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आओ मिलाएं हाथ…

आओ मिलाएं हाथ…

By अनिल धीर

स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं कई सदियों तक प्रासंगिक रहेंगी, क्योंकि उन्होंने ही हमारे पतन के कारणों को बताया था। उन्होंने कहा कि जनता की उपेक्षा सबसे बड़ा पाप है और स्त्रियों की उपेक्षा उससे भी बड़ा पाप है। हाल के दौर की कुछ घटनाएं यही बताती हैं कि आज भी यही हालात हैं। विवेकानंद ने धर्म के नाम पर प्रताडऩा को गलत बताया था और शिक्षा के महत्व पर जोर दिया था। उन्होंने युवा पीढ़ी में आस्था जताई थी और भारत के लोगों में एकता के अभाव को पतन का कारण बताया था। उन्होंने कहा कि हमें अपने देश का सम्मान करना सीखना चाहिए और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी वजह से विवेकानंद को देशभक्त कहा जाता है। अहिंसा के पुजारी विनोवा भावे ने सही कहा था, ”विवेकानंद ने न सिर्फ हमें अपनी ताकत का एहसास कराया, बल्कि हमारी कमियों और कमजोरियों को भी बताया।’’

दुनिया में नौजवानों के रहते सभ्यता को पीछे ले जाना संभव नहीं है। आर्थिक प्रगति में भी युवा शक्ति सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। जब विकसित देशों की आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही हो तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। वर्ष 2020 में भारत के लोगों की औसत उम्र महज 29 वर्ष होने की उम्मीद है जबकि चीन और अमेरिका में 37 वर्ष, पश्चिमी यूरोप में 45 वर्ष और जापान में 48 वर्ष हो सकती है। इस मायने में भारत लाभ की स्थिति में होगा। भारत में काम करने की उम्र वाली आबादी में 4.7 करोड़ लोगों के इजाफा होने का अनुमान है। अब इन करोड़ों नौजवान भारतीयों की ऊर्जा का अंदाजा लगाइए, तब आप सोच सकते हैं कि हम एक राष्ट्र के रूप में किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति और ताकत उसके युवा होते हैं। देश का भविष्य आने वाली पीढिय़ां ही तय करती हैं। युवाओं का बुद्धि-कौशल ही यह तय कर सकता है कि उस देश का भविष्य कैसा होगा। इसलिए हम अगर भारत का भविष्य उज्ज्वल देखना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने युवाओं कार्य-कुशल और क्षमतावान बनाना होगा। जनसंख्या के मामले में भारत आज अपनी जवानी पर है। भारत में विश्व भर में नौजवानों की सबसे बड़ी आबादी है। देश की कुल आबादी में 66 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के लोग हैं। करीब 40 प्रतिशत आबादी 13 से 35 वर्ष की उम्र की है। ऐसे में अगर हम इस युवा शक्तिपूंज को सही दिशा में ले जाएं तो देश किसी भी बुलंदी को छू सकता है। युवा पीढ़ी की रचनात्मक क्षमताओं में अगर लगन, उत्साह, ऊर्जा और प्रतिभा को जोड़ दिया जाए तो देश आश्चर्यनक ऊंचाइयां छू सकता है। हमें बस अपने युवाओं ऐसी ताकत से संपन्न कर देना है कि वे बेहतर भविष्य बना सकें।

हमारे युवाओं में समाज की बुराइयों और अन्याय से लडऩे की अपार क्षमता है, उनमें अपने मूल्यों के प्रति श्रद्धा है और उम्मीदों और आकांक्षाओं से लबालब भरे हुए हैं। आज स्वामी विवेकानंद की शिक्षा का सबसे अधिक महत्व है। युवाओं को ताकत प्रदान करने का सबसे अच्छा और बेहतर उपाय उचित शिक्षा देना है। ऐसी शिक्षा जो वैज्ञानिक, तार्किक बुद्धि का विकास करे और युवाओं को खुले दिमाग वाला आत्म-स्वाभिमानी, ईमानदार और देशभक्त नागरिक बनाए। इस संदर्भ में यह बताना सार्थक है कि स्वामी जी मानव मन और समाज के महान वेत्ता थे। वे यह समझते थे कि किसी समाजिक परिवर्तन के लिए अकूत ऊर्जा और उत्कट इच्छा की जरूरत होती है। इसीलिए उन्होंने नौजवानों से बौद्धिक ही नहीं, शारीरिक शक्ति निर्माण का भी आह्वान किया। वे अपने देश के युवाओं में ‘लौह मांसपेशियों’ के साथ ‘फौलादी इरादों’ का समावेश देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि युवाओं में सामाजिक कार्य के रास्ते में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए शारीरिक और मानसिक तैयारी हो। वे व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाते थे और उन्हें युवाओं के आगे आने वाली चुनौतियों और समाज की प्रतिक्रियाओं का भी पूरा एहसास था।

इसलिए युवाओं में किसी भी काम के लिए तन-मन की शुद्धता, धैर्य और लगन की जरूरत है। समाज की प्रतिक्रिया प्रारंभ में भले कष्टप्रद और धीमी हो सकती है लेकिन आखिरकार अच्छे काम स्वीकार किए जाते हैं। लेकिन भारत अनेक विरोधाभासों का देश है। एक तरफ देश में बेहिसाब युवा-शक्ति है तो दूसरी तरफ हमारे एक-तिहाई लोग हर रोज दो जून की रोटी के लिए तरसते रहते हैं। दूरसंचार, सूचना तकनीक इौर अंतरिक्ष अनुसंधान के मामले में भारत ने बेमिसाल उपलब्धियां हासिल की हैं तो दूसरी तरफ यह जानकर बड़ा दुख होता है कि सिर्फ 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी तक ही शौचालय की सुविधा उपलब्ध है और महज 22 प्रतिशत लोग ही शुद्ध पीने का पानी हासिल कर पाते हैं। आज भी गांवों में हमारे 42 प्रतिशत बच्चों को स्कूल नसीब नहीं है। अनेक बच्चे आज भी अपने परिवार का पेट पालने के लिए खेतों और कारखानों में काम करते हैं। हम दुनिया भर के तमाम लोगों की तकनीकी और सॉफ्टवेयर समस्याओं का समाधान करते हैं लेकिन हम अपने देश के गरीबों की समस्याएं नहीं सुलझा सकते, जो दुनिया की करीब 25 प्रतिशत आबादी है। हमारे देश में खेल, संगीत, कला, तकनीक और संपत्ति सृजन के मामलों में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं लेकिन हमारे यहां राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रवेश करने वाले युवाओं का अकाल है। यह तथ्य स्थिति और पेचीदा बना देती है कि हमारे युवाओं को अपने वेदों, उपनिषदों और गीता की शिक्षाओं को जानने-समझने के ज्यादा अवसर नहीं हैं। ये शास्त्र युवाओं को आदर्श मनुष्य बनाने की अपार क्षमता रखते हैं। ये किताबें उनके जीवन, चरित्र, शारीरिक क्षमता यानी उनकी पूरी प्रकृति को नया कलेवर दे सकती हैं।

भारत के युवाओं को नैतिक मूल्यों को अपना आधार बनाना चाहिए। वे इसी महान योजना के लिए बने हैं। जीवन के इसी स्वरूप को उन्हें अपनाना चाहिए, वैसे ही चरित्र का निर्माण करना चाहिए और नैतिक व्यक्ति बनना चाहिए। सफल जीवन का यही मर्म है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उदार राष्ट्रवाद में युवाओं और अगली पीढ़ी को संवारना अनिवार्य अंग है। 12 फरवरी 1936 को एक भाषण में मुखर्जी ने कहा था, ”हमारा उद्देश्य सभी को प्राथमिक से उच्च स्तर की शिक्षा मुहैया कराना चाहिए, जिससे हम अपने युवाओं में छुपे श्रेष्ठ गुणों को बाहर ला सकें और उन्हें अपने शहरों, गांवों से लेकर राष्ट्रीय क्षेत्र के हर दायरे में सेवा करने की प्रेरणा के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। हमारा उद्देश्य अच्छी उदार शिक्षा का व्यापक प्रसार करना है….हमारा उद्देश्य अपने विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता और तर्कसम्मत प्रगतिशील विचारों का केंद्र बनाना है।’’

युवाओं की सफलता इससे नहीं नापी जाती कि उन्होंने क्या हासिल किया, बल्कि पैमाना यह है कि वे कैसी जिंदगी जीते हैं और क्या करते हैं। अगर देश के युवा इस पैमाने पर खरे उतरते हैं तो वे खुशहाली हासिल कर सकेंगे। युवा पीढ़ी को एक-दूसरे के साथ मिलकर अपनी क्षमताओं, जानकारियों, ज्ञान का साझा करके राष्ट्र निर्माण के लिए साथ मिलकर राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर कार्य करना चाहिए। युवाओं से पूरी विनम्रता, लगन और क्षमता के साथ राष्ट्रनिर्माण में जुट जाना चाहिए। इससे देश गौरव के ऊंचे आसान पर विराजमान हो जाएगा।

उठो! जागो

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उठो, साहसी बनो, वीर्यवान होओ।
सब उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लो- यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता चाहो,
सब तुम्हारे ही भीतर विद्यमान है।
सब के पास जा-जाकर कहो,
”उठो, जागो और सोओ मत!
सारे दु:ख और अभाव नष्ट करने की शक्ति तुम्हीं में है!
इस बात पर विश्वास करने से
वह शक्ति जाग उठेगी।’’
यह संसार कायरों के लिए नहीं है।
पलायन करने की चेष्टा मत करो।
सफलता अथवा असफलता की चिन्ता न करो।
पूर्ण निष्काम भाव से संपन्न होकर
कत्र्तव्य-पालन करते चलो।
याद रखो विजयी होने को जन्मा मन सदैव दृढ़ संकल्प और धैर्य से युक्त रहता है!
महामोहग्रस्त लोगों की ओर दृष्टिपात करो!
हाय! उनके ह्दय-भेदकारी करूण आर्तनाद सुनो! हे वीरों, बद्धो को पाशमुक्त करने, दरिद्रों के कष्ट कम करने और अज्ञजनों का ह्दयान्धकार दूर करने के लिए आगे बढ़ो।
पवित्र और नि:स्वार्थी बनने की कोशिश करो- यही धर्म का सार है।

08-11-2014

हम अपने देश के महापुरुषों से क्या सबक ले सकते हैं? हम अपने आप से पूछें कि क्या हमारे देश की समस्याएं सिर्फ गरीबी, बढ़ती आबादी और अपर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों की हैं? स्त्रियों को सम्मान, सामाजिक समानता, व्यक्तिगत आजादी तथा सबके लिए न्याय, सभी जाति-धर्मों-समुदायों के प्रति सहिष्णुता, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं, और शिक्षा जैसे मौलिक मानवीय मूल्यों के बारे में हमारे विचार क्या हैं? क्या हम वाकई विवेकानंद की शिक्षाओं को मर्म समझते हैं? पिछले डेढ़ सौ साल में हमारा समाज कितना बदल गया है? क्या हम वाकई प्रगति की राह में आगे बढ़ रहे हैं?

हिरोशिमा में बम बरसाए जाने के महज 30 सालों के भीतर ही जापान आर्थिक शक्ति के रूप में उभर आया। चीन भी भारत के लगभग साथ ही स्वतंत्र हुआ लेकिन आज वह एशिया की महाशक्ति बन गया है। पचास के दशक तक ब्रिटेन के मत्स्य पालन के ठिकाने रहे मलेशिया ओर सिंगापुर अब एशिया के शेर कहे जाते हैं। 2040 तक ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, मेक्सिको सभी बड़े औद्योगिक देश बनने की राह पर हैं। लेकिन भारत के बारे में क्या कहेंगे?

मेरा मानना है कि स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं कई सदियों तक प्रासंगिक रहेंगी क्योंकि उन्होंने ही हमारे पतन के कारणों को बताया था। उन्होंने कहा कि जनता की उपेक्षा हमारा सबसे बड़ा पाप है और स्त्रियों की उपेक्षा उससे भी बड़ा पाप है। हाल के दौर की कुछ घटनाएं यही बताती हैं कि आज भी यही हालात हैं। विवेकानंद ने धर्म के नाम पर प्रताडऩा को गलत बताया था और शिक्षा के महत्व पर जोर दिया था। उन्होंने युवा पीढ़ी में आस्था जताई थी और भारत के लोगों में एकता के अभाव को पतन का कारण बताया था। उन्होंने कहा कि हमें अपने देश का सम्मान करना सीखना चाहिए और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी वजह से विवेकानंद को देशभक्त कहा जाता है। अहिंसा के पुजारी विनोवा भावे ने सही कहा था, ”विवेकानंद ने न सिर्फ हमें अपनी ताकत का एहसास कराया, बल्कि हमारी कमियों और कमजोरियों को भी बताया।’’

इस देश के युवा के लिए स्वामी विवेकानंद ऐसे नायक की तरह हैं जो सक्रियता और ऊर्जा से भरा है। उन्होंने कहा, ”मेरी आस्था युवा पीढ़ी, आधुनिक पीढ़ी में है, उन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता आएंगे।’’ विवेकानंद युवकों में जोश जागाते थे इसलिए उन्हें सही में आधुनिक भारत का देवदूत कहा गया है।

स्वामी जी ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था और दुनिया में भाईचारे का संदेश दिया था। उसी दिन पश्चिम ने पूरब की क्षमताओं का एहसास किया। वह ऐतिहासिक दिन हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है, उसे विश्व भाईचारा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उसके ठीक 108 साल बाद 11 सितंबर 2001 को पश्चिम ने न्यूयॉर्क में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला देखा, जो शायद एक और धर्म की प्रकृति के अनुरूप था। यह विडंबना ही है कि वह दिन स्वामी के संदेश के साथ भीषण हमले के लिए भी याद किया जाता है।

स्वामी जी ने कहा था, ”मैं उनके लिए हृदय से प्रार्थना करता हूं और हर धर्म के आगे ‘लड़ो नहीं, मदद करो’, ‘विध्वंस नहीं सामंजस्य’ ‘अशांति नहीं शांति’ जैसे नारे लिखे होंगे।’’ लेकिन आज की फेसबुक वाली पीढ़ी के लिए तो 11 सितंबर विश्व भाईचारे के बदले विध्वंस का ही दिन है।

रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, ”अगर आप भारत को जानना चाहते हो तो स्वामी विवेकानंद को पढ़ो। उनमें सब कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’ युवा नायक विवेकानंद के संदेश से सकारात्मक संदेश ही फैलेगा। आज जब देश में विध्वंसकारी ताकतें सक्रिय हैं तो विवेकानंद के विचार अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि उनका दर्शन और आदर्श देश की युवा पीढ़ी को नया संदेश दे। विवेकानंद का सपना था कि एक दिन भारत ”समृद्धि और ताकत की बुलंदी’’ पर पहुंचे। इसे युवा पीढ़ी ही साकार करेगी।

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