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प्यास का हल, नल से जल

प्यास का हल, नल से जल

वंदे मातरम में भारत की धरती को सुजलाम सुफलाम कहा गया है। यह सुजलाम सुफलाम धरती बढ़ती आबादी, बदलते मौसम के कारण अकाल और सूखा का केंद्र बन कर बूंद-बूंद पानी को तरसती जा रही है। गर्मी आने के बाद तो पानी का आपातकाल लागू हो जाता है। तब पता चलता है कि पानी अब नया तेल हो गया है, जिसे पाने के लिए उसकी बूंद-बूंद बचानी होगी क्योंकि बिन पानी सब सून है। रहीम ने कहा है पानी गए न उबरै मोती मानुख चून। मोती और चून के बारे में तो हम नहीं जानते मगर पानी नहीं होगा तो आदमी नहीं उबर पाएगा। मोदी सरकार ने देर-सबेर ही सही इस हकीकत को समझा है और पानी के लिए कदम उठाने की नई पहल की है। यह तो वक्त ही बतायेगा कि यह पहल क्या रंग लाती है।

भारी बहुमत से जीत कर आई मोदी सरकार ने अब एक नया जल शक्ति मंत्रालय बनाया है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनावी अभियान के दौरान वादा किया था कि अलग से एक ऐसा मंत्रालय बनाया जाएगा जो सिर्फ पानी से जुड़ी हर समस्या का निपटारा करेगा। दुनिया भर में पानी को लेकर मचे हाहाकार के बीच नए बने इस मंत्रालय के सामने कई चुनौतियां हैं जिससे इसे पार पाना होगा।

मोदी सरकार-२ में जल जीवन मिशन के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोकस देश के हर घर तक नल से जल पहुंचाने पर है। सरकार ने इसके लिए जल शक्ति मंत्रालय बनाया है, मंत्रिमंडल में इसकी जिम्मेदारी राजस्थान के सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंपी गई है। चुनाव से पहले भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में स्वच्छ पेय जल उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दी थी। पिछली एनडीए सरकार में स्वच्छ भारत मिशन के तहत साफ-सफाई पर जोर दिया गया था। नए जल शक्ति मंत्रालय में जल संसाधन, नदी विकास, गंगा जीर्णोद्धार और पेय जल एवं स्वच्छता विभाग को शामिल किया गया है। नल जल योजना के तहत सरकार ने २०२४ तक देश के हर घर में पानी की पाइप लाइन और नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

एक अधिकारी ने बताया कि नए मंत्रालय का पहला काम देश में मौजूद जल स्रोतों का संरक्षण करना है। इसके लिए मनरेगा योजना की मदद ली जाएगी। जल स्रोतों को बचाने के लिए कुछ महीने पहले इजराइल और भारतीय अधिकारियों के बीच बैठक भी हो चुकी हैं। इजराइल में पाइप लाइन के जरिए लोगों को पेय जल उपलब्ध कराया जा रहा है। फिलहाल, भारत में भूजल का ४ प्रतिशत पानी पीने और ८० प्रतिशत पानी खेती में इस्तेमाल होता है।

पिछले साल आई नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, ६० करोड़ भारतीय गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। स्वच्छ पेय जल नहीं मिलने से देश में हर साल २ लाख लोगों की मौत हो जाती है। अनुमान है कि २०३० तक देश में पानी की मांग मौजूदा वक्त से दोगुनी हो जाएगी, अगर इसे पूरा नहीं किया गया तो इससे जीडीपी में ६ प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।

हर साल अप्रैल से जुलाई तक देश के कम से कम आठ राज्यों में पानी की विकट स्थिति उत्पन्न होती है। हाल ही में केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु को सूखे के संदर्भ में परामर्श जारी किया था। इसमें लोगों से अपील की गई थी कि वो कुछ हफ्तों के लिए पानी को विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल करें क्योंकि बांधों में पानी का भंडारण एक महत्वपूर्ण स्तर से नीचे गिर गया था।

कृषि और घरेलू उद्देश्य के लिए लगभग पूरा ग्रामीण भारत मानसून की बारिश पर ही निर्भर करता है, इसलिए आज के समय में जल प्रबंधन की सख्त जरूरत है।

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वैसे भारत व इजरायल के बीच बहुत ही गहरे रणनीतिक संबंध हैं। लेकिन जिस क्षेत्र में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच काफी ज्यादा उत्साह है वह है जल क्षेत्र। सूत्रों के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच जल रणनीतिक साझेदार बनने के विकल्प पर बातचीत हुई है। इजरायल को जल तकनीक के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश माना जाता है। वैसे इजरायल के सहयोग से भारत में पहले से ही जल संरक्षण व पेयजल के मामले में काम हो रहा है, लेकिन भारत सरकार इसे बड़े पैमाने पर विस्तार देना चाहती है। खास तौर पर भारत असिंचित इलाकों में सिंचाई के जरिये कृषि उत्पादकता बढ़ाने की तकनीक हासिल करना चाहता है। मोदी सरकार का लक्ष्य है कि २०२४ तक हर घर तक पानी का कनेक्शन लगाया जाए और नल के जरिए पानी सप्लाई हो। हालांकि, अभी तक सिर्फ ६५ प्रतिशत घर ही ऐसे हैं जहां नल से पानी पहुंचाने का काम हो रहा है। हालांकि, नल से पानी सप्लाई से अलग इस गर्मी के मौसम में विकराल हो रहे पानी संकट से जूझना भी अलग चुनौती है।

मोदी सरकार का लक्ष्य हर घर तक नल से पानी पहुंचाने का जरूर है, लेकिन इसमें बहुत बड़ी बाधा भी है। इस साल गर्मी अपने सारे रेकॉर्ड तोड़ रही है और देश का ज्यादातर हिस्सा इस वक्त पानी की कमी की समस्या से जूझ रहा है। पानी का संकट देश के सभी हिस्सों में है। महाराष्ट्र के ग्रामीण पानी की कमी के कारण बहुत अधिक परेशान है तो समुद्र के किनारे बसे चेन्नई शहर में इन दिनों लोग पानी के लिए लाइन में लगे हैं।

देश जल संकट से गुजर रहा है तो जाहिर है इससे निपटने के लिए भी कुछ बहुत बड़े उपायों की जरूरत है। हर घर तक पीने का स्वच्छ पानी पहुंचाने के लिए घरों में पाइपलाइन लगाने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है। प्राइस की तरफ से किए सर्वे के अनुसार, शहरी इलाकों में लगभग ९० प्रतिशत घरों तक पानी के लिए नल लगाए जा चुके हैं। अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २०२४ तक सभी घरों में नल के जरिए पानी पहुंचाने का बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि, नल लगाने भर से ही समस्या नहीं सुलझ सकती है क्योंकि नलों से पर्याप्त मात्रा में पानी की सप्लाई भी जरूरी है।

६५ प्रतिशत भारतीय घरों में अब नल का पानी

भारतीय घरों में पानी के लिए नल के प्रयोग का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। २०१४ से २०१८ में ६.७ प्रतिशत की वृद्धि से घरों में पानी के कनेक्शन के लिए नल लगाए गए। २०११ से २०१४ में यह आंकड़ा ४ प्रतिशत था और २००१ से २०११ में यह ०.६ प्रतिशत ही था।

पानी के कनेक्शन लगाने और नल से पानी पहुंचाने की दिशा में गांवों में वृद्धि का आंकड़ा शहरों से अधिक है। २०१४ से २०१८ के बीच गांवों में यह २८ प्रतिशत और शहरों में २२ फीसदी के करीब रहा। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में अभी भी लगभग आधे घर ऐसे हैं जहां तक पानी का कनेक्शन नहीं पहुंचा हैं।

सबसे गरीब जिलों की स्थिति दयनीय

ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे जिले जो सबसे गरीब की श्रेणी में आते हैं, वहां तक पानी का कनेक्शन अभी बहुत कम संख्या में पहुंचा है। डिवेलप्ड डिस्ट्रिक्ट कल्स्टर (D1-D7) में १५ से ३८ प्रतिशत घरों में ही नल का पानी आता है। अपेक्षाकृत अधिक विकसित जिले D8-D20 के दायरे में आने वाले ७० प्रतिशत से अधिक घरों में नल का पानी आता है।

यूपी-बिहार-बंगाल नल कनेक्शन में पीछे

उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार जैसे राज्य ऐसे हैं जिनमें नल से पानी की सप्लाई अभी आधे घरों तक भी नहीं पहुंच पा रही है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं जहां ७० प्रतिशत से अधिक घरों में पानी के लिए नल लगाए जा चुके हैं। इन राज्यों के शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों में नल का प्रयोग पानी के लिए किया जा रहा है। हालांकि, २०१९ की रेकॉर्ड तोड़ गर्मियों में इन दोनों ही राज्यों में पानी का संकट बहुत गहरा गया है।

केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने अधिकारियों से कहा कि अगले तीन सालों में हर घर नल का जल पहुंचाना है, खास तौर पर यूपी और बिहार में किया यह जाएगा कि हर गांव में बोरिंग (ड्रिलिंग) की जाएगी, जमीन से पानी खींचा जाएगा और सिंटेक्स टंकी रखकर पाइप से पानी पहुंचा दिया जाएगा। अब इसके लिए हजारों-लाखों बोर करने पड़े तो कोई बात नहीं क्योंकि धरती पर इतने छेद तो पहले से ही हैं।

राष्ट्रपति जी ने पानी और नदियों को लेकर कहा है- ‘२१वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है- बढ़ता हुआ जल-संकट। हमारे देश में जल संरक्षण की परंपरागत और प्रभावी व्यवस्थाएं समय के साथ लुप्त होती जा रही हैं। तालाबों और झीलों पर घर बन गए और जल-स्रोतों के लुप्त होने से गरीबों के लिए पानी का संकट बढ़ता गया। क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते प्रभावों के कारण आने वाले समय में, जल संकट के और गहराने की आशंका है।

आज समय की मांग है कि जिस तरह देश ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को लेकर गंभीरता दिखाई है, वैसी ही गंभीरता ‘जल संरक्षण एवं प्रबंधन’ के विषय में भी दिखानी होगी।’ उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपने बच्चों के लिए पानी बचाना है। और जलशक्ति मंत्रालय इस दिशा में निर्णायक कदम है।

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गजेंद्र सिंह शेखावत राजस्थान के जोधपुर से आते हैं। यह वह इलाका है जिसने भारत को पानी सहेजना सिखाया है। राष्ट्रपति जिन परंपरागत व्यवस्थाओं की बात कर रहे हैं वे यहीं से उपजी हैं। उम्मीद तो यह की जानी चाहिए शेखावत पानी की कीमत को पहचानेगें और पीढिय़ों के लिए काम करेंगे जैसे राष्ट्रनेता करते हैं लेकिन वे तो सीमित नजर वाले राजनेता निकले। उन्हें पता है कि कुओं और तलाबों के प्रबंधन और रख-रखाव में बजट भी ज्यादा लगेगा और इसके परिणाम भी काफी देर से नजर आएगें। तुरत-फुरत वाहवाही के लिए तो अच्छा है कि जमीन खोदो और पानी निकालों। जमीन के भीतर पानी कहां से आएगा यह अगली पीढ़ी की चिंता का विषय है। पीने का पानी या पीने योग्य पानी, समुचित रूप से उच्च गुणवत्ता वाला पानी होता है जिसका तत्काल या दीर्घकालिक नुकसान के न्यूनतम खतरे के साथ सेवन या उपयोग किया जा सकता है। अधिकांश विकसित देशों में घरों, व्यवसायों और उद्योगों में जिस पानी की आपूर्ति की जाती है वह पूरी तरह से पीने के पानी के स्तर का होता है, लेकिन वास्तविकता में इसके एक बहुत ही छोटे अनुपात का उपयोग सेवन या खाद्य सामग्री तैयार करने में किया जाता है।

दुनिया के ज्यादातर बड़े हिस्सों में पीने योग्य पानी तक लोगों की पहुंच अपर्याप्त होती है और वे बीमारी के कारकों, रोगाणुओं या विषैले तत्वों के अस्वीकार्य स्तर या मिले हुए ठोस पदार्थों से संदूषित स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह का पानी पीने योग्य नहीं होता है और पीने या भोजन तैयार करने में इस तरह के पानी का उपयोग बड़े पैमाने पर त्वरित और दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बनता है, साथ ही कई देशों में यह मौत और विपत्ति का एक प्रमुख कारण है। विकासशील देशों में जलजनित रोगों को कम करना सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है।

सामान्य जल आपूर्ति नेटवर्क पीने योग्य पानी नल से उपलब्ध कराते हैं, चाहे इसका उपयोग पीने के लिए या कपड़े धोने के लिए या जमीन की सिंचाई के लिए किया जाना हो। इसके बिल्कुल विपरित चीन के शहरों में पीने का पानी वैकल्पिक रूप से एक अलग नल के द्वारा (अक्सर आसुत जल के रूप में), या अन्यथा नियमित नल के पानी के रूप में उपलब्ध कराया जाता है जिसे उबालने की जरूरत होती है।

धरती की सतह के लगभग ७० प्रतिशत हिस्से में होने के बावजूद अधिकांश पानी खारा है। स्वच्छ पानी धरती के लगभग सभी आबादी वाले क्षेत्रों में उपलब्ध है, हालांकि यह महंगा हो सकता है और आपूर्ति हमेशा स्थायी नहीं हो सकती है। पानी प्राप्त करने वाले स्रोतों में निम्नांकित शामिल हो सकते हैं :-

  • जमीनी स्रोत जैसे कि भूजल, हाइपोरेइक क्षेत्र और एक्विफायर।
  • वर्षण जिनमें वर्षा, ओले, बर्फ, कोहरे आदि शामिल हैं।
  • सतही पानी जैसे कि नदियां, जलधाराएं, ग्लेशियर।
  • जैविक स्रोत जैसे कि पौधे।
  • समुद्र विलवणीकरण (डीसैलिनेशन) के माध्यम से।

झरने का पानी जो एक प्राकृतिक संसाधन है जिससे ज्यादातर बोतलबंद पानी तैयार होता है, आम तौर पर इसमें खनिज मौजूद होते हैं। विकसित देशों में घरेलू जल वितरण प्रणाली द्वारा पहुंचाए जाने वाले नल के पानी (टैप वाटर) का मतलब है एक नल के माध्यम से पाइपों के जरिये घरों तक ले जाया गया पानी. ये सभी पानी के स्वरुप आम तौर पर पीने के काम में आते हैं जिन्हें अक्सर छानकर (फिल्टरेशन) शुद्ध किया जाता है।

पीने योग्य पानी के स्थानांतरण और वितरण का सबसे प्रभावी तरीका पाइपों के माध्यम से है। पाइपलाइन तैयार करने में काफी मात्रा में पूंजी निवेश की आवश्यकता हो सकती है। कुछ प्रणालियां उच्च परिचालन लागत से ग्रस्त हैं। औद्योगिक देशों के खराब होते पानी और स्वच्छता संबंधी बुनियादी सुविधाओं को बदलने की लागत अधिक से अधिक २०० बिलियन डॉलर प्रति वर्ष तक हो सकती है। पाइपों से अनुपचारित और उपचारित पानी का रिसाव पानी तक पहुंच को कम करता है। शहरी प्रणालियों में ५० प्रतिशत तक रिसाव की दरें असामान्य नहीं हैं।

बिना सुरक्षित पीने के पानी की पहुंच वाले लोगों के अनुपात को आधा करने का सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (मिलेनियम डेवलपमेंट गोल) संभवत: १९९० और २०१५ के बीच हासिल किया जा सकता है।

हालांकि कुछ देश अभी भी भारी चुनौतियों का सामना करते हैं।

ग्रामीण समुदाय २०१५ एमडीजी पीने के पानी के लक्ष्य को पूरा करने से काफी दूर हैं। दुनिया भर में ग्रामीण जनसंख्या के केवल २७ प्रतिशत के घरों में सीधे तौर पर पाइप के जरिये पीने का पानी पहुंचाया जाता है और २४ प्रतिशत आबादी असंशोधित स्रोतों पर निर्भर करती है।

पीने का पानी समुचित रूप से उच्च गुणवत्ता वाला पानी होता है जिसका तत्काल या दीर्घकालिक नुकसान के न्यूनतम खतरे के साथ सेवन या उपयोग किया जा सकता है। अधिकांश विकसित देशों में घरों, व्यवसायों और उद्योगों में जिस पानी की आपूर्ति की जाती है वह पूरी तरह से पीने के पानी के स्तर का होता है, लेकिन वास्तविकता में इसके एक बहुत ही छोटे अनुपात का उपयोग सेवन या खाद्य सामग्री तैयार करने में किया जाता है।

दुनिया के ज्यादातर बड़े हिस्सों में पीने योग्य पानी तक लोगों की पहुंच अपर्याप्त होती है और वे बीमारी के कारकों, रोगाणुओं या विषैले तत्वों के अस्वीकार्य स्तर या मिले हुए ठोस पदार्थों से संदूषित स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह का पानी पीने योग्य नहीं होता है और पीने या भोजन तैयार करने में इस तरह के पानी का उपयोग बड़े पैमाने पर त्वरित और दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बनता है, साथ ही कई देशों में यह मौत और विपत्ति का एक प्रमुख कारण है। विकासशील देशों में जलजनित रोगों को कम करना सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्ष्य है। यह काम आसान नहीं है बहुत मुश्किल है मगर मोदी सरकार ने शौचालय बनवाने का काम जिस उत्साह से कर दिखाया है उसे देखकर लगता है कि मोदी है तो मुमकिन है।

सतीश पेडणेकर

 

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