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कश्मीर में आइएसआइएस के झंडेनए खतरे का संकेत

कश्मीर में आइएसआइएस के झंडेनए खतरे का संकेत

By दानवीर सिंह

हमें आइएसआइएस और अल कायदा के बीच के संबंधों को जानने-समझने और उनके राजनैतिक इस्लाम की अवधारणा में कश्मीर के महत्व को पहचानने की दरकार है। यह भी समझने की जरूरत है कि वे अपने मकसद के बारे में बेकसूर मुसलमानों को कैसे हदीस की अपनी खास व्याख्या से राजी करते हैं। इससे हम समझ पाएंगे कि कश्मीर घाटी में आइएसआइएस के झंडे लहराना सिर्फ मुट्ठी भर मूर्ख लोगों की करतूत नहीं थी, जैसा कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री का दावा है।

टीवी के परदे पर 14 अक्टूबर को श्रीनगर में पत्थरबाजी का नजारा देख कर देश भर के लोग दंग रह गए। अमूमन घाटी में ऐसा नजारा जुम्मे (शुक्रवार) की नमाज के बाद दिखता रहा है, लेकिन यह तो मंगलवार का ही दिन था। फर्क सिर्फ इतना ही नहीं था, पत्थरबाज पाकिस्तानी झंडे के साथ इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया (आइएसआइएस)के झंडे भी लहरा रहे थे। हालांकि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में आइएसआइएस तत्वों की मौजूदगी से इनकार किया। उन्होंने कहा कि घाटी में आइएसआइएस के झंडे लहराने की वारदात बस कुछ ‘मूर्खों’ की हरकत थी जो ‘दुर्भाग्य से’ मीडिया में छा गई।

आश्चर्य है कि क्या इसे इतने हल्के से लिया जा सकता है? लेकिन सच्चाई यही है कि हमारे लोकतंत्र में तरह-तरह के राजनैतिक हितों की चिंता में सुरक्षा के मसलों के प्रति उदासीनता और लापरवाही बरती जाती है। इसलिए 14 अक्टूबर की घटना को अपवाद मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे इस्लामिक स्टेट और अल कायदा की विचारधारा के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए।

यह महज संयोग नहीं है कि अल कायदा के भगोड़ा कमांडर अयमान अल-जवाहिरी ने इस घटना के महीने भर पहले सितंबर में भारतीय उपमहाद्वीप में जेहाद छेडऩे के लिए आतंकी गुट अल कायदा की एक नई शाखा खोलने का ऐलान किया था। उसने कहा था कि नई शाखा यह एहसास दिलाएगी कि ‘हिंदुस्तान के मुस्लिम भाइयों को हम भूले नहीं हैं।’ उसने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप में अल कायदा ‘भारत में ब्रिटेन की खींची सभी सीमाओं को मिटा देगा।’ उसने आह्वान किया कि क्षेत्international air freight companiesмоисея гора