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विकास के लिए न छेड़ें इकोसिस्टम को

विकास के लिए न छेड़ें इकोसिस्टम को

By उदयेश रवि

जब हम विकास के लिए पिछड़ेपन से लड़ रहे होते हैं तो सिर्फ जोश से काम लेते हैं, होश को ताख पर रख देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि होश कितना जरूरी है दूरगामी लक्ष्यों को सुचारू रूप देने के लिए। जोश हमें लक्ष्यों तक भले पहुंचा दे मगर जोखिमों की ओर इंगित नहीं करता जो भयावह है हमारे कल के लिए, आनेवाली पीढिय़ों के लिए।

हमने नदियों और सागरों पर पुल बना लिए। घनघोर जंगलों के बीच से सड़कें बना लीं। …और इन सड़कों, पुलों जैसी जगहों को हाई-बीम लाइटों से जगमगा दिया, पर क्या हमने सोचा कि इन लाइटों के क्या घातक परिणाम हैं? विकास के दौरान भला कहां इसे आंका जाता है? किंतु यह गलत है। हमारे यहां की इस लद्धड़ परंपरा पर अनायास हंसी आती है तो कोई पढ़ा-लिखा आदमी हमें समझाता है कि योजना बनाते समय इंजीनियर के साथ जीवविज्ञानी को नहीं बिठाया जाता प्रभो! भला ऐसी परिपाटी में इन्हें कौन समझा सकता है कि हाई-बीम लाइटों से कई कीट-पतंगों की प्रजातियां खत्म हो जाती हैं और कइयों में प्रजनन की क्षमता समाप्त हो जाती है।

विकास की इस अंधी दौड़ में सबसे ज्यादा जो प्रभावित हुए हैं वो है जुगनुओं की प्रजाति। हां, वही जुगनू जिसके पीछे हम बचपन में दौड़ते-भागते थे। अंधेरे में चमकने वाले उस जीव के प्रति तब अधिक ही कौतूहल रहता था। सोचता था, इसके चमकने का रहस्य अपने दोस्तों को मैं ही सबसे पहले बताऊंगा। दिन के उजालों में हम जब इन जुगनुओं को ढूंढऩे निकलते थे तो उसे लौकी के पौधों पर अंटा लेते। आज विकास के क्रम ने हमें उन जुगनुओं से जुदा कर दिया। अब लौकी के पत्तों पर भी वे हमें नहीं मिलते। इसके लिए सिर्फ ज्यादा चमकने वाली लाइटें ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि वे कीटनाशक भी हैं जो हमें भी खाए जा रहे हैं।

22-11-2014

सवाल सिर्फ एक प्राणी के नष्ट होने का नहीं है, बल्कि उस प्राणी की तरह के सैकड़ों अन्य की है जो जुगनुओं की तरह चमक कर हमें आकर्षित नहीं कर पाते।

जीव विज्ञान का सिद्धांत है कि किसी एक जीव के एक्सटिंक्ट होने से खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है और इकोसिस्टम पर घातक असर पड़ता है।

यहां एक जीव और उसका जीवन-यापन अन्य दूसरे जीवों के लिए गहरा ताल्लुक रखता है। यह संबंध सिर्फ सामाजिक नहीं जैविक भी है। यहां जैविक का मतलब जिंदा रहने और रखने से है। हम मानवों को छोड़कर ये जीव-जंतु इसका ध्यान रखते हैं। वहीं दूसरी ओर विकास के क्रम में हम बड़े कमजोर निकले।

विशेषज्ञों के अध्ययनों पर गौर करें तो पिछले बीस वर्षों में पूरी दुनिया ने लगभग 200 जीवों की प्रजातियां खो दीं जिसमें से गिद्ध भी एक है। जलीय जीवों में कछुआ, मगरमच्छ एवं झींगें की कुछ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर है। जमीन पर तो बाघों की संख्या के बारे में सबको पता है। सांपों की कई प्रजातियां भी वक्त का शिकार ऐसे ही हो गईं। नेवले की जाति पर भी संकट के बादल गहरा रहे हैं। खेती में उपयोग किए जा रहे रसायनों ने तो भूमि की उर्वरा शक्ति को रिचार्ज करनेवाले केंचुओं को ही नष्ट कर दिया। हास्यास्पद बात तो यह कि अब हमारा सरकारी तंत्र जैविक खेती और जैविक खाद को बढ़ावा देने की कोशिश में केंचुओं को फिर से जिंदा करने में जुटा है। आखिर हम कहां जा रहे हैं? पहले हम ज्यादा बुद्धिमान होने का दंभ पालते हैं फिर खुद का थूक चाटकर क्या साबित करना चाहते हैं? जिसे हम नष्ट कर रहे हैं उसे फिर से जिंदा करके खुद को ईश्वर साबित करना चाहते हैं तो इस थोड़े समय की उस जीव की अनुपस्थिति हमारी सभ्यता को कहां पहुंचा देती है इस पर विकास के लिए किसी भी तरह की योजना बनाने से पहले विचार करना चाहिए।

गाय, बैल, चूहे, सांप, बिल्ली, केंचुआ, नेवला, कबूतर कभी किसानों के मित्र हुआ करते थे। आज इनकी जगह आधुनिक खेती ने ले ली है जो बेहतरी का तरीका तो है मगर बैलों या बछड़ों के प्रति इनकी उदासीनता इसके विलुप्त होने के संकेत दे रहे हैं। गायें अगर विदेशी नस्ल की या अधिक दूध देनेवाली न हों तो अब किसान उसे भी नहीं पालते वरन वो कत्लखाने में स्वाहा हो जाती हैं। इनका कोई उपयोग न रहा जैसे। हमारा यह स्वार्थी स्वभाव घातक है। इसपर पुर्नविचार की दरकार है।

हम चाहे जुगनुओं को खो रहे हों या बैलों को यह संकेत है उस वक्त का जब पृथ्वी के इकोसिस्टम को हम बचाने की अंतिम कोशिश कर रहे होंगे। हमें चेतना चाहिए बुरे वक्त से पहले। हमें चेतना होगा।wobs отзывыwebsite for translators

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