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हुई मन की बात

हुई मन की बात

By पूजा मेहरोत्रा

रेडियो युग ऐसा वापस आया है कि एक बार फिर हर घर में अपना स्थान बना लिया है। घर-घर में रेडियो को पहुंचाने का पूरा-पूरा श्रेय जाता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को। ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के आदर्श वाक्य वाले आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) की स्थापना के नियंत्रक लायनेल फील्डन की बातों को शायद मोदी ने आत्मसात कर लिया है। फील्डन ने कहा था – ”भारत जैसे विशाल देश में प्रसारण जितनी शिक्षा दे सकता है, एकता ला सकता है और निर्देश दे सकता है, उतना कोई माध्यम नहीं कर सकता है।’’ मोदी ने उनकी इस बात को सच साबित करने का प्रयास किया है।

एफएम युग में ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) फिर से फैशन में आ गया है। आकाशवाणी का फैशन लोगों के दिलों-दिमाग पर ऐसा छाया है कि घरों के किसी कोने में, अलमारी के उपर, कबाडख़ाने में पहुंचकर अंतिम सांस ले रहा रेडियो आज महानगरों के ड्राइंगरूम से लेकर गांवों की बैठकों और पंचायतों तक पहुंच गया है। घर-घर में रेडियो को एक बार फिर से पहुंचाने का पूरा श्रेय जाता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी देश की सवा सौ करोड़ जनता तक पहुंचने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं। महानगरों में तो वे फेसबुक, ट्वीटर और ब्लॉग के जरिए हर पल जनता से जुड़े रहते हैं, लेकिन दूर-दराज के गांवों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए प्रधानमंत्री ने नायाब तरीका ढूंढ निकाला है। अभी तक राष्ट्रपति द्वारा देश के नाम संदेश से जुडऩे वाला रेडियो आज महीने में एक दिन एक-दूसरे को जोडऩे का कार्य कर रहा हैं। दो नवंबर को सुबह 11 बजे एक बार फिर पूरा देश रेडियो से कान लगाए बैठा था। मौका था तो दस्तूर भी था। आखिर प्रधानमंत्री अपने मन की बात जो करने वाले थे। 3 अक्तूबर को जिन्होंने भी मन की बात को नजरअंदाज किया था वे इस मौके को नहीं छोडऩा चाहते थे। क्या बोलेंगे आज प्रधानमंत्री, क्या कुछ नया करने जा रहे हैं, क्या फिर कोई नया मिशन होगा, ऐसे कई सवाल रेडियो के साथ बैठे लोगों के मन में घुमड़ रहे थे। लेकिन, इन सब के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात, जिस पर लोगों ने शायद ध्यान नहीं दिया, वह यह है  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की हर उस डूबती हुई धरोहर को महज दो महीने में सहेजने का काम करना। पहली बार खादी और अब रेडियो।

2 नवंबर को मन की बात के जरिए 25 मिनट तक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के देश के हर नागरिक से अपनी बात जोरदार तरीके से कही और एक ही समय में आकाशवाणी के 126 चैनलों के माध्यम से 125 करोड़ नागरिकों के घर-घर पहुंचे। यही नहीं विदेशों में बैठे अप्रवासी भारतीयों ने भी बिना समय गंवाए उन्हें बहुत ध्यान से सुना। यहां तक कि दूरदर्शन और अन्य चैनल भी पूरे दिन रेडियो में ही तब्दील रहे। इसे कहते है फैशन, जिसने टेलीविजन को भी रेडियो बना दिया। प्रधानमंत्री ने जब 5 सितंबर को रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से देशभर के स्कूली बच्चों से जुडऩे की बात की थी तब शायद ही किसी ने नहीं सोचा था कि इसका असर इतना गहरा और लंबे समय तक होने वाला है।

अक्तूबर में जब पहली बार प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात की थी तो उन्होंने महात्मा गांधी और खादी को खूब भुनाया था। खादी का एक रुमाल खरीदकर अपने पास रखने की बात जब प्रधानमंत्री ने की थी तब उनकी इस बात की प्रशंसा पूरे देश के साथ-साथ उनके घूर विरोधियों ने भी की थी। दिवाली के दिन उनके सियाचीन में देश के रक्षकों के पास पहुंचने की प्रशंसा भी उतनी हुई। मोदी ने शायद हर बात में विरोधियों को चुप कराने का मन बना लिया है। उन्होंने मन की बात कुछ यूं रखी – ”काले धन पर जितनी हाय-तौबा हो रही है, आप मुझ पर विश्वास कीजिए मैं पूरा पैसा वापस लाउंगा।’’ उन्होंने अनोखे अंदाज से पूरे देशवासियों को बता दिया कि मैं ही क्या, पुरानी सरकार भी नहीं जानती कि विदेशी बैंकों में भारत का कितना कालाधन जमा है। उन्होंने दूर-दराज के देशवासियों से कहा कि यदि आपके पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है तो आप हमें पत्र लिखें। मोदी ने अनोखे अंदाज में डूबती डाक विभाग को भी उबारने का फैसला ले लिया।

डूबती खादी, खोता रेडियो और डगमगाते डाक विभाग को तो अब प्रधानमंत्री ने फैशन में ला ही दिया है। साफ-सफाई पर उन्होंने पहले ही एक बड़ा अभियान छेड़ रखा है जहां नेता से लेकर अभिनेता तक झाडू लिए नजर आ रहे हैं। इस तरह प्रधानमंत्री के मन की बात होती जा रही है। लेकिन बात है आकाशवाणी की तो आपको बता दूं कि ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के आदर्श वाक्य वाले आकाशवाणी की स्थापना के नियंत्रक लायनेल फील्डन ने कहा था – ”भारत जैसे विशाल देश में प्रसारण जितनी शिक्षा दे सकता है, एकता ला सकता है और निर्देश दे सकता है उतना कोई माध्यम नहीं कर सकता है।’’ आज उनकी बात सच होती प्रतीत होती दिख रही है।

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