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अकेले भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी

अकेले भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी

विरोधी जब वास्तविक मुद्दों पर सरकार को घेरने में नाकाम रहते हैं तो उनके पास कहने को क्या रह जाता  है? अक्सर, बड़ी चालाकी से वे किसी ऐसे मुद्दे के पीछे पड़ जाते हैं जो सारी बातों से अलग रख कर देखने पर नकारात्मक दिखता है। उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी की 5 प्रतिशत विकास दर को लें जिसे मोदी सरकार के नेतृत्व में हुए विकास को चुनौती देने के लिए गिनाया जा रहा है। यह सच है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती आई है, और भारत अब दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं रहा और खपत कम हो गई है। सरकार के आलोचकों को इन आंकड़ों में जैसे बहुत बड़ा हथियार मिल गया और राफेल घोटाले की फ्लॉप नौटंकी के बाद जो खेमा शांत पड़ गया था वह अचानक ही शोर मचाने लगा है। निश्चित रूप से, इन आंकड़ों को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन हमें इसके साथ ही इस मंदी से जुड़े तथ्यों का भी पता लगाना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि यह सरकार की विफलता है या नीति निर्माताओं के नियंत्रण से बाहर के कारकों का परिणाम?

अमेरिकी केन्द्रीय बैंकिंग प्रणाली जिसे फेडरल रिजर्व कहते हैं, और जो मौद्रिक नीति तय करती है, उसने इस साल जुलाई में नीतिगत दरों में कटौती की है जो दस वर्षों में पहली बार हुआ है। जानकारों ने इस कदम के कई कारण बताए हैं। उनमें सबसे बड़ी वजह सुस्त पड़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था को बताया गया है जिस पर दुनिया के कई देशों के बीच व्यापार के विवादों की बड़ी बुरी मार पड़ी है। ये वो देश हैं जो संरक्षणवादी और केवल अपने हितों को देखने का रुख अख्तियार कर चुके हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व अमेरिका ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले चीन के खिलाफ एक ऐसा व्यापार युद्ध छेड़ रखा है जिसका कोई जोड़ नहीं। झगड़े पर उतरे दोनों ही देशों ने एक दूसरे की वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा दिए और विवाद का हल निकालने के लिए अब तक हुई बातचीत का भी कोई नतीजा नहीं निकला है। विश्लेषकों का अनुमान है कि फेड दरों में अभी और भी 100 बेसिस प्वाइंट की कटौती कर सकता है ताकि आर्थिक गतिविधियों को ठप पडऩे से रोका जा सके, वहीं अर्थशास्त्रियों को अमेरिका में ‘हल्की मंदी’ आती दिख रही है।

वैसे तो हम भारतीय लोग चीन की साम्यवादी विचारधारा के साथ ही अपने जाल में फंसा लेने वाले उसके कर्जों और राजनीतिक तथा आर्थिक दबंगई की प्रवृत्ति के कारण लगभग एकमत से उससे नफरत करते हैं, लेकिन यह भी सच है कि चीन की आर्थिक तरक्की की कहानी शोध का भी विषय रही है। भारत सरकार और उसकी नीतियों के आलोचकों ने खबरों की उन हेडलाइंस को जानबूझकर नजरअंदाज किया है जिनमें बताया गया कि चीन की जीडीपी विकास दर 27 साल के सबसे निम्न स्तर पर पहुंच गई है। जी हां, वित्त वर्ष 2020 की अप्रैल-जून तिमाही में, चीन की जीडीपी 6.2 प्रतिशत से बढ़ी, जो लगभग तीन दशक में सबसे लचर है। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले देश ने अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के कारण निर्यातों पर हुए भयंकर प्रहार के बीच प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए बैंकों के रिजर्व की आवश्यकता के अनुपात और करों में पर्याप्त कटौती की घोषणा की है। हाल ही में, अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने अपने अनुमानों में चीन के संभावित विकास की दर को कई कारणों से 6 प्रतिशत के नीचे ही रखा है। ‘चीन के विकास की महान गाथा’ को जबरदस्त झटका लगा है।

चलिए अब जापान की बात कर लेते हैं, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जापान के केन्द्रीय बैंक के गवर्नर ने आर्थिक मंदी से उबरने की जापान की संभावनाओं को धूमिल करने वाले अंधाधुंध वैश्विक व्यापार युद्ध को देखते हुए ‘पहले से ही कार्यवाही’ का वचन दिया है। जापान में, नीतिगत दर पहले से ही अति-निम्नतम स्तर पर हैं और जीडीपी विकास दर के साथ ही मुद्रास्फीति अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पा रही है। जापान की अर्थव्यवस्था पर संरक्षणवाद की मार पड़ी है और अमेरिका-चीन व्यापार विवाद ने जापानी निर्यात पर कुठाराघात किया है। यही कोई कम नहीं था कि जापान ने दक्षिण कोरिया के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ दिया और इस आरोप के साथ दक्षिण कोरिया को होने वाले जापानी निर्यात पर पाबंदियां लगा दी कि वह उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम में मदद कर रहा है। जवाबी कार्रवाई के तहत, बड़ी संख्या में दक्षिण कोरियाई लोगों ने जापानी उत्पादों से किनारा कर लिया और एशिया की दो निर्यात-आधारित शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं के बीच का व्यापार विवाद निश्चित रूप से व्यापक दुष्परिणामों का कारण बनेगा।

यहां तक कि पश्चिमी देशों की हालत भी खराब है। अगर ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (अमेरिका को फिर से महान बनाओ) का राग छेड़ रखा है, तो यूरोप में ब्रेक्सिट के चलते अर्थव्यवस्था में मंदी आई है। यूरोजोन में मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है और निर्माण क्षेत्र सुस्त पड़ा है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि यूरोपीय केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के लिए निकट भविष्य में दरों में कटौती करेगा। ब्रिटेन के ईयू से अलग होने को लेकर बनी अनिश्चितता और मांग में कमी ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं जिसे केन्द्रीय बैंक ने मंदी माना है। एक अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था, कनाडा में उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा) को लेकर ट्रंप के नकारात्मक रुख के साथ ही करों में बढ़ोतरी ने नीति निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है। मेक्सिको को भी अमेरिका को किए जाने वाले अपने निर्यात पर करों में बढ़ोतरी की आशंका है और उसने अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर उमड़ते शरणार्थियों पर लगाम लगाने की ट्रंप की मांग के आगे घुटने टेक दिए हैं।

पश्चिमी एशिया की बात करें तो सऊदी अरब ने तेल की कीमतों पर बढ़ते दबाव के चलते पहले ही कच्चा-तेल आधारित अर्थव्यवस्था से प्रस्थान की घोषणा कर दी है जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी प्रतिबंधों से जूझ रहा है। गौर करने वाली बात है कि कच्चे तेल की कीमतों में किसी भी भारी गिरावट को रोकने के लिए ओपेक बार-बार उत्पादन में कटौती (कटौती में रूस की सहमति के साथ) करता रहा है और पाबंदियों के कारण ईरानी कच्चा तेल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में नहीं बिक रहा, फिर भी कच्चे तेल की कीमतें नहीं बढ़ी हैं। इसका कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई मंदी है जिसके चलते दुनिया भर के उद्योगों ने, विशेष रूप से भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के उद्योगों ने तेल का इस्तेमाल कम कर दिया है। मंदी के कारण ही दुनिया भर में शरणार्थियों की एक अप्रत्याशीत भीड़ देखी जा रही है जो अपनी-अपनी तबाह हुई अर्थव्यवस्था से भाग कर अमीर देशों में सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं। पूरे विश्व में खपत कम हुई है और जो मंदी आई है उसका असर कुछ लोगों पर ही नहीं बल्कि सभी पर पड़ा है।

इस रोशनी में, भारत को हमें एक चमकते देश के तौर पर देखना चाहिए। यहां की सरकार ने सुधारवादी रुख अपनाया है और राजनीतिक कीमतों की चिंता किए बगैर सामाजिक-आर्थिक नीति संबंधी कदमों को लगातार उठा रही है। हां, यह सच है कि सरकार को उतना राजस्व नहीं मिल रहा है जिसकी उम्मीद थी, लेकिन इसकी उम्मीद की जा सकती है कि नीति में जीएसटी जैसे बदलाव के स्थिर होने और फिर परिणाम देने में थोड़ा वक्त लगेगा। हाल ही में, जीएसटी के राजस्व में सुधार हुआ है और करदाताओं की संख्या में वृद्धि से अधिक आय का होना निश्चित है, जिससे सरकार बुनियादी संरचना और कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक खर्च कर सकेगी। वित्त मंत्रालय वर्तमान परिस्थितियों से इनकार करने की मुद्रा में नहीं है और निवेशकों में विश्वास जगाने तथा आर्थिक गतिविधि को बढ़ाने के कदम उठाए गए हैं। भारतीयों ने मोदी सरकार में अपना व्यापक भरोसा जताया है और वक्त आ गया है जब विरोधी अपनी झूठी कहानी सुनाने से बाज आएं और देश की आर्थिक सेहत को लेकर डर फैलाना बंद करें।

डॉ. सुनील गुप्ता

 

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