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कांग्रेस : ‘यस सर’ अध्यक्ष की तलाश जारी

कांग्रेस : ‘यस सर’ अध्यक्ष की तलाश जारी

नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को चार चांद लगाने का काम किया है तो वहीं राहुल गांधी की कार्य पद्धति के कारण कांग्रेस समाप्ति की ओर बढ़ रही है। जब सामने नरेन्द्र मोदी जैसा लोकप्रिय कद्दावर अंतर्राष्ट्रीय जगत पर अपनी छाप बनाने वाला नेता खड़ा हो तो चमचों की फौज से उनसे मुकाबला नहीं किया जा सकता। ईमानदार समर्पित संघर्षशील नेता और कार्यकर्ता ही कांग्रेस की साख को वापिस ला सकते हैं।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हुयी करारी हार का जिम्मा लेते हुये राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और वे कह रहे हैं कि पार्टी अपना अध्यक्ष चुन ले लेकिन वास्तविक रूप से पार्टी अध्यक्ष का चुनाव चाहते तो अब तक कार्यसमिति की मीटिंग बुला कर अंतरिम अध्यक्ष भी चुनवा लेते। अभी भी वे पार्टी पर अपनी पूरी पकड़ बनाये रखने के लिये कोई जुझारू लोकप्रिय नेता को  अध्यक्ष नहीं बनने देंगे। आखिरकार वरिष्ठता का बहाना लेकर मोती लाल वोरा का नाम ही अंतरिम अध्यक्ष के लिये तय हो गया। वोरा को 10 जनपथ अपना विश्वसनीय दरबारी मानता है, तभी उन्हें लम्बे अंतराल तक पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाये रखा गया। अब उनकी ताजपोशी की तैयारी पर्दे के पीछे चल रही है।  वोरा से हाईकमान को उसी तरह कोई खतरा नहीं है जिस तरह मनमोहन सिंह को दुबारा प्रधानमंत्री बनाने में नहीं था। मनमोहन सिंह की तरह वोरा की भी कोई फोलोइंग नहीं है, न ही कोई समर्थक गुट है। जहां एक ओर कहा जा रहा है कि जिलों में पार्टी की कमान युवाओं को सौंपी जायेगी वहीं दूसरी ओर उन्हें अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष उन्हें बना दिया गया, जो ठीक से न सुन सकते हैं न पढ़ सकते हैं। यही नहीं वे मिडिल स्कूल तक भी शिक्षित नहीं हैं। हाईकमान को एैसे ही नेता की तलाश थी जो मनमोहन सिंह की तरह कभी अपनी जुबान न खोले और जिसके साथ दो सांसद भी न हो। यदि वोरा या उनके जैसा 10 जनपथ का सेवक ही स्थायी अध्यक्ष बनाया जाता है तो राहुल गांधी के इस्तीफे का कोई मतलब नहीं रह जाता है। अध्यक्ष कम से कम एैसा नेता बनाये जिसकी बेदाग छवि हो, जो भाई भतीजाबाद और जातिवाद से ऊपर हो। वोरा न तो साफ छवि वाले हैं अभी वे नेशनल हेरॉल्ड की बिक्री केस में भ्रष्टता के आरोप में अदालत से जमानत पर है। उन पर जातिवाद को बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। अपने बेटे को एक दो चुनाव हारने के बाद भी टिकट दिलवाते रहे और अंत में वे भी नेता बन ही गये। राहुल गांधी नहीं जानते क्या कि वोरा जी ने भी वंशवाद को बढ़ावा दिया।

ऐसा नहीं कि पार्टी के अध्यक्ष पद के लिये अनुभवी ईमानदार अच्छी छवि वाले नेता न हो और जो लोकप्रिय भी हो पर चौबीस घंटे दरबान की तरह न खड़े होने के कारण उन्हें बनाया नहीं जायेगा। पिछले दो दशकों में पार्टी ने चमचों को तरजीह दे कर संघर्षशील नेताओं को पीछे ढकेलने का काम किया है। फिर चमचे नेता अपने चमचों को आगे बड़ाते हैं क्योंकि उनके मन में डर समाया रहता है। इस तरह ऊपर से नीचे केडर तक बजाय नेतृत्व की क्षमता के लोगों की जगह चमचों की फौज खड़ी हो गयी है।

सुशील कुमार शिंदे, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री रह चुके हैं पार्टी ने उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ाया है और अनुसूचित जाति के भी हैं  वे वोरा जी से कहीं दर्जे बेहतर हैं पर उनके शरद पवार से गहरे रिश्ते हैं। यही एक कारण हो सकता है कि उन्हें नहीं बनाये जाने का। वीरप्पा मोइली भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं पर वे मुखर हैं अपनी बात रखने में हिचकते नहीं है, लोकप्रिय नेता है, अनुसूचित जाति से हैं। उत्तर प्रदेश की नेता मोहसिना किदवई जो प्रदेश पार्टी अध्यक्ष और लम्बे समय तक पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री रह चुकी हैं। केंद्र में मंत्री रही हैं अल्पसंख्यक भी हैं, महिला भी हैं। इस तरह से कई नेता अध्यक्ष बनने के योग्य हैं, उनकी छवि भी बेहद ईमानदार नेताओं की है उन्हें कमान दिये जाने से भ्रष्ट नेताओं को तकलीफ  हो जायेगी। इसलिये इनका भी नाम नहीं आयेगा।

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किसी स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के सदस्य को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाता है तो लोगों में संदेश जायेगा कि अब पार्टी बदल रही है। अध्यक्ष बदलने का कोई मतलब तभी निकलेगा जब नया अध्यक्ष जातिवाद, भाई भतीजावाद से दूर ईमानदार छवि का हो। वैसे तो कांग्रेस पार्टी में ईमानदार नेता तलाशना टेढ़ी खीर है, पर कुछ ठीक ठाक तो मिल ही सकता है। पार्टी की नियत इसी से जाहिर होती है कि तारिक अनवर जैसे ईमानदार नेता को पार्टी में लाकर उनका कोई उपयोग नहीं किया। वे कांग्रेस पार्टी के महामंत्री आज से 20 साल पहले रह चुके हैं। वे सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के खिलाफ थे।  राहुल गांधी को ईमानदार संघर्षशील जुझारू अध्यक्ष नहीं चाहिये, उन्हें बेजुवान यशमेन को ही अध्यक्ष बनाना है, चाहे पार्टी का और भी भट्टा बैठ जाये। जिस तरह केन्द्र सरकार की चाबी मनमोहन सिंह के 10 वर्ष के प्रधानमंत्री कार्यकाल में 10 जनपथ पर थी उसी तरह पार्टी को 10 जनपथ से चलाये जाने की पूरी तैयारी हो रही है। राहुल यहां भूल गये कि वोरा जी ने उनको ही धोखा दिया था जो उन्हें राजनीति में लाये थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजीव गांधी के सबसे विश्वास पात्र मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ही उन्हें राजनीति में लाये। अर्जुन सिंह जब पंजाब के राज्यपाल बन कर गये तो उन्होंने अपनी जगह वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया। उसके बाद वोरा जी ने पलटा खाया और उन्हें धोखा दिया।

अगर इसी तरह का अध्यक्ष बनाया जाता है तो राहुल गांधी कांग्रेस की हालत आसमान से गिरे खजूर पर लटके जैसी कर देंगे। उनका हर परीक्षण फेल हुआ है। खुद अमेठी से चुनाव हारे, राज बब्बर को जो बाहर से आये थे       उत्तर प्रदेश की कमान दे दी। नवजोत सिंह सिद्धू बाहर से आये, उन्हें मंत्री बना दिया उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री की नाक में दम की हुयी है। जगह-जगह पार्टी की किरकिरी करवाते रहते हैं, पर 10 जनपथ को नेता कम और चमचे ज्यादा पसंद हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा, वहां भी चौपटा हो गया।

राहुल जी ईवीएम और मोदी को दोष देना छोड़ कर पार्टी को संभालें। यदि उन्होंने सचमुच ही पार्टी के सुधार के लिये इस्तीफा दिया है तो सर्वसम्मति के द्वारा बिना कोई दखल दिये कार्यसमिति की मीटिंग या। एआईसीसी की मींटिंग बुलाकर अध्यक्ष पद का चुनाव होने दें।

डॉ. विजय खैरा

 

 

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