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मंत्रिमंडल विस्तार विश्वास गंवा चुके सितारे ओझल

मंत्रिमंडल विस्तार  विश्वास गंवा चुके सितारे ओझल

By जयपुर से विजय माथुर

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने मुश्किल लक्ष्य को आसान बनाने की अपनी खासियत का एक बार फिर प्रदर्शन किया है। मंत्रिमंडल विस्तार की घड़ी का सांसे रोककर बेताबी से इंतजार कर रहे वे लोग तो बुरी तरह हतप्रभ हैं, जो अपनी ताजपोशी को पक्की मानकर अपने वफादारों के बीच बेलोस ठहाके लगा रहे थे। राजनीति और कारोबार में माथा देखकर तिलक लगाया जाता है। वसुंधरा राजे ने भी नए चेहरों के माथे पर तिलक लगाया है तो निश्चित रूप से इसके पीछे दूरगामी राजनीतिक अनुभूति की तीव्रता है। भाजपा की धारदार नेता वसुंधरा राजे के अवचेतन में कहीं ना कहीं पुरानी केंचुल उतारकर फेंकने की बेकरारी रही होगी, तभी उन्होंने ‘फ्रीहैंड’ का उम्दा इस्तेमाल करते हुए शतरंज के एक माहिर खिलाड़ी होने का परिचय दिया। राज्य विधानसभा चुनावों में 163 सीटें और लोकसभा में समूची 25 सीटों के विजय रथ पर सवार होकर मरूधरा की रेतीली राजनीति में सितारा हैसियत लेकर लौटी वसुंधरा को मिली छूट का सिक्का खूब चला। उन्होंने अजेय बनने की यात्रा में आदर्श नेतृत्व को भली-भांति परिभाषित किया। पुष्ट सूत्रों की मानें तो केन्द्रीय नेताओं ने वसुंधरा राजे को खुली छूट दे रखी थी कि अपनी सरकार बिना बाधा के चलाने के लिए वे जिसे उपयुक्त समझें मंत्रिमंडल में शामिल कर सकती हैं।

विराट बहुमत लेकर लौटी वसुंधरा राजे के धधकते तेवरों  के कारण उनके  करीबी का दम भरने वाले और संघनिष्ठ माने जाने वाले उनकी छाया से छिटक गए तो इसकी वजह यही रही। वसुंधरा राजे के मिजाज से परिचित राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो, ‘अपनी राह में रोड़ा बनने वालों’ की रड़क निकालने में वे कितनी कामयाब रही हैं, घनश्याम तिवाड़ी, नरपत सिंह राजवी, राव राजेन्द्र सिंह इसकी ताजा मिसाल हैं। घनश्याम तिवाड़ी और नरपतसिंह के लिए सिंहासन बत्तीसी पढऩे का रास्ता तो जयपुर के राजपाल सिंह शेखावत को कैबिनेट मंत्री बनाकर बंद कर दिया।  वैसे भी जयपुर के दो मंत्री हो जाने के बाद क्या बचता था? नागपुर के रेशमबाग से दरियादिली की उम्मीद लगाए तीनों ही नेता शपथग्रहण समारोह में जाने का साहस नहीं जुटा पाए।

वसुंधरा का मंत्रीमंडलीय विस्तार राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन साधने की मशक्कत को ज्यादा दर्शाता है। वहीं आठ नए चेहरों को लेकर शुचिता की प्रतिबद्धता पर भी मुहर लगाता है। उदयपुर से किरण माहेश्वरी को मंत्री बनाए जाने से गुलाबचंद कटारिया कितने दग्ध थे, वसुंधरा राजे ने उनके चेहरे की बेचैनी को भली-भांति भांप लिया था। नतीजतन कटारिया के पल्लू से बंधे जीतमल खांट को भी मंत्री बना दिया गया। ब्राह्मण बिरादरी से राजकुमार रिणवा को मंत्री बनाकर वसुंधरा ने दो काम किए। एक तो इसी बिरादरी के अरुण चतुर्वेदी को ऊंची परवाज भरने पर रोक लगा दी, दूसरी घनश्याम तिवाड़ी के संघनिष्ठ रुतबे को भी खामोश कर दिया। उन्होंने रिणवा को भले ही राज्यमंत्री बनाया, लेकिन स्वतंत्र प्रभार देकर रुतबा भी  तो बढ़ाया है। दूसरी खेप के शपथ ग्रहण में कटारिया का दर्जा बढ़ाने के साथ अरुण चतुर्वेदी को कैबिनेट मंत्री बनाकर ‘मेरी कमीज उजली क्यों सरीखी सभी आशंकाओं का ढक्कन बंद कर दिया। वसुंधरा ने कटारिया की नजरें नीची रखने में गजब की बाजीगरी दिखाई है। उन्हें अपने ही महकमें में तबादलों और पोस्टिंग के अधिकारों से वंचित कर दिया। अरुण चतुर्वेदी का दर्जा बढ़ाकर वसुंधरा ने अपने धुर विरोधी ललित चतुर्वेदी को भी तनावग्रस्त कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि वसुंधरा का यह कदम उनकी संवाद कला, महत्वाकांक्षा और टीम गढऩे की क्षमता को दर्शाता है।

किरण माहेश्वरी के अलावा दो और महिलाओं को मंत्रिमंडल में शामिल कर वसुंधरा राजे ने एक तीर से दो शिकार साधे हैं। पहला – महिला सशक्तीकरण के प्रति अटूट आस्था का संदेश, दूसरा- भरतपुर राजघराने की कृष्णेन्द्र कौर दीपा को मंत्री बनाना भरतपुर जिले में विश्वेन्द्र सिंह के असर को दो इंच छोटा करना तथा अजमेर से अनिता भदेल – को मंत्री बनाकर दलितों की रहनुमा होने का संदेश भी दे दिया। राजनीतिक गलियारों में यह बात ज्यादा चर्चित थी कि अजमेर से दो विधायकों – वासुदेव देवनानी तथा अनिता भदेल को क्यों प्रतिनिधत्व दिया गया? हकीकत समझें तो देवनानी को नागपुर के रेशमबाग की खास अनुकम्पा वाला नेता माना जाता है। हालांकि उनके खाते में पिछले चुनाव के सदस्यता अभियान का संयोजक होने की उपलब्धि भी शामिल है। अनिता भदेल को मंत्री बनवाने में राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत का हाथ माना जाता है। लेकिन, यह बात भी उतनी सही है कि उनकी ‘राजनीतिक सक्रियता और स्वच्छ छवि’ चौंकाने वाली रही है।

भाजपा के राजनीतिक हल्कों में कोटा का कटोरा रीता रह जाना बेहद हलचल भरा रहा।  सूत्र बताते हैं कि पिछले मंत्रिमंडल के गठन में गुर्जर नेता हेमसिंह भडाना को राज्यमंत्री बनाया गया था। इस बार उनका दर्जा बढ़ाकर कैबिनेट मंत्री कर दिया गया। ऐसे में कोटा (उत्तर) के विधायक प्रह्लाद गुंजल के लिए जगह भी कहां थी। कांग्रेस सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शांति धारीवाल को पराजित करने का पुण्यलाभ कमाने का तोहफा भी  गुंजल को नहीं मिला। उनके मुख्य सचेतक बनने की उम्मीद बंधी थी लेकिन यह ओहदा देने की पटकथा में आखिरी वक्त तब्दीली कर दी गई। सूत्र कहते हैं कि ‘राजनीतिक रार छिडऩे के अंदेशे में भवानी सिंह राजावत और प्रह्लाद गुंजल को मंत्री नहीं बनाया गया’। विश्लेषकों का कहना है कि  ‘सांसद ओम बिरला के विरोध के कारण गुंजल और राजावत के पांव तले मंत्रीपद की बिसात नहीं बिछ पाई।’ जानकार सूत्रों का कहना है कि ‘सांसद ओम बिरला ने प्रह्लाद गुंजल का मंत्रीपरिषद् में शामिल होने से रोकने के लिए पूरा जोर लगा रखा था। लिहाजा गुंजल का नाम कटने से राजावत के सितारे भी स्याह हो गए।’ अलबत्ता, यह बात चौंकाती है कि कोई खास शख्सियत नहीं होने के बावजूद बूंदी से केशवराय, पाटन विधायक बाबूलाल वर्मा को आखिरी लम्हों में मंत्री बना दिया गया। हालांकि कोटा संभाग की भाजपा राजनीति में पहली बार बूंदी का पलड़ा भारी रहा है, लेकिन उनको पद मिलने से संभाग की भाजपा राजनीति गरमा सकती है। विश्लेषकों की मानें तो ‘अधिकारियों को मुर्गा बना दूंगा’ या फिर ‘हार्ट का वल्व बंद कर दूंगा’ सरीखी दबंगई और बदजुबानी राजावत की ताजपोशी में बाधक बन गई। बेलगाम जुबान के अंदेशों ने भी उनकी राह में कांटे बिछा दिए। हालांकि गुंजल और राजावत को सत्ता की कश्ती में नहीं बिठाए जाने के और भी ढेरों कारण हंै। दिलचस्प बात है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार की विफलताओं पर प्रह्लाद गुंजल का जंगी प्रदर्शन उन्हें पूरे संभाग में कद्दावर बना गया था,  फिर भी उनकी ताजपोशी की टे्रन छूट गई तो इसके पीछे विश्लेषक नई राजनीतिक दस्तक मानते हैं कि ‘वसुंधरा ने उन्हें धारीवाल के खिलाफ इस्तेमाल किया और भूल गई। राजगंज मंडी से विधायक चुनी गई चन्द्रकांता मेघवाल का स्वप्नखंडन भी चौंकाता है। वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल में नगरीय विकास मंत्री रहे छबड़ा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी को तो वसुंधरा राजे ने अप्रत्यक्ष संकेत दे दिए थे कि इस बार उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलेगी। इस बुरी खबर के लिए सिंघवी तैयार भी थे, लेकिन पता नहीं क्यों वे बयानबाजी कर रहे हैं कि मेरा तो नाम भी चल रहा था।
म्ंत्रिमंडल विस्तार में पाली इकलौता जिला रहा जहां से तीन नेताओं क्रमश: जैतारण से सुरेन्द्र गोयल, बाली से पुष्पेन्द्र सिंह राणावत तथा पाली के ही रहने वाले तथा पड़ोसी जिले की सीट सिरोही से विधायक बने ओटाराम  देवासी को प्रतिनिधित्व क्यों दिया गया? जानकार सूत्रों का कहना है कि इस कवायद में वसुंधरा राजे ने देश की राजनीति में भाजपा के रणनीतिकार बन कर उभरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी माने जाने वाले ओमप्रकाश माथुर को साधने का प्रयास किया है। माथुर पाली जिले के ही रहने वाले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रदेश की राजनीति में माथुर सत्ता का नया केन्द्र बनते जा रहे थे। उनके समर्थकों ने तो उन्हें भावी मुख्यमंत्री तक बताना शुरू कर दिया था। ऐसे में माथुर वसुंधरा की सत्ता के लिए खतरा बनते जा रहे थे। वसुंधरा ने पुष्पेन्द्र सिंह राणावत को मंत्री बनाकर माथुर के घर में सेंध लगाने की कोशिश की है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे कार्यकर्ताओं की जो भीड़ माथुर को सत्ता का केन्द्र मानकर उनकी तरफ  भाग रही थी उसे राणावत की तरफ मोड़ा जा सकेगा।

पिछले कार्यकाल में अपने ही लोगों के चक्रव्यूह में घिरी रही वसुंधरा ने इस बार मंत्रिमंडल के गठन में फूंक-फूंक कर कदम उठाए हैं। इस बार उन्होंने चुनावों में ऐसे विकेटकीपर-बल्लेबाज की भूमिका निभाई है, जो अपने प्रहार से स्टेडियम में तहलका मचा देता है। विश्लेषक कहते हैं कि ‘वसुंधरा ने इस बार टीम की नई परिभाषा गढ़ी है’, जो अपनी क्षमता दिखा सकती है। इस बार वसुंधरा ने पूरी तरह भरोसेमंद टीम को लेकर शासन का श्रीगणेश किया है। कुर्सी पर वापसी के बाद वसुंधरा राजे की समझ में आ गया है कि शासन चलाने के लिए सिर्फ  मुस्कान ही काफी नहीं,उम्मीदेंजगानेवालाचुस्तप्रशासनभीचाहिए।

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