ब्रेकिंग न्यूज़ 

विश्व की निगाह है युवा भारत पर

विश्व की निगाह है युवा भारत पर

By जगमोहन सिंह राजपूत

तीन चार दशक पहले तक भारत की बढ़ती जनसंख्या विकसित देशों की बड़ी चिन्ता का कारण थी। आज स्थिति बदल गई है। विकसित देश ही नहीं, अनेक अन्य देश भी जब भारत की युवाशक्ति की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं। अब यह सर्वविदित है कि अनेक देशों में वयोवृद्ध लोगों का प्रतिशत बढ़ रहा है और उन्हें अपनी व्यवस्थाओं को चलाने के लिये बाहर से प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता होने लगी है और यह लगातार बढ़ रही है। इसके विपरीत भारत में युवाओं की संख्या बढ़ रही है। यहां 65 करोड़ लोगों की आयु 35 वर्ष से कम है। 54 प्रतिशत लोगों की आयु 25 वर्ष से कम है। अनुमान है कि 2025 तक 30 करोड़ लोग कार्यशील आयुवर्ग में प्रवेश करेंगे या दुनिया का एक चौथाई होगा। भारत में 15-34 आयुवर्ग में 1970 में 17.4 करोड़ लोग थे, जो 2000 में बढ़कर 35.4 करोड़ हो गये। 2030 तक यह संख्या 48.5 करोड़ पर पहुंच जाएगी। भारत के बाहर तथा अन्दर भी अनेक लोग इसे भारत की जनसंख्या का स्वर्णिमकाल कहते हैं। आशय स्पष्ट है: भारत के युवाओं को कार्य करने के अवसर अनेक क्षेत्रों में उपलब्ध हैं तथा अनेक देशों के दरवाजे उनके लिये खुले हैं: रेड कार्पेट उनका इन्तजार कर रही है। वे बुलाने को तैयार हैं मगर क्या हम जाने के लिये तैयार हैं?

पहले भारत की आन्तरिक स्थिति देखें। उदाहरण लें अध्यापकों का: अध्यापकों के खाली पदों के आंकड़े यद्यपि दस-बारह लाख के आस-पास हैं। वास्तव में यह संख्या इससे भी काफी अधिक है। छ:-सात लाख पैरा-टीचर्स लगाये गये हैं। रेलवे, वैज्ञानिक संस्थान, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, सेना, पुलिस लगभग हर क्षेत्र में लोगों की कमी है। सुयोग्य उम्मीदवार मिलते नहीं है – वैसे नियुक्तियों के तरीके भी इसके लिये जिम्मेवार होते हैं। व्यवसायिक शिक्षा के लिए निजी निवेशकों का इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आगमन हुआ है, जो समय की आवश्यकता है, मगर इससे अनेक समस्यायें भी पैदा हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण है – प्रशिक्षण में गुणवत्ता की कमी तथा रोजगार देने वालों की जरूरतों की अनदेखी। इसी का परिणाम है कि प्रतिवर्ष चार लाख इन्जीनियर प्रशिक्षित होकर निकलते हैं, मगर केवल एक चौथाई ही अपेक्षित स्तर पर खरे उतरते हैं। कारण स्पष्ट है: यदि संस्थान केवल ‘लाभांश’ पर ध्यान केन्द्रित करेगा तब ऐसा होगा ही। यहां एक अन्य तथ्य से भी उजागर होता है – अब प्रतिवर्ष इन्जीनियरिंग तथा प्रबन्धन के सैकड़ों महाविद्यालय बन्द हो रहे हैं – जबकि आवश्यकता तो हजारों नये महाविद्यालयों की है। प्रतिवर्ष 13 करोड़ का नामांकन प्राथमिक शालाओं में होता है और केवल 1.2 करोड़ स्नातक प्रतिवर्ष तैयार होते हैं। उच्चशिक्षा में भागीदारी के प्रतिशत को 25 तक बढ़ाने के सघन प्रयास आवश्यक हैं। युवा जनसंख्या के लिए सुनहरे अवसर देश में तथा विशेषकर विदेश में तभी अपेक्षित लाभ दे पायेंगे जब यहां के प्रशिक्षण की गुणवत्ता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो तथा उसे वैसी स्वीकार्यता मिले।

इसका प्रारम्भ कहां से होगा – सबसे पहले सरकारी स्कूलों की कमियों को दूर करने का विशेष अभियान व्यवहारिक रूप से निर्धारित समय सीमा में चलाना तथा पूरा करना होगा। सरकारी सूत्र तो यही कहेंगे कि वे कई अभियान ‘सफलतापूर्वक’ चला रहे हैं: शिक्षा के अधिकार अधिनियम का क्रियान्वयन, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान, साक्षरता अभियान, इत्यादि। यह आवश्यक हैं मगर गुणवत्ता पर केन्द्रित होने की स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं। सरकारी तन्त्र द्वारा पोषित विश्वविद्यालयों तक की स्थिति में अनेक सुधार करने होंगे। शोध की गुणवत्ता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा व्यवस्था की साख बनाती है। इसे प्रोत्साहन देना आवश्यक है। इसकी गुणवत्ता में सुधार करना होगा।

भारत के युवाओं के लिये विदेशों में जो अवसर खुलते जा रहे हैं उसके आयाम केवल रोजगार प्राप्त करने तक सीमित नहीं हंै। यहां यह याद करना उपयुक्त होगा कि सबसे पहले भारतीय युवाओं नें अन्तरिक्ष विज्ञान की अमेरिकी संस्था, नासा में अपनी कर्मठता तथा लगनशीलता का लोहा मनवाया। उसके बाद ‘सिलिकान वैली’ में भारतीय छा गये। उनके नवाचार सारे विश्व में प्रशंसा प्राप्त करते रहते हैं। इनके कारण भारत की अपार ‘बौद्धिक सम्पदा’ की ओर विश्व का ध्यान गया। इसी के साथ भारत की संस्कृति, इतिहास, ज्ञान परम्परा तथा दर्शन की ओर विश्व का आकर्षण बढ़ा है। सामाजिक सुरक्षा की भारत की संयुक्त

परिवार परम्परा का लोहा सभी आधुनिकता से ओतप्रोत देश भी मानने लगे हैं। भारतीय जहां भी गये, उन्होंने भारत का नाम सदा उंचा किया। जो युवा आज बड़ी संख्या में विदेश जा सकते हैं वे भी अपने आचार-विचार तथा व्यवहार से भारत के सांस्कृतिक दूत का दायित्व निर्वाह करेंगे। इससे विभिन्न राष्ट्रों से भारत के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता बढेगी। यह उपलब्धियां अपने में आर्थिक उपलब्धियों से भी अधिक महत्वपूर्ण होगी।

युवाशक्ति को आह्वान

08-11-2014

समस्त शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम कुछ भी कर सकते हो, यह विश्वास करो। मत विश्वास करो कि तुम दुर्बल हो। सब शक्ति तुम में है। तत्पर हो जाओ। तुम में जो देवत्व छुपा हुआ है, उसे प्रकट करो। मृत्यु जब अवश्यम्भावी है, तो कीट-पतंगों की तरह मरने के बजाय वीर की तरह मरना अच्छा है। इस अनित्य संसार में दो दिन अधिक जीवित रहकर भी क्या लाभ? It is better to wear out than to rust out. जराजीर्ण होकर थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हए मरने के बजाय वीर की तरह दूसरों के अल्प कल्याण के लिए भी लड़कर उसी के अन्य कल्याण के लिए भी लड़कर उसी समय मर जाना क्या अच्छा नहीं है?

संसार के धर्म प्राणहीन उपहास की वस्तु बन गये हैं। आज संसार जो चाहता है वह है चरित्र। आज ऐसे लोग चाहिए जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण हो। उस प्रेम से कहा गया हर शब्द वज्रवत् प्रभावी होगा।

आलस्य का त्याग करो, त्याग करो इहलोक और परलोक के सुख-भोगों को परमात्मा की ओर ले आओ। मेरे भीतर जो आग जल रही है, वह तुम्हारे भीतर जल उठे, तुम अत्यंत निष्कपट बनो और संसार के रणक्षेत्र में तुम्हें वीरगति प्राप्त न हो- यही मेरी निरंतर प्रार्थना है।…

यह प्रश्न लगातार उभरेगा कि किस प्रकार शिक्षित तथा हुनरमन्द युवाओं को प्रशिक्षित किया जाय? सरकारी तन्त्र को कैसे ऊर्जावान बनाया जाय, निजी निवेशकों, कारपोरेट, तथा अन्य को किस प्रकार प्रेरित किया जाय तथा सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी को कार्यशील बनाया जाय। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की स्थापना की गई है और 2022 तक 50 करोड़ युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक देश का कर्तव्य है कि वह अपने हर युवा को इतनी शिक्षा तथा कौशल प्रदान करे कि वह आत्मविश्वास के साथ देश की प्रगति में योगदान कर सके। इस दिशा में कई कदम तुरन्त उठाये जाने हैं – क्योंकि बाहर के लोग हमारे लिए प्रतीक्षा नहीं करते रहेंगे। साथ ही साथ हमें दीर्घकालीन नीति पर भी विचार करना होगा, उसे लागू कर गति प्रदान करनी होगी। स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण है – वहां कौशलों का, मूल्य शिक्षा का, भारत से परिचय को उचित स्थान देना होगा। हर बच्चे का हस्त कौशल से परिचय प्राप्त कराने ही नहीं, उसे प्रवीणता के स्तर तक ले जाना होगा।
यहां एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष उभरता है शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालयों का। 1970 के बाद विश्वभर में चर्चित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एशियन ड्रामा’ में गुन्नार मिरडल ने लिखा था कि विकासशील देशों के शक्तिस्त्रोत, गुणवत्ता स्त्रोत तो उनके शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय होंगे। वहां से निकले अध्यापक तय करेंगे कि उनके पढ़ाये बच्चे किस स्तर के वैज्ञानिक, इन्जीनियर, प्रबन्धक इत्यादि बनेंगे। भारत ने अपने आचारवान तथा ज्ञानी लोगों को बाहर के देशों में हजारों साल पहले से भेजा है। इन्होंने भाईचारा बढ़ाया है। उन्होंने भारत की संस्कृति की गहनता को लोगों को समझाया तथा ज्ञानार्जन तथा उसके मानवहित में उपयोग की व्यवहारिकता को स्थापित किया। भारत को विश्वगुरू ऐसे ही लोगों के योगदान नें बनाया था। आज फिर एक अवसर आया है: भारतीयों द्वारा विदेशों में अपने देश की प्रतिष्ठा की पुन: स्थापना का। भारत को अपने युवाओं पर पूरा विश्वास है। व्यवस्था उनके साथ न्याय करें, उन्हें तैयार करे, यह उनका अधिकार है।

михаил безлепкинкак правильно

Leave a Reply

Your email address will not be published.