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मोदी की नजर में भविष्य निर्माण

मोदी की नजर में भविष्य निर्माण

By रविशंकर कपूर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर में युवाओं की महत्ता जगजाहिर है। अक्सर वे कहा करते हैं कि भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष की उम्र से नीचे की है और जनसंख्या के मामले में देश की इस बढ़त का लाभ उठाना चाहिए। अपने अमेरिका यात्रा में उन्होंने न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में ग्लोबल सीटिजन फेस्टिवल के दौरान भी नौजवानों में अपने भरोसे का इजहार किया। तकरीबन 60 हजार की भीड़, जिसमें अधिकांश अमेरिकी छात्र थे, को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ”कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्गों के अनुभव और बुद्धि से दुनिया बदलती है। मेरा मानना है कि आदर्शवाद, अनुसंधान, ऊर्जा और युवाओं का ‘कर सकते हैं’ का रवैया ज्यादा ताकतवर होता है।’’

उनकी सरकार ऐसे आदर्शवाद, ऊर्जा और रवैये को ठोस शक्ल देने की कोशिश कर रही है। मसलन, 2014-15 के बजट में राष्ट्रीय विविध कौशल निर्माण कार्यक्रम ‘हुनरमंद भारत’ का प्रावधान किया गया है। बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ”इससे नौजवानों में रोजगार और उद्यमशीलता के लिए जरूरी कौशल पैदा होगा। इसके तहत वेल्डर, बढ़ई, मोची, राजमिस्त्री, लोहार, जुलाहे वगैरह के परंपरागत पेशों के लिए भी प्रशिक्षण और मदद मुहैया कराई जाएगी। इस उद्देश्य के लिए विभिन्न योजनाओं का विलय भी किया जाएगा।’’

ऐसे पेशेवरों को ताकत देने के अलावा कला और व्यावहारिक कला को जगाने की दरकार है। शुक्र है कि सरकार का ध्यान इस ओर भी है। सरकार इसे पर्यटन से जोडऩा चाहती है, जो रोजगार सृजन का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है और जिस पर प्रधानमंत्री का विशेष ध्यान भी है। सो, जुलाहों, कलाकारों और हस्तकला के धुरंधरों के गांवों को पर्यटन से जोडऩे की कवायद चल रही है। कपड़ा सचिव एस.के. पांडा ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखा है कि सांसद ग्राम योजना की तर्ज पर विकास के लिए चार-पांच गांवों को चिन्हित करें, जिसकी घोषणा मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में की थी।

मुख्य सचिवों को अपनी चिट्ठी में पांडा ने लिखा, ”हस्तकरघा और हस्तकला वाले चुनींदा गांवों को पर्यटन क्षेत्र के लिहाज से विकसित करने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं का विकास क्षेत्र में जारी विभिन्न योजनाओं की मद से किया जाना चाहिए…’’ इससे युवाओं में परंपरागत कला को अपनाने की प्रेरणा जगेगी।’’

कानूनी बदलाव
यही नहीं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों की योजनाओं को असंतोषजनक पाकर जुलाई में केंद्रीय कैबिनेट ने अप्रेंटिसशिप कानून में संशोधन का प्रस्ताव किया। कानून का पालन न करने वाले नियोक्ताओं को गिरफ्तार करने वाले प्रावधान को हटा दिया गया। अमूमन नियोक्ता कानून के डर से अपे्रंटिस प्राप्त युवाओं को रखने से घबराते थे। लिहाजा, उन्हें मिला प्रशिक्षण बेकार चला जाता था।

अप्रेंटिस कानून में संशोधन के दौरान इसमें 500 नई विधाओं को भी जोड़ा गया। सरकार रोजगार केंद्रों को कॅरिअर केंद्रों में बदलना चाहती है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा था, ”ये केंद्र युवाओं को उनकी क्षमता और दिलचस्पी के हिसाब से रोजगार चयन का परामर्श भी देंगे।’’ उन्होंने युवा नेतृत्व कार्यक्रम का भी ऐलान किया और प्रारंभ में उस मद में 100 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया।

क्या आप युवा है? युवा वह है-

08-11-2014

जो अनीति से लड़ता है।
जो दुगुणों से दूर रहता है।
जो काल की चाल को बदल देता है।
जिसमें जोश के साथ होश भी है।
जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है।
जो समस्याओं का समाधान निकालता है।
जो प्रेरक इतिहास रचता है।
जो बातों का बादशाह नहीं बल्कि करके दिखाता है।

08-11-2014

मोदी सरकार की युवाओं और बाकी लोगों के लिए नीतियों का अहम पहलू यह है कि वह सरकारी खैरात के बदले लोगों के उद्यम और प्रयासों पर ज्यादा जोर देती है। अपने 64वें जन्मदिन पर गुजरात सरकार की युवा, महिला और गरीबों के उत्थान के लिए 11 नए कल्याण कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मोदी ने अफसोस जाहिर किया कि ”हमारे दुर्भाग्य से, देश में जारी योजनाएं और कार्यक्रम ऐसे हैं कि वे गरीब लोगों को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने के बदले सरकार पर आश्रित कर देते हैं। अगर सरकारी योजाएं बंद हो जाएं तो लोग भूखे मर जाएंगे। क्या हम इस हालात को बदल नहीं सकते? ईश्वर ने हमें हाथ, बुद्धि, शिक्षा दी है… इसी तरह दलित, आदिवासी और गरीबों को भी दी है। उन्हें बस अवसर नहीं मिलता। अगर उन्हें अवसर मिले तो वे भी किसी के आश्रय में जीना पसंद नहीं करेंगे।’’

इसी मायने में मोदी बुनियादी रूप से सिर्फ कांग्रेस के नहीं, भारतीय जनता पार्टी सहित दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी अलग हैं। उनका नजरिया जनोन्मुख है, न कि महज आंकड़ों वाला। वे यह स्वीकार करते हैं कि सरकार हमारे लोकतंत्र की तमाम बीमारियों का समाधान नहीं कर सकती।

लोकतंत्र महज एक बार वोट देने का ही नाम नहीं है। लोकतंत्र सुशासन और लोगों के प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह नीतियों का भी नाम है, न कि कुछ सीविल सोसायटी और एनजीओ के कुछ बड़बोले लेागों की बातें सुनने का।

लोकतंत्र वह कला है जिससे हमारी स्वतंत्रता निकलती है, वह हर तरह के छोटे-बड़े उत्पीडऩ के खिलाफ कवच की तरह होनी चाहिए। यानी लोकतंत्र का संबंध लोगों से है। अगर लोग सभ्य, संतुष्ट और तर्कसम्मत बने रहेंगे तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। लेकिन लोग अगर टुकड़ों में बंट जाएंगे, छोटी-छोटी भावनाओं से उत्तेजित होते रहेंगे तो लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रहेगा। आज भारत के यही हालात हैं।

साहित्य, संगीत, कला विहिन
हम भारत के लोग तेजी से अधीर बनते जा रहे हैं। क्रिकेट मैच जीतते ही धोनी और उनके साथी हमारे लिए भगवान बन जाते हैं, लेकिन थोड़े दिनों बाद कोई मैच हार जाते हैं तो वे राक्षस जैसे बन जाते हैं। दोनों ही मामलों में तात्कालिक भावनाएं हम पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि हम भूल जाते हैं कि क्रिकेटर कोई भगवान या राक्षस नहीं हैं, वे भी हमारी तरह इंसान हैं जिसके जीवन में हार-जीत लगी रहती है। हमारे देश में निर्भया कांड जैसी बड़ी से बड़ी घटनाएं भी भावनाएं तो बहुत भड़काती हैं लेकिन अंत में कोई समाधान नहीं निकलता। राजनीति में वाम पक्ष के नेता अपने राजनैतिक हितों के लिए ऐसी भावनाओं को भड़काते हैं।

ये घटनाएं इसलिए हो रही हैं क्योंकि भारतीय समाज में तात्कालिकता पर बहुत जोर है। हमारे नौजवान थोड़े समय के लिए किसी धुन, किसी रिंगटोन या वीडियो गेम से थिरकते रहते हैं। वे छोटी-मोटी खुशियों के लिए महान साहित्य और कला के गहरे आनंद उठाने की ओर प्रेरित नहीं हो पाते। आज, मामूली चीजों में ही लोगों की दिलचस्पी है।

दरअसल राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र और इतिहास के अज्ञान के कारण वामपक्षीय राजनीति सार्वजनिक बहसों में भारी बनी रहती है। यह स्थिति तभी बदलेगी जब समाज में नई ऊर्जा जगेगी और लोगों की रुचियां परिष्कृत होंगी।

इसलिए लोगों को अपनी चेतना का स्तर ऊपर उठाकर समाज में एक तरह का स्थायित्व लाना चाहिए। उन्हें साहित्य गोष्ठियां, फिल्म सोसाइटीज, गीत-संगीत वगैरह को बढ़ावा देना चाहिए। युवाओं को महत्वपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक मुद्दों से जोडऩा चाहिए, वरना भारतीय समाज अपनी ऊर्जा खो बैठेगा। वह वैसा हो जाएगा, जैसा संस्कृत कवि भतृहरि ने लिखा है, ”साहित्य, संगीत, कला विहिना/ साक्षात पशु पुच्छ बिषान हीना।’’

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