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हर धर्म की विविधता को स्वीकार करें

हर धर्म की विविधता को स्वीकार करें

By उपाली अपराजिता रथ

पूरे विश्व में भारत एक ऐसा देश है जहां हर धर्म के लोग एक ही शासन के नीचे रहते हैं। हमारे संविधान ने हर धर्म को समान अधिकार दिए हैं। धर्म को आधार बनाकर हमारे शासन नीति में अनेक खास बातों को शामिल किया गया है। हमारे देश में हर धर्म को समान अधिकार दिया गया है। किसी भी व्यक्ति को अपने पसंद के धर्म को अपनाने का अधिकार है। हम मिल-जुलकर रहने का प्रयास करते हैं और इसे पसंद करते हैं, लेकिन हम मन से हर धर्म की भिन्नता को स्वीकार नहीं कर पाते। हर धर्म के व्यक्ति न सिर्फ अपने धर्म को सर्वोत्तम मानते हैं, बल्कि दूसरों के धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते हैं। जो इंसान धर्म के नाम पर संकीर्णत्ता का प्रदर्शन करते हैं उनको असलियत में धर्म का ज्ञान नहीं होता।

धर्म इतना व्यापक है कि हमारी तुलना से बाहर है, धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है। धृ का अर्थ धारण करना है। अर्थात् धर्म अपने अंदर सब कुछ  धारण करता है। धारण करने की कोई सीमा नहीं होती। समग्र विश्व में धर्म अपने अंदर धारण कर सकता है। धर्म का विभाजन भी संभव नहीं है। लेकिन, अपने मन के विभाजन को हम धर्म का विभाजन मान लेते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में मानव जीवन के असली धर्म का बहुत सुंदर रूप से वर्णन किया है। मानव जीवन का असली स्वरूप उसकी आत्मा होती है। एक आत्मा का अगर कोई भी धर्म है तो वह केवल परमात्मा से जाकर मिलना है। हम कोई भी मार्ग अपनाएं, लेकिन एक सच्चे मानव का सिर्फ एक ही धर्म होता है। केवल परमात्मा से मिलकर ही उसका लक्ष्य पूरा होता है। सिर्फ हिंदू धर्म में ही नहीं, हर धर्म का मकसद एक ही है। लेकिन हम इस बात को महसूस नहीं कर पाते।

हम दूसरों के धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास करके पूरे समाज में अपने आपको सबकी नजर में संकीर्ण करते हैं। हमारा आचार-व्यवहार ही दुनिया से हमारा असली परिचय कराता है। किसी के प्रति सद्भावना भी अपने धर्म के प्रति लोगों में मन एक सुखद भाव जगाता है।

आजकल राजनैतिक जीवन में तरक्की के लिए लोग धर्म को माध्यम बना लेते हैं। एक आदमी को अपने धर्म को लोगों के बीच में महान बनने के लिए बस दूसरे के धर्म पर आक्षेप लगाना होता है। अन्य धर्म के परमेश्वर की भी निंदा करने से कतराते नहीं हैं। शायद उन्हें यह महसूस नहीं होता कि इससे वे कुछ गिने-चुने संकीर्ण मानसिकता के लोगों को ही बहला सकते हैं, लेकिन परमात्मा की नजर में वे खुद कितने छोटे हो जाते हैं, इसका अहसास उन्हें नहीं होता।

अपने मानवीय धर्म से जुड़कर हर व्यक्ति को आनेवाले हर मुश्किल से खुद को अलग रखना चाहिए। इस आधुनिक दुनिया में रहकर खुद को संकीर्णता के आगे जाकर सोचना चाहिए। मानव धर्म अपनाकर हम न सिर्फ उन्नति के पथ पर अग्रसरित हो सकते हैं बल्कि पूरे समाज को भी उन्नति के पथ पर ले जा सकते हैं।

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