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हिन्दू कश्मीर मुस्लिम बहुल कश्मीर कैसे बना

हिन्दू कश्मीर मुस्लिम बहुल कश्मीर कैसे बना

प्राचीनकाल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध धर्म का केंद्र था। मगर बाद में तस्वीर बदल गई। अब वह मुस्लिम बहुल हो गया। जब भी हम कश्मीर के इतिहास के पन्ने खोलते हैं, तो कश्मीर का इतिहास रक्तरंजित के साथ ही इस्लामी आक्रमण का वह इतिहास रहा है जिसने कश्मीर के वास्तविक और हिंदू नायकों को इतिहास से खारिज किया है। फारसी इतिहासकारों ने उन नायकों का हर चिन्ह मिटाने का प्रयास किया, जिन्होंने भारतीयता को कश्मीर में जीवित रखने का प्रयास किया।  फारसी इतिहासकारों ने उन नायकों का हर चिन्ह मिटाने का प्रयास किया, जिन्होंने भारतीयता को कश्मीर में जीवित रखने का प्रयास किया। कभी शैव विचारधारा की पवित्र भूमि कही जाने वाले कश्मीर में आज ‘अजान’ और ‘आतंवादियों’ की गोलियां सुनाई देती हैं।

भारत में मुस्लिम सभ्यता  के आगमन के बाद कश्मीर 1589 में मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गया। इस समय मुगल बादशाह अकबर महान का शासन था।  मुगल साम्राज्य के बाद कश्मीर पर पठानों का कब्जा हो गया था। इस समय कश्मीर में किसी भी प्रकार का विकास नहीं किया गया। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रांता कश्मीर पर काबिज हो गये। कुछ मुसलमान शाह और राज्यपाल (जैसे शाह जैन-उल-अबिदीन) हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर कई (जैसे सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन) ने यहां के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर या राज्य छोडऩे पर या मरने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही सदियों में कश्मीर घाटी में मुस्लिम बहुमत हो गया।

नरेंद्र सहगल की पुस्तक व्यतित जम्मू- कश्मीर बताती है कि जब ईरान, ईराक और तुर्किस्तान को अपने पैरों तले सुल्तान महमूद गजनवी ने रौदा तो वह यह सोचने लगा था कि वह कश्मीर को अपना बना लेगा। इसी इच्छा के चलते उसने दो बार भारत पर हमला भी किया लेकिन कश्मीर की वादियों से उसको खाली हाथ लौटना पड़ा था।

गजनवी का हिन्दू कश्मीर पर पहला हमला तो 1015 ई. को बताया जाता है। गजनवी को तौसी नामक मैदान में घेरकर मारा गया था। इसके बाद एक मुस्लिम इतिहासकार नजीम ने अपनी पुस्तक ‘महमूद ऑफ गजनी’ में लिखा है कि 1021 में कश्मीर पर दोबारा आक्रमण कर जीतने इच्छा से आये गजनी को बर्बादी की संभावना से डरकर दुम दबाकर भागना ही उचित लगा। हिन्दू कश्मीर को जीतने का इरादा उसने सदा सर्वदा के लिए त्याग दिया।

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तो कश्मीर पर इसे हम शायद एक तरह से पहला मुस्लिम आक्रमण भी बोल सकते हैं। लेकिन हिन्दुओं की शक्ति उन दिनों वाकई अच्छी थी। 1128 से 1150 ईस्वी तक शूरवीर राजा जयसिंह के कश्मीर पर राज करने का वर्णन है। अब इस समय काल में मुस्लिम लोग कश्मीर में घुसे और उन्होंने युद्ध नहीं किया अपितु भीख के रूप में रहने की जगह मांगी थीं। तबसे यहां मस्जिदें बननी लगीं और मुस्लिम लोग अधिक तेजी से जनसंख्या बढ़ाने लगे।

तेरहवीं सदी में कश्मीर के राजा सहदेव के समय मंगोल आक्रमणकारी दुलचा ने आक्रमण किया। इस अवसर का फायदा उठा कर तिब्बत से आया एक बौद्ध रिंचन ने इस्लाम कबूल कर अपने मित्र तथा सहदेव के सेनापति रामचंद्र की बेटी कोटारानी के सहयोग से कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया। इस तरह वह कश्मीर (जम्मू या लद्दाख नहीं) का पहला मुस्लिम शासक बना। कालांतर में शाहमीर ने कश्मीर की गद्दी पर कब्जा कर लिया और इस तरह उसके वंशजों ने लंबे काल तक कश्मीर पर राज किया। आरम्भ में ये सुल्तान सहिष्णु रहे लेकिन शाह हमादान के समय में शुरू हुआ इस्लामीकरण सुल्तान सिकन्दर के समय अपने चरम पर पहुंच गया। इस काल में हिन्दू लोगों को इस्लाम कबूल करना पड़ा और इस तरह धीरे-धीरे कश्मीर के अधिकतर लोग मुसलमान बन गए जिसमें जम्मू के भी कुछ हिस्से थे।

शाह हमादान के बेटे मीर हमदानी के नेतृत्व में मंदिरों को तोडऩे और तलवार के दम पर इस्लामीकरण का दौर सिकन्दर के बेटे अलीशाह तक चला लेकिन उसके बाद 1420-70 में जैनुल आब्दीन (बड़े शाह) गद्दी पर बैठा। इसका शासन अच्छा रहा।

कश्मीर में इस्लामीकरण की शुरुआत 1379 में कुतुबुद्दीन के शासनकाल में फारसी संत और विद्वान सैयद अली हमदानी का अपने शिष्यों के साथ कश्मीर आगमन से मानी जाती है। सुल्तान ने उनका स्वागत किया श्रीनगर में झेलम के दक्षिणी किनारे पर उन्हें अपना खानकाह बनाने के लिए जमीन दी गई और इस तरह खानकाह-ए-मौला के नाम से कश्मीर में पहली खानकाह (सूफी मठ) का निर्माण हुआ। हमदानी ने अपने शागिर्दों को पूरे कश्मीर में धर्म प्रचार के लिए भेजा। साथ ही उसने सुल्तान को शरिया की शिक्षा दी।  कश्मीर के इस्लामीकरण में बड़ा नाम ‘मीर सैय्यद अली हमदानी’ का आता है। हमदानी कहने को सूफी संत था मगर कश्मीर में कट्टर इस्लाम का उसे पहला प्रचारक कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

श्रीनगर में हमदानी की खानखा-ए -मौला के नाम से स्मारक बना हुआ है। पुराने कश्मीरी इतिहासकारों के अनुसार यह ‘काली देवी का मंदिर’ था। इस पर कब्जा कर इसे इस्लामिक  खानखा में जबरन परिवर्तित किया गया था। सबसे खेदजनक बात यह है कि वर्तमान में कश्मीरी हिन्दुओं की एक पूरी पीढ़ी हमदानी के इतिहास से पूरी प्रकार से अनभिज्ञ है।  कुछ को सूफियाना नशा चढ़ा है। वे सूफियों को हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक समझते हैं।

यह मीर सैय्यद अली हमदानी ही था जिसने कश्मीर के सुल्तान को हिन्दुओं के सम्बन्ध में राजा लागू करने का परामर्श दिया गया था। इस परामर्श में हिन्दुओं के साथ कैसा बर्ताव करें। जैसे – हिन्दुओं को नए मंदिर बनाने की कोई इजाजत न हो। न पुराने मंदिर की मरम्मत की कोई इजाजत न हो। मुसलमान यात्रियों को हिन्दू मंदिरों में रुकने की इजाजत हो। मुसलमान यात्रियों को हिन्दू अपने घर में कम से कम तीन दिन रुकवा कर उनकी सेवा करें। हिन्दुओं को जासूसी करने और जासूसों को अपने घर में रुकवाने का कोई अधिकार न हो। कोई हिन्दू इस्लाम ग्रहण करना चाहे तो उसे कोई रोकटोक न हो।

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लेकिन सुल्तान सिकंदर का समय आते-आते परिस्थितियां बदल गईं 1393 में सैयद अली हमदानी के साहबजादे मीर सैयद हमदानी की सरपरस्ती में सूफी संतों और उलेमाओं की दूसरी खेप कश्मीर आई। अपने पिता के विपरीत मीर हमदानी इस्लाम की स्थापना के लिए हर तरह की जोर जबरदस्ती का हामी था या यों कहें कि तब  तक इसके लिए अनुकूल माहौल बन चुका था।

हिन्दू कश्मीर को इस्लामी राष्ट्र में बदलने के खतरनाक इरादों को इतिहासकार एम डी सूफी ने ‘कश्मीर’ पुस्तक में विस्तार से लिखा है। मुस्लिम इतिहासकार हसन ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में धर्मांतरण जिक्र इस प्रकार किया है कि ‘सल्तान सिकंदर ने (1393) में शहरों में घोषणा करा दी थी कि जो हिन्दू मुसलमान नहीं बनेगा वह या तो देश छोड़ दे या फिर मार डाला जाए। इस तरह सुल्तान सिकंदर ने लगभग सात मन जनेऊ हिन्दू धर्म परिवर्तन करने वालों से जमा किये और जला दिए। धार्मिक ग्रंथों को जलाया दिया गया, मंदिरों को ध्वस्त कर वहां एवं अनेक मस्जिदें बनवाई गयी।

इतिहासकार हसन के अनुसार ‘सबसे पहले सुल्तान सिकंदर की दृष्टि हिन्दू कश्मीर के विश्व प्रसिद्ध मंदिर मार्तण्ड सूर्य मंदिर पर पड़ी। उसने इसे तोड़ देने का निर्णय किया। लेकिन इसे तोडऩे में एक वर्ष का समय लगा और बाद में इसमे लकडिय़ां भरकर आग लगा दी गयी थी।

इस तरह से जो कश्मीर कभी हिन्दुओं का स्वर्ग होता था, वह धीरे-धीरे हिन्दुओं का कब्रिस्तान बना दिया जाता है। आजादी के बाद पंडितों के साथ जो हुआ, वह तो बस कश्मीर से हिन्दुओं का अंत ही था।

हमदानी के प्रभाव में सबसे पहले जो लोग आये उनमें सुल्तान का ताकतवर मंत्री सुहा भट्ट था। हमदानी ने उसका धर्म परिवर्तन कर मलिक सैफुद्दीन का नाम दिया और उसकी बेटी से विवाह किया। सुहा भट्ट ने कालांतर में अपनी क्रूरता से सबको पीछे छोड़ दिया और सिकंदर के नेतृत्व में कश्मीर में मंदिरों के ध्वंस और धर्मपरिवर्तन का संचालक बना। इस दौर को कश्मीर में ताकत के जोर से इस्लामीकरण का दौर कहा जा सकता है।

सुहा भट्ट के प्रभाव में सुल्तान ने शराब, संगीत, नृत्य और जुए पर पाबंदी लगा दी, हिन्दुओं पर जजिया लगा दिया गया और माथे पर कश्का (तिलक) लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया, सोने और चांदी की सभी मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों में तब्दील कर दिया गया और सभी हिन्दुओं को मुसलमान बन जाने के आदेश दिए गए।

कश्मीर के इस्लामीकरण में सूफियों की भी अहम भूमिका रही। इसमें विदेशी ही नहीं वरन देशी सूफियों का भी बड़ा हाथ रहा। इनमें नंद ऋषि प्रमुख थे जिनका असली नाम नुरूद्दीन था। हमदानी के मंदिर ध्वस्त करो अभियान से कश्मीरी हिन्दू समाज में रोष व्याप्त हो गया था। शेख नुरूद्दीन ने कश्मीर के इस्लामीकरण का दूसरा मार्ग पकड़ा। इस्लाम के धर्मांतरण प्रोग्राम पर हिन्दू धर्म का रंग चढ़ाकर प्रचार प्रारंभ किया। कभी कश्मीर में एक शिव उपासक योगिनी लालदेवी का बहुत नाम था। लोग उसे प्यार से लाल देद कहते थे। लाल देद की कविताएं घर-घर गाई जाती थी। कश्मीरी जनता में उनका बहुत स्म्मान था। शीघ्र लाल देवी के भक्त भी नुरूद्दीन को भी उसी दर की दृष्टि से देखने लगे। फिर चालू हुआ धर्मांतरण का सिलसिला जो हर सूपी का वास्तविक मकसद होता है। नूरूद्दीन के शिष्य अपने को धर्मनिरपेक्ष संत के रूप में पेश करने के लिए सूफी के संतान पर अपने को ऋषि कहने लगे।

अली  शाह  के  छोटे भाई शाही खान उसे सत्ता से अपदस्थ कर जैनुल आब्दीन के नाम से गद्दी पर बैठा और उसने अपने पिता तथा भाई की साम्प्रदायिक नीतियों को पूरी तरह से बदल दिया। जैनु-उल-आब्दीन का सबसे बड़ा कदम धार्मिक भेदभाव की नीति का खात्मा करना था।

लेकिन उसकी मृत्यु के बाद शाह मीर वंश का पतन शुरू हो गया और 1540 में हुमायूं के एक सिपहसलार मिर्जा हैदर दुगलत ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। उसका शासनकाल 1561 में समाप्त हुआ जब स्थानीय लोगों के एक विद्रोह में उसकी हत्या कर दी गई। उसके बाद चले सत्ता संघर्ष में चक विजयी हुए और अगले 27 सालों तक कश्मीर में लूट, षड्यंत्र और अत्याचार का बोलबाला इस कदर हुआ कि कश्मीर के कुलीनों के एक धड़े ने बादशाह अकबर से हस्तक्षेप की अपील की। अकबर की सेना ने 1589 में कश्मीर पर कब्जा कर लिया और इस तरह कश्मीर मुगल शासन के अधीन आ गया।

16 अक्टूबर 1586 को मुगल सिपहसालार कासिम खान मीर ने चक शासक याकूब खान को हराकर कश्मीर पर मुगलिया सल्तनत को स्थापित किया। इसके बाद अगले 361 सालों तक घाटी पर गैर कश्मीरियों का शासन रहा जिसमें मुगल, अफगान, सिख, डोगरे आदि रहे। मुगल शासक औरंगजेब और उसके बाद के शासकों ने हिन्दुओं के साथ-साथ यहां शिया मुसलमानों पर दमनकारी नीति अपनाई जिसके चलते हजारों लोग मारे गए।

मुगल वंश के पतन के बाद 1752-53 में अहमद शाह अब्दाली के नेतृत्व में अफगानों ने कश्मीर (जम्मू और लद्दाख नहीं) पर कब्जा कर लिया। अफगानी मुसलमानों ने कश्मीर की जनता (मुस्लिम, हिन्दू आदि सभी) पर भयंकर अत्याचार किए। उनकी स्त्री और धन को खूब लूटा। यह लूट और खसोट का कार्य पांच अलग-अलग पठान गवर्नरों के राज में जारी रहा। 67 साल तक पठानों ने कश्मीर घाटी पर शासन किया। मुगल सल्तनत गिरने के बाद से सिख महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में शामिल हो गया। कुछ समय बाद जम्मू के हिन्दू डोगरा राजा गुलाब सिंह डोगरा ने ब्रिटिश लोगों के साथ सन्धि करके जम्मू के साथ-साथ कश्मीर पर भी अधिकार कर लिया (जिसे कुछ लोग कहते हैं कि कश्मीर को खरीद लिया)। डोगरा वंश भारत की आजादी तक कायम रहा। वर्ष 1814 में पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह ने पठानों को शिकस्त दी और वहां पर सिख साम्राज्य की स्थापना की। 1839 में रणजीत सिंह की मौत के साथ लाहौर का सिख साम्राज्य बिखरने लगा। अंग्रेजों के लिए यह अफगानिस्तान की खतरनाक सीमा पर नियंत्रण का मौका था तो जम्मू के राजा गुलाब सिंह के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित करने का।

1947 में जम्मू और कश्मीर पर डोगरा शासकों का शासन रहा। राज भले ही हिन्दू राजाओं का आ गया था मगर ज्यादातर प्रजा मुसलमान हो चुकी थी।

सतीश पेडणेकर

 

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