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सरदार और संघ के बीच अंतर किसने बनाया ?

सरदार और संघ के बीच अंतर किसने बनाया ?

By डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाये गये आरोपों का उत्तर तुरन्त उसी दिन नेहरु को भेजा और साथ ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के झूठ की पोल भी खोली। पटेल ने लिखा, ”बख्शी गुलाम मोहम्मद कल लगभग पूरा दिन मेरे साथ था। उसने मुझे यह नहीं बताया कि उसे राज्य के अधिकारियों से मिलने में कुछ कठिनाई हुई है या किन्हीं हथियारों को रोक लिया गया है। दरअसल मुझे तो यह भी नहीं पता था कि हथियारों का ऐसा भंडार राज्य सरकार के पास है।’’

देश में सरदार पटेल की सबसे ऊची मूर्ति स्थापित करने का निर्णय गुजरात सरकार ने पहले ही कर लिया था। इसके लिये देश के कोने-कोने से लोहा भी एकत्रित किया जा चुका है। अब इस प्रकल्प का क्रियान्वयन हो रहा है। सरदार पटेल की 182 मीटर की इस प्रस्तावित मूर्ति को ‘एकता की प्रतिमा’ नाम दिया गया है। नर्मदा में एक टापू पर निर्मित की जाने वाली यह प्रतिमा अमेरिका में स्थित ‘मुक्ति-प्रतिमा’ से आकार में दो गुना होगी। वैसे भी यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। वैसे तो पिछले साल 31 अक्तूबर को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब अपना यह संकल्प देश के लोगों के साथ साझा किया था तो एक खास तबके में खलबली मच गई थी और मीडिया के एक हिस्से में बहस शुरु करवा दी गई थी। सरदार पटेल की जब भी कोई बात करता है तो तुरन्त कुछ लोगों को लगने लगता है कि शायद यह पंडित जवाहरलाल नेहरु को नीचा दिखाने के लिये किया जा रहा है। उसके बाद दूसरा हल्ला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर मचने लगता है। भाव कुछ इस प्रकार का होता है, मानों सरदार पटेल की बात करने के पीछे संघ की योजना है और यह योजना भी नेहरु को नीचा दिखाने के लिये है। सरदार पटेल की प्रतिमा को लेकर भी इस प्रकार की बहस चल रही है। उसके तुरन्त बाद नेहरु के तथाकथित भक्तों की ओर से चिल्ल-पों शुरु हो जाती है कि सरदार पटेल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ थे और उन्हीं के मंत्रालय ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया था।

एक बात समझ से परे है। नेहरु के वैचारिक प्रतिष्ठान के प्रति समर्पित लोग, उनके वैचारिक आधार को इतना पिलपिला क्यों मानते हैं कि आज पटेल की मृत्यु के पांच दशक बाद भी उसकी छाया से ही वह आधार हिलने लगता है? क्या नेहरु की कुल उपलब्धियों की नींव व उस पर बना भवन इतना कच्चा है कि पटेल की छाया मात्र से उसके तिरोहित होने का खतरा पैदा हो जाता है? एक बात और, यदि यह खेमा सचमुच यह मानता है कि सरदार पटेल संघ के सख्त विरोधी थे तो उनके इस तर्क की कीमत कितनी रह जाती है कि पटेल को उभारने का काम संघ कर रहा है? संघ अपने विरोधी को क्यों उभारेगा? पटेल और नेहरु में मतभेद बहुत ज्यादा थे, इसमें कोई शक ही नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री का निर्णय कांग्रेस ने सरदार पटेल के पक्ष में ही किया था, लेकिन महात्मा गान्धी ने नेहरु के पक्ष में अपनी राय दी। यह भी निर्विवाद है कि नेहरु का महात्मा गान्धी के चिन्तन में रत्ती भर भी विश्वास नहीं था। नेहरु ने इसे कभी छिपाया भी नहीं। गान्धी के ‘हिन्द स्वराज’ को नेहरु ने एक पत्र लिखकर स्पष्ट रुप से अप्रासंगिक बता दिया था। यह पत्र भी नेहरु ने गान्धी को ही लिखा था। नेहरु, पटेल और गान्धी की संगति में इतना सहज नहीं रह पाते थे जितना लॉर्ड माऊंटबेटन और लेडी माऊंटबेटन की संगति में महसूस करते थे। उसका कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि तो थी ही, ब्रिटेन की छाया में विकसित हुआ उनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण भी था। यह दृष्टि ही पटेल से उनके मतभेदों का कारण थी। यह मतभेद ब्रिटिश आभिजात्य दृष्टि और भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि का था। दरअसल जिस दिन गान्धी की हत्या हुई उस दिन भी पटेल अपना त्यागपत्र देने के लिये ही गान्धी के पास गये थे।

22-11-2014

वास्तव में नेहरु और पटेल की भारत को लेकर दृष्टि अलग थी। नेहरु भारत को उसी दृष्टि से देखते थे जिस दृष्टि से अंग्रेज भारत को देखते थे। नेहरु कुलीन वर्ग के व्यक्ति थे। वे ब्रिटिश कुलीन वर्ग के साथ सहज रह पाते थे। अंग्रेज भी सांस्कृतिक दृष्टि से भारत को समझने की कोशिश कर रहे थे और नेहरु भी उसी प्रकार भारत को खोजने की कोशिश कर रहे थे। उनकी ‘डिस्कवरी ऑफ  इंडिया’ उनकी इसी खोज का परिणाम था। इसके विपरीत, गान्धी और पटेल जमीन से जुड़े व्यक्ति थे। उनको भारत की खोज करने की जरुरत नहीं थी। भारत उनकी आत्मा में बसा था। अंग्रेजों के दो सौ साल के शासन के कारण सांस्कृतिक स्तर पर दो भारत उभर आये थे। एक भारत वह था जो यहां का आम आदमी समझ पाता था, दूसरा भारत वह था जिसे अंग्रेजों ने बनाया और समझा था। दूसरे भारत के प्रतिनिधि नेहरु और माऊंटबेटन थे। इसमें कोई शक ही नहीं कि अंग्रेजों की इच्छा रही होगी कि उनके जाने के बाद भी भारत की बागडोर उसी के हाथों रहे जो भारत को लेकर गढ़ी गई ब्रिटिश अवधारणाओं का मुरीद हो। पहले भारत के प्रतिनिधि गान्धी और पटेल थे। यह गुत्थी अभी तक सुलझ नहीं पाई की नेहरु को प्रधानमंत्री बनाने के लिये गान्धी क्यों आमादा थे? शायद वे नेहरु-दृष्टि और पटेल-दृष्टि के समन्वय का नया प्रयोग कर रहे हों। हो सकता है गान्धी को यह भी डर हो कि पटेल तो उनकी बात मान जायेंगे, लेकिन यदि नेहरु को प्रधानमंत्री न बनाया तो वे कहीं अपनी अलग पार्टी न बना लें, जैसा कि उनके पिता ने एक बार गान्धी से मतभेदों के चलते कांग्रेस छोड़कर स्वराज पार्टी बना ली थी।

कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन सरदार पटेल जल्दी ही समझ गये थे कि नेहरु जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह जल्दी ही भारत को संकट में ही नहीं डालेगा, बल्कि भारत की पहचान के लिये भी खतरा पैदा करेगा। इसीलिये पटेल की पहल पर कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिये, ताकि देश की सभी राष्ट्रवादी ताकतें मिलकर एक सशक्त भारत का निर्माण कर सकें। यदि पटेल संघ विरोधी होते तो यह प्रस्ताव पारित न होता।

अंग्रेजों को शायद यह भी अहसास होने लगा था कि नेहरु का महात्मा गान्धी से भी देश के आर्थिक विकास को लेकर निकट भविष्य में गहरा विवाद हो सकता है। हिन्द स्वराज को लेकर गान्धी और नेहरु के मतभेद प्रकट होने ही लगे थे। पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपया देना चाहिये, इसको लेकर महात्मा गान्धी ने जो मरण व्रत रखा था, उसके लिये गान्धी को उकसाने में लॉर्ड माऊंटबेटन का भी हाथ था। सारा ताना-बाना इतनी ख़ूबसूरती से बुना गया कि पटेल आदि को भनक न लग सके। माऊंटबेटन अपनी सामान्य बुद्धि से इतना तो जानते ही होंगे कि विभाजन के बाद दिल्ली के उत्तेजित वातावरण में गान्धी को इस प्रकार के काम के लिये उत्साहित करना घातक सिद्ध हो सकता है। क्या माऊंटबेटन भारत से जाने के पहले नेहरु का रास्ता निरापद करके जाना चाहते थे?

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एक बात और ध्यान में रखनी चाहिये कि महात्मा गान्धी की हत्या का बहाना बनाकर नेहरु ने केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही निपटाने की कोशिश नहीं की, बल्कि हत्या की आड़ में सरदार पटेल को भी किनारे करने की कोशिश की। उन दिनों की अखबारों को यदि देखा जाये तो यह फुसफुसाहट भी चालू कर दी गई थी कि हत्या के लिये पटेल भी किसी न किसी रुप में जिम्मेदार हैं। पटेल इन आरोपों से काफी व्यथित भी थे। एक तीर से दो शिकार करने की यह पुरानी पद्धति थी। नेहरु के वैचारिक प्रतिष्ठान के स्वयंभू पहरेदार बार-बार चिल्लाते हैं कि पटेल ने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाया था। वे यह नहीं बताते कि यदि पटेल उस समय संघ पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध करते तो शायद नेहरु के समर्थक गान्धी की हत्या के लिये सीधे-सीधे पटेल को ही उत्तरदायी ठहराने लगते। जांच के बाद जब पाया गया कि संघ का गान्धी हत्या से कोई सम्बंध नहीं है तो पटेल ने प्रतिबन्ध उठा भी लिया।

यदि पटेल संघ विरोधी ही होते तो वे कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के पास बातचीत करने के लिये संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर को न भेजकर किसी कांग्रेसी को भेजते। सरदार पटेल से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण घटनाएं अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन जब बहस चल ही निकली है तो कुछ का स्मरण करना समीचीन होगा। जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान ने हमला किया हुआ था। महाराजा हरि सिंह ने रियासत को नई स्थापित हो रही संघीय लोकतांत्रिक सांविधानिक व्यवस्था का अंग बनाने के लिये 26 अक्तूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये थे। राज्य में भारतीय सेना आक्रमणकारियों से जूझ रही थी। शेख अब्दुल्ला के पास रियासत की सत्ता आ गई थी। लेकिन, शेख के निशाने पर अब महाराजा हरि सिंह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आ गये थे। दोनों को रियासत से बाहर करने की अपनी योजना पर उसने काम शुरु कर दिया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मिलिशिया या होमगार्ड के नाम से अपने संगठन का युवा विभाग बनाया था और भारत सरकार इसे हथियार मुहैया करवा रही थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने नेहरु के पास जाकर शोर मचाना शुरु किया कि जो हथियार हमारे होमगार्डों के लिये भेजे जा रहे हैं, महाराजा और रियासत के दीवान मेहरचन्द महाजन उन हथियारों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास पहुंचा रहे हैं। सब जानते हैं कि संघ और महाराजा के नाम पर नेहरु बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते थे। उन्होंने तुरन्त सरदार पटेल को 30 दिसम्बर 1947 को एक पत्र लिखा, ”मुझे टैलीफोन पर एक चिन्ता पैदा करने वाली सूचना बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद ने दी है। जो शस्त्र हमने भेजे थे, वे रोक लिये गये हैं और उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों में बांट दिये गये हैं। जब जम्मू अनिवार्य रुप से खतरे में है, उस समय बड़ी मात्रा में भेजे गये हथियारों को रोका गया। बख्शी के होमगाडर््ज बिना राइफलों के लड़ रहे हैं और उनके पास बारुद भी कम रहता है, जिससे अनेक जवानों ने अपनी जान गंवाई है। अनेक रपटों से जो सूचना मुझे प्राप्त हुई हैं, लगता है कि बख्शी के होमगार्ड्स की कीमत पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता जा रही है। खुलेआम पोस्टरों एवं अन्य उपायों से शेख अब्दुल्ला के खिलाफ प्रचार किया जा रहा है। राज्य के दूरदराज के इलाकों में, जहां आक्रमणकारी नहीं हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिनिधि दहशत पैदा कर रहे हैं। यह स्थिति बहुत गंभीर है और इसे इसी तरह आगे नहीं बढऩे दिया जा सकता।’’

सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाये गये आरोपों का उत्तर तुरन्त उसी दिन नेहरु को भेजा और साथ ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के झूठ की पोल भी खोली। पटेल ने लिखा, ”बख्शी गुलाम मोहम्मद कल लगभग पूरा दिन मेरे साथ था। उसने मुझे यह नहीं बताया कि उसे राज्य के अधिकारियों से मिलने में कुछ कठिनाई हुई हो या किन्हीं हथियारों को रोक लिया गया हो। दरअसल मुझे तो यह भी नहीं पता था कि हथियारों का ऐसा भंडार राज्य सरकार के पास है। (यदि संघ की गतिविधियां आपत्तिजनक होतीं तो बख्शी मुझे जरुर बताते) लेकिन न तो बख्शी ने और न ही किसी अन्य व्यक्ति ने जम्मू में मुझे आर.एस.एस की गतिविधियों के बारे में कोई शिकायत की। आर.एस.एस ने शुरु में कुछ किया हो पता नहीं, लेकिन किसी आपत्तिजनक गतिविधि का कोई साक्ष्य नहीं है।’’ नेशनल कॉन्फ्रेंस अच्छी तरह जानती थी कि संघ के बारे में नेहरु को बरगलाया जा सकता है, सरदार को नहीं।

दरअसल नेहरू के क्रियाकलापों और गतिविधियों से समस्याएं सुलझने के बजाय उलझती ज्यादा थीं, खासकर कश्मीर के मामले में। इससे पटेल चिंतित रहते थे। पटेल ने 1946 के मध्य में ही इसकी चर्चा द्वारिकाप्रसाद मिश्र से की थी। पटेल के अनुसार, ”नेहरु ने हाल ही में ऐसी बहुत-सी बातें कही हैं, जिनसे जटिल उलझनें पैदा हुर्इं हैं। कश्मीर के सम्बध में उनकी गतिविधियां, संविधान सभा में सिख चुनाव में हस्तक्षेप, कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के तुरन्त बाद प्रेस सम्मेलन बुलाना, ये सभी काम उनके भावनात्मक पागलपन के ही थे, जिससे हम सभी को इन मामलों के समाधान में अत्यन्त तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा।’’

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खैर, इधर जम्मू-कश्मीर में सेना पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से जूझ रही थी और उधर शेख अब्दुल्ला और उनकी नेशनल कॉन्फ्रेंस अपना निशाना महाराजा को बनाये हुए थी। आगे उन्होंने राज्य के दीवान मेहरचन्द महाजन को भी अपने निशाने पर यह आरोप लगाकर ले लिया था कि वे संघ की सहायता कर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक सेना के कन्धे से कन्धा मिलाकर सहायता कर रहे थे। स्वयं सेनाधिकारी इस तथ्य को स्वीकार रहे थे। कई स्थानों पर तो अग्रिम मोर्चों पर भी संघ के स्वयंसेवक सेना को गोला बारुद पहुंचा रहे थे। लेकिन नेहरु को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं था। उन्होंने सरदार पटेल का पत्र प्राप्त होने पर उसी दिन बिना एक भी क्षण गंवाये उसका उत्तर दिया। पटेल द्वारा स्थिति स्पष्ट कर दिये जाने के बाद उन्होंने हथियारों के मामले को सेना की ओर खिसका दिया। उन्होंने लिखा, ”हथियार बांटने का मामला पुराना हो चुका है और इस पर अनेक बार सैनिक अधिकारियों के साथ चर्चा हो चुकी है। सर बुकर अधिक रुष्ट हैं कि बख्शी को भेजे गये शस्त्र उसे क्यों नहीं दिये गये। उन्होंने कुलवंत सिंह से इसका स्पष्टीकरण भी मांगा है।’’ वैसे रिकार्ड के लिये बता दिया जाये कि जिस बुकर का नेहरु गवाही की तरह इस्तेमाल कर रहे थे वह अंग्रेज ही था और आजादी के बाद भी भारतीय सेना का मुखिया था और भीतर ही भीतर अन्य अंग्रेज सैनिक अधिकारियों की तरह प्रयासरत था कि पाकिस्तान ज्यादा से ज्यादा रियासत पर कब्जा कर ले। नेहरु ने अबकी बार नये मुद्दे उठा लिये थे। अब तक नेहरु शेख के प्रभाव में इतना आ चुके थे कि वे यह कल्पना भी करने लगे कि हिन्दुओं ने शेख को नेता स्वीकार लिया है। पटेल के स्पष्टीकरण के बाद भी निशाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही था। नेहरु ने लिखा, ”शेख ने हिन्दुओं का सहयोग प्राप्त करने का कठिन प्रयास किया है। इसमें उन्हें कश्मीर में पूर्ण रुप से तथा जम्मू में कुछ सीमा तक सफलता प्राप्त हुई है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्थानीय अधिकांश हिन्दू अब उनके साथ हैं। किन्तु आर.एस.एस और पंजाब के हिन्दू भिन्न प्रकार के हैं। उनके और शेख अब्दुल्ला के बीच गहरी खाई है। मुझे समझ नहीं आता कि इस खाई को कैसे पाटा जाये, जब आर.एस.एस पर आरोप है कि उसने जम्मू में मुसलमानों को मारने का संगठित प्रयास किया है।’’ नेहरु की संघ और हिन्दुओं को लेकर की गई ये टिप्पणियां भ्रान्त धारणाओं पर आधारित थीं। शेख के साथ जिन हिन्दुओं के जुडऩे की बात नेहरु कर रहे थे, वे सी.पी.आई के लोग थे, जो उस समय की पार्टी लाईन के अनुसार या तो जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र राज्य बनाने का प्रयास कर रहे थे या फिर उसे पाकिस्तान में मिलाने का, क्योंकि महाराजा हरि सिंह ने राज्य में नई संघीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना का रास्ता खोलकर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करवाने की योजना तो समाप्त कर दी थी, इसलिये अब वे भविष्य में रियासत को स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिलवाने की योजना पर अमल करने के लिये शेख के साथ हो लिये थे।

सरदार पटेल नेहरु द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाये गये इन नये आरोपों का उत्तर तुरन्त नहीं दे सकते थे, क्योंकि उन्हें उसी दिन (30 दिसम्बर) को असम के प्रवास पर जाना था। लेकिन, असम से वापस आकर उन्होंने तुरन्त 8 जनवरी 1948 को नेहरु को उत्तर दिया। पटेल ने लिखा, ”असम के प्रवास पर जाने से पूर्व आपने मुझे कहा था कि गुलाम मोहम्मद बख्शी की शिकायत है कि हमारे भेजे गये शस्त्रों को बख्शी के होम गार्डस को देने के बजाय आर.एस.एस को दे दिया गया है। आपने यह भी कहा था कि इसके लिये महाराजा स्वयं तथा उनके प्रधानमंत्री मेहरचन्द महाजन इसके लिये दोषी हैं।’’ पटेल ने इस आरोप का सिलसिलेवार उत्तर दिया। पटेल के अनुसार, ”ये हथियार राज्य के सैनिक सलाहकार को दे दिये गये थे। न तो महाराजा को और न ही महाजन को इस बात की जानकारी है कि ये किसे बांटे गये। उसके बाद पटेल ने नेहरु की संतुष्टि के लिये बताया कि ये हथियार भारतीय सेना के मेजर जनरल कुलवन्त सिंह को दिये गये थे और उन्होंने इन्हें बख्शी को सुपुर्द कर भी दिया था।’’ यदि पटेल का इस कथन सत्य मान लिया जाये तो बख्शी झूठ क्यों बोल रहा था? इसका उत्तर भी पटेल ने नेहरु को दिया। ”ऐसा लगता है कि जनरल ने बख्शी के लाइट मशीनगन और मोर्टार देने के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इन हथियारों का प्रयोग करने का कौशल बख्शी के होमगार्डों के पास नहीं था। और जहां तक महाराजा और मेहरचन्द महाजन का प्रश्न है, यह भी संभावना है कि बख्शी ने हथियार बिना उन्हें बताए अपने होमगार्ड्स के लिये मांगे हों।’’ यह अलग बात है कि नेहरु ने इस बात की जांच करवाना जरुरी नहीं समझा कि बख्शी मोर्टार और लाइट मशीनगनें किस उद्देश्य से मांग रहे था?

इसके बाद पटेल ने एक बार फिर संघ को लेकर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने लिखा, ”जहां तक यह आरोप है कि आर.एस.एस के कार्यकर्ताओं को हथियार दिये जाते हैं तो आज तक महाराजा या मेहरचन्द महाजन, दोनों में से किसी ने भी संघ को देने के लिये हथियारों की मांग नहीं की। संघ के कुछ लोगों के बारे में शिकायत थी कि वे राज्य में मुसलमानों के विरुद्ध शिकायत करते हैं। महाजन ने एक बैठक बुलाकर सभी पक्षों को स्पष्ट कर दिया कि किसी भी प्रकार की शरारत सहन नहीं की जायेगी। जहां तक हथियारों को दिये जाने का प्रश्न है, वे रियासत की सेना के लिये ही अपर्याप्त हैं, अत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिये जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। राज्य सरकार ने अपनी एक मिलिशिया गठित की है, जो सैनिक अनुशासन के अन्तर्गत है। संघ के स्वयंसेवक उसमें भर्ती होकर सीमा पार युद्ध में भाग ले चुके हैं।’’

पहली बार सरकार के स्तर पर भारत के उपप्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि संघ के लोग सेना के साथ मिलकर सीमा पार युद्ध में भाग ले रहे हैं। नेहरु को पटेल की इस स्पष्टोक्ति से कितना कष्ट हुआ होगा, यह तो अल्लाह ही जानता होगा, लेकिन पहली बार सरकारी स्तर पर जम्मू-कश्मीर में संघ की युद्ध के दौरान भूमिका को पटेल ने आधिकारिक रुप से इतिहास का हिस्सा बना दिया। आमीन। क्या यह संयोग ही नहीं है कि जब एक साल पहले गुजरात सरकार ने पटेल की प्रतिमा लगाने की घोषणा की तो नेहरु समर्थकों में बेचैनी बढऩे लगी। इस पर बहस शुरु हुई और मामला बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ा कि देश में सत्ता परिवर्तन ही हो गया। इस सत्ता परिवर्तन पर सबसे सटीक टिप्पणी भी ब्रिटेन के अग्रणी समाचार पत्र ‘दि गार्जियन’ ने ही की कि ‘अब जाकर सचमुच अंग्रेज भारत से विदा हुये हैं।’ इतना तो सब मानते ही हैं कि अब तक मोटे तौर पर देश की सत्ता वैचारिक दृष्टि से नेहरुवादियों के हाथ में ही रही है। चाहिये तो यह था कि इस टिप्पणी पर खुली बहस होती और चैनलों में यह सुर्खी बनती, लेकिन उससे सब बच रहे हैं। सरदार पटेल की छाया से भी डरे-सहमे लोग घूम-फिर कर इसी को लेकर मिमियाना शुरु कर देते हैं कि पटेल भी संघ विरोधी थे।

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