ब्रेकिंग न्यूज़ 

इस्लामिक स्टेट की आहट उमर के लिए खतरे की घंटी

इस्लामिक स्टेट की आहट उमर के लिए खतरे की घंटी

By आर.एस.एन. सिंह

किसी अन्य जिहादी प्रोपगंडे ने उतना समर्थन हासिल नहीं किया जितना कि आईएस (इस्लामिक स्टेट) के प्रोपगंडे ने किया। यहां तक कि पश्चिमी देशों से भी उसे अप्रत्याशित सहयोग मिल रहा है।ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क सहित कई देशों के युवा, जिनमें लड़कियां भी शामिल हैं, इस्लामिक स्टेट में शामिल हो रहे हैं।

श्रीनगर की जामा मस्जिद के सामने 10 अक्टूबर को चेहरे पर नकाब पहने हुए एक व्यक्ति ने आईएस का झंडा लहराया। यह घटना शुक्रवार की नमाज के बाद हुई। ऐसी ही एक घटना 6 अक्टूबर को हुई थी, जिसमें ईद की नमाज के बाद कुछ युवाओं ने इस्लामिक स्टेट का काला झंडा लहराया था। इसके तीन महिने पहले 27 जुलाई को कुछ युवाओं द्वारा उसी झंडे को शुक्रवार की नमाज के बाद लहराते हुए देखा गया था।

कश्मीर में शुक्रवार की नमाज या धार्मिक समारोहों के दौरान आईएस के झंडे के प्रदर्शन के बीच गहरा नाता है जो स्पष्ट रूप से दिखता है। पांच महिनों में कम से कम तीन बार हुई इस तरह घटनाएं की या कश्मीर में इस्लामिक खलीफा के प्रति एकजुटता के दिखावे के बावजूद जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि राज्य में इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी की बात मीडिया का दुष्प्रचार है।  गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ने  इस आशय की टिप्पणी केन्द्रीय गृहमंत्री के कार्यालय से बाहर निकल कर की थी।

राज्य में आई अब तक की सबसे भीषण बाढ़ से उबरने की कोशिशों के दौरान घटी इन दो घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को बेहद सतर्क हो जाना चाहिए। बाढ़ के दौरान भारतीय सेना ने प्रभावित लोगों को बचाने, राहत और उनके पुनर्वास के लिए अपनी और अपने परिवार की जान दावं पर लगा दी। बाढ़ पीडि़तों में आम लोग ही नहीं अलगाववादी नेता और उनके परिजन भी शामिल थे। वही अलगाववादी नेताओं ने सुरक्षित बाहर निकलने के बाद राहत सामग्रियों पर कब्जा करने की कोशिश की।

29-11-2014

जम्मू और कश्मीर के युवा मुख्यमंत्री अब्दुल्ला को आम लोगों के बीच इन अराजक तत्वों के घटिया और अमानवीय व्यवहार से निश्चित रूप से चिंतित होना चाहिए। ऐसे तत्व सिर्फ घाटी तक ही सीमित हैं। कोई बाढ़ या केन्द्रीय फैसला इन तत्वों को धार्मिक कट्टरपन के रास्ते से अलग नहीं कर  सकता। यह कैसी पैशाचिक धारा है?

पूरा देश बाढ़ से प्रभावित कश्मीर के साथ खड़ा था। राहत सामग्री का आगमन होता रहा, जो अभी भी जारी है। केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीरियों की प्रतिव्यक्ति खर्च को हमेशा ऊंचा रखा गया। कश्मीर में इन तत्वों द्वारा विकास को हमेशा गलत तर्क देकर झूठा ठहराया गया। यहां तक कि बाढ़ के बाद इन अलगाववादी तत्वों द्वारा उस पाकिस्तान के लिए हंगामा किया जाना जारी रखा गया, जिसे  मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाया गया था। मुसलमानों के लिए बना यह मुल्क अहमदिया और शिया समुदाय के लिए नर्क का द्वार साबित हुआ। हिंदुओं और ईसाईयों के खिलाफ बर्बरता के अलावा शिया और अहमदिया के खिलाफ होने वाली हिंसा ने प्रशासन के धर्मनिरपेक्ष होने के पाकिस्तान के दावे की हवा निकाल दी है।

तो क्या एक असफल मुल्क में शामिल होने की अपनी चाहत में अलगाववादी तत्व इस्लामिक स्टेट को आमंत्रित कर शियाओं का शुद्धिकरण कराना चाहते हैं? लगता तो ऐसा ही है, क्योंकि जिस इस्लामिक स्टेट का वे समर्थन कर रहे हैं वह शिया विरोधी आतंक के लिए जाना जाता है। वास्तव में इस्लामिक स्टेट सुन्नियों के वर्चस्व की बात कहता है। वे जिस इस्लामिक खलीफा की बात कर रहे हैं उसमें शियाओं की भूमिका सिर्फ गुलाम की है।

इस्लामिक स्टेट का प्रवक्ता अबु मोहम्मद अल-मदनानी ने नजफ और कर्बला को नष्ट कर इराक को शियाओं के लिए जिंदा नर्क बनाने की बात कही थी। असल में इस्लामिक स्टेट का दर्शन पश्चिम विरोधी या इस्लाम का विस्तार नहीं बल्कि कट्टरपंथी सुन्नी विचारधारा का विस्तार करना है।

किसी अन्य जिहादी प्रोपगंडा ने उतना समर्थन हासिल नहीं किया जितना कि आईएस (इस्लामिक स्टेट) के प्रोपगंडा ने किया। यहां तक कि पश्चिमी देशों से भी उन्हें अप्रत्याशित सहयोग मिल रहा है। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क सहित कई देशों के युवा, जिनमें लड़कियां भी शामिल हैं, इस्लामिक स्टेट में शामिल हो रहे हैं। भारत से भी युवाओं के इस्लामिक स्टेट में शामिल होने की खबरें हैं। महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले कुछ युवा सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट की तरफ से जिहाद के नाम पर नरसंहार कर रहे हैं। ऐसी भी एक खबर है कि हैदराबाद के कुछ युवा बांग्लादेश के रास्ते सीरिया में जाकर जिहाद करने के लिए पश्चिम बंगाल पहुंच गए थे। तो क्या बर्धवान बम धमाके की घटना, जहां बम बनाने के दौरान विस्फोट हुआ था, का इस्लामिक स्टेट से कोई संबंध है? यह भी संभावना है कि इस षडयंत्र और नेटवर्क के अवशेषों को मिटाने के लिए अपराधियों और राज्य सरकार के कुछ कपटी अधिकारियों द्वारा जल्दीबाजी में की गई कार्यवाही हो ताकि कोई कार्रवाई न हो। इसके पुख्ता सबूत हैं कि बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार द्वारा आतंकवादियों को ध्वस्त करने करने वाली कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल उनके लिए सुरक्षित पनाहगाह बना है। बांग्लादेश से भागकर पश्चिम बंगाल में आए कट्टरपंथी संगठनों एवं जिहादी राजनीतिक तौर उपयोगी हो गए। तमिलनाडु के कुछ युवाओं ने इस्लामिक स्टेट के समर्थन वाले टी-शर्ट पहनकर फोटो खिंचवाई थी। केरल की राजधानी तिरूअनंतपुरम के एक आयुर्वेदिक कॉलेज के दीवार पर 31 अक्टूबर को इस्लामिक स्टेट के समर्थन में लगाए हुए पोस्टर मिले।

कश्मीर का इस्लामीकरण

प्रकाश नंदा

29-11-2014

वर्षों पहले बांग्लोदशी विद्वान अबु ताहिर सलाहुद्दीन अहमद द्वारा कश्मीर के बारे में कही गई प्रवृत्तियों – ‘इंडियननेस’, ‘कश्मीरीनेस’ और ‘मुस्लिमनेस’ का कश्मीर गवाह रहा है। इंडियननेस संघीय बलों द्वारा प्रचारित है, चाहे वह केन्द्र सरकार हो या कांग्रेस और भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टियां। जो भी हो, राज्य में संघर्ष दो पक्षों के बीच है, एक जो कश्मीरीनेस में विश्वास रखते हैं और दूसरे वे जो मुस्लिमनेस के प्रति निष्ठावान हैं। कश्मीरीनेस, कश्मीरियत की एक शाखा है, जो इंडियनेस के साथ सह-अस्तित्व के साथ समग्र पहचान की बात करता है, सभी वर्गों को एक साथ जोड़ता है और किसी वर्ग को नुकसान नहीं पहुंचाता है। इसमें आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि मुस्लिम बहुसंख्यक होने के बावजूद घाटी में हाल तक गोमांस का प्रयोग लगभग अस्तित्व में नहीं था।

हालांकि कुछ विद्वान इस बात की ओर इशारा करते हैं कि घाटी के हिंदू (खासकर कश्मीरी पंडित) और मुसलमानों के बीच कश्मीरियत की अवधारणा की व्याख्या हमेशा से अलग-अलग रही है। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं है कि इस अवधारणा ने सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया। इसलिए, अधिसंख्य मुसलमानों को हिंदुओं या बौद्धों से कोई समस्या नहीं थी। कश्मीरियत की सफलता का सबसे प्रमुख कारक शायद यह था कि अधिसंख्यक कश्मीरी मुस्लिम सुफीवाद या कह लें ऋषि परंपरा में विश्वास करते थे, जिसमें संतों और धर्मस्थलों की पूजा की परंपरा रही है। इसमें इस सत्य ने भी मदद की कि महाद्वीप के अधिसंख्य मुस्लिम हिंदू धर्म से धर्मांतरित थे।

इसके विपरीत, मुस्लिमनेस घाटी में हमेशा विशेष अवधारणाओं की वकालत करता है। वहाबी और अहल-ए-हदीस संप्रदाय द्वारा प्रसारित संस्थाएं कुरान और हदीस पर ज्यादा विश्वास करती हैं और संत या कब्रों की पूजा का सख्ती से विरोध करती हैं। इस तरह की परंपरा या संस्था कश्मीर में हमेशा से अल्पसंख्यक रही हैं, लेकिन दिखती हमेशा रही हैं। लेकिन ऐसे तत्व सिर्फ मुस्लिम कॉन्फ्रेंस और कश्मीर जमात जैसे संगठनों के पीछे थे।

यह कहने की जरूरत नहीं कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे तथाकथित उदारवादी अलगाववादी सहित सभी अलगाववादी और आतंकवादी इस्लामनेस जैसी संस्थाओं से संबंध रखते हैं। उनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। तुष्टीकरण की कोई भी सीमा उन्हें भारत से जोड़े रखने में नाकाम रही है। वे ‘कश्मीर सिर्फ मुसलमानों के लिए’ के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं और उनका प्रमुख तर्क है कि वे हिंदू बहुल भारत के साथ नहीं रह सकते।

आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे तत्व कश्मीर में 1979 में हुई इरानी क्रांति के बाद सक्रिय हुए। यह वह समय था जब ‘कश्मीर की आजादी’ और ‘इस्लामिक क्रांति’ के शब्द सुनाई दिए। ये तत्व राजनीतिक तौर पर भी मुखर हुए और छोटे-छोटे राजनीतिक संगठन बना लिए। सितंबर 1985 में ऐसे 12 संगठनों ने साथ मिलकर मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट की स्थापना की। जल्दी ही मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट ने दावा किया कि वो राज्य में फारूख अब्दुल्ला के नेशनल कॉफ्रेन्स का विकल्प उपलब्ध कराएगी, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी हितों को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हाथों बेच दिया था।

उमर अब्दुल्ला ने भी इन आरोपों का जवाब अपना मुस्लिमनेस दिखाते हुए ही दिया। उमर अब्दुल्ला सरकार ने राज्य के लगभग 2500 गांवों के नाम बदलकर उन्हें इस्लामिक नाम दे दिया। उदाहरण के लिए, अनंतनाग के सबसे बड़ा शहर को इस्लामाबाद नाम दे दिया गया। शेख ने वैसा ही सांप्रदायिक भाषण दिया, जैसा कि 1930 में मस्जिदों में दिए जाते थे। अपनी आत्मकथा में उन्होंने कश्मीरी पंडितों को भारत सरकार का मुखबिर कहा है।

तब से राजनीतिक इस्लाम ने घाटी में अपनी जड़ें गहरी जमा ली है। पाकिस्तानी सहयोग और समर्थन ने इस उद्देश्य को मजबूती दी है। इसमें सऊदी अरब की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस्लाम के नाम पर सऊदी अरब घाटी के मदरसों और अन्य इस्लामिक संस्थाओं को उदारतापूर्वक वित्तीय मदद पहुंचाता रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सऊदी अरब के कई मजहबी नेताओं ने 1979 में श्रीनगर में इस्लामिक कॉन्फ्रेंस किया था और उसके बाद प्राय: यहां आते रहे हैं। उन्होंने 1980 में झेलम घाटी मेडिकल कॉलेज को स्थापित किया, जिसके जरिए बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा कश्मीर को भेजते रहे।

लेकिन घाटी में राजनीतिक इस्लाम की सबसे ज्यादा मदद किसी ने की तो वह है केन्द्र और राज्य सरकार की अलगाववादियों द्वारा की गई तुष्टीकरण। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह तक को यह गलत विश्वास रहा कि हुर्रियत और मानवाधिकार संगठनों की मांगों को मानने से स्थिति में सुधार आएगा। हालांकि तुष्टीकरण मुस्लिमनेस के सामने कभी काम नहीं करेगा, बल्कि उन्हें ‘कश्मीर मुसलमानों के लिए’ की मांग को और मजबूत करेगा। कुछ साल पहले अमरनाथ यात्रा विवाद के दौरान क्या हमने उमर अब्दुल्ला और मुफ्ती महबूबा को यह कहते हुए नहीं सुना था कि कश्मीर अपने मुस्लिम चरित्र के साथ कभी समझौता नहीं करेगा।

29-11-2014

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामिक स्टेट की भावनात्मक अपील या अन्य आतंकवादी संगठनों के विपरीत लोगों को ऑनलाईन से आकर्षित करने की जो क्षमता इस्लामिक स्टेट में है, इसकी मुख्य वजह शिया विरोधी आचरण में निहित है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिया विरोधी या सुन्नीवाद ने ‘संपूर्ण इस्लीकरण’ पर फतह हासिल कर ली है। ऐसा निष्कर्ष इसलिए निकाला जा सकता है, क्योंकि शिया-सुन्नी विभाजन सदियों से गहरा और बेहद चौड़ा है।

उमर अब्दुल्ला को इस बात को लेकर चिंतित होना चाहिए कि इस्लामिक स्टेट की कट्टर सुन्नीवाद विचारधारा शिया-सुन्नी के बीच विभाजनरेखा को न सिर्फ घाटी में और चौड़ा करेगा, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी ये खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ाएगी। टाईम्स ऑफ इंडिया (2 अगस्त 2014) ने घाटी में शियाओं की बेचैनी को रेखांकित करते हुए एक शिया धर्मावलंबी मिर्जा हुसैन को उद्धृत करते हुए लिखा है – ”हमें डर है कि इससे हमारी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि इस्लामिक स्टेट के नेता शियाओं के नरसंहार के अलावा हमारे धार्मिक स्थलों और स्मारकों को निशाना बना रहे हैं।’’

इस्लामिक स्टेट की विचारधारा की गूंज देश के अन्य भागों में भी महसूस की जा रही है। इस साल जून में इराक के मुख्य शिया धर्मगुरू ग्रांड अयातुल्लाह अली अल-सिस्तानी की इराक के शिया धर्मस्थलों और स्मारकों को बचाने के लिए हथियार उठाने की अपील ने भारतीय शियाओं को उद्वेलित कर दिया। इस्लामिक स्टेट के शिया विरोधी रूख के कारण लखनऊ के पुराने हिस्से में शिया और सुन्नी के बीच दंगे हो गए। भारत और पाकिस्तान के जिहादियों के बीच टेप की गई बातचीत (इंडियन एक्सप्रेस, 13 अक्टूबर 2014) से भी उमर अब्दुल्ला को चिंतित होना चाहिए। इस बातचीत से यह साफ हो गया कि अल-कायदा, तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद और इस्लामिक स्टेट जैसे विभिन्न जिहादी गुटों में आपसी प्रतिस्पर्धा तो है, लेकिन वह स्पर्धा विरोधात्मक नहीं है। इससे यह साफ होता है कि जिहादी अपनी प्रवृत्ति, झुकाव और सुविधा के अनुसार विभिन्न जिहादी संगठनों में अपना करियर बना रहे हैं।

यूनाईटेड जिहाद कौंसिल के अध्यक्ष सैयद सलाहुद्दीन ने कश्मीर की आजादी के लिए अल कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे अन्य अंतर्राष्ट्रीय जिहादी संगठनों से सहयोग मांगा है। पाकिस्तान स्थित सिपाही-ए-साबा, लश्कर-ए-झांग्वी और तहरीक-ए-खिलाफत जैसे तालिबान से अलग हुए जिहादी संगठनों ने इस्लामिक स्टेट को अपना सहयोग देने की खुलेआम घोषणा की है।

तो श्रीमान अब्दुल्ला, क्या अलगाववादियों के छल के लिए इस्लामिक स्टेट एक सुविधाजनक संगठन है? श्रीमान अब्दुल्ला जी आपको चिंता करनी चाहिए कि बगदादी द्वारा जारी इस्लामिक खलीफा के नक्शे में कश्मीर भी शामिल है। मुख्यमंत्री और घाटी के अन्य राजनेताओं को निश्चित रूप से चिंतित होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो माना जाएगा कि बहुत से राजनीतिक दलों  में देशद्रोही और अलगाववादी शामिल हैं। ‘सॉफ्ट सेप्रेटिस्ट’ नाम की कोई अवधारणा नहीं होती।

владимир мунтян семьялучшие игровые ноутбуки 2013 года

Leave a Reply

Your email address will not be published.