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पटेल, आरएसएस और भारतीय राष्ट्रवाद

पटेल, आरएसएस और भारतीय राष्ट्रवाद

By अनिल धीर

नूरानी ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)पर लगे प्रतिबंध के संबंध में नेहरू से गुरु गोलवलकर के पत्राचार का हवाला दिया है। दरअसल नेहरू ने सिर्फ आरएसएस को ही सांप्रदायिक नहीं बताया था। शायद नूरानी को पता नहीं है कि नेहरू ने उप-प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पर सांप्रदायिक होने का तोहमद मढ़ दिया था।

हैदराबाद को रजाकारों के अत्याचार से मुक्त करने के लिए सेना के इस्तेमाल को लेकर बुलाई गई महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक के दौरान नेहरू चीखने-चिल्लाने लगे और पटेल से कहा, ”आप पूरे सांप्रदायिक हो और में कभी आपके सुझावों तथा प्रस्तावों का हिस्सा नहीं बनूंगा।’’ आहत पटेल ने मेज से अपने कागजात उठाए और कैबिनेट बैठक से चले गए। उसके बाद वे कैबिनेट बैठक में कभी नहीं गए और न फिर नेहरू से बात की।

दरअसल आरएसएस के बारे में पटेल की राय स्पष्ट थी। उन्होंने लिखा कि ”इसमें कोई दो राय नहीं कि आरएसएस ने हिंदू समाज की सेवा की। जहां मदद और संगठन की जरूरत थी, आरएसएस के नौजवानों ने स्त्रियों-बच्चों की रक्षा की। कोई भी समझदार आदमी इस पर आपत्ति नहीं उठा सकता। मैं पूरी तरह सहमत हूं कि आरएसएस के लोग अपनी देशभक्ति की भावना को कांग्रेस में शामिल होकर ही बेहतर ढंग से अंजाम दे सकते हैं, उससे अलग रहकर या उसका विरोध करके नहीं।’’

जब 12 जुलाई 1949 को प्रतिबंध हटा लिया गया तो पटेल ने गुरु गोलवलकर को लिखा, ”मेरे करीब के लोग ही जानते हैं कि मैं संघ पर प्रतिबंध हटने से कितना खुश हूं। मैं आपको शुभकामनाएं देता हूं।’’

इन स्पष्ट सबूतों के बावजूद कांग्रेस का रवैया नहीं बदला। इंदिरा गांधी ने 1966 में न्यायाधीश जे.एल. कपूर आयोग का गठन किया, जिसने करीब 100 गवाहों के बयान लिए और अपनी रिपोर्ट 1969 में पेश की। कपूर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ”मोटे तौर पर आरएसएस महात्मा गांधी की हत्या का जिम्मेदार नहीं है, मतलब यह कि शांति के दूत की हत्या का जिम्मेदार इस संगठन को नहीं माना जा सकता। यह साबित नहीं हो सका है कि वे (अभियुक्त) आरएसएस के सदस्य थे।’’

प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने अपने भाषणों से संघ के बाहर के कई लोगों से खूब वाहवाही लूटी। उन्होंने स्वयंसेवकों और आरएसएस से सहानुभूति रखने वालों से कहा, ”संघ पर प्रतिबंध के इस अध्याय को अब बंद किया जाना चाहिए। हमें अपने मन में उनके प्रति कटुता का भाव नहीं रखना चाहिए जिन्होंने हमारी नजर में, हमारे प्रति अन्याय किया है। अगर दांत जीभ को काट दें तो क्या आप दांत को उखाड़ फेकेंगे? जिन्होंने हमारे साथ अन्याय किया, वे हमारे अपने लोग ही हैं। इसलिए हमें उन्हें माफ कर देना चाहिए और कटुता भुला देनी चाहिए।’’ ऐसा विशाल हृदय था आरएसएस का।

फिर, प्रतिबंध हटने के बाद गोलवलकर अगस्त 1949 में देश भर के दौरे पर निकले और छह महीने तक दूर-दूर तक यात्रा की। जहां भी वे गए, उनका जोरदार स्वागत हुआ। उनके लिए सबसे ‘यादा भीड़ दिल्ली में 23 अगस्त 1949 को उमड़ी, जिस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान गया। बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया, ”गोलवलकर भारत के क्षितिज पर उभरने वाले नए सितारे हैं। इतनी भीड़ जुटाने की क्षमता रखने वाले दूसरे नेता बस प्रधानमंत्री नेहरू ही हैं।’’ नेहरू ने शायद प्रतिबंध पर इतना जोर इसलिए दिया हो कि उन्हें आरएसएस के रूप में सशक्त चुनौती दिखी हो।

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नूरानी ने अपने लेख में हिंदुत्व के मुद्दे पर वीर सावरकर का नाम भी घसीट लिया है। यह किसी शैतान के शास्त्र उद्धृत करने जैसा ही है। सावरकर हमेशा ही हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। ‘हिंदू’ शब्द की उनकी व्याख्या से प्रभावित होकर आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद ने कहा, ”यह वैदिक प्रकाश ही है जिसने हमारे महापुरुषों को नई सगाई के प्रति प्रेरित किया और हिंदुत्व की नई परिभाषा गढऩे का विचार दिया।’’ सावरकर के ‘हिंदू’ शब्द की व्याख्या को परोक्ष रूप से स्वतंत्र भारत के संविधान में भी स्वीकार किया गया। सावरकर के राष्ट्रवाद में कोई टकराव नहीं, बल्कि वह मानवतावाद में समाहित हो जाता है।

सावरकर के लिए हिंदूवाद हिंदुत्व का ही एक हिस्सा था। इन दो शब्दों के फर्क को न समझने के कारण ही गलतफहमी और विभिन्न समुदायों के बीच संदेह पैदा हुआ जो हमारी हिंदू सभ्यता को साझा करते हैं। हिंदुत्व हिंदू नस्ल के सभी विचारों और क्रियाकलापों का समुगाय है। इसलिए हिंदुत्व के महत्व को समझने के पहले हमें हिंदू शब्द को समझना होगा और एहसास करना होगा कि यह करोड़ों लोगों के हृदय में क्या स्थान रखता है।

लगभग पगासी प्रतिशत भारतीय अपने को गर्व से हिंदू कहते हैं। हिंदुत्व को राष्ट्रवाद का आधार बनाने का पहला चरण यह परिभाषित करना है कि धर्म क्या होता है। लोकसभा चुनाव के पहले एक साक्षात्कार में मोदी ने साफ-साफ कहा कि ”हिंदूवाद कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन-शैली है।’’ आधुनिक, आर्थिक नीतियों से संचालित भाजपा के लिए हिंदुओं से हिंदुस्तानियों का समीकरण एकमेव है। लेकिन यहां एक विरोधाभास है और कुछ मुसलमान इसे गहरे से महसूस करते हैं। अगर आपका पितृदेश भारत है और पवित्र स्थल मक्का है तो आप पूरी तरह से हिंदू नहीं हैं या कुछ कमतर भारतीय हैं। हिंदू राष्ट्रवाद की यह दुविधा उसमें मुसलमान होने के विरोधाभास के बावजूद एक भारतीयता को व्याख्यायित करने की महत्वाकांक्षा है।

मोदी खुद एक प्रतिबद्ध स्वयंसेवक हैं और हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा से जुड़े हैं। वे इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारत के अधिकांश लोग हिंदू हैं लेकिन वे खुद को हिंदू राष्ट्रवादी नहीं कहते। गांधी नैतिक और सामाजिक अर्थों में हिंदू होने के बावजूद हिंदू राष्ट्रवादी नहीं थे। मौलाना अब्दुल कलाम पक्के मुसलमान, और ऊंचं दर्जे के विद्वान थे मगर वे मुस्लिम राष्ट्रवादी नहीं थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी सभी धर्मों के ज्यादातर लोग भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़े थे, न कि धार्मिक राष्ट्रवाद से।

हिंदू राष्ट्रवाद को राम मंदिर चाहिए, जबकि भारतीय राष्ट्रवाद को स्कूल, विश्वविद्यालय और नौजवानों को रोजगार के लिए कारखाने चाहिए। मोदी हर वर्ग, संप्रदाय और धर्म के विकास पर आधारित भारतीय राष्ट्रवाद की कामना करते हैं।

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उपजे भारतीय राष्ट्रवाद के लिए हिंदू राष्ट्रवाद को चुनौती के रूप में देखा जाता है। इसी तरह म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध राष्ट्रवाद को लोकतंत्र के लिए चुनौती माना जाता है, पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्रवाद तबाही मचा रहा है। लेकिन मोदी के भारत में ऐसा कुछ नहीं है।

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