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पटेल की प्रासंगिकता

पटेल की प्रासंगिकता

By उदय इंडिया ब्यूरो

पटेल शायद सबसे अधिक मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना के प्रतीक हैं जो आज कहीं खो गई-सी लगती है। देश को एकसूत्र में पिरोने के बाद भारत के आखिरी छोर कन्याकुमारी के दौरे पर उन्होंने साथ गए लोगों से कहा था, ”आप भारत माता के चरणों में हो, कुछ देर अपनी आंखें बंद करो और सोचो हिमालय के नीचे वह क्या है जिसे अभी एकसूत्र में पिरोना बाकी है।’’

जब देश के लोग किसी एक राजनैतिक खानदान की उपासना करने को मजबूर हुए थे, जब बड़े सामाजिक उद्देश्यों के लिए देशसेवा का बढ़-चढ़ कर दावा करने वाले क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थों को साधने में व्यस्त हो गए, उससे काफी पहले एक नेता ऐसा भी था जिसने अपने दृढ़ संकल्प से हमारी एकता को संभव बनाया था।

आश्चर्य है कि आज सरदार पटेल की कुछ गाहे-बगाहे औपचारिक आयोजनों के अलावा न चर्चा होती है, न उन्हें याद किया जाता है जबकि उनकी प्रासंगिकता दिनोदिन बढ़ती जा रही है। जब देश नेतृत्व और सुशासन के मामले में एक के बाद एक संकट के  दौर से गुजर रहा हो, जब अदूरदर्शी क्षत्रप देश की एकता की नींव पर लगातार चोट कर रहे हों, जब सार्वजनिक सक्रियता का एकमात्र उद्देश्य ऐशोआराम की जिंदगी हासिल करना बन गया हो, ऐसे समय में पटेल का प्रेरणास्पद व्यक्तित्व और कृतित्व दूसरे कई शख्सियतों से ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

फिर भी, उस महान व्यक्तित्व को भुला दिया गया है। जिस शख्सियत ने चार साल तक नई दिल्ली के 1, औरंगजेब रोड़ पर निवास के दौरान देश की भौगोलिक एकता को बनाए रखने के लिए संकल्पबद्ध प्रयास किए, उसका आज कोई नामलेवा नहीं है। कहीं उसके कोई निशान नहीं दिखते। मानो राष्ट्रीय राजधानी में स्मारक स्थापित करने का एकमात्र अधिकार एक राजनैतिक परिवार का हो।

लेकिन पटेल ने भी शायद खुद स्मारक स्थापित करने, अपनी प्रशंसा करने की मनाही की थी। अपने बारे में उनके विचार कुछ अलग थे। मृत्यु के साल भर पहले 1949 में उन्होंने कहा था, ”मैं स्वयं को हिंदुस्तान की सेवा में एक सिपाही मानता हूं और मैं जीवन पर्यंत सिपाही ही बना रहंगा। जिस दिन सेवा के इस पथ से मैं विचलित होऊंगा, उस दिन मेरा अस्तित्व मिट जाएगा।’’

जिस दौर में देश के नेता स्वार्थ को ही तरजीह दे रहे हों, पटेल का नि:स्वार्थ सेवा भाव अद्भुत मिसाल बन सकता है। उनके एक सहयोगी ने, जो बाद में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने, बताया था कि बतौर केंद्रीय मंत्री सरदार पटेल ”प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों से फोन पर बात करने का खर्च अपने वेतन से दिया करते थे। कांग्रेस के फंड से पैसे नहीं लेते थे।’’ सरदार पटेल की बेटी और सचिव मणिबेन खर्च का हिसाब-किताब रखा करती थीं।

आज के राजनैतिक रिवाज के उलट, पटेल अपने परिजनों को लाभ पहुंचाने के मामले में एकदम कट्टर शुद्धतावादी थे। 1950 के प्रारंभ में कभी पटेल के बेटे दाहयाभाई दिल्ली आए। उन्होंने ”कराची की एक कंपनी का 1945 में एक पार्टनर के साथ अधिग्रहण किया था, अब वे बंबई (मुंबई) में एक मुस्लिम द्वारा छोड़ी गई जमीन को लेने की अनुमति चाहते थे।’’ इससे पटेल इस कदर नाराज हुए कि बेटे को फौरन निकल जाने को कहा। बाद में उन्होंने अपने एक सहयोगी को बताया, ”मैं गुस्से से कांप रहा था। मैंने उससे कहा, फौरन यहां से निकल जाओ।’’ पटेल का यह गुस्सा आज के राजनैतिक चाल-चलन से कितना अलग और पवित्र था।

22-11-2014

जब सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर आज भी बहस चल रही है, हमने पुरानी युद्धों के सबक भुला दिए हैं, पटेल का ऐसे ही मामले में एक उदाहरण प्रेरणादायक है। अक्टूबर 1947 के आखिरी हफ्ते में जब पठान कबायली कश्मीर में धावा चुके थे, पटेल ने केंद्रीय सार्वजनिक कार्य मंत्री एन.वी. गाडगिल को बुलाया और नक्शे में जम्मू-पठानकोट के इलाके को दिखाकर निर्देश दिया कि ”दोनों शहरों के बीच भारी वाहनों वगैरह के परिवहन के 65 मील लंबी सड़क अगले आठ महीने में बनाई जाए।’’ उन्हें यह एहसास हो गया था कि लड़ाई लंबी चलेगी।

जब गाडगिल ने कहा कि ”नदी-नाले, पहाड़ी और पर्वत’’ नक्शे में जाहिर नहीं हो रहे हैं इसलिए यह काम काफी कठिन है। तो, सरदार ने दो-टुक कहा, ”आपको यह करना है।’’ तमाम दिक्कतों पर पार पा कर करीब 10,000 मजदूर राजस्थान से विशेष ट्रेन के जरिए ले जाए गए। ”रात में काम करने के लिए बत्तियां लगाई गईं, मजदूरों के शिविर लगे, सचल सिनेमा और बाजार की व्यवस्था की गई’’ और काम समय पर पूरा हो गया।

पाकिस्तान पर पटेल का नजरिया आज भी दोहराने की जरूरत है। उन्होंने 1950 में दौरे पर आए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से साफ-साफ कहा, ”मेरी पक्की राय है कि दोनों देशों को अपनी नियति तलाशनी होगी, लेकिन नियति उनके हाथ में है।’’ लेकिन ”दोनों देशों के बीच चाहे जैसे रिश्ते बनें, मैं तो भारत को महान और समृद्धशाली बनाने की महत्वाकांक्षा छोडऩे को तैयार नहीं हूं। यह हमें हासिल करना ही होगा, अब चाहे इसके लिए पाकिस्तान से दोस्ती हो या कुछ और।’’

स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस पार्टी पर पटेल की पकड़ इतनी मजबूत थी कि एक बार जेल में महात्मा गांधी ने उनके बारे में लिखा, ”मेरी दिक्कत यह है कि तुम मेरे सामने नहीं हो, इसलिए मैं एकलव्य का ध्यान करता हूं, जो द्रोणाचार्य के मना करने के बाद उनकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर धनुष विद्या की साधना करता था, मैं तुम्हारी मूर्ति आंखों के सामने लाकर रोज उससे सवाल करता हूं।’’

लेकिन पटेल शायद सबसे अधिक मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना के प्रतीक हैं जो आज कहीं खो गई-सी लगती है। देश को एकसूत्र में पिरोने के बाद भारत के आखिरी छोर कन्याकुमारी के दौरे पर उन्होंने साथ गए लोगों से कहा था, ”आप भारत माता के चरणों में हो, कुछ देर अपनी आंखें बंद करो और सोचो हिमालय के नीचे वह क्या है जिसे अभी एकसूत्र में पिरोना बाकी है।’’

इसलिए सरदार को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा जाहिर करने का शायद यही सबसे अच्छा उदाहरण है कि उन्हें राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोने वाला माना जाए। उनकी इस छवि का स्मरण बार-बार किया जाना चाहिए!

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