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”बिना समर्पण और कठिन परिश्रम के सफलता हासिल नहीं होती’’ – अलका याज्ञनिक

”बिना समर्पण और कठिन परिश्रम के सफलता हासिल नहीं होती’’ – अलका याज्ञनिक

अलका याज्ञनिक उन गायकों में से एक हैं, जिनकी सुरीली आवाज ने गायन क्षेत्र को एक नई ऊंचाई दी है। दर्जन भर से अधिक भाषाओं में अपनी गायकी का लोहा मनवाकर अलका ने गायन के क्षेत्र में नई कहानी लिखी है।लता मंगेशकर से प्रेरित अलका को विश्वास है कि पश्चिमी संगीत से प्रभावित वर्तमान दौर जल्दी ही गुजरेगा और मधुर एवं सुरीले संगीतों की वापसी होगी। संगीत के साथ उनके सफर  को जानने के लिए संजय सिन्हा ने मुंबई स्थित स्टूडियो में अलका से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश:

अपने करियर के प्रारंभिक दौर के बारे में कुछ बताएं।
मैंने इसकी शुरूआत बहुत छोटे स्तर से की थी, एक स्टेज शो के माध्यम से। उसके बाद मैं ऑल इंडिया रेडियो पर आई, जहां प्राय: भजन आदि गाया करती थी। इसके कुछ खट्टे-मिट्ठे अनुभव भी जुड़े हैं। मैंने अपने करियर की शुरूआत कोलकत्ता से की और धीरे-धीरे मुंबई की ओर बढ़ती गई।

गायकी को अपना करियर बनाने की कोई खास वजह?
मेरा मां शुभा याज्ञनिक शास्त्रीय संगीत की गायिका थीं और मैं उनसे बहुत प्रभावित थी। वही ऐसी शख्स थीं, जिनसे संगीत के बारे में कोई शंका या त्रुटि पर मैं सबसे पहले संपर्क करती थी।

किस फिल्म में आपने सबसे पहले गाया था?
(कुछ सोचते हुए…) उस फिल्म का नाम था ‘पायल की झंकार’। यह फिल्म 1980 मे रिलीज हुई थी। मैंने उस फिल्म के लिए पहली बार अपनी आवाज दी। हालांकि मैं आत्मविश्वास से भरपूर थी, लेकिन श्रोताओं की प्रतिक्रिया को लेकर सशंकित भी थी। लेकिन भगवान की कृपा से, लोगों की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक थी।

अलका जी आपने सुमधुर गीतों के स्वर्णकाल को देखा है। लोग आज भी उन गीतों को याद करते हैं और आपको सुरीले गीतों की साम्राज्ञी कहते हैं। लेकिन आजकल गीत-संगीत का ट्रेंड बदलकर तेज और अश्लील हो गया है। क्या आपको लगता है कि सुरीले गीतों का दौर एक बार फिर वापस आएगा?
तेज और अश्लील गीतों की लाईफ सीमित होती है। लोग उसे महीने-दो महीनों में भूल जाते हैं। लेकिन सुरीले गीत हमेशा के लिए मन में बस जाते हैं। इन गीतों की जिंदगी सीमित नहीं होती। मैं युवाओं से विशेष रूप से आग्रह करती हूं कि कानफोड़ू अश्लील संगीतों का अनुसरण न करें और अपना मन शास्त्रीय, सुरीले और काव्यात्मक संगीतों में लगाएं। इसी में वास्तविक आनंद की प्राप्ति है।

आपके करियर के कुछ यादगार पल…
मैं 12 फरवरी 1994 की तारीख को नहीं भूल सकती। इस दिन मुझे फिल्मफेयर अवार्ड के लिए आमंत्रित किया गया था। गायकी के लिए मुझे 7 फिल्मफेयर अवार्ड मिले। उस क्षण मेरी आंखों में खुशी के आंसू थे। मेरी मां ने मुझे गले लगा लिया। यह किसी भी कलाकार के लिए गर्व का पल होता है।

22-11-2014

कोई ऐसा वाकया जिससे आपको ठेस पहुंची हो।
मुझे फिल्मफेयर अवार्ड मिलने के एक सप्ताह बाद ही मेरे पिताजी चल बसे। खुशी के पल देने के बाद ईश्वर ने मुझे दुख के दिन दिखाए। यह मेरे लिए एक अजीब सी स्थिति थी।

ऐसी जगह जहां आप बार-बार जाना चाहती है…
हां, कोलकता। वहां से मेरी भावनाएं, मेरा बचपन जुड़ा हुआ है। जब भी मुझे अवसर मिलता है मैं कोलकाता जाती हूं और अपने दोस्तों के साथ मस्ती करती हूं। मैं उस शहर के ‘फुचका’ और ‘भेलपुरी’ को कभी नहीं भूल सकती।

भावी कलाकारों के लिए क्या कहना चाहेंगी?
बिना समर्पण और कठिन परिश्रम के सफलता नहीं हासिल की जा सकती। युवाओं को शॉर्टकट के बजाय पूरी लगन और निष्ठा के साथ परिश्रम करना चाहिए। धैर्य के साथ युवा अपने आप को परिपूर्ण बनाएं।

पाश्र्व गायिका के रूप में आपने एक लंबी पारी खेली है।क्या आप अपने करियर से संतुष्ट हैं?
एक कलाकार कभी संतुष्ट नहीं होता। वह हर दिन हर पल कुछ न कुछ सिखने की कोशिश करता है। मैंने अपने आप को कभी भी पूर्ण नहीं माना। मैं अभी भी सिखने की कोशिश करती हूं। आज मैं जहां भी हूं उसके लिए भगवान, अपने परिवार, अपने दोस्तों और अपने प्रशंसकों को आभार व्यक्त करती हूं। मुझे जीवन के हर क्षण उनसे ढेर सारी ऊर्जा और विश्वास मिलता है।

अपनी भावी परियोजनाओं के बारे में कुछ बताईए।
मैं एलबम और फिल्म सहित कुछ नई परियोजनाओं पर काम कर रही हूं। इसके अलावा संगीत कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए पूरे भारत और विदेशों की यात्रा कर रही हूं।

राजनीति में आने की कोई योजना….।
नहीं, मैं एक कलाकार के रूप में ही संतुष्ट हूं। आज की राजनीति गंदी हो गई है।александр лобановский харьковкупить музыкальную куклу

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