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गुरू का महत्व एवं उनकी प्रासंगिकता

गुरू का महत्व एवं उनकी प्रासंगिकता

शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं

यशश्चारू चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं

गृहं बान्धवा: सर्वमेतद्धि जातम्।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

विदेशेषु मान्य: स्वदेशेषु धन्य:

सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्य:।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दै:

सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्

जगद्वस्तु सर्वं करे सत्प्रसादात्।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ

न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये

न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

अनध्र्याणि रत्नानि मुक्तानि सम्यक्

समालिगंता कामिनी यामिनीषु।

मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्।।

 

 

गुरोरष्टकं य: पठेत्पुण्यदेही

यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।

लभेत् वांछितार्थ पदं ब्रह्मसंज्ञं

गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥

 

 

 

आचार्य शंकर कहते है कि यदि शरीर सुंदर, स्त्री भी सुंदरी, अद्भूत विशद, यश और सुमेरूपर्वत समान विपुल धन प्राप्त है पर मन श्रीसद्गुरू चरण कमल में नहीं लगा तो उससे क्या लाभ? जिसे स्त्री, धन, पुत्र, पौत्र आदि मिले एवं सारा कुटुम्ब, बन्धु-बान्धब, ये सब प्राप्त हो, जिसके मुख में छ: अंगों सहित वेद तथा शास्त्रों की विद्या विद्यमान है और जो सुंदर गद्य-पद्य वाले कविता भी करता है, जिसका सर्वत्र सम्मान है तथा जिसके समान सदाचारी भक्त नहीं है, भूमंडल के सभी राजाओं द्वारा जिसका चरणकमल सदा सेवित है, दान के द्वारा सभी दिशाओं में यश प्राप्त है, चित्त न भोग में लगता हैं न योग में न धन में आसक्त होता है, किन्तु मन यदि सद्गुरू चरणकमल में नहीं लगा तो उससे क्या लाभ?  किसी का मन न घर में न वन में न कार्य में लगता किन्तु उसका मन सद्गुरू चरणकमल में न लगा तो क्या लाभ? जिसका मन गुरू के उपर्युक्त वाक्य में लगा है उसका मन श्रीसद्गुरू के चरणकमल में लगा हुआ है ऐसा जो पवित्रकाय सन्यासी राजा ब्रम्हचारी और गृहस्थ इस गुर्वष्टक स्त्रोत का पाठ करेगा उसे ब्रम्हनामक पद की प्राप्ति होगी। ऐसा शंकराचार्य जी का कथन है।

वेद व्यास जी ने भी महाभारत में गुरू को भवसागर के कर्णधार बतााते हुए कहा है-जैसे ज्ञान विज्ञान के बिना मोक्ष नहीं हो सकता उसी प्रकार सद्गुरू से संबंध हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरू इस संसार सागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौका के समान बताया गया है मनुष्य उस ज्ञान को पाकर भवसाागर से पार और कृतकृत्य हो जाता है फिर उसे नौका और नाविक की आवश्यकता नहीं रहती।

आचार्य चाणक्य ने भी गुरू की महत्ता का वर्णन इस प्रकार किया है-” गुरू सच्चा मार्गदर्शक होता है बिना गुरू कोई भी अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू गूढ रहस्यों को सुलझा देता हैं। केवल पुस्तकें पढ़कर ही सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं होता। इस ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग अभाव में किताबी ज्ञान वैसा ही होता है जैसा कि जनसमाज में व्याभिचारिणी स्त्री का स्थान होता है। ज्ञानदाता गुरू की निंदा करना तो दूर उनकी निंदा सुननी भी नहीं चाहिए।


 

भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा


 

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भारतवर्ष की अपनी अनेक विलक्षणता एवं विशेषताएं है जिनके कारण प्राचीन काल से आज तक वह विश्व के आकर्षण को केन्द्र एवं कई बातों में वह उसका शिक्षक बनता जा रहा हैं। उन अनेक बातों में आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तारक हेतु गुरु शिष्य परम्परा भी भारत की एक अपनी वस्तु है और वस्तुत: आध्यात्मिक ज्ञान की ज्योति को जलाये रखने का यही मुख्य आधार है।

आध्यात्म ज्ञान के सागर में आज भाटा आ जाने के कारण गुरु की महिमा तिमिराच्छन्न हो गई है। गुरु पूजा एक व्यक्ति की पूजा सी दिखायी पड़ती है और यह परम्परा व्यक्तिवाद के रूप में सामने आ जाती है। किन्तु यह भ्रम है। गुरु शिष्य परम्परा तो सृष्टि के आदि से चली आ रही है और परम आदि गुरु सृष्टिकत्र्ता ने इसी परम्परा के द्वारा ज्ञान संचार सृष्टि में किया है। अतएव यह भी निश्चय है कि सृष्टि के अन्त तक निरन्तर यह चलती रहेगी। क्योंकि यह परम्परा टूट जाने का अर्थ ज्ञान दीपक का एकाएक बुझ जाना ही होगा। प्रत्यक्ष ज्ञान का एक मात्र साधन यही है।

भ्रम का एक कारण गुरु का तात्पर्य ठीक रूप से बोध नहीं होना भी है। गुरु स्थूल नहीं होते, वह तो सूक्ष्म हैं। जिस तरह अंग्रेजी की एक कहावत है कि ‘राजा मर गया है राजा चिरायु हो’ तथा ‘राजा कभी नहीं मरता’ उसी तरह गुरु कोई व्यक्ति नहीं होते, वह तो अध्यात्मज्ञान का अधिष्ठान हुआ करते हैं, जिस तरह राजा कोई व्यक्ति नहीं होता वह तो एक पद हैं जो ताज धारण करता है। कहने का तात्पर्य कदापि नहीं है कि जैसा आजकल एक प्रचलन हो गया है कि गद्दी पर जो बैठा, वही गुरु बन गया। प्रत्युत तात्पर्य यह है कि शास्त्र ज्ञान तो परोक्ष साधन है, ब्रह्म का साक्षात्कार तो किसी के द्वारा प्रत्यक्ष कराया जाने पर ही सुविधा पूर्वक हो सकता है और इस कार्य के लिए संसार में सदैव चिदानन्द स्वरूप योगीगण विद्यमान रहते हैं जो अपने योग बल से किसी जिज्ञासु रूप उपयुक्त पात्र का ढूंढ़कर उसमें ब्रह्म का भान करा देते हैं ओर शिष्य बन कर वह पुन: उस परम्परा को आगे बढ़ाता है। शास्त्रों के पठन, मनन से भी निश्चय बहुतेरे साधक आध्यात्मवाद की चोटी पर जा पहुँचते हैं, परन्तु उसका राजमार्ग वही है।

यहां एक शंका विचारणीय है कि गुरु स्थूल नहीं, सूक्ष्म किस तरह हो सकते हैं। एक चलते फिरते ओर जीवन व्यापार चलाने के लिए प्राय: सारे कार्य करने वाले शरीरधारी को सूक्ष्म क्यों और क्यों कर माना जा सकता है? यह ठीक है कि शरीर रूप से गुरु एक स्थूल व्यक्ति हैं, परन्तु गुरु शिष्य परम्परा शरीर का संबंध नहीं है, आत्मा का संबंध है। साधक का जीव गुरु के जीव का शिष्य बनता है। इसलिए गुरु के शरीर के त्याग के पश्चात भी उसको उनसे निर्बाध प्रेरणा मिलती रहती है। गुरु आत्मरूप हैं, देह रूप नहीं।

शरीरधारी किसी अदृष्ट को सहज ग्रहण एवं प्राप्त नहीं कर सकता, इसी से शरीर रूपी कोष के भीतर सच्चिदानंद स्वरूप गुरु शिष्य के सामने उपस्थित होते हैं। जिस प्रकार वर्णमाला के अक्षर नाम रूपी हीन एवं नाशरहित हैं, परन्तु स्थूल दृष्टि से बोधगम्य किया जाने के लिए उसकी लिपि तैयार की जाती है जिस में रूप भी है और मिटाया भी जा सकता है। ‘क’ का रूप भिन्न-भिन्न भारतीय भाषा में विभिन्न है, परन्तु मूलत: ‘क’ तो श्रुतिगम्य ध्वनि है।

क्या गुरु कहलाने वाले सभी व्यक्ति ब्रह्म पद प्राप्त ही होते हैं? क्या उस नाम पर दम्भ या पाखण्ड नहीं फैलाया जा रहा है?—आदि प्रश्न यहां अप्रासंगिक हैं। ‘जड़ चेतन गुण दोष मय’ तो करतार ने किया ही है कभी दोष की मात्रा अधिक होती है तो कभी गुण की। किन्तु अध्यात्मज्ञान की जिसे एक झलक मात्र भी मिल गयी होती है, उसे इस बात का दृढ़ विश्वास हो जाना आवश्यक है कि परमात्मा उसकी देख रेख करने वाले हैं, और जब एक सच्चे गुरु को उसके पास पहुंचा देना वे आवश्यक समझेंगे तो वैसा संयोग आप ही आप उपस्थित हो आवेगा। गुसाईं जी का कथन है—

—बिनुहरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।……

—बिनु गुरु होहि न ज्ञान…….

—सो कि होइ बिनु हरि भगति।…….

अतएव जैसे भगवद् कृपा से मगरमच्छ से भरे नालों को कोई पार कर जाता है, उसी तरह भक्त साधक पाखण्डी ही गुरुओं से बचता हुआ सच्चे गुरु की शरण में जा पहुंचता है। जो अनुभवगम्य है, शब्दों के विस्तार से उसको हृदयंगम कराना दुरूह है।

इसी भाव से हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गुरु की अलौकिक महिमा गायी गयी है। संस्कृत साहित्य से भक्ति काल के हिन्दी कवियों ने अव्यक्त ब्रह्म के पद पर—और किन्हीं ने उनसे श्रेष्ठतर−आसीन कराया है। जैसे:—

गुर्रुब्रह्मा, गुर्रुविष्णु: गुरु र्देवो महेश्वर:। गुरु: साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।

ध्यानमूलं गुर्रुमूर्तिम पूजा मूलं गुरुर्पदम्। मन्त्र मूलं गुरुर्वाक्यम् मोक्ष मूलं गुरु कृपा॥

गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण का प्रारम्भ मात्र गुरु वन्दना से करते हैं। वन्दना भी गुरुदेव का नहीं, उनके ‘पद पद्म परागा’ का। इतना साहस कहां कि गुरुदेव भर की पूजा करें, जब उनके चरण भी नहीं, उसके रज कण में संजीवनी बूटी की महत्ता है, बल्कि जो ‘शम्भु तनु विभूति’ के समान विमल है। ‘मानस’ में उस रज गण के अलौकिक गुणों का अवलोकन किया जा सकता है। वे गुरुजी कैसे हैं!

‘कृपा सिन्धु नर रूप हरि।’ बल्कि भक्त शिष्य के दृष्टिकोण से उनमें एक विशेषता भी है कि ‘महा मोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।’ स्वयं हरि किसी साधक में अज्ञानतम दूर करने की प्रेरणा देते हैं, परन्तु गुरुदेव तो स्वयं सूर्य के समान उसका कारण बन जाते हैं। बल्कि हरि की पहचान करवाने की शक्ति अथवा कला गुरु के पास ही है:—

वन्दे बोधमंय नित्य गुरुं शंकर रुपिणाम्। याम्यां विना न पश्यन्ति योगिन: स्वान्तस्थमीश्वरम्॥

यहां गुरु का एवं शंकर की एक पद मर्यादा तथा एक कार्यभार हो गया है। बिना इन दोनों की कृपा के योगी अपने हृदय में स्थित ईश्वर का भी साक्षात्कार नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति का कैसा सच्चा वर्णन है।

इसी भाव से ओत प्रोत होकर महात्मा कबीरदासजी ने खुला फैसला करके तर्क के साथ गुरु को गोविन्द से ऊंचा सिद्ध कर दिखाया—

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो बताय॥

गुरु और गोविन्द यदि किसी अवसर पर एक साथ मिल जायं, तो पहले किनका अभिवादन किया जाय! अपने प्रश्न का आप ही उत्तर देते हैं कि गुरु का जय जयकार हो जिन्होंने गोविन्द को प्रत्यक्ष करा दिया। —जिस गुरु की इतनी मर्यादा है, उनके लक्षण भी बनाये हैं—

हरहि शिष्य धन मोहन हरई। सो गुरु घोर नरक महे परई

मनीषिणी एवं बसेन्द्र के तथा उनके गुरु श्रीमती मैडम ब्लाडीवास्की ने गुरु शिष्य के महत्व पर बहुत कुछ लिखा है। भारतीय संस्कृति से परिचित होकर उनने इस महत्व का समझा था।

हिमाचल, तिब्बत आदि में अन्तर्हित महात्मा महात्मागण मशालची की नाई देखते रहते हैं कि अध्यात्म का मशाल जल तो रहा है। मन्द ज्योति होने की दशा में अपने में निहित आध्यात्म शक्ति से उसमें तेल डालते हैं कि वह अनवरत जलता रहे। इनमें अनेकों की आयु सैकड़ों वर्षों का पार कर जाती है।

साभार: literature.awgp.org

प्रो. लालजीराम शुक्ल

 


गुरू शब्द की व्युत्पत्ति अनेक प्रकार से की जा सकती है-  ‘ग’ अक्षर सिद्धिदायक कहा गया है और ‘र’ पाप का हरण करने वाला है ‘उ’ अव्यक्त विष्णु है इस प्रकार इन तीन अक्षरों से बना यह शब्द परम गुरू का वाचक है।

धर्म ज्ञान और भक्ति का उपदेश करने के कारण वह गुरू कहलाता है। तत्त्व का वेदादि शास्त्रों का और आत्मज्ञान के साधनों का उपदेया करने के कारण गुरू कहते हैं। देवो, गन्धर्वो, मनुष्य आदि से स्तुति किए जाने के कारण वह गुरू कहलाता है। महिमा और माहात्मय के कारण उसकी स्तुति की जाती है इसलिए उसे गुरू कहते हैं। वह ज्ञान वारि से शिष्य के हृदय को सीचंता है इसलिए गुरू कहा जाता है। वह वेदादि शास्त्रों का तथा आत्मतत्वादि का ज्ञान कराता है इसलिए गुरू शब्द से वाच्य है। वह शिष्य के अज्ञान को निगल जाता है इसलिए गुरू नाम से अभिहित होता है। वह शिष्य को सत्पथ पर प्रवृत्त एवं परिचालित करता है अत: वह गुरू है।

‘गु’ शब्द का अर्थ है अन्धकार और ‘रू’ शब्द का अर्थ है उसका विनाश करने वाला इस प्रकार अंधकार का निरोध होने से गुरू कहलाया।

भारतीय संस्कृति में गुरू अथवा आचार्य आदि शब्दों का पारिभाषिक अर्थो में प्रयोग मिलता है। मोक्ष की प्राप्ति ही मनुष्य का परम लक्ष्य है और इसकी प्राप्ति गुरू से दीक्षित हुए बिना सम्भव नहीं है। रूद्रदायमल (304/2) के अनुसार गुरू का स्वरूप वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह शान्त जितेन्द्रिय कुलिन, शुद्ध वेश धारण करने वाला पवित्र आचार सम्पन्न सुप्रतिष्ठित, शुद्ध, दक्ष ध्यानिष्ठ, गृहस्थ मन्त्रार्थ को जानने वाला अहंकार रहित निर्विकार महापंडित, वाक्पति, सभी सुंदर लक्षणों से समविंत, ज्ञानी, मौनी दानपरायण, लक्ष्मीवान, धैर्यसम्पन्न एवं प्रभुतासम्पन्न होना चाहिए।


 

इतिहास के महान गुरु और उनके शिष्य


 

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द्रोणाचार्य और एकलव्य : गुरु और शिष्यों की जोड़ी में सबसे चर्चित जोडिय़ों में इनका नाम आता है, लेकिन एकलव्य को गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा कैसे मिली, यह जानकर आप भी हैरान हो जायेंगे। दरअसल गुरु द्रोणाचार्य ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे, लेकिन एकलव्य एक निषाद पुत्र था। जब एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य के पास शिक्षा पाने की इच्छा से गए तो उन्होंने एकलव्य को मना करते हुए वापस भेज दिया, लेकिन एकलव्य भी अपनी निष्ठा का पक्का था। उसने गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम के पास ही एक कुटिया बनाई और वहीं पर द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर उसी के सामने एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे। एकाग्र मन से लगातार अभ्यास और गुरु का ध्यान करने के कारण वह धनुष चलाने में इतना निपुण हो गये कि बड़े-बड़े धुरंधर भी उसके सामने फेल थे, लेकिन इस बात कापता स्वयं गुरु द्रोणाचार्य को भी नहीं था। एक दिन जब द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ आखेट पर गए तब उन्हें इस बारे में पता चला और एकलव्य की अपने गुरु के प्रति ऐसी निष्ठा थी कि उसने गुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अंगूठा ही दे दिया।17

समर्थ गुरु रामदास और छत्रपति शिवाजी महाराज : छत्रपति शिवाजी की अपने गुरु समर्थ रामदास के प्रति निष्ठा जग-जाहिर है। गुरु रामदास अपने सभी शिष्यों में सबसे ज्यादा प्रेम शिवाजी से ही करते थे। एक बार समर्थ गुरु ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही तो वे अपने शिष्यों के साथ एक दिन वन में गए और वहां पेट में दर्द का नाटक करते हुए कराहने लगे और नीचे जमीन पर लेट गए। शिवाजी अपने गुरु की पीड़ा को देखकर बड़े दु:खी हुए और समर्थ गुरु से पूछने लगे कि इसकी कोई दवा नहीं है क्या गुरुदेव, तब समर्थ गुरु ने कहा कि इसकी सिर्फ एक ही दवा है – बाघिन का ताजा दूध। पीड़ा का उपाय सुनते ही शिवाजी तुरंत बाघिन का दूध लाने के लिये समर्थ गुरु का कमंडलु लेकर निकल पड़े और फिर दूध लेकर ही वापस लौटे। गुफा में लौटने पर समर्थ गुरु ने शिवाजी से कहा – तुम धन्य हो शिवा। तुम्हारे जैसे निष्ठावान शिष्य के रहने पर किसी गुरु को पीड़ा कैसे हो सकती है! इस तरह अन्य सभी शिष्य शिवाजी की समर्थ गुरु के प्रति कर्तव्य परायणता और समर्थ गुरु के शिवाजी के प्रति प्रेम को भी समझ गए।

गुरु सांदीपनी और कृष्ण जी : गुरु की आवश्यकता सिर्फ मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि स्वयं भगवान को भी होती है। यह बात गुरु सांदीपनी और कृष्ण जी पर अच्छे से लागू होती है। गुरु सांदीपनी भगवान कृष्ण और बलराम दोनों के गुरु थे। उनके गुरुकुल में कई महान राजाओं के पुत्र पढ़ते थे, लेकिन गुरु सांदीपनी ने कृष्ण जी को पूरी 64 कलाओं की शिक्षा दी थी। भगवान विष्णु के अवतार होने के बाद भी कृष्ण जी ने गुरु सांदीपनी से शिक्षा ग्रहण की। गुरु-शिष्य के इस अनोखे रिश्ते से यह साबित होता है कि कोई भी चाहे कितना ही ज्ञानी हो, फिर भी उसे एक गुरु की आवश्यकता तो होती ही है। यहां पर एक बात यह भी सामने आती है कि जब कृष्ण जी की शिक्षा पूरी हो गई तो गुरु सांदीपनी ने उनसे गुरु दीक्षा के रूप में यमलोक से अपने पुत्र को वापस लाने को कहा और कृष्ण जी ने भी उनके पुत्र को वापस धरती पर लाकर अपनी गुरु दीक्षा दी।

साभार: www.acharyainduprakash.com


कोलावाली निर्णय में कहा गया है कि ब्रम्हा, पराशर, व्यास, विश्वामित्र आदि ने गुरू शुश्रुषा के कारण ही सिद्धि प्राप्त की थी। योगसूत्र में भी ईश्वर गुरूरूप में वर्णित किया गया है। सामान्य ज्ञान की तो बात ही क्या ब्रम्हज्ञान भी गुरू से प्राप्त किया जा सकता है। कुलात्र्णवतन्त्र के अनुसार गुरू के छ: भेद बताए गए हैं- प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक शिक्षक और बोधक, वस्तुत: अन्य तन्त्रों के अनुसार गुरू के दो ही भेदमाने गए हैं दीक्षागुरू और शिक्षा गुरू। साधना व्यापार में प्रथम दीक्षागुुरू फिर शिक्षा गुरू माने गए हैं। दीक्षागुरू और शिक्षागुरू एक या दो भी हो सकते हैं। तन्त्र के अनुसार गुरू आचार्य या देशिक भी उपलब्ध हैं किंतु उपनिषद् में शिक्षा गुरू व्यवहृत होता है। सच्चे गुरू के लक्षण इस प्रकार हैं-सच्चा गुरू हमारे मिथ्या बोध को नष्ट कर देता है और हमें शास्त्रों के सच्चे अर्थ का बोध करा देता है, सुगति तथा कुगति के मार्गो तथा पुण्य तथा पाप का भेद बता देता है कत्र्तव्य तथा अकत्र्तव्य का भेद समझा देता है। उसके बिना कोई हमें संसार सागर से पार नहीं करा सकता।

यदि व्यक्ति अपना हित चाहता है तो उसे ऐसे गुरू का वरण करना चाहिए जो स्वंय पापरहित मार्ग पर चलता हो और निष्काम भाव से दुसरों को भी उसी पथ पर चलाता हो स्वंय तर चुका हो और दूसरों को तारने में समर्थ हो। सच्चा गुरू वही हो जो हमारे अन्दर सच्चिादानंद का साक्षात्कार करा दे। अन्य सब तो नाम के गुरू हैं।


 

गुरु-शिष्य संबंधों में आते बदलाव


 

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गुरु शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है। गु और रु.. इन दो शब्दों से मिल कर बनता है गुरु शब्द। ‘गु’ शब्द का अर्थ है अन्धकार या अज्ञान और ‘रु’ शब्द का अर्थ है ज्ञान या प्रकाश। अज्ञान रुपी अन्धकार को मिटाने वाला जो ज्ञान  रूपी प्रकाश है, वही गुरु है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। कबीर दास जी ने भी कहा है-

‘गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पांय

बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय’

प्राचीन काल में गुरु और शिष्य के संबंधों का आधार था, गुरु का ज्ञान, मौलिकता और नैतिक बल, उनका शिष्यों के प्रति स्नेह भाव, तथा ज्ञान बांटने का नि:स्वार्थ भाव।

शिष्य में होती थी, गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, गुरु की क्षमता में पूर्ण विश्वास तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण एवं आज्ञाकारिता। अनुशासन शिष्य का सबसे महत्वपूर्ण गुण माना गया है।

आचार्य चाणक्य ने एक आदर्श विद्यार्थी के गुण एस प्रकार बताये हैं- गुरु और शिष्य के बीच में केवल शाब्दिक ज्ञान का ही आदान प्रदान नहीं होता था, बल्कि गुरु अपने शिष्य के संरक्षक के रूप में कार्य करता था। उनका  उद्देश्य होता था शिष्य का समग्र विकास। शिष्य को भी यह विश्वास रहता था कि गुरु उसका कभी अहित सोच भी नहीं सकते। यही विश्वास गुरु के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा और समर्पण का कारण रहा है।

राम-वशिष्ठ, कृष्ण-संदीपनी से ले कर चन्द्रगुप्त मौर्य-चाणक्य और विवेकानंदा- परमहंस तक शिष्य-गुरु की एक आदर्श और लम्बी परंपरा  रही है। पर इस  पवन परम्परा के कुछ गंभीर अपवाद भी रहे हैं। उस एकलव्य को भला कौन भुला सकता है, जिसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या स्वयं सीखी लेकिन  अन्यायी गुरु द्रोणाचार्य ने  गुरु दक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा ही मांग लिया!

आज का समाज अधिक जागरूक है। किसी गुरु के द्वारा किसी शिष्य के प्रति आज ऐसा अन्याय हो जाये और समाज उसका विरोध न करे, आज यह संभव नहीं है।

आज ज्ञान के प्रसार के साधन बहुत बढ़ गए हैं। इससे छात्रों का औसत बौधिक स्तर भी बढ़ गया है। लेकिन आजकल अधिकतर मेधावी छात्र अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद अध्यापन के क्षेत्र में कार्य करने के बजाय किसी अन्य व्यवसाय में जाना अधिक पसंद  करते हैं। विशेषकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में योग्य शिक्षकों का काफी अभाव है। शिक्षा के क्षेत्र में हो  रहे तेज परिवर्तनों के  कारण,  यह  आवश्यक हो गया है कि शिक्षक भी अपनी क्षमता के स्तर को निरंतर विकसित करते रहें। आदर और श्रद्धा मांगने से नहीं मिलते, बल्कि उन्हें अपनी योग्यता के बल पर हासिल किया जाता है। आज का छात्र जागरूक है। यदि शिक्षक छात्र की जिज्ञासा का उचित समाधान नहीं कर पाता तो छात्र का आदर खो देता है।

आज के भौतिकतावादी समाज में ज्ञान से अधिक धन को महत्व दिया जाने लगा है। अत: आज अध्यापन भी निस्वार्थ नहीं रह कर, एक व्यवसाय के रूप में नजर आता  है। छात्र और शिक्षक का सबंध भी एक उपभोक्ता और सेवा प्रदाता का होता जा रहा है। छात्रों के शिक्षा लिए गुरुओं से प्राप्त होने वाले ज्ञान के बजाय, धन से खरीदी जाने वाली वस्तुमात्र बन कर रह गयी है। इससे शिष्य की गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और गुरु का छात्रों के प्रति स्नेह और संरक्षक भाव लुप्त होता जा रहा है।

आज जरुरत है कि गुरु और शिष्य दोनों अपनी अंतरात्मा में झांकें और विचार करें कि गुरु और शिष्य के संबंधों में आ रही इस गिरावट को कैसे रोका जाए।

साभार: amritablogs.wordpress.com


शिक्षा किससे ग्रहण की जाए इसका उत्तर होगा गुरू से। गुरू शब्द का अर्थ किसी मानव देहधरी से लेना ही पर्याप्त नहीं दिखता अपितु पौराणिक ग्रंथों के आधार पर कीट पतंगों से भी शिक्षा प्राप्त करने के उदाहरण हैं। पंचतंत्र और हितोपदेश में तो पशु-पक्षियों से ही समग्र शिक्षा देने की बात सामने आई हैं। श्रीमदभागवत अवधूतोपारव्यान में भगवान दत्तात्रेय द्वारा चौबीस गुरूओं द्वारा शिक्षाग्रहण करने का प्रकरण है और ये चौबीस गुरू सभी पशु पक्षी थे इनमें मनुष्य एक भी नहीं था- यथा–1. पृथ्वी 2. वायु 3. आकाश 4.जल 5. अग्रि 6.चन्द्रमा 7.सूर्य 8. कबूतर 9.अजगर 10. समुद्र 11.पतंगा 12. मधुमक्खी 13. हाथी 14. मधुनिकालने वाला 15. हरिण 16. मछली 17. पिगंला 18. कुरर पक्षी 19. बालक 20. क्न्या 21. बाण निर्माण 22. सर्प 23. मकड़ी 24. भृंगीकीट। इस प्रकार इनमें आचार्य या सुशिक्षित कहे जाने वाला कोई नहीं था। गुरू/आचार्य वर्ग वह सांचा है जिनके विचारों में ढ़लकर शिष्य की भावना मूर्त रूप में ढलती है। गुरू वह कुम्हार है जो शिष्य के जीवन रूपी मिट्टी के र्लोदे को एक रूप देना तथा उसे मंगलमय तथा मूल्यवान बना देता है। समाज के प्रति भी गुरू वर्ग का बड़ा भारी दायित्त्व होता है। वह समाज का निमार्ता है शिष्य के प्रति तो उसके विशेष कत्र्तव्य है ही जैसे अनगढ पत्थर मूर्ति बनकर शोभा पाता है और मूल्यवान बनता है वैसे ही शिष्य गुरूओं के सानिध्य में अच्छी शिक्षा पाकर शोभायमान होता है समाज में उसका मूल्य बढ़ जाता है शिक्षा की उपयोगिता से सभी अभिज्ञ है और इसीलिए कहा गया है- शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक है और शिक्षा प्राप्त करने के लिए योग्य गुरू की शरण लेना आवश्यक है, जो परमोच्च कल्याण का मार्ग जानता हो उस गुरू की शरण लेना चाहिए। गुरूदेव ऐसा हो जो  वेदादि शब्दों में निष्णाद हो जिनका चित्त पूर्णतया शान्त हो चुका हो।

ध्यान का मूल है गुरू की मूर्ति पूजा का मूल है गुरू का चरण मन्त्र का मूल है गुरू का वाक्य और मोक्ष का मूल है गुरू की कृपा ब्रम्हज्ञानी गुरू यथाविधि समीप आए हुए दर्प आदि दोष से मुक्त शान्ति मुक्त शिष्य को ब्रम्हविद्या का तत्त्व समझाए।

इतिहास साक्षी है कि योग्य गुरू मिलने पर शिष्य उच्चत्तम शिखर पर पहुंचा- भगवान राम को वशिष्ठ जैसे गुरू मिले तो श्री कृष्ण को साक्षीपनी कर्ण को भगवान परशुराम तो अर्जुन को द्रोण भीम और दुर्योधन को बलराम इसी प्रकार वर्तमान युग में चन्द्रगुप्त को चाणक्य जैसे गुरू मिले तो शिवाजी महाराजको समर्थ रामदास विवेकानंद को रामकृष्ण जैसे गुरू मिले तो प्लेटों कों सुकरात, यह एक लम्बी श्रृखंला है। योग गुरू की भी पहचान करनी पड़ती है जो योग गुरू को पहचान लेता है उसका जीवन सार्थक हो जाता है इस संर्दभ में महादेवी वर्मा का उदाहरण दिया जा सकता है। जब महादेवी विद्यार्थी तो उनको बौद्ध भिक्षुणी बनने का विचार आया। एक दिन वे लंका के बौद्ध विहार के महास्थाविर से मिलने नैनीताल गई। जब वे महास्थाविर के पास गई तो महास्थाविर ने अपना मुख ढक रखा था जब महादेवी जी ने इसका कारण पूछा तो उसको बताया गया कि महास्थावीर स्त्रियों का मुख नहीं देखते। यह जानकर महादेवी को बड़ी ठेस लगी और वह बिना मिले वापस चली गई जब महादेवी जी ने इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा जो गुरू दुर्बल है कि स्त्री का मुख भी नहीं देखना चाहता। इतने कमजोर मनोबल वाला मुझे क्या दीक्षा देगा और इस प्रकार महादेवी बौद्ध भिक्षुणी बनते रह गई।


 

गुरू एक मार्गदर्शक सत्ता


 

गुरू के प्रति अगाध श्रद्धा, समर्पण और त्याग का पर्व है गुरू पूर्णिमा। गुरू पूर्णिमा महोत्सव, भारत की आध्यात्मिक परम्परा और सनातन परम्परा का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। यह हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाती है, असत्य से सत्य की ओर ले जाती है। हमारे अन्धकारयुक्त जीवन को प्रकाश गुरू ही प्रदान करते है। गुरू दिव्य ज्ञान और दिव्य प्रकाश का स्रोत है। गुरू ज्ञान का पुंज हैं जो शिष्य के जीवन में आध्यात्मिक क्रान्ति लाते हैं। शिष्य का जिस प्रकार समर्पण होगा गुरू का कृपा प्रसाद उसी रूप में शिष्य को प्राप्त होता है। वर्तमान समय में भटकता हुआ मानव शान्ति की तलाश में है। जब कहीं भी कोई रास्ता नहीं दिखता है तब वह भटकता हुआ गुरू को खोजता है; गुरू की तलाश में जाता है और गुरू की शरण में जाता है। गुरू के वचनों को सुनता है और गुरू के अनुसार अपना आचरण बनाता है। गुरू के चरण, उनकी शरण और आचरण ही उसके जीवन का पाथेय बन जाता है उसके पश्चात जीवन में जो बदलाव आता है वह अद्भुत है। धन्य है महापुरूषों का संग, बदल देता जीवन का रंग।

गुरू एक मार्गदर्शक सत्ता है। जिस प्रकार कुम्हार गीली मिट्टी पर थाप देकर उसे सुगढ़ आकार प्रदान करता है, उसी प्रकार गुरू भी अपने शिष्य के जीवन में ज्ञान का प्रकाश भर देते हैं। परन्तु शिष्य का जीवन भी गीली मिट्टी की तरह समर्पित होना चाहिये जो किसी भी रूप में परिवर्तित होने के लिये तैयार रहे अर्थात शिष्य के समर्पण के आधार पर ही गुरू के अनुदानों की वर्षा होती है। गुरू, शिष्य के समर्पण को देखकर ही उसके जीवन में ज्ञान के प्रकाश का दीप प्रज्जवलित करता है। शिष्य का समर्पण आरूणी, नचिकेता और स्वामी विवेकानन्द की तरह होना चाहिये।

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हमारे शास्त्रों में गुरू का बड़ा ही महत्व है ”गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो मिलाय। गुरूपूर्णिमा का पर्व हमें यही याद दिलाता है।। गुरूपूर्णिमा पूरे विश्व के लिये भारत की ओर से एक बहुत बड़ा संदेश है। आदिकाल से ही यह परम्परा चली आ रही है, गुरू के रूप में महर्षि व्यास जी, सूत जी, वाल्मीकि जी, सांदीपनी जी को जो सम्मान मिला यही तो पूरे विश्व को संदेश है कि भारत केवल मंत्रों को गाता नहीं है कि विश्व एक परिवार है बल्कि जीता भी है तथा भारत ने गुरूओं के रूप में विश्व को अनमोल रत्न दिये है। पूज्य गुरूओं ने वेद, पूराणों और दिव्य ग्रंथों के माध्यम से हमें बताया कि कैसे जियें। अत: प्रत्येक मनुष्य को इन दिव्य ग्रंथों को पढऩा चाहिये, इन दिव्य गं्रथों के मंत्र  जीवन के सभी रहस्यों को खोल सकते है। मंत्रों की गहराई को समझने से मन, वचन, कर्म और विचारों में अद्भुत परिवर्तन होता है।

गुरूपूर्णिमा का दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारा ध्यान उस गुरू तत्व की ओर जाये जो जीवन की सारी निराशाओं को नष्ट कर विशाद युक्त जीवन को प्रसाद बना दे। गुरू की इतनी महिमा है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण को भी गुरूकुल गये और शिक्षा ग्रहण की और संसार को गुरू महिमा का संदेश दिया इससे गुरूकुल के महत्व को समझा जा सकता है। उन्होने कहा कि गुरूकुल अर्थात गुरू का वह कुल जहां पर भीतर का अनुशासन और स्वयं पर शासन गुरू की छत्रछाया में होने लगता है। पूर्णिमा अर्थात पूर्ण-मां, मां तो केवल जन्म देती है और गुरू, जीवन प्रदान करता है। प्रतिवर्ष गुरूपूर्णिमा पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में जो अन्धकार है, उस अन्धकार के मध्य गुरू रूपी ज्योति भी है उससे अपने जीवन को प्रकाशित करे और परमार्थ की ओर बढ़ते रहे।

वर्तमान समय में गुरू और शिष्य परम्परा का कहीं न कहीं अभाव है। गुरू शिष्य को अपने आप से जुडऩा सिखाता है, वर्तमान में जीना सिखाता है परन्तु बदलते समय के साथ आज का युवा धीरे-धीरे गुरू शिष्य परम्परा को भूलने लगा है। जैसे जैसे प्रगति की वैसे-वैसे वह अपनी जड़ों से, अपने संस्कारों से दूर होता चला गया जिसका परिणाम बहुत सारे रूपों में हमारे सामने आया। आज दुनिया में लोग सबसे अधिक अवसाद से, तनाव से गुजर रहे है, आत्महत्या कर रहे है तथा नशा करने की लत बढ़ रही है यह सब आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौडऩे के कारण हो रहा है। जिसके कारण आज के युवा एकांकी और स्वार्थी भी होते जा रहे है और यही एकांकीपन के कारण जीवन में तनाव उत्पन्न हो रहा है। गुरू से जुड़े रहने का तात्पर्य मार्गदर्शक से जुडऩा आज इसका अभाव स्पष्ट दिखायी दे रहा है।

गुरू पूर्णिमा हमें गुरू के पद्चन्हों पर चलने का संदेश देती है। गुरू पूर्णिमा  प्रतिवर्ष हमें ज्ञान, श्रद्धा और सद्बुद्धि को आत्मसात करने का बोध कराती है। शिष्य के जीवन में व्याप्त अज्ञान के अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश भर देते हैं गुरूजन। गुरू, ज्ञान का दाता है, वैसे आज के वैज्ञानिक युग में हमारे पास संचार के अनेक साधन हैं। यथा हमारे पास गुगल है; बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियां है और कई अन्य साधन हैं परन्तु यह सब हमें जानकारियां प्रदान करते हैं ज्ञान नहीं, ज्ञान तो केवल गुरू ही देता है; गुरू, शिष्य के जीवन में ज्ञान का दीप प्रज्जवलित करता है।

गुरूपूर्णिमा के दिन शिष्य अपने आराध्य को अपनी आस्था के सुमन समर्पित कर रहे है तब मैं इन सब गुरूदेवों से, आराध्यों से और गुरूओं से निवेदन करना चाहूंगा कि आज भारत को एक अन्धकार लील रहा है। वह अन्धकार भारत को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को निगल रहा है वह है प्रदूषण का, बढ़ती जनसंख्या का, प्लास्टिक का, दूषित जलवायु का और दूषित जल का। यह हमें और हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिये खतरा बनते जा रहा है। मुझे तो लगता है अब सब गुरू मिलकर इस प्रदूषण रूपी अन्धकार से संसार को प्रकाश की ओर लेकर जायें, एक रास्ता खोजे, तरीका ढूंढे और जल शक्ति को जन शक्ति बनायें तथा जल जागरण को जन जागरण बनायें और जल को सहेंजे। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने जो जल शक्ति की बात कही है मुझे लगता है अब हर शक्ति जल शक्ति के संरक्षण और संचयन में लगे। यह अपने आप में सबसे बड़ा जल अनुष्ठान और जल यज्ञ होगा जिसमें सभी की आहुति पड़े यह बहुत जरूरी है। सरकार और जिन्हें भी जल से सरोकार है वह जल की एक-एक बूंद को सहेजं लें। गुरूपूर्णिमा जल पूर्णिमा बनें। गुरूओं की स्पिरिचुअल जवाबदारी तो है ही अब गुरूओं की सोशल जवाबदारी भी हो। आईये हम सब मिलकर भारत को एक नई दिशा दें केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व आप सब गुरूओं की प्रतिक्षा में है।

(लेखक परमाध्यक्ष, परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश, हैं)

स्वामी चिदानन्द सरस्वती

 


योग्य गुरू के लिए योग्य शिष्य का होना भी आवश्यक है यदि योग्य गुरू को शिष्य भी अपने जैसा योग्य मिल जाये तो सोने पर सुहागा है। गीता का ज्ञान देने वाले भगवान श्रीकृष्ण की सांदीपनी जैसा योग्य गुरू मिला, श्रीकृष्ण और सुदामा ने गुरू सांदीपनी से मात्र चौसठ दिन ही शिक्षा प्राप्त की थी और प्रतिदिन एक कला सीख लेते थे इस प्रकार उन्होंने चौसठ दिनों में चौसठ कलाएं सीखी थी यह वह समय था जब राजा का पुत्र और निर्धन का पुत्र एक साथ एक गुरू के पास बैठ कर शिक्षा ग्रहण करते थे। राजा परीक्षित को श्रीमदभागवत की अमृत कथा सुनाने वाले शुकदेव जी जब राजा जनक से ज्ञान प्राप्त करने गए तो राजा जनक ने शुकदेव जी की कड़ी परीक्षा ली थी एक सप्ताह तक उनसे मिले नहीं थे। जब शुकदेव जी को ज्ञान प्राप्त करने योग्य पाया तो उन्हें ज्ञान दिया। हमारे शास्त्र पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब योग्य शिष्य ने योग्य गुरू से मां के गर्भ में ही शिक्षा ग्रहण की

थी। यह सर्वविदित है कि अभिमन्यु ने गर्भ में ही अर्जुन से चक्रव्यूह तोडऩे का ज्ञान प्राप्त किया था इसी प्रकार अष्ट्रावक्र ने भी अपनी मां सुजाता के गर्भ में ही ज्ञान प्राप्त किया था। जब अष्ट्रावक्र मां के गर्भ में थे तो एक दिन उनके पिता काहोड़ जो बहुत विद्धान थे ने पूजा करते समय किसी श्लोक का गलत उच्चारण कर दिया तब अष्ट्रावक्र ने गर्भ से ही आवाज दी पिताजी आप यह श्लोक गलत उच्चारण कर रहे हो इसका सही उच्चारण इस प्रकार है और सही श्लोक का उच्चारण किया तब काहोड़ ऋषि ने क्रोधित होकर सुजाता के गर्भ पर वार किया पैर से वार से अष्ट्रावक्र का जन्म हुआ परंतु पैर के वार से आठ स्थानों से टेढ़ा हो गया और इस प्रकार उसका नाम अष्ट्रावक्र पड़ गया। अयोग्य शिष्य को शिक्षा देने के बारे में चाणक्य का कथन है कि जैसे सांप को दूध पिलाना विष को बढ़ाना है उसी प्रकार नीचों को दिया लाभ उनकी नीच प्रवृतियों को बढ़ावा देने वाला होता है।

प्राचीन समय में भारतीय सभ्यता के अच्छे दिन थे गुरू, शिष्य संबंध बड़े मधुर होते थे उनमें मौलिक सत्यों के अन्वेषण और ग्रहण करने के कृत्ति और साहस था। उस समय प्रकृति की गोद में स्थित आश्रमों में गुरूओं के सीधे संपर्क में रहते हुए शुद्ध वातावरण में शिक्षार्थी शिक्षा का मर्म ह्दय और जीवन में उतारते थे। प्रकृति भी गुरू का कार्य करती थी प्रकृति का विराट सौंदर्य उन्हें श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करता था आचार्य के अतिरिक्त उन पर अन्य किसी का नियंत्रण नहीं होता था राजपुत्र भी दीन प्रजा के पुत्रों के साथ जमीन पर बैठ कर शिक्षा ग्रहण करते थे। कोई शुल्क नहीं कोई राजकीय बंधन नहीं सब झरनों पर्वतों, नदियों के समीप वृक्षों के नीचे आसन बिछा कर ज्ञान प्राप्त करते थे और उस प्राप्त ज्ञान को समाज के लिए अर्पित कर देते थे। आज की शिक्षा का रूप दूसरा है, इसका सांचा इस देश का सांचा नहीं है इसमें विजातीय तत्वों की प्रधानता हैं। आधुनिक सभ्यता एवं जीवन की जटिलताओं के कारण शिक्षा के उद्देश्य भी शुद्व न रह कर जटिल हो गए हैं शिक्षा भौतिक प्रधान हो गई। पुरानी मान्यताएं समाप्त होती जा रही है जिस शिक्षा में माता-पिता तथा गुरू का सम्मान अहम होता था वहां स्वार्थ आधारित हो गया, गुरू तो दूर माता-पिता का भी अपमान करने में पुत्र नहीं हिचकता। माता-पिता को अनाथाश्रमों का सहारा लेना पड़ रहा हैं परंतु उनको नहीं पता कि महापुरूषों का अपमान कितना घातक होता है। महापुरूषों के अपमान से नहुष को देवराज इन्द्रपद को गंवाना पड़ा था। आज समाज में ङ्क्षहसा, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान, जुआं, असत्य भाषण प्रतिदिन होने वाले दंगे-फसाद आदि माता-पिता एवं गुरूओं के अपमान का परिणाम है। हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति में गुरूओं ने अपने शिष्यों को ज्ञान/शिक्षा देकर कहा था कि हे मनुष्य! तू साहसी बनकर गरूड़ के समान गर्व गीध के समान, लोभ चकवे के समान, काम श्वान के समान मत्सर, उल्लू के समान मोह और भेडिय़े के समान क्रोध को समझ कर उन्हें मार भगा।

 

श्रीकृष्ण मुदगिल

 

 

 

 

 

 

 

 

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