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मतदान का महत्व जागरूक मतदाता

मतदान का महत्व जागरूक मतदाता

17वीं लोकसभा के लिए 7 चरणों में निर्वाचन सम्पन्न कराये गये। इस बार लगभग 90 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। जबकि सम्पूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया में लगभग 67 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसका सीधा सा अभिप्राय यह है कि देश के 33 प्रतिशत मतदाताओं ने भारतीय लोकतंत्र के इस महापर्व में भाग ही नहीं लिया। हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि मतदान से दूर रहने वाले ये सभी लोग क्या वास्तव में अपने जीवन की व्यक्तिगत उलझनों में इतना अधिक फंसे हुए थे कि उनके लिए मतदान करना सम्भव ही नहीं था। वास्तव में मतदान न करने वाले लोग देश में एक अच्छी व्यवस्थित सरकार चुनने के इस अवसर के प्रति उदासीन कहे जा सकते हैं।

मतदान के घटते प्रतिशत को देखकर शोधकर्ताओं ने एक और तथ्य प्रस्तुत किया है कि पंचायत चुनावों में मतदान प्रतिशत सबसे अधिक होता है, विधानसभा स्तर के चुनावों में मतदान प्रतिशत कुछ कम हो जाता है और लोकसभा स्तर के चुनावों में तो यह प्रतिशत सबसे कम देखा जाता है। पंचायत स्तर के निर्वाचनों में उम्मीदवारों और मतदाताओं के बीच दूरी नहीं होती, जबकि लोकसभा स्तर के चुनावों में उम्मीदवार और मतदाताओं के बीच व्यक्तिगत सम्पर्क की दूरी कम मतदान का कारण बनती है। इसलिए सफलता की ऊँचाईयाँ छूने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को अपने राजनीतिक कार्यों के माध्यम से मतदाताओं के साथ अधिक से अधिक व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाने चाहिए। जिस उम्मीदवार का सम्बन्ध बूथ स्तर के मतदाता तक होगा उस निर्वाचन में मतदान प्रतिशत भी बढ़ेगा और ऐसे उम्मीदवारों को सरल सफलता भी प्राप्त होगी।

समय-समय पर अनेकों ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जब परिवार में तरह-तरह के सुखों-दु:खों की व्यस्तताओं के बावजूद जागरूक मतदाता अपने आपको मतदान से दूर नहीं रखते। कई बार यह भी सुनने में आया कि निर्वाचन के दिन विवाह के बावजूद दुल्हा और दुल्हन ने मतदान अवश्य किया। एक घटना में तो रात्रि में विवाह होने के बाद प्रात:काल जब डोली की विदाई का समय आया तो दुल्हे ने विदाई को कुछ घण्टे विलम्ब करने का आग्रह किया जिससे दुल्हन अपने क्षेत्र में मतदान करने के बाद ही ससुराल के लिए प्रस्थान करे।

इस बार 19 मई, 2019 को जब पंजाब के निर्वाचन निर्धारित थे, एक दिन पूर्व 18 मई को होशियारपुर जिले के मेहंगरोवाल गाँव में एक बच्चे की दुर्घटना में मृत्यु हो गई। अगले दिन मृत शरीर का संस्कार किया जाना था। इतनी बड़ी विपदा की घड़ी में इस परिवार के सदस्यों ने अपने मतदान जैसे महत्त्वपूर्ण अधिकार और कत्र्तव्य को व्यर्थ गंवाना उचित नहीं समझा। बच्चे के अन्तिम संस्कार से पूर्व परिवार के सदस्यों ने मिलकर मतदान किया। जब मुझे इस घटना की जानकारी प्राप्त हुई तो मैं दिवंगत बच्चे की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना तथा शोकग्रस्त परिवार को संवेदना व्यक्त करने के लिए उनके परिवार में गया। जब मुझे इस बात का पता चला कि संस्कार से पूर्व इस परिवार ने मतदान का बहिष्कार नहीं किया अपितु दु:ख की इस घड़ी में भी अपने राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन कर दिखाया है। वास्तव में इस परिवार के द्वारा किया गया यह कार्य लोकतंत्र के एक सच्चे प्रहरी का कार्य है। जो लोग बिना कारण ही निर्वाचन प्रक्रिया जैसे राष्ट्रीय कार्यों के प्रति उदासीन रहते हैं उनके लिए यह बहुत बड़ी प्रेरणा की घटना बन सकती है। मैंने इस परिवार के प्रति अपना पूरा सम्मान व्यक्त करते हुए भारत के निर्वाचन आयोग तथा पंजाब निर्वाचन आयोग और जिले के कलेक्टर को पत्र लिखकर ऐसे कार्यों को ‘जागरूक मतदाता’ के रूप में मान्यता देने की मांग की है। ऐसे जागरूक मतदाताओं को सम्मान प्रदान करके हम उन उदासीन मतदाताओं के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा पैदा कर सकते हैं जो अपने जीवन की छोटी-छोटी व्यस्तताओं और यहां तक कि आलस्य के कारण अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते। मैंने स्वयं गाँव वालों की उपस्थिति में इस पति-पत्नी को सम्मानित किया।

भारत के निर्वाचन आयोग में भारतीय मतदाताओं को अपने मताधिकार के प्रति सचेत करने के लिए कई प्रकार के विशेष कार्यक्रम भी चला रखे हैं। सभी सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं और औद्योगिक संस्थाओं को अपने स्टॉफ के बीच निर्वाचन में भाग लेने की चर्चाएँ की जाती हैं। दिल्ली से संचालित ‘भारतीय मतदाता संगठन’ तो विशेष रूप से मतदाता जागरूकता के अनेकों कार्य कर रहा है। इस गैर-सरकारी संस्था के द्वारा दिल्ली ही नहीं अपितु देश के कई अन्य हिस्सों में भी ‘मतदाता मित्र’ नाम से स्वयं सेवक पंजीकृत किये गये हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करते हैं। प्रतिवर्ष यह संस्था अनेकों ऐसे मतदाता मित्रों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित और प्रोत्साहित करती है।

भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने-अपने दायरे में मतदाता जागरूकता पर चर्चा करते रहना चाहिए। गत वर्ष गुजरात के एक ऐसे मिठाई निर्माता का नाम सामने आया था जिसने खोये के पेड़े बनाते समय उन पर मतदान करो अंकित करवाया। मतदाता जागरूकता के लिए कई विद्यालय अपने छात्र-छात्राओं को जुलूस के रूप में नजदीक के क्षेत्रों में घुमाते हैं। निर्वाचन आयोग को सरकारी और गैर-सरकारी सभी स्कूलों और कॉलेजों के प्रबन्धकों को इस कार्य के लिए प्रेरित करना चाहिए कि वे छात्र-छात्राओं के माध्यम से ऐसे जागरूकता अभियान अवश्य संचालित करें। यदि मतदान 90 प्रतिशत से अधिक होने लगे तो इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनेकों सुधार देखने को प्राप्त होंगे। जब अधिक संख्या में लोग मतदान करेंगे तो उस अवस्था में यह स्वाभाविक है कि जागरूक मतदाता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के प्रचार से प्रभावित न होकर स्वयं अपनी मानसिकता का निर्माण करने में सक्षम होंगे और बहुत बड़ी संख्या में किया गया मतदान यह सिद्ध करेगा कि निर्वाचन परिणाम भारत के जागरूक मतदाताओं की अन्तर चेतना से किये गये निर्वाचन की आवाज है। जब मतदान 90 प्रतिशत से अधिक की अवस्था तक पहुँच जायेगा तो इसका असली लाभ लोकतंत्र की प्रारम्भिक सीढिय़ों अर्थात् पंचायतों, नगर-निगमों और विधानसभाओं के स्तर पर दिखाई देगा। क्योंकि इन स्तरों पर स्थानीय मुद्दे और राजनेताओं का व्यक्तिगत सम्पर्क अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। मतदान प्रतिशत बढऩे से राजनेताओं के दिमाग में भी एक हलचल पैदा होगी कि इतनी बड़ी संख्या में जागरूक हुए मतदाता उसके कार्यों और विचारों को भली प्रकार परखने की भी क्षमता रखते हैं। भारी संख्या में मतदान निर्वाचन प्रक्रिया के दौर में शराब, नकद या अन्य वस्तुओं के वितरण जैसी बुराईयों को भी निष्प्रभावी करने के योग्य बन सकेगा। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता जागरूकता अत्यन्त आवश्यक है।

 

अविनाश राय खन्ना

(लेखक उपसभापति, भारतीय रेड क्रास सोसायटी, हैं)

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