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युवा भारत, श्रेष्ठ भारत

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

दीपोत्सव के पावन अवसर पर हमारे सभी शुभेच्छु एवं पाठकों को अनेकानेक बधाईयां। अंधेरा मिटाके आलोक प्रज्जवलन करना हमारे देश की महान परंपरा है। प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष के संत, महापुरूष, राष्ट्रभक्त और वैज्ञानिकगण पूरे विश्व को बौद्धिक विकास की दिशा दे रहे है। हमारे शास्त्र, हमारी परंपरा पूरे विश्व में अद्वितीय है। एक अनुशासित जीवन-शैली के साथ सादा जीवन एवं श्रेष्ठ विचार को लेकर, ‘स्वयं ही नहीं, राष्ट्र सभी के लिए सर्वोपरि’ यह हमारा विचार है। छात्रावस्था से ही हम अपने बच्चों को सिखाते हैं – मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव:, अतिथिदेवो भव:! किसी को आहत न करके और सभी को सम्मान देते हुए समाज और देश को कैसे सुदृढ़ बनाना और पूरे विश्व का मंगल करना है, यह भी हमारा ध्येय है। आज महसूस होने लगा है कि पूरा विश्व सही दिशा से भटक गया है। ऐसे समय में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। कहा जाता है – ‘माना कि अंधेरा घना है, लेकिन दीया जलाना कहां मना है।’ आज लगता है कि जो हमारे पूर्वज और महापुरूषों ने कहा था, उसका समय आ गया है। अब भारत को विश्वगुरू का स्थान प्राप्त कर लेना चाहिए। आंकड़ें कहते हैं कि आज भारत युवा पीढ़ी का देश है। अब सब के मन में नई उम्मीदें है, आत्मविश्वास भरा हुआ है, इसलिए आज पूरे विश्व की नजर भारत पर है। स्वामी विवेकानंद ने भारत के युवाओं को कहा था -‘उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत (उठो जागो और सत्य को जानो)’। आज इस उक्ति का महत्व बढ़ गया है। हमारे युवा मानस को श्रेष्ठ बनने का समय आ गया है। इधर-उधर को ना देखकर अपने संस्कार एवं विचार को अपना लेना हमारे युवाओं का परम कत्र्तव्य होना चाहिए।

दिल्ली में दिसंबर 2012 में 23 वर्षीया छात्रा के साथ दुष्कर्म की बर्बर घटना के बाद यौन उत्पीडऩ कानून में बदलाव की सिफारिश के लिए गठित न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति ने देश में नौजवानों की आर्थिक हताशा को गंभीर समस्या बताया था। न्यायमूर्ति वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में ‘नाउम्मीद नौजवानों की जमात’ की बात की थी, जो हताशा में महिलाओं को अपने बर्बर हमले का शिकारबनाते हैं। बकौल रिपोर्ट, ”ये नौजवान ‘ऐसी अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाने की जंग लड़ रहे हैं जो उन्हें सिर्फ अस्थायी काम की ही पेशकश करती है।’’ ये बातें आम-सी लग सकती हैं, लेकिन इसे खास संदर्भ में देखा जाए तो यह हमारे देश के नौजवानों की नाउम्मीदी और हताशा का अंदाजा देती हैं।

प्राचीन सभ्यता वाला देश भारत आज सबसे युवा देश है। ऐसा लगता है कि आज भारत में दो तरह के बशिंदे हैं। एक का संबंध पुरानी पीढ़ी से है, जिसे कुछ हद तक पुरातनपंथी माना जा रहा है, तो दूसरे का संबंध पाश्चात्य से है, जो एकदम उलट विचारों में यकीन करता है। चाहे बेंगलुरु का सूचना तकनीक का विशाल केंद्र हो या बड़ा होता शहर नागपुर हो, या फिर भुवनेश्वर, त्रिची जैसे छोटे शहर हों, हर जगह देश के नौजवान आगे बढऩे को उतावला है। पिछले दो दशकों में उदारीकरण से देश में बनीं संभावनाओं और नए अवसरों को वे हासिल करना चाहते हैं।

08-11-2014

आज देश के शहरों में हर तीसरा आदमी नौजवान है। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा में 15 से 24 वर्ष की उम्र वाले युवा माने जाते हैं। इस हिसाब से भारत में करीब 24 करोड़ युवा हैं, यानी 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के करीब 20 प्रतिशत। यह संख्या 2001 के आंकड़ों से 19.5 करोड़ से ज्यादा है। भारत में लोगों की औसत आयु 25 वर्ष है। इसका मतलब यह हुआ कि हमारी आधी आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है और बाकी उससे ज्यादा की। 2001 में 15-34 वर्ष के आयु वर्ग की आबादी 35.3 करोड़ थी, जो बढ़कर 2011 में 43 करोड़ हो गई। मौजूदा आकलनों के हिसाब से 2021 में 46.4 करोड़ युवा आबादी होगी और 2026 में थोड़ी घटकर 45.8 करोड़ रह जाएगी। हमारी तुलना में कनाडा में महज 12 प्रतिशत आबादी ही युवा है और वहां की औसत उम्र 40 वर्ष है।

पश्चिम के साथ ही जापान और चीन तक में बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है। भारत को अपने इसी जनसंख्या बढ़त से उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त लाभ मिल जाता है और अर्थशास्त्रियों के मुताबिक उसे सकल घरेल उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर में 2 प्रतिशत का लाभ हासिल हो जाएगा। तो, इन आंकड़ों का भारत के लिए क्या अर्थ निकलता है? इनका मतलब है कि करोड़ों युवा देश में रोजगार और जीवनसाथी की तलाश में हैं या जल्दी ही होंगे। अगर उनकी उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो उनमें हताशा भर सकती है। कुछ समाजशास्त्रियों के मुताबिक यही हताशा बढ़ते अपराध के रूप में प्रदर्शित होता है।

क्या न्यायमूर्ति वर्मा की रिपोर्ट यह बताती है कि देश के युवाओं की हताशा महिलाओं के खिलाफ बढ़ते यौन उत्पीडऩों के रूप में दिख रही है? आदमी में ऐसी प्रवृत्ति कई वजहों से पैदा हो सकती है, लेकिन इसमें आर्थिक-सामाजिक हताशा की भी भूमिका हो सकती है। इधर-उधर भटकने को भी मटरगस्ती कहते हैं और खाली बैठने वालों को भी यही कहा जाता है।

भारत में 1991 से अधूरे आर्थिक उदारीकरण से देश में अकुशल और कम शिक्षित लोगों के लिए कुछ ही रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। देश में पिछले दो दशकों में मुख्यत: सूचना तकनीक से बने सेवा क्षेत्र में वृद्धि दिखी है। इससे पढ़े-लिखे और कुशल लोगों को नौकरियों के अवसर तो बढ़े हैं लेकिन उत्पादन क्षेत्र में उतना इजाफा न होने से कम कुशल लोगों के लिए नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही हैं। ऐसे नौजवानों के पास रिक्शा चलाने या सड़कों पर खोमचे लगाने के अलावा कोई चारा नहीं है। आज देश की नौजवान पीढ़ी में ऐसे लोगों की ही तादाद बढ़ रही है।

बेरोजगारी और अद्र्ध-बेरोजगारी का आकलन आसान नहीं है, क्योंकि करीब 90 प्रतिशत भारतीय श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है, जिसका कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जनसंख्या के आकार में परिवर्तन के इस दौर में शिक्षा के मामले में क्षेत्रीय गैर-बराबरी के कारण पूरे देश को इसका समान लाभ नहीं मिल रहा है। दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों को तो आर्थिक वृद्धि का लाभ मिला, क्योंकि इन्हीं राज्यों में प्रशिक्षित नौजवानों की 63 प्रतिशत आबादी है। औपचारिक रूप से प्रशिक्षित युवाओं की सबसे ज्यादा आबादी केरल के बाद महाराष्ट्र, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में है। प्रशिक्षण पाने वालों की संख्या के मामले में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है तो बिहार सबसे नीचे।

देश के हर क्षेत्र में अवसरों के मामले में भारी गैर-बराबरी और शिक्षा का अभाव बड़ी समस्या बनी हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक गांवों की तुलना में शहरी युवाओं के पास 93 प्रतिशत अधिक अवसर उपलब्ध होते हैं।

सामान्य धारणाओं के विपरीत, देश का युवा जानता है कि उसे जिंदगी में क्या चाहिए। नौजवानों में अपने और अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करने की उत्कट आकांक्षा होती है। वे अपनी संभावनाओं को बेहतर बनाना चाहते हैं और समाज में उच्ची हैसियत पाना चाहते हैं। मौजूदा युवा पीढ़ी सुरक्षित खेलने में यकीन नहीं करती। वह कुछ अलग तरह से सोच कर जोखिम लेने को तैयार रहती है। आज की पीढ़ी में पुरानी पीढ़ी वाली असुरक्षाबोध और भय नहीं है।

इस पीढ़ी की दूसरी खासियत इसकी मुखरता है। पिछली पीढ़ी के मुकाबले यह अधिक मुखर है, सिर्फ फेसबुक या ट्विटर पर ही नहीं, बल्कि सड़क पर भी वह आवाज बुलंद करती है। पिछले कुछ साल में लगातार प्रदर्शन इसकी मिसाल है।

आज की पीढ़ी भी पिछली पीढ़ी की ही तरह देशभक्त है। वे भारत को हर क्षेत्र में सबसे ऊपर देखना चाहते हैं। उन्हें दुनिया और विभिन्न संस्कृतियों की जानकारी बहुत है।

आज युवा सबसे बड़ा वोट बैंक भी है। वे रोजमर्रा के जीवन में एक तरह के आदर्श के लिए लड़ रहे हैं। उनकी जरूरतें रोजगार, आवास, महंगाई घटना और आसान शर्तों पर सुरक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और वित्तीय सुविधाएं हासिल करना है। वे अपने सपने साकार करना चाहते हैं, उनकी दीर्घकालिक चाहत न्याय, गरिमा और शिकायतों का तेजी से समाधान हासिल करने की भी है। वे मंदिर-मस्जिद, युद्ध और आरक्षण जैसे मुद्दों को अपनी आकांक्षाओं से अलग पाते हैं।

मोदी जी ने दीवाल पर लिखी इस इबारत को पढ़ लिया है। तो, भारत के युवाओं के लिए क्या ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं?

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