ब्रेकिंग न्यूज़ 

कैसे होगा स्वच्छभारत ?

कैसे होगा स्वच्छभारत ?

By शैलेन्द्र चौहान

छोटे कस्बे और गांवों की स्थितियां भी अब कम भयानक नहीं हैं। नाक पर रुमाल रखकर ही अब किसी गांव या कस्बे में प्रवेश किया जा सकता है। सड़कों के किनारे, गलियों में विष्ठा निष्कासन का कर्म वहां नित्यप्रति संपन्न होता है, जिससे भीषण दुर्गंध उस माहौल में व्याप्त रहती है पर वहां के लोग बहुत सहजता से नंगे पांव या चप्पल पहन कर वहां से गुजरते रहते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने घर का कचरा पड़ोसी की बाउंडरी के पास डाल देने में हम भारतवासियों को बहुत संतोष मिलता है। इससे वे अपने घर को बहुत साफ महसूस करते हैं और मन को भी।

हमारा देश भारत महान है। विदेशियों (पश्चिमी देश वाले) का कहना है कि भारत सपेरों, नटों और ठगों (भिखारियों से  लेकर टैक्सी व ऑटो ड्राईवर और होटलों के दलालों तक) का देश है। (अब मोदी जी बनायेंगे आधुनिक भारत।) चूंकि यह अत्यंत प्राचीन देश है, इसकी संस्कृति भी अति प्राचीन है (उपरोक्त सभी विशेषज्ञताएं, धर्म, दर्शन, कर्मकांड, पाखंड, अंधविश्वास इत्यादि को मिलाकर) इसलिए भी भारत महान है। इधर 1952 के चुनावों के बाद से हमारी स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में यह पढ़ाया जाता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है और खेती-किसानी पर अपना निर्वाह करती है। तो भारत की इस इमेज को तोडऩे के लिए या कहें कि बदलने के लिए पंडित नेहरु ने इस देश में बड़े-बड़े उद्योग-धंधों की स्थापना की, सार्वजनिक उपक्रमों का गठन किया। भारत को लोकतांत्रिक और समाजवादी देश बनाने के लिए पंचशील के सिद्धांत बताए, पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं, पांच साला चुनाव करवाए। गांधी जी की बताई खादी की पोशाक पहनी और उसे धुलवाने पेरिस भेजते रहे। टाटा, बिड़ला, डालमिया को भारत के विकास में हिस्सेदारी दी गई। सभी राजाओं, महाराजाओं (जिनमें क्रूर अपराधियों से लेकर व्यवसायी और थोड़े उदार किस्म के लोग शामिल थे) को सत्ता में शामिल किया गया और उन्हें प्रिवी-पर्स तथा विशेष अधिकारों से (जो शायद अंग्रेजों की स्वामिभक्ति के कारण ही प्राप्त हुए थे) कतई वंचित नहीं किया गया बल्कि उनमें इजाफा ही हुआ। इस परस्पर विरोधी कार्य नीति और व्यवहार के चलते भारत में गरीबी की महानता भी बरकरार रहती आई।

सार्वजनिक शौचालय की सफाई पर ध्यान

22-11-2014

सार्वजनिक शौचालय या मूत्रालय साफ करने की हिम्मत आजकल कौन जुटा सकता है। अब इस देश में गांधी नहीं पैदा होते। अब तो मंत्रीगण हाथ में लंबी झाड़ू पकड़ कर साफ की हुई जगह को मीडिया के सामने साफ करते दिखते हैं। घरों की चहारदीवारी में साफ-सुथरे रहने वाले लोग बाहर की गंदगी से गुरेज कतई नहीं करते। यदि चार घरों के सामने गंदी नाली बहती है और उसका पानी रुका रहता है तो वे लोग मिलकर उसे साफ करने की बात कभी नहीं सोचते। जिसको ज्यादा परेशानी हो वह साफ कराए अन्यथा नहीं कराए। मरे हुए पालतू जानवर तक लोग आसपास ही फेंक देते हैं। उनके सडऩे पर सारा मोहल्ला बदबू झेलता रहता है। सार्वजनिक या निजी अस्पताल तक अपनी पूरी गंदगी रिहाइशी इलाकों में ही किसी खाली जगह पर डाल देते हैं। इससे इन्फेक्शन फैलने की संभावना रहती है। होटल, ढाबे और चाय वाले भी अपना कचरा पास की नाली या सड़क पर फेंक देते हैं। इस तरह हर व्यक्ति अपना कचरा अपने आस-पास ही फेंकता है। गंदगी में रहने वाले लोगों को गंदगी देखने और उसकी दुर्गंध सहने की आदत हो जाती है, उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे गंदे नालों के किनारे रहने वाले लोग, सीले और बदबूदार स्थानों पर रहने वाले लोग, रासायनिक कारखानों में काम करने वाले लोग, सब्जी मंडी में दुकान लगाने वाले दुकानदार और व्यापारी दुर्गंध सहन करने के आदी हो जाते हैं। यहाँ गरीबी अमीरी का फर्क मिट जाता है पर गरीबों की संख्या फिर भी वहां अधिक ही होती है। सभी रासायनिक उत्पादकों द्वारा प्रदूषित ठोस और तरल पदार्थ खुलेआम बाहर फेंक देते हैं या नदियों में प्रवाहित कर देते हैं। प्रदूषण नियामक कुछ नहीं कहते। बढ़ती आबादी, अव्यवहारिक शिक्षा, सामूहिक और सामुदायिक चेतना का अभाव एवं स्वास्थ्य के प्रति गहरी राजनीतिक उदासीनता इसके कुछ बड़े कारण हैं। नियतिवाद, पाखंड और निहित स्वार्थ इसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं, इन सबकी जड़ में मूलत: गरीबी ही है। आज भी सत्तर प्रतिशत गरीब जनसंख्या हमारे देश में है इसीलिए तमाम तरह के औद्योगिक विकास, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मौजूदगी,उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के बावजूद भी भारत एक गंदगी प्रधान देश है।

22-11-2014
भारत में इधर एक छोटे से समुदाय में अमीरी और सुख-सुविधाओं की धांसू बढ़ोत्तरी हुई तो उधर गरीबों की संख्या में भी द्रुुतगति से इजाफा होता गया। भारत में गरीबी का शाश्वत महात्म्य सदैव बखाना गया। जैसे कि गरीबी एक ईश्वरीय परिघटना, भाग्य का खेल, पुनर्जन्म का फल है आदि आदि। गरीबों का काम सदैव साधन-संपन्न अमीरों की सेवा करना है। स्वयं जन्म-जन्मांतर तक गरीब बने रहकर अमीरों के लिए जीवन दे देना ही गरीबों की महानता है। गरीब गरीब होता है उसका जीना-मरना क्या, खाना-पीना क्या, रहना-सहना क्या और सोना-जगना क्या। तो गरीबी की एक सशक्त सुदृढ़ और सुदीर्घ परंपरा हमारे देश में बहुत परिश्रम से बचाए रखी गई है। यह हमारी महानता का अत्यावश्यक भाग है हम इसे कदापि नष्ट नहीं करना चाहेंगे।

चलिए अब इस महान परंपरा की एक महान उपशाखा की ओर अपना ध्यान केंद्रित करें। एक दिन भारतीय रेल की एक द्रुतगति की एक्सप्रेस ट्रेन के द्वितीय श्रेणी (पहले जमाने में जिसे तीसरे दर्जे के नाम से जाना जाता था) के ठसाठस भरे डिब्बे में यात्रा कर रहा था। भीड़ इतनी थी कि सारे दरवाजे-खिड़कियां खुले होने के बावजूद हवा नहीं आ पा रही थी। रह रह कर बीड़ी, पसीने और बिना धुले कपड़ों से उठती दुर्गंध के भभके नथुनों में जबरन प्रवेश किए जा रहे थे। बहुत बेचैनी हो रही थी पर वहां एक निर्विकल्प मजबूरी थी सो कभी इस टांग पर वजन डाल कर तो कभी उस टांग पर वजन डाल कर चुपचाप खड़ा था। जेब में कुछ पैसे थे सो चेतना उस पर केंद्रित थी, क्योंकि वहां किसी भी क्षण कोई प्रोफेशनल गिरहकट हाथ की सफाई दिखा सकता था। ऐसा दो-चार बार मेरे साथ हो भी चुका था। जेब में बमुश्किल सौ-सवा सौ रुपये रहे होंगे पर वे भी गिरहकटों की आंखों की किरकिरी बन गए थे।
22-11-2014
किसी तरह पैर आगे-पीछे करते-करते शौचालय की दीवार के सहारे टिक पाया था। दोनों तरफ दरवाजे खुले थे पर हवा नाम को भी नहीं लग रही थी। भयानक सफोकेशन था तब भी लगातार लोग बीड़ी और सिगरेट पिए जा रहे थे। जहां मैं खड़ा था ठीक उसके बाजू में किसी तरह एक मोटे काले और भद्दे से आदमी ने बैठने की जगह बना ली थी। वह खैनी खा रहा था। थोड़ा ही समय बीता होगा कि उसने पिच्च से मेरे पैर के बगल में थूक दिया। मैं जूते पहने हुए था वरना उसके छींटे मेरे पैर पर अवश्य पड़ते। मैंने उस आदमी से कहा कि तुम दरवाजे के पास बैठे हुए हो बाहर भी थूक सकते थे, डिब्बे के अंदर ठीक मेरे पैर के पास क्यों थूक दिया। वह सहज ही बोला ‘क्या करें बाबू गरीब आदमी हैं’। अब गरीब आदमी होने का डिब्बे के अंदर थूकने से क्या ताल्लुक? क्या गरीब आदमी घर के अंदर ही हगते-मूतते हैं? मैं गुस्से में था। आगे कुछ नहीं बोल पाया पर यदि यही बात मैं उससे पूछता और वह फिर वही बात दोहरा देता ‘क्या करें बाबू गरीब आदमी हैं’ तो अपने कपड़े फाड़ लेने या सर के बाल नोंच लेने का मन अवश्य करता।

खैर मूल बात यह है कि गरीबी और गंदगी में एक घनिष्ठ संबंध है। लोग झुग्गी-झोंपडिय़ों में रहते हैं, गंदे नालों के किनारे रहते हैं, कचरा फेंकने वाली जगहों पर रहते हैं, पानी जमा होने वाले निचले स्थानों पर रहते हैं, गाय-भैंसों के साथ रहते हैं, सुअरों और भेड़-बकरियों के साथ रहते हैं, जाहिर है राजी-खुशी तो वे वहां नहीं रहते, मजबूरी में ही रहते हैं, पर वातावरण के हिसाब से अपने को ढाल लेते हैं। मैला ढोने, साफ करने से लेकर गाड़ी सुधारने तक के काम वे करते हैं जिनमें मैल लगना स्वाभाविक है। गत दिनों आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों, विशेष रूप से मेहबूबनगर जिले में दिमागी ज्वर (मेनिंजो एनसिफलाटिस) से दो सौ से अधिक बच्चों की मौत हो गई। यह बीमारी गंदगी और गरीबी के कारण ही पनपी थी। गंदगी के कारण मच्छरों का बढऩा और उनसे मलेरिया तथा मस्तिष्क ज्वर का फैलना ग्रामीण इलाकों में बहुत आम बात है। राजस्थान के रेगिस्तानी भाग में हर वर्ष हजारों लोग इन बीमारियों की बलि चढ़ जाते हैं। मिट्टी पत्थर और खेती के काम भी कोई साफ-सुथरे काम तो हैं नहीं कि नहा-धोकर आराम से संपन्न किए जा सकें और कमीज भी मैली न हो। तो गरीब किसान मजदूरों को गंदगी से जूझते रहने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प कम से कम भारत में तो नहीं ही है। यह कहावत सटीक है कि मिट्टी में पैदा हुए हैं और मिट्टी में ही मिल जाएंगे।

22-11-2014

मुझे अपने बचपन की याद है कि जब हम गांव जाते थे तो वहां हाथ गंदे हो जाने पर मिट्टी से धोया करते थे। शौच के लिए गांव के बाहर मैदानों में या झाडिय़ों की आड़ में जाते थे। लौटते समय गांव के पास खुदी पड़ी बलुई मिट्टी से हाथ भी अच्छी तरह साफ  करते थे और शौच के लिए ले जाया गया लोटा भी। महिलाएं अपने बाल मिट्टी से ही धोती थी, मुलतानी मिट्टी ना हुई तो गांव की ही रेतीली मिट्टी चल जाती थी। कपड़े नदी-नाले, तालाब या कुएं के पानी में भिंगो कर पछीट-पछीट कर साफ  कर लिए जाते थे। बरतन राख से मल-मल कर चमकाए जाते थे। नीम या बबूल की दातुन से दांत साफ किए जाते थे। कभी-कभी राख और नमक भी दांत साफ करने के लिए प्रयुक्त किए जाते थे। यानि वे लोग मिट्टी में पैदा हुए थे, मिट्टी में जीते थे, मिट्टी में काम करते थे, धन-धान्य उपजाते थे और अंत में मिट्टी में ही मिल जाते थे। लेकिन तब भी वे साफ-सफाई और स्वास्थ्य का बेहतर ख्याल रखते थे। अब न साफ मिट्टी है न साफ पानी और न साफ हवा।

खेतों की मिट्टी में रासायनिक खादें, जहरीले पेस्टिसाइड्स और इन्सेक्टिसाइड्स मिलाए और छिड़के जाते हैं। नदियों में हर तरह की गंदगी, जहरीले रसायन, कारखानों का उच्छिष्ट और मल-मूत्र डाला जाता है। वायु में तरह-तरह की प्रदूषित और जहरीली गैसों का लगातार समावेश हो रहा है। खाने की चीजों में तरह-तरह की मिलावट हो रही है। अप्राकृतिक उत्पादों की बाजार में भरमार है। जैसे-जैसे सभ्यता और संस्कृति का बाजारीकरण होता गया, वैसे-वैसे सार्वजनिक स्थल कूड़े के ढेरों में तब्दील होते गए। शहरों की नालियां गंदगी से बजबजाती नजर आती हैं। म्यूनिसपेल्टी कचरा ढो-ढो कर परेशान है, इसलिए हफ्ते दस दिनों तक कचरे को जहां का तहां सडऩे देती है। सिविल लाइंस नामक इलाके को छोड़कर बाकी इलाकों में चाहे जितने भी रईस लोग क्यों न रहते हों, आसपास की नालियों से बदबू उठती है। बाउंडरी के बाहर कुत्ते हगते रहते हैं। घरों का कचरा बाहर इकट्ठा होने लगता है। सड़कों पर पानी फैलता रहता है। यदि कहीं घर बन रहा हो और कोई बिल्डर बना रहा हो तो पुराने घर को तोडऩे से लेकर नए अपार्टमेन्ट के बनने तक उसकी धूल पड़ोसियों को पचानी पड़ती है। रोड पर पड़े मलबे से बच कर निकलना पड़ता है। चूंकि आधी से अधिक सड़क मकान का मटेरियल घेरे रहता है तो दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं।

छोटे कस्बे और गांवों की स्थितियां भी अब कम भयानक नहीं हैं। नाक पर रुमाल रखकर ही अब किसी गांव या कस्बे में प्रवेश किया जा सकता है। सड़कों के किनारे, गलियों में विष्ठा निष्कासन का कर्म वहां नित्यप्रति संपन्न होता है, जिससे भीषण दुर्गंध उस माहौल में व्याप्त रहती है पर वहां के लोग बहुत सहजता से नंगे पांव या चप्पल पहन कर वहां से गुजरते रहते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने घर का कचरा पड़ोसी की बाउंडरी के पास डाल देने में हम भारतवासियों को बहुत संतोष मिलता है। इससे वे अपने घर को बहुत साफ महसूस करते हैं और मन को भी। अपने घर के सामने बहते गंदे पानी को यदि पड़ोसी के घर के पास तक बहाने का अवसर प्राप्त हो जाए तो उन्हें महान संतोष भी प्राप्त होता है और अपरिमित आनंद भी। हमारे इस महान देश के महान नागरिक अक्सर ही केले के छिलके सड़कों पर, रेलवे प्लेटफार्म पर भी फेंक देते हैं। पैर फिसले तो आपकी जिम्मेदारी, आपको नीचे देख कर चलना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों जैसे रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड वगैरह गर्मियों में दुर्गंध से इस कदर भरे होते हैं कि सौ में से दस व्यक्ति तो वहां दो चार घंटे ठहरने के बाद बीमार हो ही सकते हैं।

kombohacker 4александр лобановский класс

Leave a Reply

Your email address will not be published.