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मालिक अपनी मर्जी के!

मालिक अपनी मर्जी के!

By राजेश पाठक

कहते हैं कि किसी काम को लेकर सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ जाये तो प्रायवेट कंपनीयों की चुस्त कार्य-शैली का महत्व समझ में आ जाता है। पर पिछले दिनों ये मान्यता मुझे दगा दे गयी, तब जबकि मेरा एक स्कूटर खरीदना हुआ उन कंपनीयों में से एक से जिन्हें देश में आटो गियर स्कूटर को चलन में लाने का श्रेय जाता है। सारा भुगतान तो वैसे हो चुका था, लेकिन कुछ असेसरीज (बजर, डिग्गी आदि) उपलब्ध ना होने के कारण सेल्स्मेन नें बाद में आकर लगवाने को कहा। स्वभाविक है, मैं मान गया, नहीं पता था कि आने-जाने का सिलसिला जो एक बार शुरु होगा तो उसका अन्त आसानी से नहीं होने वाला। और मुझे वो अनुभव मिलना शुरु हुये जिनसे अक्सर पाला सरकारी दफ्तरों में ही पड़ता है। लगा कि जरुरी नहीं कि किसी प्रतिष्ठत निजी कंपनी में आपका सामना ऐसे कर्मियों से न हो जो अपने आपको ‘अपनी मर्जी के मालिक’ न समझते हों। एक, दो, तीन पूरे चार चक्कर लगाने के बाद भी जब असेसरीज न मिली तो सेल्स्मेन से मैंने बोला कि अब जब उनके यहां सामान आ जाये तो वे खुद ही फोन कर दें मैं चला आऊंगा।

ये तय है कि लोग भले ही अपने को ना बदलना चाहें, व्यवस्था अच्छे-अच्छे बिगड़ों को बदल कर रख डालती है। जरुरत है तो केवल व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे उसे संचालित करने वाले लोगों में इच्छा-शक्ति की। नहीं तो 90 के दशक में टी.एन शैषन के चुनाव आयुक्त बनने के पूर्व किसने सोचा था कि देश में और खासतौर पर बिहार जैसे राज्यों में चुनाव बिना बूथ-केपचरिंग या धांधली के संपन्न भी हो सकते हैं। या 80 के दशक में मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और पुलिस महानिदेशक के.पी.एस गिल के सक्रिय होने के पहले कौन कह सकता था कि पंजाब में आतंकवाद से मुक्त दौर भी एक दिन फिर से लौट कर आयेगा। खैर, एक दिन शौरुम से फोन आता है ये बताने के लिये कि सामान उपलब्ध है मैं आकर के स्कूटर में लगवा लूं। पता नहीं सामान का कोई और हकदार मुझसे पहले ना जा पहुंचे, मै तत्काल सारे काम छोड़कर शौरुम जा पहुंचा। मुझसे इंतजार करने को कहा गया। एक घंटे से अधिक इंतजार करवा लेने के बाद मुझे खेदरहित और बड़े ही निरपेक्ष भाव से सेल्समेन कहता है कि मैकेनिक रमजान की जुमे की नमाज पढऩे चले गये हैं और अब लौटेंगे भी की नहीं, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। अब आपका काम शायद ही हो पाये- आप किसी और दिन आयें। एक तो सामने वाले के बुलाने पर आप पहुंचो, फिर घंटे भर इंतजार करते रहो और उपर से ये सुनने को मिल जाये तो कौन है जो आपा ना खो दे! मैनें झल्लाते हुये सेल्स्मेन से उनके वरिष्ठ अधिकारी का फोन नम्बर मांगा। मैनें अब मामले को ऊपर तक ले जाने की ठान ली थी। सैल्स्मेन ने जो नम्बर दिया वो कंपनी के जनरल मैनेजर का था। स्विच ऑफ होने के कारण तब तो फोन लगा नहीं, लेकिन घर पहुंच कर जब मैंने फोन लगाया तो लग गया। उनको जब मैंने पूरा हाल सुनाया तो ये कहते हुये कि वो दोबारा बात करते है उन्होनें फोन काट दिया। कुछ देर बाद उनका फोन आता है। जाहिर है कि वो अब तक अपने स्टाफ से बात कर  चुके थे। और व्यवस्था को ठीक करने की जिस बात को हम ऊपर चर्चा कर आये हैं लगा उसमें जनरल मैनेजर सहाब की कोई दिलचस्पी नहीं। पता नहीं अपने अधीनस्थों से उन्हें क्या पता चला, या नमाजियों के सामने अपने को बेबस पाया कि अपने स्टाफ के पक्ष में डटकर खड़े हो मुझे ही गलत ठहरने में जुट गये। इस प्रक्रिया में उनका जोश, उनका वाक् कौशल देख मुझे अपनी ‘पराजय’ स्वीकार कर लेने में ही भलाई दिखी। और बात को खत्म करते हुये मैंने उनसे अनुरोध किया कि बेहतर होगा कि मेरे पैसे बापस कर दिये जाये, और रही बात असेसरीज की तो वो मैं कहीं और से लगवा लुंगा।

माना जाता है कि ग्राहक भले धैर्य चूक जाये, पर बाजार में जो व्यापार  करने बैठा है उससे उम्मीद की जाती है कि वो दस बार संयम का परिचय दे। पर इस मामले में जनरल मैनेजर सहाब नें मुझे पीछे छोड़ते हुये मेरे अनुरोध को स्वीकार करने में जरा भी देर नहीं लगाई। और फिर एक दिन शोरुम जाकर और अपने पैसे लेकर मैंने मामले का पटाक्षेप किया।

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