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मोदी सरकार में यौन अपराधियों की खैर नहीं

मोदी सरकार में यौन अपराधियों की खैर नहीं

जिस समाज में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता रहा है, जहां शारदीय और बासंती दोनों नवरात्र में कन्या पूजन की महत्ता रही है, जिस समाज में कन्यादान को महादान माना जाता रहा हो, उस समाज में हाल के वर्षों में जिस तरह बच्चों से यौनाचार की शर्मनाक घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे समाजकर्मी के साथ ही राजनीतिक तंत्र बेहद चिंतित है। चिंतित तो हर वह व्यक्ति है, जिसके सीने में सचमुच एक संवेदनशील दिल धड़कता रहता है। चिंतित होने की बात भी है। भारत सरकार के आंकड़े ही इसकी बड़ी वजह हैं। यह मामूली बात नहीं है कि पिछले छह महीने में ही बच्चों के साथ यौन दुराचार के 24 हजार मामले दर्ज हुए हैं। भारतीय समाज में इस सिलसिले में आई तमाम जागरूकता के बावजूद अब भी इज्जत के नाम पर ऐसी घटनाओं को दबाने और उसे भूल जाने की घटनाएं ज्यादा होती है। अपनी और पारिवारिक बदनामी के नाम पर ऐसी बहुत सारी घटनाओं पर समाज और परिवार ही पर्दा डाल देता है। इसका मतलब यह है कि दर्ज हुए मामलों से हकीकत में बाल दुराचार की घटनाएं और भी ज्यादा हैं। ऐसी घटनाओं को जितना भी शर्मनाक कहा जाएगा, कम ही होगा।

बाल दुराचार की बढ़ती घटनाओं का असर न्यायपालिका की संवेदना पर भी नजर आ रहा है। यही वजह है कि पिछले दिनों खुद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इसका संज्ञान लिया और खुद ही एक जनहित याचिका दायर कर उसकी सुनवाई की। इस सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि बच्चों से बढ़ते दुष्कर्म के हालात बेहद गंभीर हैं। इस मामले पर सुनवाई के दौरान सरकार ने जो आंकड़े अदालत के सामने रखे, उस पर रंजन गोगोई ने कहा कि कि ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए अदाल विशेष अदालतें बनाने के साथ ही तेज जांच और निर्धारित समय सीमा में ट्रायल करने के अलावा उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करने पर विचार करेंगे। रंजन गोगोई ने ऐसे मामलों की सुनवाई और दोषियों को दंडित करने के लिए संसाधन बढ़ाए जाने पर भी जोर दिया है।

भारत में दुष्कर्म की घटनाओं पर पहली पर व्यापक ध्यान दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद गया था। तब एक तरह से यौन अपराधों के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था। तब सरकार पर भी दबाव बढ़ा था। सरकारी स्तर पर कड़े कानून बनाने, त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने, मध्य प्रदेश जैसे राज्य में ऐसे एक मामले में सिर्फ 32 दिनों की सुनवाई में सजा सुनाए जाने के बावजूद बच्चों से दुष्कर्म की घटनाएं थमती ही नजर नहीं आ रही है। यह मामूली बात नहीं है कि सिर्फ पिछले छह महीने में ही बच्चों के साथ बलात्कार के 24 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। जाहिर है कि ये आंकड़े देश को झकझोरने के लिए काफी हैं। एक जनवरी से जून तक देशभर में बच्चों से दुष्कर्म के मामलों में 24212 मामले दर्ज हुए। जिनमें से 11981 मामलों में जांच जारी है जबकि 12231 मामले में चार्जशीट अदालत में पेश हो चुकी हैं। लेकिन इनमें से सुनवाई सिर्फ 6449 मामलों में ही शुरू हो सकी है। इनमें भी सिर्फ 4 फीसदी यानी 911 मामलों का ही निपटारा हो पाया है। जबकि साल 2016 में लगभग 16,863 मामले दर्ज किए गए थे। नेशनल एकेडमी ऑफ साइकोलॉजी की 2013 की रपट कहती है कि लगभग 70 फीसदी बच्चे यौन शोषण की जानकारी नहीं देते तथा 93 फीसदी यौन शोषित बच्चियां ग्रामीण इलाकों की हैं। साथ ही 20 फीसदी बच्चे गंभीर यौन उत्पीडऩ के शिकार होते हैं। वहीं राज्य स्तरीय विश्लेषण के तौर पर देखा जाए तो नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार बाल यौन शोषण के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, वहीं दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र का नंबर आता है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 65 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में यौन शोषण के शिकार होते हैं। जबकि बारह से कम आयु के 41.7 प्रतिशत बच्चे यौन उत्पीडऩ से जूझ रहे हैं।

इससे जाहिर है कि ऐसे मामलों में तेज सुनवाई के साथ ही बच्चों से यौन अपराध करने वाले मनोविकृत अपराधियों के साथ और सख्ती से पेश आने की जरूरत है।

इस तथ्य को केंद्र सरकार ने भी समझा है। शायद यही वजह है कि केंद्रीय मंत्रीमंडल ने बाल यौन अपराध संरक्षण यानी पॉक्सो कानून में संशोधन करने को मंजूरी दी है। जिस ढंग से, बाल यौनाचार की भयावह घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, उनको देखते हुए कड़े कानून की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही थी। इसलिए मोदी सरकार का बाल यौन अपराध संरक्षण यानी पॉक्सो कानून को कड़ा करने के लिए संशोधनों को मंजूरी दिया जाना सही दिशा में किया जा रहा प्रयास है। मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधनों में बच्चों का गंभीर यौन उत्पीडऩ करने वालों को मृत्युदंड और नाबालिग के खिलाफ अन्य अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। इसमें बाल पोर्नोग्राफी पर लगाम लगाने के लिए सजा और जुर्माने का भी प्रावधान शामिल है। इसमें पोक्सो की 10 धाराओं को संशोधित किया गया है। गौरतलब है कि इन प्रस्तावित संशोधनों के साथ नए पॉक्सो कानून को  संसद की मंजूरी मिलनी शेष है।

आज हालात यह है कि बच्चे कहीं सुरक्षित नहीं हैं। स्कूलों तक से कई बार वहां के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तो कई बार उन्हें स्कूल ले जाने वाले ड्राइवर तो कई बार किसी अध्यापक के ही जरिए बाल यौन उत्पीडऩ की खबरें सामने आती हैं तो कई बार बाहरी लोगों का निशाना बच्चे बनते हैं। वैसे पारिवारिक रिश्तों में भी बच्चों को यौन हमले का शिकार बनाये जाने के भी मामले सामने आ रहे है। ऐसे में समाजशास्त्री भी मानने लगे थे कि जब तक बच्चों के खिलाफ ऐसे दुष्कृत्य करने वालों को कड़े और कठोर कानून के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक हालात में सुधार नहीं होगा। ऐसे में माना जा रहा है कि कड़ा कानून ऐसे यौन अपराधियों में भय भरने में कामयाब होगा। हालांकि केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। इसके साथ ही जरूरी होगा कि पुलिस अधिकारियों की संख्या बढ़ाई जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानक के मुताबिक जहां 454 लोगों पर एक पुलिस अधिकारी होना चाहिए, वहीं भारत में 514 लोगों पर एक ही पुलिस अधिकारी है। भारत के गृह मंत्रालय में 2016 के आंकड़े के मुताबिक 10 लाख लोगों में लिए 19 न्यायाधीश हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यह संख्या 50 होनी चाहिए। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में पुलिस के विभिन्न स्तरों पर करीब साढ़े पांच लाख पद खाली हैं। इन पदों को जल्द भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकारों के साथ ही केंद्र सरकार को भी ताकीद कर चुका है। हालांकि इस दिशा में कोई ठोस प्रगति होती अभी नजर नहीं आ रही।

भारत में यह देखा जा रहा है कि बच्चों को भी दुराचार के लिए किसी तरह फंसा कर लाया जा रहा है। इनमें दूरदराज और गरीब इलाकों के बच्चे ज्यादा शिकार बनाए जा  रहे हैं। ऐसी घटनाओं में कई जगह गिरोहों के भी हाथ होने के मामले सामने आते रहे हैं। इसके साथ ही पोर्न साइटों पर भी बच्चों के साथ यौनाचार के वीभत्स दृश्य डाले जा रहे हैं। इस दुश्चलन ने दुनिया भर में विकृतियां बढ़ाई हैं। कहना न होगा कि कथित संचार क्रांति के चलते अपना देश भी इसका शिकार हुआ है। कई बार तो कुछ धनपतियों और प्रभावी लोगों द्वारा अपनी यौन कुंठा पूरी करने के लिए बच्चों के साथ अजीबोगरीब तरीके से वीभत्स यौनाचार की बातें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में पूरे समाज का दायित्व परेशानी में फंसे असुरक्षित बच्चों को बचाना और उनकी सुरक्षा व गरिमा सुनिश्चित करना है। सभी को अपना दायित्व समझना होगा। इसके साथ ही पुलिस एवं प्रशासन के साथ समाज को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सरकार और प्रशासन जो चाहिए, वे कदम तो उठाएंगे ही, लेकिन हमें भी इस समस्या के प्रति चौकस होना होगा। कहीं भी यदि कोई बच्चा संदेहास्पद परिस्थिति में दिखे तो हमें तत्काल पुलिस को जानकारी देनी होगी और पुलिस को भी त्वरित कार्रवाई करनी होगी। तभी देश के भविष्य बच्चों के साथ न्याय हो सकेगा। वे निर्भय वातावरण में सांस ले सकेंगे और भविष्य में भारत के विकास में अपना सकारात्मक योगदान दे सकेंगे।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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