ ‘ढाल’ होती थी, लेकिन अब उसके साथ ‘तलवार’ भी होगी। हमारी परंपरागत क्षमता उनकी तुलना में काफी ज्यादा है और इसलिए अगर वे यह जारी रखते हैं तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। वे इस प्रकार के दुस्साहस के कारण दर्द भी महसूस करेंगे।’

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