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मुमताज से लेकर शहनाज तक…

मुमताज से लेकर शहनाज तक…

By प्रेमपाल सिंह वाल्यान

हाल ही में राजस्थान के एक पिछड़े इलाके की 24 वर्षीया शहनाज की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गयी। वह एनिमिक थी तथा वह उच्च तनाव से गुजर रही थी। उसकी स्थिति को दखते हुए गांव की दाई ने उसे शहर ले जाने के लिए कहा था, लेकिन धन के अभाव में उसका पति उसे शहर न ले जा सका और आखिर में प्रसव के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई।

सदियों पहले ताजमहल जिसकी याद में बनवाया गया था, यानी बेगम मुमताज की, उसकी मृत्यु भी बच्चे को जन्म देते हुए ही हुई थी। प्रसव के समय मां की मृत्यु हो जाने का सिलसिला तब से लेकर आज तक रूका नहीं है और इस मामले मे हिन्दुस्तान, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अमेरिका व अन्य सभी जगहों की महिलाओं की स्थिति एक जैसी है। स्थिति का कठिन पहलु तो शायद यही है कि अमेरिका में अजन्मे शिशु के अधिकार के नाम पर स्त्रियों की चुनने की आजादी का हनन किया जा रहा है तो भारत में गर्भपात का अधिकार होने पर चुन-चुन कर कन्या भ्रूण की हत्या की जा रही है। इस तरह दोनों ही तरफ औरतें ही घाटे में हैं।

सुरक्षित गर्भपात व कृत्रिम जन्म निरोध एक महान धारणा है, लेकिन इसका पालन दुनिया के चन्द देशों में ही किया जाता है। ब्रिटेन में  ऑक्सफेम नामक चैरिटी संस्था ने अभी हाल ही में ‘मातृत्व की कीमत’ शीर्षक से एक सर्वे किया था, जिसके अनुसार पूरी दुनिया में शिशु को जन्म देने के दौरान प्रति मिनट एक महिला की मौत हो जाती है। यानि एक वर्ष में 5.25 लाख स्त्रियां बच्चा पैदा करते समय मर जाती हैं। इसमें से 40 प्रतिशत महिलायें दक्षिण एशिया से होती हैं। भारत और नेपाल जैसे विकासशील देशों मे इनका आकड़ा यह है कि एक लाख गर्भवती महिलाओं में से बच्चे को जन्म देने के दौरान 540 महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। जबकि जर्मनी में मातृ मृत्यु दर मात्र 5.4 है। जापान में 6.1 व अमेरिका में 8.3 है। कुछ अन्य आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्व में प्रति मिनट 380 महिलाएं गर्भधारण करती हैं। इनमें से 190 महिलाएं अनचाहे गर्भ का सामना करती हैं। इतना ही नहीं प्रति मिनट 110 महिलाएं अनचाहे असुरक्षित गर्भ संबंधी जटिलताओं से गुजरती हैं तथा इनमें से 40 महिलाएं असुरक्षित गर्भपात कराती हैं।

मदर्स डे से पहले एक अन्तर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ‘सेव द चिल्ड्रेन’ की वार्षिक रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ  वल्र्डस मदर-2013’ में एक सूची जारी की गई है, जिसके अनुसार सर्वेक्षण में शामिल 176 देशों में से फिनलैण्ड को मां बनने के लिए सबसे उपयुक्त देश बताया गया है। इसके बाद क्रमश: स्वीडन, नार्वे, आइसलैण्ड, नीदरलैण्ड, डेनमार्क, स्पेन, बेल्जियम, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया का नम्बर आता है। जबकि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो का नम्बर सबसे अंत में है। मां बनने के लिए उपयुक्त जगह का मूल्यांकन मां के स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु दर, शिक्षा, आय और राजनीतिक स्थिति के आधार पर किया गया।

2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, कांगो में हर तीस गर्भवती महिलाओं में से एक की विभिन्न कारणों से मौत हो जाती है, जबकि फिनलैण्ड में 12,200 गर्भवती महिलाओं में से मात्र एक महिला की मृत्यु होती है। इस सूची में अमेरिका को 30वें, चीन को 68वें, पाकिस्तान को 139वें तथा भारत को 142वें स्थान पर रखा गया है।

यूनिसेफ व सात अन्य बड़ी सामाजिक संस्थाओं से प्रकाशित पुस्तक ‘फैक्ट फॉर लाइफ’ के अनुसार भी मातृत्व की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस पुस्तक के अनुसार विश्व में प्रति दिन 1400 महिलाएं गर्भावस्था अथवा इससे जुड़ी समस्याओं के चलते मौत के आगोश में चली जाती हैं। इस पुस्तक में ‘सेफ मदरहुड’ नामक कॉलम में मातृत्व को सुरक्षित रखने के लिए कुछ बिन्दु सुझाए गए हैं जो इस क्षेत्र में एक सार्थक पहल कही जा सकती है। इसके लिए एक साझा मंच ‘व्हाइट रिबन एलायंस’ का गठन किया गया है, जो इस प्रकार से होने वाली मौतों से बचाने के लिए महिलाओं को जागरूक करेगी। 1999 में अमेरिका में गठन के बाद से ही संगठन ने व्यापक स्तर पर अपने कार्य को अंजाम देना प्रारंभ कर दिया है। यह संस्था सुरक्षित मातृत्व को सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी समस्या ही नहीं मानती बल्कि स्त्रियों का मूलभूत अधिकार भी मानती है। इसका कहना है कि महिला सशक्तीकरण के इस दौर में अब महिलाओं को जागरूक हो जाना चाहिए और मातृत्व सुरक्षा को एक अधिकार के रूप में हासिल करना चाहिए।

एक अन्य सर्वे के अनुसार, भारत में प्रसव संबंधी विभिन्न कारणों से प्रत्येक पांच मिनट में एक महिला की मृत्यु हो जाती है। देश में गर्भावस्था और प्रसव के समय अच्छी व मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलने के कारण साल में एक लाख से अधिक महिलाएं मृत्यु की शिकार हो जाती हैं और करीब 3,50,000 बच्चे अनाथ हो जाते हैं। इसके कारण  90,000 परिवार बर्बाद हो जाते हैं। ये आंकड़े विकसित देशों की तुलना में 60-80 प्रतिशत अधिक हैं। यह विडंबना ही है कि एक को जन्म देने की प्रक्रिया में एक की मौत हो जाती है। इस सम्बन्ध में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में हर वर्ष करीब 5 लाख 85 हजार महिलाएं प्रसव से जुड़ी परेशानियों के कारण मौत के मुंह में समा जाती हैं और इनमें से करीब 99 प्रतिशत मौतें विकासशील देशों में होती हैं। डब्ल्यूएचओ का मानना है कि विकासशील देशों की करीब 30 करोड़ महिलाएं प्रतिवर्ष गर्भावस्था या मातृत्व से जुड़ी बीमारियों से ग्रसित होती हैं। इन महिलाओं की संख्या इन देशों की कुल वयस्क आबादी का करीब एक चौथाई है। सबसे ज्यादा दुखद यह है कि कुछ सामान्य उपाय करके इन महिलाओं को मरने से बचाया जा सकता है, लेकिन वे भी उन्हें उपलब्ध नहीं हैं। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि इन उपायों पर प्रति वर्ष प्रति महिला मात्र तीन डॉलर अर्थात लगभग 180 रूपये का खर्च आएगा। विकसित देशों में जहां उच्च गुणवत्ता वाली तथा सहज उपलब्ध चिकित्सा सुविधा व सेवाएं विकसित करके इस तरह की मौतों पर काबू पा लिया है, वहीं विकासशील देशों में मातृत्व से जुड़ी परेशानियां इतना गंभीर रूप धारण कर लेती हैं कि वे जानलेवा बन जाती हैं। विकासशील देशों में हर 48 में से एक गर्भवती महिला की जान खतरे में रहती है, जबकि विकसित देशों में 1800 में से केवल एक महिला पर प्रसव के दौरान जान जाने का खतरा रहता है।

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