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भारत के विरले सरदार

भारत के विरले सरदार

आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल की हैसियत से लॉर्ड माउंटबेटन ने 19 जून 1948 को ‘सरदार’ वल्लभभाई पटेल को लिखा, ”इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा सरकार की अभी तक सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय संघ में रियासतों का एकीकरण है। अगर आप इसमें नाकाम हो जाते तो नतीजे भयावह होते। लेकिन आप इसमें सफल हो गए तो कोई भी उन भयावह स्थितियों का अंदाजा नहीं लगा पायेगा जिसे आपने दूर कर दिया है। आपने रियासतों के मामले में जो अनोखी नीति बनाई, उससे बड़ा सम्मान मौजूदा सरकार के लिए कुछ और हो नहीं सकता।’’

सरदार पटेल सही अर्थों में अनोखे महापुरुष थे। हम भारतवासी आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में बाकी नेताओं से अधिक उनके आभारी हैं। ज्यादातर देशवासी भारत की एकता और स्थायित्व में सरदार पटेल के महती योगदान से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। हमें उनके प्रति आज पहले से अधिक आभार जताने की दरकार है।

अगर महात्मा गांधी ने देश के प्रधानमंत्री के पद पर नेहरू को नहीं बैठाया होता और अगर ‘असाधारण नेता’ पटेल को प्रधानमंत्री बनने दिया होता तो देश का इतिहास आज कुछ अलग होता। लेकिन, महात्मा अपनी कमजोरियों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। पटेल स्वतंत्रता संग्राम के न सिर्फ मुख्य संगठनकर्ता थे, बल्कि आजादी की लड़ाई के बाद नए राष्ट्र के प्रमुख सूत्रधार भी बने। इतिहास में, कोई भी विद्रोही और राजनेता दोनों भूमिकाओं में शायद ही सफल रहा है। पटेल ऐसे ही विरले व्यक्तित्व थे।

देश के इतिहास को बदल देने की संभावना वाली एक घटना का जिक्र करना यहां अनिवार्य है। 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के दौरान कुल 16 राज्यों में 13 राज्यों की कांग्रेस कमेटी ने इस पद के लिए सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था। यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था और कांग्रेस का निर्वाचित अध्यक्ष ही बाद में स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बनने वाला था। इस महत्वपूर्ण चुनाव के पहले महात्मा गांधी ने सरदार पटेल से आग्रह किया कि वे जवाहरलाल नेहरू के पक्ष में अपनी उम्मीदवारी छोड़ दें। सरदार पटेल कुछ सोचे बगैर मैदान से हट गए। लेकिन देश को उसकी कीमत चुकानी पड़ी।

पटेल रणनीतिक मामलों में बेहद दूरदर्शी थे और अपने विचारों में समय से आगे सोचते थे। उनकी दृष्टि ‘राजनैतिक यथार्थ’ से प्रेरित थी जबकि नेहरू ‘राजनैतिक आदर्शवाद’ से प्रभावित होते थे। उन्होंने लिखित में नेहरू को कश्मीर और चीन से संबंधित नीतियों पर आगाह किया था। हैदराबाद के मुद्दे को जानमाल की मामूली क्षति के साथ समाधान (हैदराबाद पुलिस कार्रवाई में सेना के सिर्फ चार जवान मारे गए) निकाल लेने से नेहरू और पटेल के नजरिए का फर्क भी उजागर हो गया था। कश्मीर और चीन के मोर्चे पर हमारी नाकामियां नेहरू के लस्त-पस्त रवैए का ही नतीजा थीं।

यहां तक कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि सिर्फ पटेल ही सैकड़ों रियासतों को एक करने की चुनौती से निपट सकते हैं। सरदार पटेल में विश्वास जता कर महात्मा गांधी ने उनसे कहा था, ”रियासतों की समस्या इतनी कठिन है कि सिर्फ आप ही इसे हल कर सकते हो।’’ पटेल ने अपने उद्देश्य के लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति अपनाने से परहेज नहीं किया। उनका संकल्प और कार्यशैली ऐसी थी कि रियासतों के पास भारत में विलय करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। उन्होंने इसके लिए हर नुस्खा अपनाया। वे उनके साथ नरमी से पेश आए जो समझदारी दिखा रहे थे और विलय को तैयार थे। लेकिन उनके प्रति सख्त थे जो ना-नुकुर कर रहे थे और अपने अलग मंसूबे पाल रखे थे। जहां जरूरी हुआ, वहां सेना भेजने से भी नहीं हिचके।

सरदार पटेल सिद्धांतों पर दृढ़ रहने वाले नेता थे। वे राष्ट्रवादी थे और कभी भी ‘राष्ट्र सबसे पहले’ के मूल दर्शन से डिगते नहीं थे। सरदार पटेल को उनकी योग्यता के अनुसार पद से वंचित किया गया लेकिन आज भी देश के लोग उन्हें आदर से सबसे काबिल राजनैतिक प्रशासक के रूप में याद करते हैं। उन्हें हमेशा देश के पहले और एकमात्र ‘लौहपुरुष’ के रूप में याद किया जाएगा। यह मोदी के एनडीए का ही नहीं, बल्कि हर देशवासी का कर्तव्य है कि हम सरदार यानी भारत को एक करने वाले महापुरुष के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करे।

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