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राज्यसभा उपचुनाव : भाजपा-बीजद में दोस्ती के संकेत

राज्यसभा उपचुनाव : भाजपा-बीजद में दोस्ती के संकेत

राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। यहां परिवर्तन ही चिरंतन है।  राजनीति में कब मित्रता शत्रुता में बदल जाये और धूर विरोधी एक दूसरे को गलबहियां डालने लगे की भविष्यवाणी करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। राज्य में हुए राज्यसभा उपचुनाव में यह स्पष्ट नजर आया है। अप्रैल-मई महीने में हुए आम चुनाव के बाद बीजू जनता दल के चार राज्य सभा सांसद विधानसभा और लोकसभा में चुने गये हैं। इन चार रिक्तियों के स्थान पर चुनाव आयोग ने तीन स्थानों के लिए चुनाव कराने की घोषणा की। एक सीट पर कार्यकाल एक वर्ष से भी कम बचा होने की वजह से उसपर उपचुनाव नहीं कराया गया। राज्य विधानसभा में बीजू जनता दल का प्रचंड बहुमत होने की वजह से बीजद को तीनों सीट जीतने में कोई कठिनाई नहीं होनी थी। इसके बावजूद बीजद ने एक सीट भाजपा को सौंप कर लोगों को हतप्रभ कर दिया है। राजनीति से जुड़े सभी लोग इसे लेकर अपने-अपने तरीके से व्याख्या करने में जुटे हैं।

राज्यसभा में तीन रिक्त स्थानों पर इस बार अमर पटनायक, सस्मित पात्र (दोनों बीजद के) और अश्विनी वैष्णव (भाजपा) के चुने गये हैं। 21 जून को बीजद सुप्रीमो नवीन पटनायक ने जब दलीय प्रार्थियों के नामों की घोषणा की तो उन्होंने तीनों को बीजद प्रार्थी बताया था। पर थोड़ी देर बाद उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि अश्विनी वैष्णव भाजपा के प्रार्थी हैं और बीजद भाजपा को समर्थन देगी। मुख्यमंत्री की इस स्पष्टीकरण के बाद से राज्य का राजनैतिक माहौल ही बदल गया। नवीन पटनायक ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह ने उनसे भाजपा प्रार्थी को समर्थन देने का आग्रह किया था जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। अश्विनी वैष्णव ओडिशा कैडर के पूर्व आई ए एस अधिकारी हैं।

वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निजी सचिव के रूप में भी काम कर चुके हैं। वैष्णव के नवीन पटनायक के साथ भी मधुर संबंध रहे हैं।

भाजपा प्रार्थी चुने जाने के बाद ही वे औपचारिक तौर पर प्रदेश अध्यक्ष और सांसद बसंत पंडा और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुए।

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वैष्णव स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति के बाद राज्य में कुछ खदान कंपनी के निर्देशक के पद कार्यरत हैं। राज्य के प्रमुख खान संचालक बी प्रभाकरण के साथ जुड़ी कंपनियों में निर्देशक के तौर काम करने की वजह से कांग्रेस ने उनकी उम्मीद वारी पर प्रश्न खड़े किये हैं।  कांग्रेस के दिग्गज नेता और विधायक नरसिंह मिश्र ने प्रश्न उठाते हुए कहा कि जब बीजेडी सभी तीन सीटें अपने बलबूते जीतने की स्थिति में थी तो उसने एक सीट भाजपा को ‘दान’  में क्यों दी।  वर्तमान में 145 सदस्यीय राज्य विधानसभा में बीजद के 111 सदस्य हैं। उन्होंने दोनों दलों में सांठगांठ का आरोप लगाया और पूछा कि ऐसे में भाजपा विपक्ष की भूमिका किस प्रकार निभायेगी? प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निरंजन पटनायक ने भी चुनाव के दौरान दोनों दलों द्वारा एक दूसरे पर किये गए आक्रमण को एक नाटक बताया। पर पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुप्त सांठ-गांठ के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि सब कुछ खुले में हुआ है और भाजपा विपक्षी दल की भूमिका पूरी मुस्तैदी से निभायेगी।

बीजद ने केवल वैष्णव का समर्थन ही नहीं दिया बल्कि उन्हें  सौम्य रंजन पटनायक द्वारा खाली की गई सीट दी है। इसके फलस्वरूप वे पांच वर्ष तक (अप्रैल, 2024) राज्य सभा सांसद रहेंगे। जबकि बीजद प्रार्थी सस्मित पात्र को पी. के. देब द्वारा खाली की गई सीट दी गई है। इस सीट पर वे जुलाई 2022 तक रहेंगे। इससे लगता है कि दोनों दलों के बीच पुरानी सौहाद्रता वापस लौट आई है। उल्लेखनीय है कि भाजपा और बीजद 1998 से 2009 तक सहभागी रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार जतिन दाश इस मसले पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते हैं ‘भाजपा को राज्यसभा में समर्थन की जरूरत है और दूसरी ओर बीजद सरकार को केंद्र में दोस्ताना सरकार की आवश्यकता है। दोनों दलों को राज्य और केंद्र में प्रबल जनसमर्थन मिला है। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। अत: दोनों के लिये यह विन-विन की स्थिति है।’

ओडिशा की राजनीति एक नये युग में प्रवेश कर रही है। यहां पक्ष और विपक्ष के बीच की महीन लकीर मिट गई है और अब दोनों मिल कर काम करने को तैयार है।

नवीन पटनायक ने भाजपा को एक सीट दान देकर अपने शासन को निर्विघन और निर्बाध कर लिया है।

भाजपा राज्यसभा में अपनी संख्या बढ़ता देख खुश हो सकती है। पर दूसरी तरफ नवीन पटनायक ने भी अपने राज्य में विपक्ष मुक्त कर लिया है। भाजपा को कई मुद्दों पर मौन धारण करना होगा। कांग्रेस के पास संख्या नहीं है। बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र भी कमजोर होता है जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

 

भुवनेश्वर से सतीश शर्मा

 

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