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‘युवा जगे, देश जगे’- स्वामी चिदानंद सरस्वती

‘युवा जगे, देश जगे’- स्वामी चिदानंद सरस्वती

अपनी जड़ों से जुड़े रहो और सबको इज्जत दो। इसका मतलब है कि अगर मैं हिंदू हूं और नवरात्री का व्रत करता हूं तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि नवरात्री की शुभकामनाएं। अपनी जड़ों को छोड़ो नहीं और दूसरे की तोड़ो नहीं, यही तो धर्म है और यही हिंदू धर्म है। इसलिए युवाओं को आज यह संदेश देना है कि अपनी जड़ों से जमे रहो। परमार्थ निकेतन के प्रमुख स्वामी चिदानंद सरस्वती से उदय इंडिया के समूह संपादक दीपक कुमार रथ की बातचीत के प्रमुख अंश :

एक साधु होने के नाते देश के प्रति आपका कत्र्तव्य है?
हिंदू धर्म का सार है, अपने लिए नहीं अपनों के लिए जीयो और उससे पूरे विश्व को अपना परिवार बना लो। परिवार बनाने के लिए बहुत त्याग करना पड़ता है, साथ-साथ चलना पड़ता है, साथ-साथ सोचना पड़ता है, साथ-साथ जीना पड़ता है। इस जीने में जीओ और जीने दो,दोनों होती हैं। वसुधैव कुटुंबकम् की पूरी अवधारणा है, सिर्फ मनुष्य मात्र ही नहीं बल्कि प्राणी-मात्र के साथ भी समन्वय और उसके साथ जो चलने वाला व्यक्ति है, वह है भारत का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। मुझे लगता है यह एक नरेन्द्र से दूसरे नरेन्द्र की यात्रा है।

आप मानते हैं कि ऐसा है?
बिल्कुल मानते हैं। वह सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, बल्कि वैश्विक नेता बनने की ओर अग्रसर हैं। वे विश्व के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो पर्यावरण-प्रेमी प्रधानमंत्री हैं।

मोदी को युवाओं पर पूरा विश्वास है। एक संन्यासी के रूप में युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
युवा ऊर्जा से भरपूर होते हैं। वे कुछ बनना चाहते हैं, कुछ कर दिखाना चाहते हैं। कुछ बनने के लिए कुछ होना पड़ता है। कुछ नहीं होने से कुछ प्राप्त नहीं होता। इसके कुछ करना पड़ता है। अब भारतीय युवाओं के लिए समय आ गया है कि वे अब अपना उत्साह, अपनी महत्वकांक्षा और अपनी ऊर्जा का पूरा सदुपयोग करें। ऊर्जा में गति होती है, लेकिन गति के निर्देशन जरूरी होता है। हमारे प्रधानमंत्री ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके पास युवाओं को निर्देशित देने की क्षमता है।

क्या आपको नहीं लगता कि पश्चिमी संस्कृति हमारे युवाओं को मिसगाइड कर रही है?
हां, यही बात तो कह रहा हूं। अगर भारत की बात हो रही तो हमारी संस्कृति की बात हो रही है। एक व्यक्ति नवरात्री के दिन व्रत करता है और बिना संकोच के सबको नवरात्री की शुभकामनाएं देता है। इसका मतलब क्या हुआ? अपनी जड़ों से जुड़े रहो और सबको इज्जत दो। इसका मतलब है कि अगर मैं हिंदू हूं और नवरात्री का व्रत करता हूं तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि नवरात्री की शुभकामनाएं। अपनी जड़ों को छोड़ो नहीं और दूसरे की तोड़ो नहीं, यही तो धर्म है और यही हिंदू धर्म है। इसलिए युवाओं को आज यह संदेश देना है कि अपनी जड़ों से जमे रहो। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ एक व्यक्ति झाड़ू उठा रहा है और दूसरी तरफ अंतरिक्ष में यान भेज रहा है। दोनों ही मिशन है। इन्हीं दोनों मिशनों के बीच काम करना है। युवाओं को सिर्फ मंदिर, मस्जिद, चर्च ही नहीं ले जाना है, उन्हें इनोवेटिव बनाना है। एक समय था जब टेलिकॉम्यूनिकेशन की क्रांति हुई। आज इनोवेशन में क्रांति होनी चाहिए और इस क्रांति में यूथ बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। हर यूथ के पास जवानों जैसा दिल भी होना चाहिए और प्रधानमंत्री मोदी यही कोशिश कर रहे हैं जवानों को इसमें शामिल कर। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि आप मुझे 100 नव-जवान दे दीजिए तो मैं पूरे देश का नक्शा बदल दूंगा। और ये तो कहते हैं कि आप देश का 65 प्रतिशत नव-जवान दे दीजिए पूरे विश्व का नक्शा बदल दूंगा। एक समय था कि गुजरात मॉडल बना भारत के लिए। आज भारत मॉडल बनने जा रहा है पूरे विश्व के लिए।

क्या अकेले नरेन्द्र मोदी देश के युवाओं को इकट्ठा कर लेंगे, जब देश में कोई इंफ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं?
इंफ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा हमें इंट्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। हमें लोगों को इंट्रास्ट्रक्चर्ड करना है। अगर हम इंट्रास्ट्रक्चर्ड हो गए, हमारे दिल में देश के प्रति स्वाभिमान जग जाए तो…. वही तो जापान है जो बिल्कुल बर्बाद हो गया था। एक बम से बर्बाद हो गया। हिरोशिमा की बर्बादी ने उसे कहां से कहां पहुंचा दिया, क्योंकि यही स्वाभिमान है। स्वाभिमान हो…. हो अपना-अपना अभिमान लेकिन हम स्व मानना भूल जाएं। यह बहुत जरूरी है। मोदी इसी स्वाभिमान को तो खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं कि झाड़ू उठाना भी बुरी बात नहीं है। यह सिर्फ झाड़ू लगाने वालों की बात नहीं है। इस देश के हर व्यक्ति को झाड़ू उठाना है। हम उन्हें छोटा क्यों मानें, हम सब एक हैं, हम सब साथ-साथ हैं, हम सब का विकास साथ-साथ है। हम सब को साथ-साथ जीना है, हम सब को साथ-साथ मरना है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर से पहले इंट्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। देश में इट्रास्ट्रक्चर है क्या? मैं और मेरा देश गांव से क्यों शुरू नहीं हो सकता? हमारा गौरव तो गांव से शुरू होता है।

अब तो गांवों को खत्म करने में लग हैं लोग, क्योंकि भारतीयकरण और पश्चिमीकरण को लेकर एक जंग चल रही है। गुरूकुल आज खत्म हो चुका है। कॉन्वेंट स्कूलों के प्रति लोगों का आकर्षण है। आज स्कूलों में सरस्वती वंदना नहीं गा सकते। इस देश में शंकराचार्य को पुलिस रास्ते में पीटती है। आप कितना मानते हैं इस बात को?
हमने कहा कि अभी शुरूआत है। इस चरण में कई अच्छी बातें शुरू हो गईं हैं। अभी तो कुछ ही महीने हुए हैं और इन महीनों में बहुत कुछ बदला है। अभी आगे देखना है। वे सवा सौ करोड़ की बात करते हैं। अब समय आ रहा है कि यह आदमी 725 करोड़ लोगों की बात करेंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब व्यक्ति अपने लिए कुछ न चाहे तब बहुत कुछ होने लगता है। अपने की बात आती है समस्या वहीं से खड़ी होती है। जब व्यक्ति स्वयं केन्द्र में नहीं होता तब बहुत कुछ बदलता है। हालांकि वे प्रधानमंत्री हैं तो मोदी केन्द्र में तो दिखाई देंगे हीं, लेकिन ये मानते हुए कि अगर मैं केन्द्र में हूं भी तो अपने लिए नहीं बल्कि खुदा की कायनात के लिए। वो मानते हैं कि यह पहला सबक है किताब-ए-खुदा का कि मखनूख सारी है कुनबा खुदा का, वसुधैव कुटुंबकम्। इसमें अगर बात है तो 125 करोड़ की नहीं, 725 करोड़ की बात है। आप देख लिजिएगा कि संयुक्त राष्ट्र में उनकी अगली भाषण पूरे विश्व के लोगों के लिए होगी और यह होने जा रहा है।

उनके नाम से ‘लोकतंत्र का हत्यारा’, ‘मौत का सौदागर’ का जो नाम उन्हें मिला था, उसका क्या असर अब क्या रहेगा?
वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने तय कर रखा है कि निंदा करने के लिए नो निंदा, नो चंदा, नो धंधा। ये उन्होंने पक्का कर रखा है। कोई निंदा नहीं करनी है, किसी के लिए चंदे इकट्ठे नहीं करने हैं, यहां भी नहीं, दूसरे देशों से भी नहीं। ये नहीं कि किसी के सामने जाकर भीख मांगता रहूं। हम उनसे कह रहे हैं कि आप हमारे यहां आईए। हमारे यहां डेमोक्रेसी भी है, डेमोग्राफी भी है, हमारे यहां डिमांड भी है। हम सिर्फ एक बाजार नहीं हैं, हम एक विश्व परिवार भी हैं। ये जो बात है, वो एक बड़ी बात है। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। वे कुछ मांगने नहीं गए, वे कुछ देने गए। विश्व में भारत एक बड़ी भूमिका निभा सकता है और वह है आईए चलें साथ-साथ। जब एक व्यक्ति इतनी बड़ी भूमिका की बात करता है तो बात अपने-आप में बन गई। अब तो मीडिया को आगे आना चाहिए।  मीडिया को तो यह कहना चाहिए कि कोई तो मिला। तीन महिना न देखे, ये देखे कि अगले तीन सालों में क्या मिलने वाला है, अगले तीस सालों में क्या मिलने वाला है, अगले तीन सौ सालों के लिए क्या मिलने वाला है। जैसा कि सीएसआर अब सामने आया है, अब मीडिया समझ ले एमएसआर (मीडिया सोशल रिस्पॉन्शिबिलिटी)। अब हम इन इश्यू को उठाएंगे। वे किसी की निंदा नहीं करते। अगर रामलीला मैदान में सोनिया गांधी से भी मिलते हैं तो वे रावणलीला क्रिएट नहीं करते। वहां भी एक-दूसरे को नमस्कार ही कर रहे हैं। नमस्कार का अर्थ क्या है कि हम आप में भी वही दिव्यता देख रहे हैं जो मुझमें है।

08-11-2014

पको क्या लगता है ये महात्मा उनसे आगे चले जाएंगे?
बात न आगे बढऩे की है, न पीछे जाने की है और न पीछे करने की है। बात यह है कि दिल को महात्मा बनाए रखते हुए देश को आगे बढ़ाने की है। उनके दिमाग में यह नहीं है कि मैं आगे बढ़ जाउं, उनके दिमाग में यह नहीं है कि मैं पीछे चला जाउं। मैं मोदी जी को बहुत तह-ए-दिल से जानता हूं। अंदर तक जो मैंने उनको समझा है, हालांकि सबकी समझ अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मेरी समझ के अनुसार न तो आगे बढऩा चाहता है वह व्यक्ति और न ही किसी को पीछे छोडऩा चाहता है। वो चाहता है क्यों न हम साथ-साथ चलें। जब व्यक्ति साथ-साथ चलने की बात करता है तो पूरा देश ही नहीं, पूरा विश्व साथ खड़ा हो सकता है और होगा, बशर्ते हम खड़े हो जाएं। विश्व आपके साथ तब खड़ा होगा जब आप खड़े हों। पहले देश तो खड़ा हो। देश इसी तरह की बातें करता रहेगा बाहर वाला भी कहेगा कि उसके अपने ही देश वाले…। तो पहले अपने देश वालों को खड़ा होना होगा। मोदी जी खड़े हो गए, अब अपने देश को खड़ा होना है।

क्या सारे साधु समाज की तरफ से आप कह सकते हैं कि सारा साधु समाज मोदी जी के साथ खड़ा है?
मैं मानता हूं कि व्यक्ति को सारे समाज की बात नहीं करनी है। पहले अपनी बात करनी है, क्योंकि बदलाव खुद से आता है। जब आप खुद खड़े हो जाते हैं तो समाज भी खड़ा हो जाता है। सूरज तो अकेला है। उसे किसी विज्ञापन की जरूरत नहीं होती। वह प्रकाश देता है, सबके लिए देता है बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी छुट्टी के, बिना किसी उम्मीद के। उत्तराखंड में आपदा आई तो सौ करोड़ की बात आई और जब जम्मू-कश्मीर में बाढ़ आई तो एक हजार करोड़ दे दिया, उसके बाद 1100 करोड़ रूपए और देकर आए। कौन संप्रदायवादी है? ये सोचने की जरूरत है। एक वो लोग जो कह रहे थे कि मोदीजी को समुद्र में डूबो देना चाहिए और जब जम्मू-कश्मीर खुद डूब रहा था तब मोदीजी ने वहां जाकर यह नहीं कहा कि तुम डूबो, उन्होंने वहां भी कहा कि हम साथ-साथ हैं। ये सारे भाई-बहन हमारे हैं। वहां कोई दीवार नहीं है, कोई दरार नहीं है उनके मन में। उन्हें खुद के लिए कोई उम्मीद भी नहीं है। वहां किसी तरह का उन्होंने भेदभाव भी नहीं किया। ये नहीं कि ये मुसलमान है या ये हिंदू है। वो सबको भारतवासी देखते हैं। उन्होंने कहा मैडिसन स्क्वॉयर में कि मैंने 15 मिनट का भी वैकेशन नहीं लिया। कुछ लोग तो देश को नींबू की तरह निचोड़कर खा गए और एक व्यक्ति यह है कि नींबू का पानी खुद पी रहा है। नींबू का पानी ही नहीं पी रहा, बल्कि खुद को निचोड़कर-निचोड़कर भी देश के लिए दे रहा है। सौ घंटे में पचास मीटिंग, पांच दिन का उपवास और एक घंटा बीस मिनट की ऐसी स्पीच की सामने बैठे लोगों का मन मोहित हो जाए। ओबामा नहीं सोच रहे होंगे कि सब आदमी खा रहे हैं और एक आदमी गर्म पानी पीकर गर्म हो रहा है। ये छोटी बातें नहीं हैं। ये बहुत दूर तक सोचने की बातें हैं। वे आगे कुछ मुद्दे दे सकते हैं विश्व को जिससे विश्व भर में भूखमरी और कुपोषण की समस्या नष्ट हो सकती है। विश्व साथ चले तो काम बन सकता है। बात साथ चलने की है। इसलिए मोदी जी के साथ अब मीडिया को कदम मिलाना है और वह मिला भी रहा है। इस बात की मुझे बहुत प्रसन्नता है। लेकिन उसे और आगे कदम बढ़ाने हैं, क्योंकि कुछ शंकाएं भी हैं तो उसे शंका की आंख से नहीं श्रद्धा की आंख से देखना है। क्योंकि, मोदीजी अब मोदीजी नहीं, वे अब देश हैं, वे देश के प्रतीक हैं।

आध्यात्मिक नेता हमेशा राजनीतिक नेता से बड़े माने जाते हैं। आपको लगता नहीं कि आप मोदीजी को बहुत बड़े रूप में देख रहे हैं या वो सचमुच में वो इतने बड़े हैं?

सचमुच में वो इतने बड़े हैं। दिल से हैं। भगवान करे कि उनको सबका साथ मिले। जब सारे कदम एक साथ चल पड़ते हैं तो परिवत्र्तन आता ही है। ऐसा नहीं है कि मैं उनको देखकर ऐसा कह रहा हूं। हो सकता है कि मेरा उनके प्रति यह व्यक्तिगत दृष्टिकोण हो। लेकिन व्यक्तिगत रूप में हमें क्या चाहिए, हम तो महात्मा हैं। जो बैठा ही गोबर के फर्श पर हो, वह ग्रेनाईट भी लगा सकता था। जीवन में दो च्वॉइस है – या तो गोबर या तो ग्रेनाइट। आज जिंदगी गोबर से ग्रेनाइट की ओर जा रही है। यही तो हो रहा है। सारा गांव ग्रेनाइट के पीछे पड़ा हुआ है। ग्रेनाइट माने क्या – और सुविधाएं, और सुंदर फर्श। लेकिन हमने और सुंदर फर्श तो बना लिए, लेकिन अपने आप को अर्श पर नहीं पहुंचा पाए। इसलिए हम क्या करें कि गांव जैसी सादगी, गांव जैसा जीवन, गांव जैसी सरलता, गांव जैसी साझी संस्कृति, गांवों जैसी सरसता को अपनाकर शहर में रहने वाला व्यक्ति भी साथ-साथ चलेंगे। ये कोई असंभव कार्य नहीं है। जापान ने यह करके दिखा दिया है। कोरिया को देख लो, ताईवान को देख लो, हांगकांग को देख लो, सिंगापुर को देख लो, थाईलैंड को देख लो…. अगर छोटे-छोटे देश कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं। इन देशों की आबादी जितनी नहीं है, उससे कई गुणा ज्यादा लोग विश्व भर से वहां घूमने जा रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन लोगों ने ठाना। मैंने सिंगापुर के उस स्लम को भी देखा है और सिंगापुर की उस समृद्धि को भी देखा है। एक व्यक्ति ने कसम खा ली और प्रधानमंत्री के रूप में उसने अपने देश का कायाकल्प कर डाला। बात एक से ही शुरू होती है और साथ सबका होता है। जब साथ होता है और संकल्प होता है तो चीजें बदलती हैं। मैं कोई इसे मैग्रिफाई नहीं कर रहा हूं, कोई ग्लोरीफाई नहीं कर रहा हूं। यह होने वाला है। जो होने वाला है वो दिख रहा है मुझे।

08-11-2014

तो क्या मोदीजी को आप साधु मानते हैं?
मैं मानता हूं। वे मैडिसन स्क्वॉयर में भगवा जैकेट पहनकर आए, इसका मतलब क्या वो किसी को भगवा करने जा रहे हैं क्या। मैंने कहा सवेरे सूरज उगता है तो कौन सा रंग होता है उसका, यही भगवा रंग ही होता है। सूरज जब छिपता है तो भी उसका रंग भगवा ही होता है। सूरज किसी को भगवा करने नहीं जा रहा है। उसका एक संदेश होता है कि मैं सबके लिए हूं। किसी से कोई भेदभाव नहीं। प्रकाश के लिए सूरज से पैसा नहीं लेता, कोई अंतर नहीं करता। आरती करें तो, पूजा करें तो, मानें तो, न मानें तो, गाली दें तो, गरिमा बढ़ाए तो…. इसकी चिंता सूरज को नहीं रहती। ये भगवा जैकेट भी उसी बलिदान की निशानी है। यह त्याग की निशानी है कि उठो जागो, अंधेरे में अब बहुत जी लिए, गुमनामी में बहुत जी लिए, गुलामी में बहुत जी लिए। यह गुलामी चाहे गंदगी की हो या प्रदूषण की हो या या गरीबी की हो, इन सब से अपने को उपर उठाना है और एक नए भारत का निर्माण करना है। न ये अपनी जेब के लिए, न अपने जॉब के लिए, न अपने ख्वाब के लिए बल्कि एक सपने के लिए जीना है। मोदीजी को अपनों के लिए जीना है। उनके सारे अपने हैं। उनके पास श्रेष्ठ भारत का सपना है। उससे भी आगे एक श्रेष्ठ विश्व का उनके पास सपना है। जब कोई ऐसे जीने लगता है तो दिल से शांत हो जाता है। जिस धरती के शासक मन से संत नहीं होते हैं उस धरती के पीड़ाओं के अंत नहीं होते हैं। बात बाहर से संत होने की नहीं है, बात भीतर से संत होने की है। जिसका मन संत है, उसको कौन रोक सकता है। फिर आप जैकेट किसी भी कलर का पहनें, डजन्ट मैटर।

आपने भारत की संस्कृति, उसकी अस्मिता की बात की है। इसी धरती पर राम पैदा हुए हैं और उनके रामराज्य को श्रेष्ठ प्रशासन के रूप में मानते हैं। उसी देश में रामलला अयोध्या में अपमानजनक तरीके से पड़े हैं। मथुरा में भी कृष्ण जन्मभूमि के साथ जो हुआ है, वह भी आप देख रहे हैं।आपको नहीं लगता कि मोदीजी को राम और कृष्ण के बारे में सोचना चाहिए?
निश्चित रूप से मोदी जी को भगवान राम और कृष्ण के प्रति श्रद्धा है, आस्था है। लेकिन, आस्था और व्यवस्था दोनों के संगम हैं मोदी जी। उन्हें आस्था भी देखनी है कि लोगों की आस्था भी बचे, साथ में व्यवस्था भी बढ़े। आस्था और व्यवस्था के बीच से रास्ता निकालें संविधान के मार्ग से ताकि लोगों की आस्था केवल राम पर ही न रहे बल्कि संविधान पर भी रहे। यह भी उनको ध्यान रखना है। तो राम और संविधान दोनों के बीच का सेतु जो बन सकता है, उसी की तलाश में उनकी यात्रा है।

08-11-2014

लेकिन एक संन्यासी के नाते आप क्या चाहेंगे?
भगवान राम का एक मंदिर नहीं है, लाखों मंदिर हैं भगवान राम के। वह एक आस्था का प्रतीक है, वह जन्मभूमि है। जैसे मुसलमानों के मक्का का महत्व है, मोहम्मद साहब के लिए एक महत्व है ठीक उसी तरह से हिंदुओं के मन में अयोध्या का और उस स्थल पर भगवान राम के मंदिर का महत्व है। जब भगवान राम के जीवन पर रामायण बनी तो भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी कफ्र्यू लगने लगे थे। आस्था और व्यवस्था के बीच के जो सेतु है वही तो श्रीराम हैं। श्रीराम तो मर्यादा के प्रतीक हैं। श्रीराम कभी नहीं चाहेंगे कि मेरे नाम पर हंगामा हो, मेरे नाम पर खून-खराबा हो।

मोदी जी का एक और सपना है स्वच्छ गंगा। उत्तराखंड से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा स्वच्छ बन जाए, यह हो पाएगा?
एकदम हो पाएगा। बात राजनीतिक इच्छाशक्ति की थी। जब पॉलिटिकल विल जुड़ी तो पब्लिक विल भी जुड़ गई। पॉलिटिकल विल ने जब झाड़ू उठाया तो पब्लिक ने भी झाड़ू उठा लिया। अब बात झाड़ू से आगे बढऩे की है। कुछ ने झाड़ू उठाया फोटो खिंचवाने के लिए …..

हिंदुस्तान में जितने मंदिर हैं, मठ हैं, उनको कंट्रोल करने के लिए सरकार ने इन्डोवमेंट कमीशन बैठा दी। अब इस देश में जितने मस्जिद हैं उनके मालिक वक्फ बोर्ड है। जितने गिरजाघर हैं उनके मालिक चर्च से जुड़े संगठन हैं। आपका क्या कहना है इस पर?
मैं कंट्रोल की बात नहीं कर रहा हूं, मैं एक नए रोल की बात कर रहा हूं। क्या रोल हो सकता है इन मंदिरों का, इन मस्जिदों का, इन गिरजाघरों का। इन्हें हरित क्रांति का स्रोत बनाया जाना चाहिए। अगर वो वहां से आवाज दें, नमाज के अजान के बाद अगर सारे लोगों को उस क्षेत्र को साफ रखने का संदेश भी दें तो बदलाव संभव है। भारत के सर्वधर्म समभाव की संस्कृति को बढ़ाना है।

08-11-2014

लेकिन इसमें तो सरकार की भूमिका है। जो सवाल मैंने पूछा वह उनके लिए क्यों नहीं है?
सरकार की बात सरकार जाने, मैं समाज हूं….

सवाल है कि सिर्फ हिंदू मंदिरों के लिए ऐसा कदम क्यों?
जो भी कानून बने इस देश में वो सबके लिए बने….

इस पर आपको आपत्ति नहीं है?
मैंने कहा न कि जो कानून बने वो सबके लिए हो। दूसरी बात यह है कि मैं कंट्रोल की बात ही नहीं कर रहा हूं। मैं एक नए रोल की बात कर रहा हूं और वो कंट्रोल से रोल की तरफ बढ़े। कंट्रोल तो सरकार का बहुत सारी चीजों पर है, लेकिन जरूरी नहीं कि सारी चीजें ठीक चल रही हैं कंट्रोल से। बात रोल की है और उसी रोल की ओर मोदीजी लेकर जा रहे हैं। मैं तो कहता हूं कि रोज हनुमान चलीसा पढऩे के बाद उसकी शक्ति को मंदिर को साफ रखने में लगाएं। ये गंदगी एक अभिशाप है। गंदगी ही गरीबी को पैदा करने में अहम भूमिका निभाती है। जितना ही गंदगी में जीएंगे, उतनी ही हम गरीबी में जीएंगे। हमारा मन भी गरीब हो जाता है, हमारा स्वास्थ्य गरीब हो जाता है। वो सारा पैसा जो बचता था, वो बीमारी में चला जाता है। हमें गलियों को सिर्फ इसलिए नहीं साफ करना है कि गंदगी है, क्योंकि गंदगी और बंदगी दोनों साथ-साथ नहीं चलते। अगर बंदगी भीतर की गंदगी साफ करती और बंदगी की जो शक्ति है उसे ऐक्शन में लाते हैं तो वह बाहर की गंदगी साफ करती है। इसलिए समाज अब उठे। रविवार को प्रार्थना के बाद जैसे ही चर्च से निकलें, शुक्रवार को नमाज पढ़कर जैसे ही मस्जिद से निकलें तो गलियों और आसपास की गंदगी को साफ करने का प्रत्यन करे तो इस देश को कहां से कहां ले जाया जा सकता है। नमाज, समाज और राज इन तीनों को जुडऩे का वक्त आ गया है। श्रावण में शंकरजी का अभिषेक करते हैं तो यह प्रतिज्ञा कर लें कि अगले सावन में गलियों का भी अभिषेक होगा। भगवान शंकर ने समाज का भला करने के लिए विष को पी लिया। गंदगी का विष भी कुछ कम नहीं है। शंकर जी ने उस विष को पीया जो समुद्र से निकला, लेकिन आज जो विष सड़कों से निकल रहा है उसके लिए हर व्यक्ति को नीलकंठ बनना पड़ेगा।

गोवंश हत्या पर प्रतिबंध भी एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन हर राज्य में ऐसा नहीं है। मोदी जी से लोगों को उम्मीद थी कि उनके आने पर इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ?
गोवंश का मुद्दा इसलिए भी जरूरी है कि आने वाले समय में ऑर्गेनिक बनाने के लिए, चाहे विश्व हो या देश हो, चाहे गांव हो या शहर हो, गाय के गोबर की आवश्यकता है। गाय का मूत्र चाहिए, नीम की पत्तियां चाहिए। यही प्राकृतिक तरीका है।

यह सब लोग कैसे करेंगे?
गऊ इसलिए बचानी जरूरी नहीं कि वह धार्मिक मुद्दा है, गऊ बचानी इसलिए जरूरी है कि वह हमारे देश का आर्थिक मुद्दा है, हमारे देश के पर्यावरण का मुद्दा है। हम केवल अर्थ की बात कर रहे हैं, हम केवल धर्म की बात कर रहे हैं, बात यह है कि अब धरती को बचाना है। धर्म के लिए नहीं, धरती के लिए गऊ को बचाना जरूरी है। जैविक बनाए रखने के लिए, जंक के बजाय जैविक फूड के लिए गाय को बचाना जरूरी है। इसके लिए हमें बदलाव की जरूरत है। हमें ऑर्गेनिक कल्चर को लाना बहुत जरूरी है।

08-11-2014

पश्चिमीकरण एक बड़ी समस्या है। स्थिति यह है कि एक आईएएस ऑफिसर भी ओल्ड एज होम के लिए पहले ही पैसा जमा कर रहा है…..
मान लिया यह सच है, मुझे नहीं पता। हमारे पास टीवी नहीं है, हम टीवी देखते नहीं हैं। उसके लिए हमें पश्चिमी संस्कृति के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। मान लिया कि बहुत कुछ गड़बड़ है, लेकिन शुरूआत कहां से करें? शुरूआत करनी है अपने परिवार से। हमें बच्चों को ऐसे संस्कारित करना है कि वे हमें ओल्ड एज होम में ना भेंजे। इसकी शुरूआत आप करें उदय इंडिया से। उदय इंडिया का अर्थ ही है एक नए भारत का उदय हो रहा है। इन विचारों को आप लोगों तक पहुंचाएं। क्या हो रहा है, किस कल्चर से हो रहा है यह बाद की बात है। हम भी तो एक कल्चर हैं। हमें खुद को कल्चर्ड बनाना है। हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से खड़ा होना होगा। कल्चर चर्च, मस्जिद और मंदिरों में मिलते, कल्चर हम खुद होते हैं। आप ही उदाहरण हैं और आप ही बदलाव के प्रतीक हैं। अगर खुद में बदलाव होता है तो बदलाव हर जगह दिखने लगेगा।

परमार्थ निकेतन की भावी योजना क्या है?
हम सृष्टिकर्ता को लंबे समय से पूजते आ रहे हैं। हम प्रणी-मात्र की भी सेवा करते हैं। हम पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवता के क्षेत्र में काम करते हैं। जब मैं छोटा था और पहले दिन जंगल से आया था कहा था – यह पहला सबक है ‘किताबें खुदा का कि मखलूख सारी है कुनबा खुदा का’। दूसरा सबक है – ‘मंदिर मत जाओ, मस्जिद मत जाओ तब नहीं कोई मुजायका है, किसी जीव का दुख हर लेना ये घर खास खुदा का है’। तीसरी बात – ‘सदियों की इबादत से बेहतर है वो एक लम्हा जो तूने बिताया है किसी इंसान की खिदमत में’। सब की पूजा। अगला कदम है वॉटर, सैनिटेशन ऐंड हाईजीन। अपने देश में श्रावण से लेकर श्राद्ध तक के महीने के लिए कुछ न कुछ है। श्राद्ध के महीने में हमलोग पेड़ें और पूडिय़ां खिलाते हैं कि पतरों को पहुंचेगी। मैं कहता हूं कि पेड़ें, पूडिय़ां और पकौड़ों की जरूरत नहीं है इस देश को अब। अब तर्पण करने के लिए पेड़ लगाने की जरूरत है। लोगों को यह तय करना है कि अपने जन्मदिन पर वे 35 साल के हुए तो वे संकल्प करें कि वे 35 पेड़ लगाएंगे। लोगों को तय करना है कि पैग को नहीं लगाएंगे लेकिन पेड़ को लगाएंगे। इसे समझने के लिए वेद समझने की जरूरत नहीं है, कल्चर समझने की जरूरत नहीं है।

युवाशक्ति को आह्वान

समस्त शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम कुछ भी कर सकते हो, यह विश्वास करो। मत विश्वास करो कि तुम दुर्बल हो। सब शक्ति तुम में है। तत्पर हो जाओ। तुम में जो देवत्व छुपा हुआ है, उसे प्रकट करो। मृत्यु जब अवश्यम्भावी है, तो कीट-पतंगों की तरह मरने के बजाय वीर की तरह मरना अच्छा है। इस अनित्य संसार में दो दिन अधिक जीवित रहकर भी क्या लाभ? It is better to wear out than to rust out. जराजीर्ण होकर थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हए मरने के बजाय वीर की तरह दूसरों के अल्प कल्याण के लिए भी लड़कर उसी के अन्य कल्याण के लिए भी लड़कर उसी समय मर जाना क्या अच्छा नहीं है?

संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु बन गये हैं। आज संसार जो चाहता है वह है चरित्र। आज ऐसे लोग चाहिए जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण हो। उस प्रेम से कहा गया हर शब्द वज्रवत् प्रभावी होगा।

आलस्य का त्याग करो, त्याग करो इहलोक और परलोक के सुख-भोगों को परमात्मा की ओर ले आओ। मेरे भीतर जो आग जल रही है, वह तुम्हारे भीतर जल उठे, तुम अत्यंत निष्कपट बनो और संसार के रणक्षेत्र में तुम्हें वीरगति प्राप्त न हो- यही मेरी निरंतर प्रार्थना है।…

यह प्रश्न लगातार उभरेगा कि किस प्रकार शिक्षित तथा हुनरमन्द युवाओं को प्रशिक्षित किया जाय? सरकारी तन्त्र को कैसे ऊर्जावान बनाया जाय, निजी निवेशकों, कारपोरेट, तथा अन्य को किस प्रकार प्रेरित किया जाय तथा सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी को कार्यशील बनाया जाय। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की स्थापना की गई है और 2022 तक 50 करोड़ युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक देश का कर्तव्य है कि वह अपने हर युवा को इतनी शिक्षा तथा कौशल प्रदान करे कि वह आत्मविश्वास के साथ देश की प्रगति में योगदान कर सके। इस दिशा में कई कदम तुरन्त उठाये जाने हैं – क्योंकि बाहर के लोग हमारे लिए प्रतीक्षा नहीं करते रहेंगे। साथ ही साथ हमें दीर्घकालीन नीति पर भी विचार करना होगा, उसे लागू कर गति प्रदान करनी होगी। स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण है – वहां कौशलों का, मूल्य शिक्षा का, भारत से परिचय को उचित स्थान देना होगा। हर बच्चे का हस्त कौशल से परिचय प्राप्त कराने ही नहीं, उसे प्रवीणता के स्तर तक ले जाना होगा।
यहां एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष उभरता है शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालयों का। 1970 के बाद विश्वभर में चर्चित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एशियन ड्रामा’ में गुन्नार मिरडल ने लिखा था कि विकासशील देशों के शक्तिस्त्रोत, गुणवत्ता स्त्रोत तो उनके शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय होंगे। वहां से निकले अध्यापक तय करेंगे कि उनके पढ़ाये बच्चे किस स्तर के वैज्ञानिक, इन्जीनियर, प्रबन्धक इत्यादि बनेंगे। भारत ने अपने आचारवान तथा ज्ञानी लोगों को बाहर के देशों में हजारों साल पहले से भेजा है। इन्होंने भाईचारा बढ़ाया है। उन्होंने भारत की संस्कृति की गहनता को लोगों को समझाया तथा ज्ञानार्जन तथा उसके मानवहित में उपयोग की व्यवहारिकता को स्थापित किया। भारत को विश्वगुरू ऐसे ही लोगों के योगदान नें बनाया था। आज फिर एक अवसर आया है: भारतीयों द्वारा विदेशों में अपने देश की प्रतिष्ठा की पुन: स्थापना का। भारत को अपने युवाओं पर पूरा विश्वास है। व्यवस्था उनके साथ न्याय करें, उन्हें तैयार करे, यह उनका अधिकार है।виды ламината фотобиол

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